शूद्र शब्द दलित-पिछड़ी जातियों का नहीं है

‘शूद्र’ पहचान की ओर वापस लौटने का सीधा अर्थ यह है कि वो वर्णधारियों की धर्म-व्यवस्था का हिस्सा होना है। जबकि दलित-पिछड़ी जातियों के चिंतकों और सुधारकों का सारा संघर्ष वर्णवादी व्यवस्था और उसकी शब्दावलियों के दायरे से निकलने के लिए रहा है। सुरेश कुमार का विश्लेषण

क्या पहचान के लिए पिछड़े वर्गो के लोगों को एक नये शब्द की दरकार है? 

‘पिछड़ा वर्ग’ पिछड़ा क्यों है? भारत की आधी से अधिक आबादी का प्रतिनिधित्व करने वाले इन समुदायों के लिए प्रयुक्त ‘पिछड़ा वर्ग’ और ‘ओबीसी (अन्य पिछड़ा वर्ग)’ शब्द इनकी वर्तमान स्थिति के बारे में तो हमें बताते हैं, परंतु यह नहीं बताते कि वे इस स्थिति में कैसे पहुंचे। लेकिन ‘शूद्र’ शब्द शायद इसकी अभिव्यक्त करता है। इस शब्द को ब्राह्मणवादी ग्रंथों के रचयिताओं ने इसलिए गढ़ा ताकि इन उद्यमी लोगों को उनकी औकात बताई जा सके। शूद्र शब्द में इन वर्गों, उनकी जीवनशैली, उनके उद्यम और उनकी शिल्पकला के प्रति इस शब्द को गढ़ने वालों का तिरस्कार भाव समाहित है और यह शब्द इन वर्गों के दमन और शोषण को वैधता प्रदान करता है। यह तब जबकि उद्यम और शिल्प ही किसी समाज या देश को आगे ले जा सकते हैं। लेकिन क्या वे उसी शब्द को अपनी पहचान बनाना चाहेंगे जो उनके शोषकों ने दिया है ताकि वे पीढ़ी-दर-पीढ़ी गुलाम बने रहें? क्या वे नहीं चाहेंगे कि जैसे पूर्व अछूतों ने अपने लिए दलित शब्द का चयन किया, उनके लिए भी वैसा ही एक शब्द हो? हम इस विमर्श में भागीदारी के लिए आपको आमंत्रित करते हैं। कृपया अपने लेख editor@forwardpress.in पर प्रेषित करें। इस विमर्श की शुरुआत कांचा इलैया शेपर्ड ने ‘खुद को शूद्र मानें ओबीसी और गैर-ओबीसी पिछड़े’ शीर्षक लेख से की। इसे आगे बढ़ाते हुए प्रसिद्ध दलित समालोचक कंवल भारती ने लिखा– ‘शूद्र’ की अपेक्षा ‘बहुजन’ शब्द ज्यादा गरिमापूर्ण है। आज पढ़ें, युवा समालोचक सुरेश कुमार का आलेख   

खुद को शूद्र मानना अपने पुरखों के संघर्ष को नकारना होगा

  • सुरेश कुमार

अस्मितावादी वैचारिकी के भीतर दलित-पिछड़ीं जातियां हिंदू दायरे और उसकी शब्दावलियों से इतर अपनी पहचान सृर्जित करने की पहलक़दमियों की ओर बढ़ रही हैं। ब्राह्मणों ने अपने धर्म-शास्त्रों के भीतर दलितों और पिछड़ीं जातियों को ‘शूद्र’ और ‘आदिशूद्र’ की संज्ञा दी है। इस प्रकार, दलितों और पिछड़ों को हिंदू दायरे से अलग देखने की कवायद आज की नहीं, बल्कि बहुत पहले से चली आ रही है।

बीसवीं सदी के महान विचारक और विलक्षण सिद्धांतकार स्वामी अछूतानंद ‘हरिहर’ (1879-1933) ने ब्राह्मणशाही के द्वारा दी गयी– शूद्र, अतिशूद्र, अन्त्येय, अस्पृश्य, और ‘अछूत’ वाली पहचान को स्वीकार नहीं किया। स्वामी अछूतानंद का मत था कि दलित-पिछड़ी जातियों के लोग अपनी पहचान में आदिधर्मी-आदिहिंदू अर्थात मूलनिवासी हैं। सन् 1922 में स्वामी अछूतानंद ने आदिहिंदू सभा की स्थापना करते हुए कहा कि “भाइयो! हम लोग भारत के प्राचीन निवासी ‘आदिहिंदू’ हैं। आर्य-द्विजातीय सब विदेशी हैं। इन लोगों ने हमें नीच, अछूत और गुलाम बना रखा है। हमें इन लोगों के फैलाये हुए भ्रमजाल से निकलकर अपने पैरों पर खड़े होकर अपने सारे मुल्की हकों को हासिल करना चाहिए।” 

