सिंधु घाटी की सभ्यता में शिक्षा : कुछ परिकल्पनाएं

सिंधु सभ्यता, भारत में ‘आर्य सभ्यता’ से कहीं ज्यादा पुरानी है। डेढ़ हजार वर्षों तक वह वैश्विक सभ्यताओं की सिरमौर बनी रही। उस सभ्यता में शिक्षा, संस्कृति, व्यापार और ज्ञान-विज्ञान की क्या स्थिति रही होगी, इस पर विदेशी विद्वानों ने अनेक परिकल्पनाएं विकसित की हैं। इनके बारे में बता रहे हैं ओमप्रकाश कश्यप

ब्राह्मणवाद ने हमारे मन-मस्तिष्क को इस कदर कब्जाया हुआ है कि हम मुक्त मन से कुछ सोच ही नहीं पाते। चर्चा साहित्य, संस्कृति अथवा ज्ञान-विज्ञान के किसी भी स्रोत की हो – खोज का सिलसिला सदैव संस्कृत-ग्रंथों से आरंभ होता है; और वेदादि ग्रंथ मनुष्य की बौद्धिक-यात्रा का पहला पड़ाव मान लिए जाते हैं। यही बात शिक्षा के इतिहास को लेकर है। बाकी चीजों की तरह, भारतीय शिक्षा की शुरुआत भी वैदिक युग से बताई जाती है। जबकि संस्कृत न तो भारत की अकेली भाषा रही है और ना ही ब्राह्मण सबसे पुराने समाज के उत्तराधिकारी हैं।

तथ्य बताते हैं कि सिंधु सभ्यता, भारत में ‘आर्य सभ्यता’ से कहीं ज्यादा पुरानी है। डेढ़ हजार वर्षों तक वह वैश्विक सभ्यताओं की सिरमौर बनी रही। उस सभ्यता में शिक्षा, संस्कृति, व्यापार और ज्ञान-विज्ञान की क्या स्थिति रही होगी, इसपर विदेशी विद्वानों ने अनेक परिकल्पनाएं विकसित की हैं। लेकिन भारतीय मूल की सभ्यता होते हुए भी भारतीयों का ध्यान उनकी ओर कम ही गया है। सिंधु सभ्यता विश्व की सबसे उन्नत नगरीय सभ्यता थी। विकास के उच्च स्तर को बनाए रखने तथा अगली पीढ़ी तक मानव-ज्ञान के समुचित अंतरण हेतु, उसमें मजबूत शिक्षा-तंत्र का होना आवश्यक था। इस संबंध में कई विदेशी विद्वानों ने परिकल्पनाएं प्रस्तुत की हैं। यहां हम उनमें से कुछ की चर्चा करेंगे। भारतीय शिक्षा के इतिहास को समृद्ध करने के लिए यह आवश्यक है।

हड़प्पाकालीन शिक्षा व्यवस्था : कुछ संभावनाएं

सिंधु सभ्यता (3300-1750 ईसा पूर्व) अपने समय की सबसे उन्नत और विकासमान सभ्यता थी। उसकी अपनी लिपि थी, जो अभी तक अपठनीय बनी हुई है। पुरातत्वेत्ताओं के अनुसार सिंधुवासी ज्योतिष, सामान्य गणित, समय-गणना और औषधियों की जानकारी रखते थे। इस ज्ञान का पीढ़ी-दर-पीढ़ी अंतरण, बिना शिक्षा-प्रणाली के संभव नहीं था। लिपि का होना भी उस सभ्यता में शिक्षा तंत्र की मौजूदगी की उम्मीद जगाता है। मेसिमो विडाले, जोनाथन मार्क किनोयर, आस्को परपोला, अर्नेस्ट मैके जैसे अनेक विद्वानों का मानना है कि हड़प्पावासी शिक्षा के क्षेत्र में आगे बढ़ चुके थे। विडाले के अनुसार सिंधु सभ्यता में शिक्षण संस्थानों की मौजूदगी के “हमारे पास कोई प्रमाण नहीं है। लेकिन वे निश्चित रूप से थे, क्योंकि जटिल संस्कृति को आगे बढ़ाने के लिए विशेष संस्थानों की आवश्यकता पड़ती है। अगर खुदाई करने वाले सही थे तो मोहनजो-दरो के गढ़ का विशाल सभागार इसी तरह की रचना हो सकता है।”[1]

आधुनिकतम शोध बताते हैं कि सिंधु वासी निर्माण तकनीक, गणित और ज्योतिष की जानकारी रखते थे। यदि उन्हें इतने विषयों की जानकारी थी, तो आने वाली पीढ़ियों को उससे परचाने के लिए शिक्षण की व्यवस्था भी अवश्य रही होगी। आस्को परपोला इसी तर्क को विस्तार देते हैं– ‘सिंधु घाटी से प्राप्त लेख (सीमित) साक्षरता की पुष्टि करते हैं, जिसे सिखाए जाने की आवश्यकता पड़ती है। अन्य सभ्यताओं में खगोल विज्ञान, समय गणना, प्राथमिक गणित और चिकित्सा के अध्ययन की पुष्टि होती है। संस्कृति संबंधी शिक्षा के अलावा प्रशासनिक कार्यों के लिए भी शिक्षण जरूरी होता है। सिंधुवासी संभवत: अपने परिवार के बीच रहकर इन शिल्पों का ज्ञान अर्जित करते थे।’[2]

