आपने ‘नाच्यौ बहुत गोपाल’ तो पढ़ा होगा, लेकिन ‘मोरी की ईंट’?

कंवल भारती बता रहे हैं मदन दीक्षित के उपन्यास ‘मोरी की ईंट’ के बारे में, जिसमें अमृतलाल नागर के उपन्यास ‘नाच्यौ बहुत गोपाल’ के विपरीत दलित विमर्श की वास्तविक तस्वीर को प्रस्तुत किया गया है

मेहतर समुदाय पर हिंदी में दो उपन्यास लिखे गए। पहला ‘नाच्यौ बहुत गोपाल’, जिसे अमृतलाल नागर ने हिंदुओं के संघी दृष्टिकोण से लिखा था। उसमें मेहतर समुदाय का पूरा ढांचा कल्पना से खड़ा किया गया है, और उसमें रत्तीभर भी यथार्थ नहीं है। इस उपन्यास पर मेरी आलोचना ‘नाच्यौ बहुत गोपाल का दलित पाठ’ शीर्षक से ‘परिवेश’ के अंक 44 (अप्रैल-सितम्बर 2003) में प्रकाशित हुई थी। दूसरा उपन्यास मदन दीक्षित का ‘मोरी की ईंट’ है, जो 1996 में शब्दकार, गुरु अंगद नगर, वेस्ट, दिल्ली से छपा था। इस उपन्यास का हिंदी की मुख्यधारा (ब्राह्मणधारा) ने कोई नोटिस नहीं लिया, जबकि ‘नाच्यौ बहुत गोपाल’ को ब्राह्मण आचार्यों ने दलितों के जीवन पर सर्वश्रेष्ठ उपन्यास भी घोषित किया और उसे विद्यार्थियों के लिए पाठ्यक्रम में भी शामिल किया। जिस हिंदू दृष्टिकोण को ‘नाच्यौ बहुत गोपाल’ में स्थापित किया गया, उसे ‘मोरी की ईंट’ में मदन दीक्षित ने ध्वस्त कर दिया। अफसोस, कि प्रकाशक ‘शब्दकार’ ने भी ‘मोरी की ईंट’ का एक संस्करण छापने के बाद उसका पुनर्मुद्रण नहीं किया। मदन दीक्षित भी अब जीवित नहीं हैं, जो इस ओर ध्यान देते। हालांकि उनके पुत्र चन्दोसी शहर के प्रतिष्ति डाक्टर हैं, पर उनकी साहित्य में रुचि नहीं है। इसलिए यह उपन्यास आज उपलब्ध् भी नहीं है। इस उपन्यास में धर्मांतरण के मुद्दे पर गंभीरता से विचार किया गया है। यह बताता है कि जिस ईसाई धर्म को मेहतर समुदाय के लोगों ने अपनाकर अपनी मुक्ति की ऊंचाइयां छुईं, उसी को ब्राह्मणों ने अपनाकर अपने जैसा ही जातिवादी बना दिया। इस उपन्यास पर मेरी आलोचना ‘मोरी की ईंट: दलित साहित्य में एक विमर्श’ नाम से ‘परिवेश’ के ही अंक 40 (अप्रैल-सितम्बर 2001) में प्रकाशित हुई थी। यह आलेख उसी आलोचना का परिवर्द्धित रूप है।

– लेखक

‘मोरी की ईंट’ का दलित भाष्य

  • कंवल भारती

सन् 1996 में प्रकाशित मदन दीक्षित का उपन्यास ‘मोरी की ईंट’ हिंदी में संभवतः पहला रचनाकर्म है, जो मेहतर समुदाय पर गांधीवादी दृष्टि से लिखा गया है। मदन दीक्षित एक ऐसे लेखक थे, जिन्होंने 1945-46 के तूफानी दिनों में दलित जीवन को देखा भी था और भोगा भी। इसका उल्लेख करते हुए उन्होंने अपनी निवेदनीय टिप्पणी ‘वाजिबुल अर्ज़’ में लिखा है, “स्कूल के दिनों में मुंशी प्रेमचंद की रचनाओं ने किशोर मन की धरती पर सामाजिक न्याय की चेतना का जो बीज रोपा था, उसे उन दिनों के ‘हंस’ और राहुल जी की रचनाओं का खाद-पानी पाकर अंकुवाने में विलंब नहीं लगा और युवा मन, ‘बाइसवीं सदी’ के सपने को धरती पर उतारने के लिये, अकुलाने लगा।” (पृष्ठ 5)