सन् 1921-22 में असहयोग-आंदोलन चरम पर था। उसी समय स्वामी अछूतानंद ने आदिहिंदू-आंदोलन के हवाले से बहुजनों के मुल्की हक और पहचान के लिए आंदोलन शुरू कर दिया। औपनिवेशिक भारत में उभरे स्वामी अछूतानंद के आदिहिंदू-आंदोलन ने जब दलित-पिछड़ी जातियों को हिंदू दायरे से अलग करने की क़वायद शुरू की तो हिंदू सुधारकों और लेखकों ने उनके विरूद्ध मोर्चा खोल दिया था। बड़ी दिलचस्प बात यह है कि रामनारायण ‘यादवेंदु’ को स्वामी अछूतानंद कि यह क़वायद रास नहीं आई। उन्होंने स्वामी अछूतानंद और उनके आंदोलन के विरुद्ध माधुरी पत्रिका (1930) में लेख लिखा। इस लेख में रामनारायण ‘यादवेंदु’ ने स्वामी अछूतानंद के आंदोलन को विचित्र आंदोलन की संज्ञा देकर हिंदुओं के लिए विनाशकारी बताया था। रामनारायण ‘यादवेंदु’ का कहना था– “आज से दो वर्ष पूर्व भारत के प्रायःसमस्त संवाद पत्रों ने एक विचित्र आंदोलन का प्रतिवाद किया था। समाचार-पत्रों के इस प्रतिवाद से ‘आंदोलन’ की प्रगति में कोई शिथिलता न आई। इसका कारण यह हो सकता है कि प्रतिवाद समुचित रूप से नहीं किया गया अथवा उसे ‘अनधिकारस्थ’ संपत्ति के भाग्य-निर्णय पर छोड़कर हिंदू-समाज ने अपने कर्तव्य-कलाप की इतिश्री समझ ली हो। अस्तु। इस विचित्र आंदोलन का नाम ‘आदिहिंदू’ है और इसके आंदोलक हैं ‘स्वामी अछूतानंद’। इनका ‘वाद’ इस प्रकार है कि भारतवर्ष की आधुनिक दलित जातियाँ यहाँ की आदि-निवासिनी हैं। विदेश से आए आर्यों ने इन आदि-निवासिनी जातियों पर आक्रमण किया और उन्हें दास बनाया। अब हमें ब्रिटिश-राज्य में सुबीता मिला है कि हम इन ‘छली-कपटी’ हिंदुओं (आर्यों) से पूरा बदला लें। यहाँ यह स्मरण रखना चाहिए कि यह वाद कुछ पाश्चात्य इतिहासज्ञों की कपोल-कल्पित एवं भ्रांत-पूर्ण आर्य-अनार्य-संग्राम के निराधार आधार पर आश्रित है।” रामनारायण ‘यादवेंदु’ ने स्वामी अछूतानंद द्वारा शूद्रों को आदि धर्मी बताएं जाने का विरोध किया। इनका कहना था कि अछूतानंद दलित जातियों को तो ‘आदिहिंदू’ मानते ही हैं, लेकिन जाटवों, यादवों, अहीर और नाइयों तक को भी अपने आदिनिवासी गल्ले में गिनतें हैं। इन्होंने दलित और पिछड़ी जातियों के लोगों से अपील करते हुये कहा कि स्वामी अछूतानंद के झांसे में किसी कीमत में न आयें। रामनारायण ‘यादवेंदु’ लिखतें हैं– “हम इस तर्कहीन ‘वाद’ की समाप्ति करते हुए जाटव, यादव और अहीर, विशेषतः दलित नामधारी जातियों से निवेदन करते हैं कि वे इस कुचक्र से अपनी रक्षा करें। अपने धर्म– वैदिक-हिंदू-धर्म पर आरूढ़ रहें। हम हिंदू जाति के नेताओं एवं उन्नायकों का ध्यान आकृष्ट करने का लोभ-संवरण नहीं कर सकते। उनका कर्तव्य है कि वे इस ‘सार्वजनिक संपत्ति’– दलित जातियों को सुरक्षित रक्खें।” दरअसल, रामनारायण ‘यादवेंदु’ अछूतों-पिछड़ों की समस्या समझने के बजाय स्वामी अछूतानंद को हिंदूधर्म और वेद व शास्त्र का विध्वसंक सिद्ध करने की कवायद में हिंदुत्व के बचाव में खड़े नज़र आए।

