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झारखंड बनाम वनांचल और साजिशें (रांची डायरी : भाग – 3)

आरएसएस और भाजपा झारखंड के पक्ष में नहीं थे। वे वनांचल चाहते थे। भाजपा की राष्ट्रीय कार्यसमिति तथा राष्ट्रीय परिषद ने आगरा में सम्पन्न अपनी बैठक में 8 अप्रैल, 1988 को छोटानागपुर और संथाल परगना को मिलाकर वनांचल राज्य बनाने का प्रस्ताव पेश किया था। बता रहे हैं कंवल भारती

[दलित साहित्यकार व समालोचक कंवल भारती ने वर्ष 2003 में झारखंड की राजधानी रांची की यात्रा की थी। उनके साथ दलित साहित्यकार मोहनदास नैमिशराय, श्योराज सिंह बेचैन और सुभाष गाताडे भी थे। अपनी पहली किश्त में उन्होंने झारखंड के दलित समुदायों के बारे में जानकारी थी। वहीं दूसरी किश्त में उन्होंने तब नवगठित झारखंड की आबोहवा का भगवाकरण करने के प्रयास के संबंध बताया। आज पढ़ें, उनके संस्मरण की तीसरी किश्त]

15 नवम्बर 2003 : विधायक निवास में ही देवकुमार धान से बातचीत 

‘आदिवासी अस्तित्व बचाओ महासभा’ के संरक्षक देवकुमार धान का कहना था कि झारखंड के 113 प्रखंडों में आदिवासी स्वायत्त शासन-व्यवस्था लागू है। यह व्यवस्था तीन स्तरों पर होती है– गांव के स्तर पर, गांवों के समूह के स्तर पर और सर्वोच्च स्तर अर्थात पूरे समुदाय के स्तर पर। लेकिन भाजपा की सरकार पिछले तीन सालों से आदिवासियों की इस स्वशासन व्यवस्था को तोड़ रही है। यह पूछने पर कि कैसे? उनका कहना था, “झारखंड सरकार भारतीय संविधान की अवहेलना करके झारखंड पंचायती राज अधिनियम 2001 और 2003 पारित करके राज्य की पॉंचवीं अनुसूची में पड़ने वाले आदिवासी क्षेत्रों में पंचायती चुनाव कराने जा रही है।” उन्होंने बताया कि हमने ‘आदिवासी अस्तित्व बचाओ महासभा’ की ओर से गैर-संवैधानिक अधिनियमों के बारे में राज्यपाल [एम. रामा जॉयस] को अप्रैल, 2003 में ज्ञापन दिया था, जिसमें हमने झारखंड के 113 अनुसूचित प्रखंडों में पंचायत चुनाव रोकने का अनुरोध किया है। उन्होंने कहा कि राज्यपाल ने कोई कार्यवाही नहीं की है। लेकिन हमारी महासभा इन क्षेत्रों में किसी भी कीमत पर पंचायत चुनाव नहीं होने देगी। उन्होंने पटना हाई कोर्ट द्वारा दिसम्बर, 1995 में दिए गए निर्णय के बारे में बताया, जो बाबूदेव बेसरा बनाम भारत सरकार तथा अन्य मामले में दिया गया था, जिसमें स्पष्ट निर्देश दिया गया था कि रांची जिला, सिंहभूमि जिला, पलामू जिला के लातेहर प्रखंड और गढ़वा प्रखंड के भंडारा ब्लॉक, दुमका, पाकुड़‍, राजमहल, जाममतारा, सुन्दर पहाड़ी, संथाल परगना आदि अनुसूचित क्षेत्रों में पंचायत चुनाव प्रतिबंधित रहेंगे।

