डॉ. आंबेडकर के विचारों से हम किसानों को मिलती है ताकत : गुरुनाम सिंह चढूनी

दिल्ली की सीमाओं पर किसान तीन कृषि कानूनों के खिलाफ करीब साढ़े चार महीने से आंदोलनरत हैं। उन्होंने इस बार आंदोलन स्थलों पर डॉ. आंबेडकर की जयंती मनाने का निर्णय लिया है। इस संबंध में सुशील मानव ने किसान नेताओं से बातचीत की

पिछले करीब साढ़े चार महीने से दिल्ली की सीमाओं पर चल रहे आंदोलन को दलित-बहुजन नायकों के विचारों ने वैचारिक मजबूती दी है। आंदोलनकारी किसानों ने जोतीराव फुले, डॉ. आंबेडकर, सर छोटू राम जैसे नायकों को अपना प्रेरणा स्रोत माना। इस संदर्भ में बीते 20 फरवरी, 2021 को किसान नेता गुरुनाम सिंह चढ़ूनी ने किसानों से अपील किया कि किसान अपने घरों में डॉ. आंबेडकर और सर छोटू राम की तस्वीरें लगाएं। इस बार किसानों ने 14 अप्रैल को डॉ. आंबेडकर की जयंती आंदोलन स्थलों पर धूमधाम से मनाने का निर्णय लिया है।

फारवर्ड प्रेस से दूरभाष पर बातचीत में गुरुनाम सिंह चढूनी ने कहा कि “हमारी लड़ाई न केवल सरकार के ख़िलाफ़ है बल्कि पूंजीपतियों के ख़िलाफ़ भी है। डॉ. आंबेडकर के विचारों से हमें प्रेरणा मिलती है। सरकार हमें आज तक विभाजित करती रही है। कभी जाति के नाम पर या कभी धर्म के नाम पर। हम सभी को सरकार की इस साजिश को समझना है और इसके मुकाबले में आपसी भाईचारे को मजबूती प्रदान करने के लिए हमारे दलित भाई अपने घरों में सर छोटूराम की फोटो और अन्य किसान भाई अपने घरों में डॉ. आंबेडकर की तस्वीरें लगा रहे हैं।

किसान नेता गुरुनाम सिंह चढूनी

वहीं, अखिल भारतीय किसान-मजदूर संगठन (एआईकेएमएस) के महासचिव डॉ. आशीष मित्तल ने बताया कि “फासीवाद और ब्राह्मणवादी विचारधारा के खिलाफ़ संघर्ष के लिए डॉ. आंबेडकर के विचार सक्षम उपकरण हैं। यही कारण है कि पहले जहां उनके परिनिर्वाण दिवस 6 दिसंबर के दिन बाबरी मस्जिद पर हमला करके उस दिन को शौर्य दिवस के रूप में विरूपित करने को अंजाम दिया गया। वहीं अब केंद्र की मनुवादी सरकार जाेतीराव फुले जयंती से लेकर आंबेडकर जयंती यानी 11 अप्रैल से लेकर 14 अप्रैल तक ‘टीका उत्सव’ के रूप में मना रही है। इसके लिए ब्रांडिंग और विज्ञापन पर हजारों करोड़ खर्च किये जा रहे हैं। जबकि आंदोलनकारी किसान आंबेडकर जयंती को ‘संविधान दिवस’ और ‘किसान-बहुजन एकता’ के रूप में मनाकर ब्राह्मणवादी सत्ता को जवाब देंगे।”  

दरअसल, संयुक्त किसान मोर्चा द्वारा डॉ. आंबेडकर की जयंती के मौके पर देशभर के किसानों और बहुजन समाज के लोगों को अपील जारी करके कहा गया है कि वे 14 अप्रैल को ‘संविधान दिवस’ के रूप में और ‘किसान बहुजन एकता’ के रूप में मनाएं। संयुक्त किसान मोर्चा ने कहा है कि “डॉ. आंबेडकर ने एक जनपक्षीय, जातिविहीन, शोषणविहीन, महिलाओं को बराबरी देने वाले भारत का सपना देखा था। अपने जीवन के अंतिम क्षणों में संसद से इस्तीफा देने के बाद उन्होंने भूमिहीनों को जीविका के साधन दिलाने पर अपना ध्यान केंद्रित करने की बात कही थी। आरएसएस-भाजपा की सरकार डॉ. आबंडकर का नाम भुनाने में कोई संकोच नहीं करती, पर वह उनके उसूलों को पैरों तले रौंदने में जुटी हुई है।”

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संयुक्त किसान मोर्चा ने कहा है कि जिस संविधान में आजादी के दिये गये कई मौलिक अधिकारों पर आज आरएसएस-भाजपा की मोदी सरकार तीखे व क्रूर हमले कर रही है। अनुसूचित जातियों, जनजातियों तथा पिछड़ी जातियों के आरक्षण के संवैधानिक अधिकार पर राजनीतिक हमला किया जा रहा है और सुप्रीम कोर्ट में याचिकाएं दर्ज कर प्रश्न उठाए/उठवाए जा रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट पर इन प्रावधानों को सख्ती के साथ अमल कराने की जिम्मेदारी है, पर वह इन आरक्षण विरोधी दलीलों को सुन रही है। आज, जब बेरोज़गारी बेइंतहा तेजी से बढ़ रही है और खेती में घाटा व कर्जदारी बढ़ रही है।

संयुक्त किसान मोर्चा ने आगे कहा है कि “कोरोना महामारी में सरकार द्वारा थोपे गए लॉकडाउन में सबसे गंभीर परेशानियां प्रवासी मजदूरों ने झेलीं, जिनका बड़ा हिस्सा पिछड़ी जातियों व बहुजन समाज का था। शहरों में फंसे मजदूरों व निम्न मध्य वर्ग पर बिना रोजगार व बिना पैसे, भूखे मरने या पुलिस यातनाओं को झेलते हुए पैदल घर लौटने की आफत लाद दी गयी। सरकार ने बीमारी रोकेने के नाम पर लोगों से भारी जुर्माना वसूला और किसानों-मजदूरों पर कई केस दर्ज कर उन्हें जेल भेजा। सीएए नागरिकता पर लगाया गया प्रश्न, मुसलमानों के साथ-साथ सभी गरीबों पर भी हमला था। यह सरकार के अहंकारी, गरीब विरोधी और मनुवादी दर्शन का हिस्सा है।” 

(संपादन : नवल)


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