स्वामी अछूतानंद के आंदोलन से हिन्दी लेखक और संपादक भयभीत दिखाई दिए। इन लेखकों का भय था कि यदि छ: करोड़ अछूत और नौ करोड़ शूद्र (सन् 1921 की जनगणना) हिंदू धर्म से अलग हो गए तो स्वराज प्राप्त करने में उच्च श्रेणी के हिंदुओं को बड़ी कठिनाई का सामना करना पड़ सकता है। इधर, स्वामी अछूतानंद का साफ़तौर पर कहना था कि दलित-शूद्र हिंदू धर्म के अंग नहीं है। यह समाज आदिधर्मी और आदि निवासी है। स्वामी अछूतानंद कि इस घोषणा के बाद हिंदू सुधारकों और लेखकों ने अपनी पत्रिकाओं में उनके खिलाफ़ खूब हल्ला मचाया। यहाँ तक कि लाला लाजपतराय ने स्वामी अछूतानंद के आदिहिंदू-आंदोलन का विरोध कर उनके आंदोलन को महज धोखे की टठ्ठी बता डाला। विद्यालंकार कन्हैयालाल मिश्र ‘प्रभाकर’ ने ब्राह्मण सर्वस्व पत्रिका में स्वामी अछूतानंद के आदिहिंदू-आंदोलन के विरुद्ध लेख लिखकर जमकर विरोध प्रकट किया। कन्हैयालाल मिश्र ने अपने लेख के भीतर अछूतों के इस आंदोलन की शिनाख्त हिंदू धर्म के भयंकर विनाश के रुप में कर डाली। इनका कहना था कि यदि शीघ्र स्वामी अछूतानंद के आंदोलन का संहार नहीं किया गया तो अछूत हिंदुओं के खिलाफ़ भयंकर क्रांति कर डालेंगे। विद्यालंकार कन्हैयालाल मिश्र ‘प्रभाकर’ ने हिंदुओं की तरफ चिंता प्रकट करते हुए लिखा– “इन आन्दोलनों में इतना फिर भी अच्छा है, कि ये लोग हिंदू ही रहना चाहते हैं, बस चाहते हैं बड़ा हिंदू बनना। परन्तु इधर कुछ दिनों से एक नया आन्दोलन चला है, यह उक्त प्रान्दालनों से अधिक भयंकर और नाशकारी है और यदि शीघ्र ही इसका दमन न किया गया तो हिंदू जाति में एक ऐसी क्रान्ति होगी कि जिसे, इच्छा रखते भी हम दबा न सकेंगे। इस आन्दोलन का अशुभ नाम है– आदिहिंदू आन्दोलन। इस आन्दोलन के संचालक अपने व्याख्यानों के द्वारा गरीब और अशिक्षित अछूतों को भड़काते हैं। उनका कहना है कि आदि काल में भारत में केवल वे ही लोग रहते थे, जिनकी इस समय अछूत (और शूद्र) संज्ञा है, अतएव ये ही भारत के आदि वासी या आदिहिंदू हैं। पूर्व काल में इनकी अवस्था बहुत अच्छी थी और भारत में इनका ही राज्य था, परन्तु आर्यों ने ईरान आदि देशों से आकर आदि हिंदुओं को जीत लिया और अपना सेवक बनाया। उन्हीं सेवकों में से कुछ को आर्यों के अत्याचार के कारण अछूत की संज्ञा मिल गई। ऊंचा कहाने वाले हिंदू ही वे विदेशी आर्य हैं। इस प्रकार अछूतों के हृदय में द्वेष-भाव उत्पन्न कर करके, उन्हें हिंदू जाति से पृथक करने की दुश्चेष्टा हो रही है।” विद्यालंकार कन्हैयालाल मिश्र ‘प्रभाकर’ जैसे हिंदू नहीं चाहते थे कि अछूत उच्चताभिमानी हिंदुओं के विरुद्ध गोलबंद होकर अपने अधिकारों की आवाज बुलंद करें। बड़ी मजे की बात है कि बीसवीं सदी के क्रांतिकारी संपादक रामरखसिंह सहगल ने भी स्वामी अछूतानंद के आदिहिंदू-आंदोलन का जबर्दस्त विरोध किया था। 

गौरतलब है कि रामरख सिंह सहगल नवजागरण काल की चर्चित पत्रिका ‘चाँद’ के संपादक और उद्भावक थे। उन्होंने इस पत्रिका के 1928 के फरवरी अंक में ‘आदिहिंदू-आंदोलन’ शीर्षक से संपादकीय लिखकर अपना विरोध प्रकट किया था।

