डॉ. आंबेडकर की यह पुस्तक गुमराह किए गए लोगों को दिखाती है राह

डॉ. आंबेडकर ब्राह्मणों द्वारा प्रायोजित हिंदू धर्मशास्त्रों की पवित्रता का तर्कों खारिज करते हैं। अगर हमें प्रबुद्ध भारत बनाना है तो उनके द्वारा परिकल्पित लोकतांत्रिक भारत बनाना होगा, जिसमें समता, स्वतंत्रता, बंधुत्व और न्याय हो। फारवर्ड प्रेस द्वारा आयोजित वेबिनार में डॉ. अलख निरंजन का संबोधन

बीते 28 फरवरी, 2021 को फारवर्ड प्रेस के तत्वावधान में हाल ही में प्रकाशित पुस्तक “हिंदू धर्म की पहेलियां : बहुजनो! ब्राह्मणवाद का सच जानो” का ऑनलाइन विमोचन व एक परिचर्चा का आयोजन किया गया। परिचर्चा का विषय था – “हिंदी प्रदेशों में ‘हिंदू धर्म की पहेलियां’ का महत्व”। इसकी अध्यक्षता प्रो. कांचा आइलैया शेपर्ड ने की। इस परिचर्चा में प्रो. कालीचरण स्नेही, प्रो. बिलक्षण रविदास, प्रो. चंद्रभूषण गुप्त, अलख निरंजन, शिवचंद्र राम व रिंकू यादव ने भाग लिया। इस कार्यक्रम का संचालन फारवर्ड प्रेस के प्रबंध संपादक अनिल वर्गीज तथा धन्यवाद ज्ञापन पुस्तक के संकलक, संपादक और संदर्भ टिप्पणीकार डॉ. सिद्धार्थ ने किया। प्रस्तुत है इस कार्यक्रम में डॉ. अलख निरंजन के संबोधन का संपादित अंश : 

परिचर्चा : हिंदी प्रदेशों में ‘हिंदू धर्म की पहेलियां’ का महत्व

  • अलख निरंजन

फारवर्ड प्रेस द्वारा ‘हिंदू धर्म की पहेलियां’ का एनोटेटेड संस्करण का हिंदी में प्रकाशन आज के समय में बेहद जरूरी है। बाबासाहेब डॉ. भीमराव आंबेडकर ने वर्ष 1954-55 में ‘रिडल्स ऑफ हिंदुइज्म’ शीर्षक से अंग्रेजी में यह पुस्तक लिखी थी। जब वे लिख रहे थे तब जिन खतरों को भांप गए थे, वह खतरा आज हमारे समक्ष आ चुका है। मैं पुस्तक पर चर्चा करते हुए डॉ. आंबेडकर की चिंतन पद्धति का उल्लेख करना चाहता हूं। कोलंबिया विश्वविद्यालय में उन्होंने 1916 में एक शोध पत्र प्रस्तुत किया था, जिसका शीर्षक था – ‘भारत में जातियां : उनका तंत्र, उत्पत्ति और विकास’। इसके बाद 1936 में उन्होंने ‘एनिहिलेशन ऑफ कास्ट’ की रचना की। यह उनका भाषण था जिसे वे जात-पांत तोड़क मंडल के लाहौर अधिवेशन में देने वाले थे। लेकिन उन्हें ऐसा नहीं करने दिया गया। फारवर्ड प्रेस द्वारा इस किताब का एनोटेटेड संस्करण भी प्रकाशित किया गया है और इस किताब में डॉ. आंबेडकर के उपरोक्त शोध पत्र को भी शामिल किया गया है।