दलित पीड़ा क्या होती है, उसे उन्होंने मेहतरों के बीच रहकर निकट से भोगा और अस्पृश्यता का दंश यह कि अपने ही घर के लोगों ने उन्हें ‘कुल कलंक’ कहकर संबोधितया। वे आगे लिखते हैं, “घर वालों की परवाह किये बिना मैं घर वापस आ गया। प्यास लगी और उठकर घड़े से पानी लेकर पिया, तो ताई ने मिट्टी का घड़ा धरती पर पटकते हुए कहा, ‘यह ब्राह्मणों का घर है, इसमें यह सब भ्रष्टम-भ्रष्ट नहीं चलेगा। अपनी बाहर की कोठरी में जैसे चाहो, वैसे नंगे नाचो’ और, इसी के साथ उनके खाने-पीने के बर्तन अलग करके उनकी कोठरी में पहुंचा दिये गये। अभिजात समाज के बड़े-बूढ़े लोग उन्हें छूत की बीमारी समझ रहे थे और उन्होंने अपने घरों के लड़कों को उनके साथ उठने-बैठने से मना कर दिया था।” (पृष्ठ 9)

‘मोरी की ईंट’ के नायक सतीश में लेखक स्वयं मौजूद है। वह कहता है, हरिजन-सेवा की रस्म निभाने वालों ने तो मेहतरों के चौपाल-स्कूल की इमारत पक्की करवाकर अपने सिर का बोझ उतार दिया था, लेकिन ऊँची बिरादरियों के कुछ दुस्साहसी नौजवानों ने हरिजन-सेवा को अपने जीवन का मिशन ही बना लिया था। सतीश बाबू ऐसे ही नौजवान हैं, जो महात्मा गांधी का ‘हरिजन सेवक’ पढ़ते-पढ़ते हरिजन-सेवा के मैदान में उतर जाते हैं। वे मेहतर बस्ती में रात के स्कूल में रेवरेण्ड दिलावर सिंह और शम्भू ठाकुर के साथ मिलकर मेहतरों को पढ़ाने का काम करते हैं।

सतीश बाबू काँग्रेसी हैं और उन्होंने काँग्रेस को एक जीवन-दर्शन के रूप में अपनाया हुआ है। दूसरे काँग्रेसियों की तरह राजनीति के छल-प्रपंच और उठा-पटक उनमें नहीं हैं। यह काँग्रेस की राजनीति का शुरुआती दौर है, जिसमें एक ओर सतीश जैसे नौजवान हैं, जो दलितों में काँग्रेस का आधार बन रहे हैं, तो दूसरी ओर शराब और सुन्दरी के बल पर आला अफसरों से अपने नाजायज काम कराकर मस्त रहने वाले साहू कन्हैया लाल और मुंशी इनायत हुसैन जैसे लोग भी हैं, जिन्हें न देश से मतलब है और न देश की जनता से। काँग्रेसी बनाये जाने का एक रोचक वर्णन उपन्यास में है। पाकिस्तान बन जाने के बाद मुंशी इनायत हुसैन से साहू कहता है, तुम भी काँग्रेसी बन जाओ। वह कहता है, मुझ मुस्लिम लीग को कौन बनायेगा काँग्रेसी? साहू जवाब देता है, “हम बनायेंगे तुम्हें काँग्रेसी। पौने पाँच रुपये ही तो लगते हैं काँग्रेसी बनने में। दो रुपये का खद्दर का कुर्ता, दो रुपये का पाजामा, अठन्नी की गांधी टोपी और चार आना काँग्रेस की मेम्बरी की फीस।”