स्वामी अछूतानंद हिंदू सुधारकों और लेखकों के संगठित विरोध से तनिक भी भयभीत नहीं हुए। वे दलितों-शूद्रों को हिंदू धर्म और उसकी शब्दावलियों से मुक्त करने के लिए आंदोलन करते रहे। 28 अप्रैल, 1933 के अमरावती में भाषण देते हुए स्वामी अछूतानंद ने कहा कि “वस्तुत: हम शूद्र, अतिशूद्र, अन्त्येय, अस्पृश्य, अछूत आदि नहीं हैं, बल्कि मूल भारतीय आदिहिंदू, आदि नेशन हैं।… हमें शूद्र और दास बनाकर हमारा निरंतर शोषण करते चले आ रहे हैं, और कर रहे हैं। ब्राह्मणी स्मृतियों में जितने कठोर विधान शूद्रों के लिए बनाए गए हैं, उतने निर्दय और क्रूर विधान कोई भी व्यस्थापक अपनी ही जातिवालों के खिलाफ़ नहीं बना सकता है।” स्वामी अछूतानंद का आंदोलन विशुद्ध रूप से सामाजिक-धार्मिक और राजनैतिक था। औपनिवेशिक भारत में उभरा यह एक ऐसा अछूत-आंदोलन था, जिसने हिंदू धर्म के परिसरों की नींव कमजोर करने में न सिर्फ अहम भूमिका निभाई बल्कि बहुजनों को हिंदू धर्म के परिसरों से बाहर निकालने की भरपूर कवायद की। इस कवायद में उन्होंने न तो वर्ण व्यवस्था के शूद्र शब्द को, और ना ही मध्यकाल व आधुनिक काल के अछूत शब्द को स्वीकार किया, बल्कि औपनिवेशिक भारत में हिंदू शब्दावलियों के इतर दलितों-शूद्रों को आदिहिंदू और आदिनेशन पहचान देने की कोशिश की थी।