पाकिस्तान के मोहनजो-दरो में उत्खनन में मिले सिंधु-घाटी सभ्यता के अवशेष

किनोयर के विचार विडाले से मिलते-जुलते हैं। उनके अनुसार– “अभी तक हमें ऐसी कोई इमारत नहीं मिली है, जिसकी शिक्षण-संस्थान के रूप में व्याख्या की जा सके। सिंधुवासियों के पास निस्संदेह अपने बच्चों को पढ़ाने के तरीके थे। शायद यह काम छोटे घरों में किया जाता था, जो अन्य घरों से अलग नहीं दिखते थे।” हड़प्पा सभ्यता में शिक्षा प्रणाली के समर्थन में अपने तर्कों को आगे बढ़ाते हुए वे लिखते हैं– “हड़प्पाकालीन सबसे बड़ी और बेहतरीन ज्ञात इमारतें मोहनजो-दरो के दुर्गनुमा टीले पर स्थित हैं। आसपास के मैदानों के ऊपर ऊंचाई पर स्थित, ये महत्वपूर्ण इमारतें तत्कालीन शासकों की शक्ति और अधिकार को वैध ठहराने के लिए, शहर के सभी हिस्सों से दिखाई देती थीं। टीले के उत्तर, उसके आधे हिस्से में तीन बड़ी इमारतें हैं, जो 1920 के दशक में उनकी खोज के बाद से ही विद्वानों का ध्यान आकर्षित करती रही हैं। वे हैं– तथाकथित अन्न-भंडार, विशाल स्नानागार और कॉलेज। दीवारों के आगे की ओर हिस्सों से अनुमान लगाया जा सकता है कि अन्य संभावित महत्वपूर्ण इमारतें अभी भी, टीले के पूर्वी हिस्से पर फैले बौद्ध स्तूप के नीचे दबी पड़ी हैं। इस टीले के दक्षिणी हिस्से में एक बड़ा भवन है जिसे सभागार कहा जाता है। उसमें चौकोर स्तंभों की दोहरी पंक्ति तथा फर्श में ईंटों की पंक्तिबद्ध बनावटें हैं। बौद्ध मठों या ब्राह्मणवादी आश्रमों में, भिक्षु या छात्र अक्सर फर्श पर लाइनों में बैठते हैं; ईंटों से बनी इन कतारों का उपयोग यह बताने के लिए भी किया जा सकता है कि लोगों को कहाँ बैठना चाहिए।”[3]

गौरतलब है कि अधिकांश भारतीय लेखकों ने विशाल सभागार को मुख्य पुरोहित अथवा पुरोहित शासक के आवास की संज्ञा दी है। जबकि हमें सिंधु सभ्यता की धार्मिक प्रवृत्तियों के बारे में बहुत अधिक जानकारी नहीं है। मार्शल ने अपनी पुस्तक में हड़प्पा सभ्यता की धार्मिक प्रवृत्तियों पर विस्तार से लिखा है। उसके अनुसार हड़प्पावासी मातृदेवियों और रूद्र की पूजा करते थे। प्राप्त मूर्तियों से पता चलता है कि वे उन स्थानीय देवी-देवताओं की तरह थीं, जिनके प्रतिरूप आज भी भारत में गांवों के बाहर मिल जाते हैं। महत्वपूर्ण बात है कि उन देवी-देवताओं की पूजा के लिए किसी पुरोहित अथवा मध्यस्थ ही आवश्यकता नहीं पड़ती। श्रद्धालु सीधे ही पूजा-कर्म करता है। असल में पुरोहित-कर्म वैदिक सभ्यता की देन था। इसलिए सिंधु सभ्यता में “मुख्य पुरोहित” या पुरोहित शासक की कल्पना पूर्वाग्रह भी कहा जा सकता है।