यह कहने की आवश्यकता नहीं कि डॉ. आंबेडकर ने अपना पूरा जीवन इस उद्देश्य के साथ जीया कि भारत के वंचितों को समुचित हिस्सेदारी समाज के हर क्षेत्र में कैसे मिले। यही वजह रही कि अपने जीवन के अंतिम वर्षों 1954-55 में ‘हिंदू धर्म की पहेलियां’ (रिडल्स इन हिंदुइज्म) के बाद उन्होंने अंतिम किताब ‘बुद्धा एंड धम्मा’ लिखी। अपने इस चिंतन प्रक्रिया में वे जाति की उत्पत्ति के प्रश्न पर चिंतन करते हुए बुद्ध तक पहुंचते हैं। इस चिंतन पद्धति में वे कुछ बिंदुओं को रेखांकित करते हैं, जिनसे स्पष्ट होता है कि जाति-व्यवस्था भारत की प्रमुख समस्या है, जो लोगों के प्रगति में सबसे बड़ी बाधा है। 1916 के अपने पहले शोध में वे जाति व्यवस्था के उदय, उसके तंत्र और कार्यप्रणाली के बारे में बताते हैं कि कैसे यह व्यवस्था लोगों के विकास में बाधक है। वहीं 1936 में ‘एनिहिलेशन ऑफ कास्ट’ पुस्तक में वह जाति-व्यवस्था को खत्म करने के संदर्भ में सभी आंदोलनों- गांधी के आंदोलन, हिंदू महासभा और वामपंथी आंदोलनों समेत विभिन्न विचारधारा के आंदोलनों की समीक्षा करते हैं। वे इस निष्कर्ष पर पहुंचते हैं कि जाति-व्यवस्था कोई स्वतंत्र इकाई नहीं है। ये हिंदू धर्म का अंग है। हिंदू धर्म का आचार और व्यवहार हिंदू धर्मशास्त्रों द्वारा निर्धारित है। जब तक हिंदू धर्म शास्त्रों में हिंदुओं की आस्था बनी रहेगी, तब तक हम जाति व्यवस्था का कुछ भी बिगाड़ नहीं सकते। वे कहते हैं कि अगर जाति-व्यवस्था खत्म करनी है तो हिंदू धर्म को खत्म करना होगा। हिंदुओं को हिंदू धर्मग्रंथ व शास्त्रों द्वारा निर्मित आस्थाओं से मुक्त कराना होगा। इसीलिए उन्होंने ‘हिंदू धर्म की पहेलियां’ पुस्तक के माध्यम से उन आस्थाओं के खोखलेपन को उजागर करने का प्रयास किया है। जाति कैसे पैदा होती है? विनाश कैसे हो सकता है? इन प्रश्नों पर हमें गंभीरता से चिंतन करना चाहिए।

फारवर्ड प्रेस द्वारा प्रकाशित पुस्तक “हिंदू धर्म की पहेलियां : बहुजनो! ब्राह्मणवाद का सच जानो” का कवर पृष्ठ व डॉ. अलख निरंजन की तस्वीर

डॉ. आंबेडकर ब्राह्मणों द्वारा प्रायोजित हिंदू धर्मशास्त्रों की पवित्रता का तर्कों खारिज करते हैं। अगर हमें प्रबुद्ध भारत बनाना है तो डॉ. आंबेडकर द्वारा परिकल्पित लोकतांत्रिक भारत बनाना होगा, जिसमें समता, स्वतंत्रता, बंधुत्व और न्याय हो। हमें इन मूल्यों का निर्माण करना होगा। इसके लिए हमें बौद्ध धर्म की शिक्षाओं की तरफ जाना होगा।

बाबासाहेब ‘हिंदू धर्म की पहेलियां’ किताब की प्रस्तावना में लिखते हैं कि इस पुस्तक का पहला उद्देश्य ब्राह्मण धर्मग्रंथों में ब्राह्मणों द्वारा प्रतिपादित आस्थाओं के दार्शनिक पहलू को बताना, उसकी सच्चाई को उजागर करना है। दूसरा, गैर ब्राह्मणों को यह बताना कि ब्राह्मणों ने कैसे उन्हें आस्था के दलदल में फंसा दिया ताकि वे तार्किक चिंतन नहीं कर सकें। इन दोनों उद्देश्यों का ध्यान से विश्लेषण करें तो डॉ. आंबेडकर हिंदू समाज में ब्राह्मण और गैर-ब्राह्मण की एक बड़ी विभाजन रेखा खींचते हैं। जब वेदों की पहेलियों की बात आती है तब वे कहते हैं कि आखिर ब्राह्मणों ने वेदों को अपौरुषेय क्यों घोषित किया? वे इसका कारण बताते हैं कि ऋग्वेद के दसवें मंडल जिसे पुरुष सूक्त कहा जाता है, में वर्ण व्यवस्था की स्थापना को मान्यता दी गयी है। उस वर्ण व्यवस्था की स्थापना से केवल 10 प्रतिशत लोगों को सारी सुख-सुविधाएं प्राप्त हैं। शेष पशुवत जीवन जीने को मजबूर हैं। 