अब हम इस तथ्य की ओर बढ़ते हैं कि औपनिवेशिक भारत में वर्णधारियों का नज़रिया शूद्रों के प्रति कैसा था। क्या उच्च शिक्षित हो जाने पर शूद्रों के प्रति वर्णधारियों का नज़रिया बदल जाता था? बीसवीं सदी के तीसरे दशक के शूद्रों का अनुभव कहता है कि शूद्रों के उच्च शिक्षित हो जाने पर वर्णधारी उन्हें शूद्र और अछूत ही समझते थे। बीसवीं सदी के महान सुधारक और लेखक संतराम बी.ए. ने ‘युगांतर’ पत्रिका के 1934 के अप्रैल अंक में एक उच्च शिक्षित पिछड़ी जाति के प्रिंसिपल का साक्षात्कार नुमा लेख ‘शूद्रों के आंसू’ शीर्षक से प्रकाशित किया। इस लेख में प्रिंसिपल साहब का परिचय देते हुए लिखा गया कि यह सज़्जन लंदन-विश्वविद्यालय के साहित्याचार्य और एक गवर्नमेंट कालेज में वाइस प्रिंसिपल हैं। बड़े सुसंस्कृत और सद्गृहस्थ हैं । खान-पान और रहन-सहन सब यूरोपियन ढंग का है। घर में बाल-बच्चे सब अँगरेजी बोलते हैं। इस उच्च शिक्षित प्रिंसिपल ने जातिगत भेदभाव का अनुभव साझा करते हुए कहा– “मैं अँगरेज़ों की गुलामी से उतना दुःखी नहीं हूँ जितना कि हिंदू कहलाते हुए भी खुद हिंदुओं के अत्याचार से हूँ। अँगरेज़ों की गुलामी का अनुभव तो मुझे वर्ष भर में शायद एकाध बार ही होता होगा, परन्तु उच्चवर्णी हिंदुओं के हाथों तो रोज़ ही पल-पल अपमानित होना पड़ता है।” इसके बाद प्रिंसिपल साहब ने द्विजों की समाज घातक मनोवृत्ति पर अपने विचार प्रकट करते हैं। उनका कहना था– “ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य– लोगों ने शूद्र कहलाने वाले लोगों के लिए जीना दूभर बना रक्खा है। कोई भी शूद्र हिंदू रहते हुए आत्म-सम्मान का जीवन नहीं बिता सकता। पहले तो स्कूलों में हिंदू मास्टर प्रायः सब द्विज ही होते हैं। जब कोई नाई, कहार, कुम्हार, तेली, और  कुरमी आदि किसी शुद्र जाति का बालक पढ़ने जाता है तो ये लोग जल-भुन जाते हैं। उनको द्वेष पैदा होता है कि हमारे गुलाम ये नाई-कहार मी क्यों पढ़ने लगे हैं। वे उन बच्चों को बड़े अपमानजनक शब्द कह कर निरुत्साहित करते हैं। ये हत्यारे कहते हैं– “अरे नाऊ के! सुसरे जाकर हजामत बना; तुझे पढ़ना नहीं आएगा; तू यहां क्या करने आया है! ओ कहार कहीं के! जा जाकर जूठे बर्तन साफ कर। पढ़ना क्षत्रिय-ब्राह्मणों का काम है; तू साले पढ़ कर क्या लेगा?” फिर ज़रा सी भी भूल हो जाने पर ये बच्चे को उसकी जात का ताना देकर बहुत बुरी तरह से दुत्कारते हैं। नन्हे से बच्चे की आत्मा वहीं कुचली जाती है। बाल्यकाल में ही उस के कोमल हृदय पर यह बात अंकित हो जाती है कि परमेश्वर ने मुझे नीच और द्विजों का दास पैदा किया है। यदि वही भूल ब्राह्मण-क्षत्रियों के लड़कों से हो जाय तो उन्हें ये दुष्ट कभी नहीं कहते कि जाओ सुसरो, जाकर हंदे (भीख) मांगते फिरो, या बाजार में चना-चबेना बेचो; तुम्हारा यहां क्या काम? यदि कोई शूद्र बालक सौभाग्य से तीव्र बुद्धि निकल पड़े और इन विद्या-बुद्धि के ठेकेदारों को परीक्षा में पछाड़ दे तो फिर ये ताने से कहते हैं-अजी, परीक्षा में प्रथम निकल आया, तब क्या हुआ, है तो अन्त को नाई ही।” द्विजों द्वारा दिये गए शूद्रों के ज़ख़्मों के संबंध में प्रिंसिपल साहब बतातें हैं– “आप नहीं जानते। हिंदुओं में रहते हुए नीच जात होने का कलंक आजन्म नहीं छुटता। जिस नगर में मैं रहता हूँ, वहां यदि दस सार्वजनिक सभाएँ होती है तो अपनी योग्यता और सरकारी पद के कारण छः का सभापतित्व मुझे ही पेश किया जाता है, परन्तु हिंदुओं के सामाजिक कार्यों में मेरा व्यक्तित्व मेरे ब्राह्मण चपरासी के जूतों में बैठने लायक भी नहीं। इसी अपमान से बचने के लिए मैंने देश निकाला सा ले रक्खा है। मैं अपनी जन्मभूमि, उत्तर भारत, में नौकरी नहीं कर सकता। आपने शायद डाक्टर सर व्रजेन्द्रनाथ सील का नाम सुना होगा। वे पाश्चात्य दर्शनशास्त्र के बहुत बड़े पंडित हैं। वे माइसोर (मैसूर) विश्वविद्यालय के वाइस चांसलर थे और शायद ढाई हजार के करीब वेतन पाते थे। दुर्भाग्य से उनकी जात नाई है। उनके पुत्र भी इंडियन एजूकेशन सर्विस में हैं और बम्बई प्रांत के किसी गवर्नमेंट कालेज के प्रिंसिपल हैं। धारवार में उन्होंने मुझसे चार्ज लिया था। उनको उच्च वर्ण के बंगाली हिंदुओं ने ताना मारा कि इंडियन एजुकेशन सर्विस में आ गया तब क्या हुआ, अन्त को है तो नाई ही। बस, इससे उनके हृदय पर ऐसी चोट लगी कि उन्होंने हिंदू-समाज को ही छोड़ देने का निश्चय कर तो लिया। उन्होंने आठ मास की छुट्टी ली, यूरोप गये, और एक फ्रेच लड़की से विवाह कर लाए। उनके बच्चों को न पता है कि जात का इसी प्रकार एक और सज्जन की बात है। अब उन के घर में हिन्दोस्तानी भाषा ही नहीं होती है और ना ही कोई हिंदू उनसे पूछ ही सकता है कि तुम नाई हो या कुछ और। वे समझते हैं कि इस प्रकार हमने कम से कम अपनी संतान को तो द्विजशाही की दासता से मुक्त कर दिया। हमारी तरह उन्हें तो जात का नाम सुनकर लज्जा से सिर न झुका देना पड़ेगा।” 