ब्रितानी पुरातत्ववेत्ता अर्नेस्ट जॉन हेनरी मैके ने 1926-1931 तक मोहनजो-दरो की खुदाई की थी। सिंधु घाटी का यह महत्वपूर्ण नगर 2500 से 1900 ईस्वी पूर्व तक सभ्यता के चरम पर था। किनोयर से बहुत पहले मैके ने भी अपने निष्कर्षों में वहाँ महाविद्यालय जैसी संरचना होने की संभावना व्यक्त की थी– “बौद्ध स्तूप और उसके आसपास की मठनुमा इमारतों तथा विशाल स्नानागार के बीच, मैदान का एक विस्तृत भूभाग जो पूर्व की ओर ऊपर की ओर उठता जाता था, ने दिलचस्प संभावनाएं प्रस्तुत की थीं। इसलिए 1927 में, शरद ऋतु के अंतिम दिनों में, हमने वहां खुदाई आरंभ की … और तुलनात्मक रूप से थोड़े समय में, एक बहुत बड़ी इमारत का पता लगा लिया था। इस खुदाई के पश्चात, विशाल स्नानागार के उत्तर में स्थित क्षेत्र की खोज की गई, निर्माण की प्रकृति के अध्ययन से पता चलता है कि वह विशाल स्नानागार के साथ निकटता से जुड़ा हुआ है।”[4]

विशाल स्नानागार तथा स्तूप के टीले के बीच स्थित उस इमारत का विवरण देते हुए मैके आगे लिखते हैं– “स्तूप के नीचे स्थित संभावित पवित्र इमारत से इसकी निकटता को देखते हुए, मैं कहना चाहूंगा कि इमारत का वह हिस्सा उच्चतम अधिकारियों, संभव है कि मुख्य पुरोहित का आवास रहा होगा, अथवा वह पुजारियों/अधिकारियों का कॉलेज था। इस उद्देश्य को देखते हुए माना जाता है कि एक महत्वपूर्ण ब्लॉक को चुना गया था। महान संरचना, जिसे हमने महाविद्यालय सदृश इमारत का नाम दिया है, मुख्य सड़क के पश्चिम में, विशाल स्नानागार से भी विशाल थी। उसे असाधारण महत्व का होना ही चाहिए। उल्लेखनीय है कि उच्चतम सीमा तक वह संभवत: एकल वास्तुनिर्माण था, न कि एक-दूसरे से संबद्ध इकाइयों का सम्मिश्रण। मुख्य इमारत की जालीदार दीवार को मुख्य स्नानागार की दीवारों की अनुकृति के रूप में तैयार किया गया होगा और उसकी भली-भांति बनाई गई बाहरी दीवार, जो कुछ स्थानों पर चार फुट से भी ज्यादा चौड़ी है, वह नीचे की दिशा में निश्चित रूप से और भी भारी रही होगी। उसकी असामान्य बनावट दो मंजिला या ऊंची इमारत की संभावना पेश करती है।”[5]

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अपने तर्क को आगे बढ़ाते हुए मैके लिखते हैं– “मुख्य द्वार से इमारत में प्रवेश करने पर, आगंतुक खुद को विशाल प्रवेश कक्ष में पाता होगा, जिसकी माप 23 फीट गुणा 14.5 फुट है। उसके ठीक सामने बड़ा जालीदार सभागार था, उसके सामने दर्शकों के संभावित सभागार के साथ कुछ कक्षों की बनी इमारत थी, जो संभवत: उस संस्थान के मुखिया की रही होगी। तथा उसके बाईं ओर, दो दरवाजे छोटे सभागार की ओर ले जाते हैं, जहां से आवासीय भवनों की बड़ी संख्या थी; तथा भूतल अथवा उच्चतलों पर बड़े सार्वजनिक कक्ष बने थे।”

मोहनजो-दरो से कुछ ऐसे उपकरण भी मिले हैं, जो वहां के निवासियों के गणित संबंधी ज्ञान को दर्शाते हैं। संभावना है कि इनका उपयोग व्यापारीगण हिसाब के लिए करते थे। किनोयर का विचार है कि इन छड़ों का उपयोग भविष्यवाणी के लिए भी किया जाता होगा। जो भी हो, इन छड़ों और प्लेटों पर जिस तरह निशानों की व्यवस्था है, उससे इनके व्यापारियों द्वारा प्रयुक्त किए जाने की भी संभावना है। उस अवस्था में उनपर बने निशानों को समझाने की कोई न कोई व्यवस्था भी अवश्य रही होगी, जो बिना औपचारिक/अनौपचारिक शिक्षा के संभव न थी। वास्तविकता जानने के लिए हमें कुछ और शोधों का इंतजार करना होगा। यह भी संभव है कि आने वाले वर्षों में सिंधु लिपि की गुत्थी सुलझ जाए और हम आज से 4000-4500 वर्ष पुरानी शिक्षा प्रणाली के बारे में कुछ पुख्ता जानकारी हासिल कर सकें।

संदर्भ  :

[1] वर देअर एनी स्कूल, यूनिवर्सिटी ऑर अकादमीज एट इंडस साइट्स

[2] वही

[3] जोनाथन मार्क किनोयर, एंशीएंट सिटीज आफ दि इंडस सिविलाइजेशन, पृष्ठ 62

[4] अर्नेस्ट जॉन हेनरी मैके, फर्दर एक्सकेवेशन एट मोहनजो-दरो, खंड प्रथम, 1938, पृष्ठ 9

[5] वही, पृष्ठ 10

(संपादन : नवल/अनिल)


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