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डॉ. आंबेडकर के चिंतन में आधी आबादी यानी महिलाएं भी रहीं, जिनके सारे अधिकार एवं हालात शूद्रों जैसे हैं। शूद्रों के समान ही वे ब्राह्मणवादी व वर्णवादी व्यवस्था के अधीन अधिकारविहीन हैं। आज जब हम इस संदर्भ में देखते हैं तब इन दस प्रतिशत द्विज पुरुषों (द्विज महिलाएं नहीं) का हित वर्ण व्यवस्था बनाए रखने में हैं। इसलिए एससी, एसटी, पिछड़ा वर्ग एवं महिलाएं तथा गैर-ब्राह्मणों का हित इस वर्ण व्यवस्था के खात्मे में हैं। डॉ. आंबेडकर ने ब्राह्मण एवं गैर ब्राह्मणों के बीच विभाजन रेखा की बात की है। वे गैर-ब्राह्मणों को बताना चाहते हैं कि कैसे ब्राह्मणों ने उन्हें आस्था के दलदल में फंसा दिया ताकि वे तार्किक चिंतन नहीं कर सकें। यही ‘हिंदू धर्म की पहेलियां’ पुस्तक का उद्देश्य है कि हिंदुओं के आस्था के केंद्र देवी-देवता, धर्मग्रंथ एवं पुराणों से निर्मित आस्थाओं पर तर्क करने के लिए हिंदुओं को विवश करें। अगर नैतिकता के आधार पर, आध्यात्मिकता के आधार पर, मानवीय मूल्यों के आधार पर आप उन देवी-देवताओं पर विश्लेषण करते हैं तो आप पाते हैं कि उनमें ऐसा अध्यात्म व नैतिकता जैसा कुछ भी नहीं है। यह सिर्फ पहेलियां हैं, जिन्हें यह पुस्तक तर्क के आधार पर उद्घाटित करती है। 

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 डॉ. आंबेडकर हिंदुत्व की बात नहीं करते, बल्कि हिंदू धर्म के पहेलियों की बात करते हैं। हिंदू धर्म खुद एक पहेली है। जैसे- कभी इंद्र या सभी देवता आपस में लड़ रहे हैं, इंद्र और कृष्ण लड़ रहे हैं, फिर विष्णु और ब्रह्मा लड़ रहे हैं, ये सारे हिंदुओं के देवता हैं। इनका अगर तार्किक विश्लेषण किया जाए तो इन धर्मग्रंथों अथवा वेदों, पुराणों, स्मृतियों की जिन दार्शनिक ऊंचाईयों की बात की जाती है, उनमें ऐसा कुछ भी नहीं है। हिंदू धर्म के मिथकों के नैतिक आचरण के बारे में डॉ. आंबेडकर कहते हैं कि राम का नैतिक आचरण कैसा है, जब गर्भवती पत्नी की परीक्षा लेते हैं और उसके बाद उसे जंगल में छोड़ देते हैं। अगर गोपियों के प्रसंग, महाभारत में हिंसा के लिए प्रेरित करने का कृत्य तथा छल-कपट करने के लिए उकसाने जैसे कृष्ण के आचरण को लें तो कैसे उनके आचरण को नैतिक कहा जा सकता है? क्या आज आधुनिक मूल्यों के तहत इन नैतिक आचरणों को स्वीकार किया जा सकता है!

डॉ. आंबेडकर प्रबुद्ध भारत के निर्माण का सपना देखते हैं। इसलिए वे उन दार्शनिक बाधाओं का तार्किक विश्लेषण करना जरूरी समझते थे, जिनसे भारतीय समाज का मन-मस्तिष्क जकड़ा हुआ है। इनमें धर्मग्रंथ एवं उनके प्रतीकों की सबसे बड़ी भूमिका है। इसलिए बाबासाहेब हिंदू धर्मग्रंथों की इन पहेलियों की बात करते हैं, वे इस पुस्तक के माध्यम से बताना चाहते हैं कि ये पहेलियां आपस में उलझी हुई हैं। पहेलियों का मतलब ही होता है, कोई बात साफ-साफ समझ में न आये। चिंतन का विषय यह है कि आज भी ये प्रवृत्तियां कायम हैं। ऐसे में बौद्धिक जनों की जिम्मेदारी है कि वे बहुसंख्यक समाज को, जिन्हें ब्राह्मणवादी ताकतें गुमराह कर रही हैं, उनसे मुक्त कराने का प्रयास करें। 

(संपादन : इमामुद्दीन/नवल)


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