इसके बाद प्रिंसिपल साहब हिंदू सुधारकों की जातिवादी मनोवृत्ति के संबंध में बताते हैं– “इस समय हिंदुओं के सबसे बड़े नेता मालवीयजी माने जाते हैं। मैं मद्रास के एक कालेज में प्रोफेसर था। मालवीयजी उधर हिंदू-विश्वविद्यालय के लिए धन एकत्र करने और हिंदू-सभा का प्रचार करने गये हुए थे। वे मुझे भी घर पर मिलने आए। मैंने उनका बड़ा धन्यवाद किया और आपसे मिलने आने वाला था और चाहता था कि आपको अपने यहाँ ही ठहराऊँ, परन्तु खेद है कि मुझे आज्ञा नहीं मिली। इतने में मेरी श्रीमती ने आकर पंडितजी को नमस्कार किया। मालवीयजी ने उसकी खूब प्रशंसा की कि आप साक्षात गृह-लक्ष्मी है; आर्य देवियों का यही आदर्श है; आप लोगों से मिल कर मुझे बहुत प्रसन्नता हुई है। तब मैंने प्रार्थना की कि आप आज हमारे यहां ही भोजन कीजिए। मालवीयजी ने इंकार करते हुए कहा कि मैं या तो स्वयं अपने हाथ से बना कर खाता हूं या अपनी ही जाति के दूसरे व्यक्ति से। मैं दूसरी जाति के मनुष्य के हाथ का नहीं खाता। मैंने इसका कारण पूछा। मालवीय जी ने कहा कि इसका कारण व्यक्तिगत स्वच्छता है और कुछ नहीं। तब मैंने कहा कि क्या आप का यह मतलब है कि मेरी उच्च शिक्षा-प्राप्त स्त्री आपके लंठ रसोइए से भी अधिक  मैली है? मालवीयजी ने कहा कि आप को नाराज नहीं होना चाहिए। मैंने कहा, बहुत अच्छा, यदि आप भोजन दूसरे के हाथ का नहीं खाते तो मेरा भी न खाइए, परन्तु इस बात का प्रमाण दीजिए कि आप जैसा कहते हैं वैसा सब हिंदुओं को भाई समझते भी हैं। आप अपने कुल की कोई जवान लड़की लाइए। मैं उसके लिए उसीकी स्थिति (स्टेटस) का अपनी जाति का एक योग्यवर देता हूँ। उनका विवाह करा दीजिए। यदि आप ऐसा करने को तैयार नहीं तो आप का सब हिंदुओं को भाई कहना एक ढोंग मात्र है। मालवीयजी ने कहा-तुम मेरा अपमान कर रहे हो। घर आए अतिथि का इस प्रकार अपमान करना आर्य सभ्यता के विरुद्ध है। इस पर मैंने कहा, इस में आप का कुछ भी अपमान नहीं। उलटा मुझे नीच और गन्दा ठहरा कर आपने मेरा अपमान किया है।” प्रिंसिपल साहब का मत था कि ब्राह्मणशाही में क्षत्रिय और वैश्य को भी पर्याप्त सम्मान और प्रतिष्ठा प्राप्त है, इसलिए वे ब्राह्मणशाही का शासन बनाए रखने में बड़ी अहम भूमिका निभाते हैं। बीसवीं सदी के तीसरे दशक में शूद्रों का दुख था कि द्विजशाही व्यवस्था में उन्हें पशुओं से भी गया-गुजरा समझा जाता है। उन्हें क़दम-क़दम पर अपमानित होना पड़ता था। इसलिए प्रिंसिपल साहब का सुझाव था कि जब तक शूद्र अछूतों की तरह द्विजों से अलग नहीं हो जाएंगे, तब तक उन्हें सम्मान और प्रतिष्ठा प्राप्त नहीं हो सकती है। 

सन् 1932 में कहार सुधारक सभा, जबलपुर ने ब्रिटिश सरकार के पास इस आशय का प्रस्ताव भेजा कि उन्हें हिंदुओं से अलग प्रतिनिधत्व दिया जाए। उनके प्रस्ताव को संतराम बी.ए.ने ‘युगांतर’, जून 1932 के अंक में संपादकीय टिप्पणी में प्रकाशित किया था। इस कहार सभा की ब्रिटिश सरकार से मांग थी कि उन्हें सरकारी नौकरियों में अलग से प्रतिनिधित्व दिया जाए और हमारा नेतृत्व किसी दूसरी जाति के नेता को न दिया जाए। कहार सुधारक सभा ने ब्रिटिश सरकार को जो प्रस्ताव भेजा, वह इस प्रकार था– “उच्च वर्णो के लोग हमें दैनिक जीवन में बहुत कष्ट दे रहे हैं। हम उनकी जो भारी सेवा करते हैं उस के बदले में उन्होंने हमें सदा के लिए अपना गुलाम और नीच बना रखा है! इस प्रकार अब हम मूक और निःसहाय पशु बन गये हैं, यहाँ तक कि शासकों के सामने अपना दुःख प्रकट करने के लिए वाणी भी हमारे पास नहीं रह गई। हम देखते हैं कि भारत में ब्रिटिश राज्य को स्थापित हुए लगभग डेढ़ सौ वर्ष हो जाने पर भी काउंसिलों, उत्तर दायित्वपूर्ण तथा अर्ध-सरकारी नौकरियों का सारा इजारा इन तीनों उच्चवर्णों ने ही ले रखा है, यहां तक कि स्कूलों और कॉलेजों में अध्यापक और प्रोफेसर भी इन्हीं उच्च जातियों के लोग हैं। ये दलित तथा निम्न जाति के बच्चों से बहुत अधिक घृणा करते है। इस प्रकार जीवन के प्रत्येक विभाग में मानवी अधिकार पाने की हमारी प्रगति में बहुत अधिक बाधा दी जा रही है। हमें उठने का अधिक मौका तभी मिल सकता है जब सरकार कृपापूर्वक सरकारी संस्थाओं से जन्ममूलक ऊंच-नीच की हिंदू-मनोवृत्ति को निकाल दे और हिंदुओं के प्रत्येक वर्ण को उस के अनुपात के अनुसार प्रतिनिधित्व मिले। इस हमारी प्रार्थना है कि हमारी जात को अलग प्रतिनिधित्व दिया जाए और एक जात का व्यक्ति दूसरी जाति का प्रतिनिधि न बनाया जाए। अंत में हम ब्रिटिश सरकार को धन्यवाद ज्ञापित करते हैं जिसके शासन में हमें विद्या प्राप्ति तथा विचार प्रकट करने का अवसर मिला है। जब भारत में उच्च वर्ग के हिंदुओं का शासन था, तब हम इस अधिकार से सर्वथा वंचित रखे जाते थे। इस समय बहुत सी हिंदू रियासतों में यही अवस्था है।”