देवकुमार ने आगे बताया कि महासभा की एक मॉंग जमीन बचाने की भी है। उन्होंने बताया कि ऐसा कानून है कि आदिवासियों की जमीन को कोई गैर-आदिवासी नहीं ले सकता। लेकिन अर्जुन मुंडा की भाजपाई सरकार इस कानून में कुछ उपबंध बनाकर आदिवासियों की जमीनें छीन रही है। उनकी मॉंग थी कि अब तक जितनी भी जमीन कब्जा की गई है, वह आदिवासियों को वापस की जाए। उन्होंने यह भी बताया कि झारखंड बने हुए तीन साल हो गए, परंतु अभी तक राज्यसभा में एक भी आदिवासी प्रतिनिधि नहीं पहुंचा है। कोई आदिवासी साहित्य अकादमी नहीं बनी है, और किसी भी आदिवासी भाषा के साहित्य के नाम पर पुरस्कार नहीं है। बिरसा मुंडा के नाम पर केवल राजनीति होती है, पर पूरे रांची शहर में बिरसा मुंडा का एक भी चित्र नहीं है, जबकि लालकृष्ण आडवाणी, अटलबिहारी वाजपेयी, नीतीश कुमार और हिंदू नायकों के तमाम चित्र सब जगह लगे हुए हैं। उन्होंने बताया कि “बिरसा मुंडा की धरती पर आपका स्वागत केवल बिरसा मुंडा अन्तरराष्ट्रीय हवाई अड्डे पर ही होता है।”

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उन्होंने बताया कि मेन रोड पर, जो महात्मा गॉंधी रोड के नाम से जानी जाती है, जी.ई.एल. चर्च मार्केट काम्पलेक्स है। यह जमीन आदिवासियों से शिक्षा के नाम पर ली गई थी, लेकिन इस जमीन पर व्यावसायिक काम्पलेक्स बना दिया गया, जो पूर्णतया वातानुकूलित है। उन्होंने कहा कि यहॉं गैर-आदिवासियों ने 1961 से ही आदिवासियों की जमीनों को हथियाना शुरू कर दिया था। उन्होंने कहा कि बिरला इंस्टीट्यूट भी आदिवासियों की जमीन पर बनाया गया है। सालों से आदिवासी इस बात के लिए संघर्ष कर रहे हैं कि आदिवासियों के बच्चों को भी इस संस्थान में प्रवेश दिया जाए। लेकिन प्रशासन द्वारा आन्दोलनकारियों पर गोलियॉं चलवाई गईं, जिसमें बहुतों की जानें चली गईं। अभी भी यहॉं इंजीनियरिंग में केवल धनी वर्ग के लड़कों को ही प्रवेश दिया जाता है। उन्होंने बताया कि नेशनल हाईवे के दोनों तरफ पांच किलोमीटर जमीन विकास के नाम पर अधिग्रहण करने का कानून पास कर दिया गया है।

पृथक झारखंड आंदोलन के  अग्रणी नेता रहे एन. ई. होरो (तस्वीर साभार : डाउन टू अर्थ)

भाजपा का जोर वनांचल पर क्यों?

विधायक निवास में ही हमें वासवी किड़ो ने भारतीय जनता पार्टी, बिहार प्रदेश, पटना की ओर से जारी एक पुस्तिका दी, जिसका नाम था ‘वनांचल ही क्यों?’। इसको मैं उस वक्त तो नहीं पढ़ सका, परन्तु रात में सोते समय मैं उसे पूरा बांच गया। उसे पढ़कर पता चला कि भाजपा की नजर में झारखंड के पीछे ईसाई मिशनरियों का हाथ है। पुस्तिका के अनुसार, “1910 में हजारीबाग संत कोलम्बस कालेज के एक छात्र बारथोलमेन ने दरिद्र आदिवासी छात्रों की समस्याओं को हल करने के उद्देश्य से ‘क्रिश्चियन स्टुडेंट्स आर्गेनाइजेशन’ बनाया। यह संगठन छात्रों तक सीमित न रहा। 1995 में इसका नामकरण ‘छोटानागपुर उन्नति समाज’ हो गया। 1928 में इसके द्वारा साइमन कमीशन को एक स्मरण-पत्र दिया गया। तब 1931 की जनगणना में आदिवासियों को, जो उससे पूर्व, हिंदू के रूप में ही स्वीकार किए जाते थे, मुख्य हिंदूधारा से अलग कर दिया गया। इस निर्णय ने पाकिस्तान की राह पर पृथक झारखंड की नींव डाली।” (पृष्ठ 6)