स्वामी अछूतानंद ‘हरिहर’, संतराम बी.ए. और डॉ. धर्मवीर की तस्वीर

सन् 1934 के दिसंबर महीने में ‘अखिल भारतवर्षीय बैकवर्ड और डिप्रेस्ड कालसेज़’ का अधिवेशन जबलपुर में होना तय हुआ। इस अधिवेशन की विज्ञप्ति ‘युगांतर’, सितबर 1934 के अंक में संपादकीय टिप्पणी में प्रकाशित हुई। अखिल भारतवर्षीय बैकवर्ड और डिप्रेस्ड कालसेज़ की ओर से दी गई विज्ञप्ति में कहा गया कि “पंद्रह हज़ार साल पहले हम मूल भारतवासी इस देश के मालिक थे। परंतु छल-बल और वर्णव्यवस्था रूपी फ़ौलादी चक्रव्यूह में फांसकर आर्यों ने हमे परास्त किया। दंडस्वरूप हमें शूद्र घोषित कर, जन्म-जन्मांतर के लिए कड़ी मेहनत के सुपुर्द कर, अपनी गुलामी में रख लिया और उन्होंने स्वयं आपने आपको द्विज कह ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य तीनों भागों में विभक्त कर लिया। साथ ही अपने पिनल कोड द्वारा विद्योपार्जन और धन संग्रह हमारे लिए निषिद्ध कर दिया।” इस विज्ञप्ति में शूद्रों के साहित्यिक और संस्कृति का विनाशक द्विजों को बताया गया था। अखिल भारतवर्षीय बैकवर्ड और डिप्रेस्ड क्लासेज़ दलित और पिछड़ी जातियों का साझा मंच था। इस सभा का कहना था कि 6 करोड़ द्विज 16 करोड़ दलित और पिछड़ी जातियों के साथ पशुओं जैसा बर्ताव करते हैं। इस विज्ञप्ति के अंत में दलित और पिछड़ी जातियों से अपील की गई कि सम्मेलन में शामिल होकर सफल बनावें और अपने अधिकारों की रक्षा करें। 