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इस तरह का कोरा झूठ गढ़ने में आरएसएस और भाजपा का कोई भी संगठन मुकाबला नहीं कर सकता। इसी झूठ के सहारे वे आदिवासियों को भी हिंदू बताते हैं और दलितों को भी, जबकि न आदिवासी हिंदू हैं और न दलित। आरएसएस आदिवासियों को जबरन हिंदू बनाने पर तुला हुआ है और उनमें ईसाई-विरोध का वही जहर भर रहा है, जो वह हिंदी प्रदेशों में दलित-पिछड़ी जातियों में मुस्लिम-विरोध का भर रहा है। आरएसएस और भाजपा झारखंड के पक्ष में नहीं थे। वे वनांचल चाहते थे। भाजपा की राष्ट्रीय कार्यसमिति तथा राष्ट्रीय परिषद ने आगरा में सम्पन्न अपनी बैठक में 8 अप्रैल, 1988 को छोटानागपुर और संथाल परगना को मिलाकर वनांचल राज्य बनाने का प्रस्ताव पेश किया था, जिसे 30 अप्रैल 1988 को बिहार प्रदेश भाजपा की कार्यसमिति ने रांची में संपन्न अपनी बैठक में पास किया था। 23 नवम्बर, 1988 को वनांचल क्षेत्र की जनता ने रांची में ऐतिहासिक प्रदर्शन किया, जिसका नेतृत्व भाजपा के तत्कालीन राष्ट्रीय अध्यक्ष लालकृष्ण आडवाणी ने किया था। 

झारखंड विधानसभा में बाबा रामदेव के शिविर के दौरान उनसे आशीर्वाद लेते तत्कालीन मुख्यमंत्री अर्जुन मुंडा (फाइल फोटो)

जाहिर है कि यह प्रदर्शन आरएसएस और भाजपा के लोगों द्वारा किया गया था। इसके बाद उनके द्वारा लगातार वनांचल राज्य के लिए रैलियां निकाली गईं और यह प्रचार किया गया कि छोटानागपुर संथाल परगना की समस्याओं का एकमात्र समाधान वनांचल राज्य का निर्माण है। असल में, आरएसएस की चिंता यह थी कि छोटानागपुर और संथाल परगना क्षेत्रों में ईसाई मिशनरी आदिवासियों के सामाजिक और शैक्षिक विकास के लिए काम कर रहे थे और काफी संख्या में आदिवासियों ने ईसाई धर्म भी स्वीकार कर लिया था। इन्हीं गतिविधियों को रोकने के लिए आरएसएस और भाजपा वनांचल राज्य चाहते थे। भाजपा इस तर्क का सहारा ले रही थी कि 150 वर्ष तक धर्मान्तरण की कोशिशों के बाद भी छोटानागपुर ईसाई बहुल क्षेत्र नहीं हो सका, इसलिए ईसाई ताकतें ईसाई बहुल राज्य बनाने के लिए झारखंड पर जोर दे रही थीं। यह तर्क झूठा था, क्योंकि 1911 की जनगणना में भी झारखंड में ईसाइयों की संख्या तीन प्रतिशत से भी कम थी। अगर ईसाई मिशनरी 150 वर्षों से आदिवासियों का धर्मान्तरण कर रहे थे, तो उनकी इतनी कम संख्या क्यों होती? 1975 में शिबू सोरेन ने ‘झारखंड मुक्ति मोर्चा’ बनाया, तो भाजपा ने बाद में उसे झारखंडी जातियता का नाम दिया, और उसे भारतीय राष्ट्रवाद के लिए घातक बताया। यही नहीं, झारखंड के नाम से जितने भी संगठन बने, जैसे 1937 में जयपाल सिंह मुंडा द्वारा गठित झारखंड पार्टी (जिसका नेतृत्व बाद में एन. ई. होरो ने किया), ऑल झारखंड स्टूडेंट्स यूनियन (आजसू), झारखंड समन्वय समिति आदि सभी में भाजपा और आरएसएस को ईसाईयों की सहभागिता दिखाई दी। लेकिन जनता ने झारखंड को स्वीकार किया और वनांचल को खारिज कर दिया।

(आगे जारी …)

(संपादन : नवल)


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लेखक के बारे में

कंवल भारती

कंवल भारती (जन्म: फरवरी, 1953) प्रगतिशील आम्बेडकरवादी चिंतक आज के सर्वाधिक चर्चित व सक्रिय लेखकों में से एक हैं। ‘दलित साहित्य की अवधारणा’ ‘स्वामी अछूतानंद हरिहर संचयिता’ आदि उनकी प्रमुख पुस्तकें हैं। उन्हें 1996 में डॉ. आंबेडकर राष्ट्रीय पुरस्कार तथा 2001 में भीमरत्न पुरस्कार प्राप्त हुआ था।

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