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बीसवीं सदी के नब्बे के दशक में अस्मितावादी विमर्श के भीतर दलित और पिछड़ी जातियों को हिंदुओं के दायरे से निकालने की बहस व्यापक स्तर पर उभर कर सामने आई। प्रखर दलित चिंतक और विमर्शकार डॉ. धर्मवीर (9 दिसंबर, 1950- 9 मार्च, 2017) ने अपनी अस्मितावादी वैचारिकी के भीतर दलित-पिछड़ी जातियों को आजीवक मक्खलि गोसाल के धर्म-दर्शन से जोड़ा है। इस विचारक का साफ़तौर पर कहना था कि दलित-शूद्र अपनी मूल पहचान में आजीवक हैं। डॉ. धर्मवीर का मत था कि दलित-पिछड़ी जतियों के लोग अपने धर्म-दर्शन और वैचारिकी की खोज में आगे नहीं आए। इसलिए, उनके विरोधियों ने अजीब-अजीब नामकरण कर डाले। डॉ. धर्मवीर ने अपना विचार प्रकट करते हुए लिखा है– “चूँकि आजीवक लोग अपने धर्म, दर्शन और समाज को बिसरा चुके थे, इसलिए विरोधियों ने उनके नये-नये और अजीब नाम रख रखे हैं। आज उन्हें साहित्य के क्षेत्र मे दलित कहा जाता है। अंग्रेजों से राजनैतिक स्वतन्त्रता के संग्राम तक उन्हें भारत में अछूत कहा जाता था जो आज कानून में प्रतिबंधित है। उन्हें हरिजन भी कहा जाता था। लेकिन वह भी अब प्रतिबंधित है। संविधान में उन्हें अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और पिछड़ा वर्ग में विभाजित कर रखा है।” डॉ. धर्मवीर बताते हैं कि महावीर जैन और गौतम बुद्ध की तरह ही दार्शनिक मक्खलि गोसाल ने आजीवक धर्म की स्थापना की थी। लेकिन इसके विरोधियों ने इतिहास में आजीवक दर्शन को विकृत करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। चूंकि आजीवक मक्खलि गोसाल कुम्हार जाति के थे, इसलिए उनके धर्म-दर्शन को ब्राह्मण और क्षत्रियों ने इतिहास में कभी सम्मान नहीं दिया। डॉ. धर्मवीर का विचार हैं– “बात यह है कि मक्खलि गोसाल कुम्हार जाति से और दास थे। बीजक भी दास। नंद वंश को शूद्र वंश कहा गया है। मौर्य वंश भी ब्राह्मणों या क्षत्रियों का वंश नहीं। रैदास चमार जाति से और कबीर जुलाहा जाति से थे। इस प्रकार, समाज व्यवस्था यह धर्म दासों, अछूतों, दलितों और पिछड़ों का धर्म था। परिणाम यह निकलता है कि आजीवक धर्म समाज व्यवस्था में दासता को मिटाने के लिए लड़ रहा था। यह कोई छोटी लड़ाई नहीं है। इसमें हार इसी रूप में मायने रखती है कि यह युद्ध अभी तक जारी है। इस की जीत इसी अर्थ में जानी जा सकती है कि समाज की कानूनी व्यवस्था में अदभाव, ऊंच-नीच और दासता समाप्त हो गई हैं। तब इसका हारना क्या– इस की जीत उस दिन निश्चित होगी जब समाज में समानता के आधार पर शांति कायम होगी । इसलिए, आजीवक धर्म को हारा हुआ न कहा जाए, क्योंकि इसका पक्ष समाज में कमजोर तबकों का है, बल्कि यह कहा जाए कि विजय प्राप्ति के लिए इसका संघर्ष आज तक सतत चल रहा है।” डॉ. धर्मवीर ने हिंदू धर्म और उसकी शब्दावलियों को मुक्त करने के लिए दलित-पिछड़ी जातियों के लिए ‘आजीवक’ शब्द के प्रयोग करने पर ज़ोर देते हैं। डॉ. धर्मवीर का कहना था– “आजीवक समाज एक पूर्ण समाज है। यह किसी पूर्ण समाज का कोई अंग या खास अंग नहीं है। यदि ब्राह्मणों, बौद्धों और जैनियों की भाषा में बोला जाए तो यह उनकी समाज व्यवस्थाओं का कोई भाग नहीं है। इसलिए, इस अर्थ में यह अपने आप में विश्व की किसी भी समाज व्यवस्था से बराबरी के स्तर पर तुलनीय है। यह किसी की गुलाम कौम या किसी का अछूत नहीं है। इसका अपना साधु समाज है, अपने राजा हैं, अपने व्यापारी हैं, अपने किसान हैं, अपने कारीगर हैं और अपने मजदूर हैं। यह भारत में चर्चित वर्ण व्यवस्था का ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र में से कुछ नहीं है क्योकि यह अवर्णवादी है।… आजीवक समाज के लिए – ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र – ये चारों शब्द विदेशी उच्चारण और बाहरी मूल के हैं।”  

इस प्रकार, हम देखते हैं कि बीसवीं सदी के शुरुआती दशक से लेकर अंत तक हिंदू दायरे से निकलने कि कवायद को अंज़ाम दिया जा रह है। दलित-पिछड़ी जातियों के सुधारक ब्राह्मणी व्यवस्था के ‘शूद्र’ शब्द की ओर नहीं लौटे। क्योंकि यह शब्द न तो उनका है और न तो उनकी पहचान का वाहक है। मेरी समझ में ‘शूद्र’ पहचान की ओर लौटने की कवायद और पैरवी अभिशप्त पहचान और बौद्धिक नादानी के सिवाय कुछ भी नहीं है। ‘शूद्र’ पहचान की ओर वापस लौटने का सीधा अर्थ यह है कि वो वर्णधारियों की धर्म-व्यवस्था का हिस्सा होना है। जबकि दलित-पिछड़ी जातियों के चिंतकों और सुधारकों का सारा संघर्ष वर्णवादी व्यवस्था और उसकी शब्दावालियों के दायरे से निकलने के लिए रहा है।   

(संपादन : नवल/अनिल)

भूल सुधार : भूलवश इस आलेख के साथ डॉ. धर्मवीर भारती की तस्वीर की जगह धर्मवीर भारतीय जी की तस्वीर प्रकाशित हो गई थी। इसके लिए हम क्षमाप्रार्थी हैं। (23 जून, 2021, 10:55 AM)


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