उपन्यास दलितों को हिंदू फोल्ड में बनाये रखने की राजनीति का पर्दाफाश करता है। मदन दीक्षित ने समाज और राजनीति में पूना-पैक्ट के बाद पैदा हुईं परिस्थितियों का वर्णन किया है। पूना-पैक्ट में डाॅ. आंबेडकर दलितों के पृथक राजनीतिक अधिकारों की लड़ाई हार गये थे। काँग्रेस ने इसमें मंदिर प्रवेश, शिक्षा और भागीदारी को अछूतोद्धार कार्यक्रम में शामिल किया था। दलित आंदोलन के बारे में हिंदू नेताओं की राय अच्छी नहीं थी।

सचमुच उपन्यासकार इस बात को रेखांकित करता है कि किस तरह अराजक तत्व भी अपनी गंदी मनोवृत्तियों के साथ काँग्रेस में शामिल हो रहे थे। इस मनोवृत्ति का परिणाम भी तत्काल सामने आता है। पाकिस्तान के बाद जब सांप्रदायिक वहशीपन का नंगा नृत्य शुरु होता है, तो साहू अपने आदमियों से शहर में लूटमार शुरु करवा देता है। लूटमार करने वाले साहू के वे सारे आदमी दलित हैं, मेहतर बस्ती के लोग। वे साहू के आदमी कैसे बनते हैं, इस रहस्य को उपन्यासकार बड़ी सफाई से खोलता है। साहू कन्हैया लाल मेहतरों के मुहल्ले में मंदिर का निर्माण कराते हैं और सुम्मेरी जमादार, जो स्वयं मेहतर है, अपनी बिरादरी के सारे निठल्ले छैलों का हुजूम साहू की हाजिरी में लाकर खड़ा कर देता है। साहू इन छैलों को नशा-पानी कराकर पालता है। इसे वह पोलिटिक्स का नाम देता है। कहता है– “पाकिस्तान बन जाने से साले कटुओं का हौसला कितना बढ़ गया है। अगर किसी दिन अली-अली कहके हिंदुओं की बस्ती पर चढ़ आये, तो तुम बाम्हन-बनिये तो धोती खोलकर पड़ जाओगे। उस वक्त मोर्चा लेने के लिये तैयार कर रहा हूँ इन लौंडोे को। इन मियां लोगों का तिया-पांचा हो जाने दो, फिर इन ससुरों को औकात पर पहुंचाने में कितनी देर लगेगी।” (पृष्ठ 205) इस प्रकार, सांप्रदायिक ताकतों द्वारा दलितों के घृणित इस्तेमाल का खेल जो शुरु हुआ, वह दुर्भाग्य से आज तक खेला जा रहा है।

उपन्यास दलितों को हिंदू फोल्ड में बनाये रखने की राजनीति का पर्दाफाश करता है। मदन दीक्षित ने समाज और राजनीति में पूना-पैक्ट के बाद पैदा हुईं परिस्थितियों का वर्णन किया है। पूना-पैक्ट में डाॅ. आंबेडकर दलितों के पृथक राजनीतिक अधिकारों की लड़ाई हार गये थे। काँग्रेस ने इसमें मंदिर प्रवेश, शिक्षा और भागीदारी को अछूतोद्धार कार्यक्रम में शामिल किया था। दलित आंदोलन के बारे में हिंदू नेताओं की राय अच्छी नहीं थी। उनकी चिन्ता सिर्फ इतनी थी कि दलित हिंदू ही बने रहें, ईसाई या मुसलमान न बन जायें। उनके सारे प्रयत्न भी इसी खतरे को रोकने के लिये थे। उपन्यासकार भी मानता है कि अंग्रेज शासक सवर्ण हिंदुओं, मुसलमानों और अछूतों का तिकोना टकराव पैदा करने की कोशिश कर रहे थे। लेकिन अछूत अपनी सांस्कृतिक और भावनात्मक परंपराओं के चलते टकराव का तीसरा पक्ष बनने के लिये तैयार नहीं हुए। परिस्थिति का उलझाव देखते हुए सवर्ण हिंदुओं ने भी अछूतों की तरफ थोड़ी उदारता बरतनी शुरु कर दी थी। (पृष्ठ 194) अछूतोद्धार में पहला काम मंदिर-प्रवेश था। दीक्षित लिखते हैं, “मोटे तौर पर साफ-सुथरे परिवेश में अछूतों के मंदिर में जाने का अधिकार सिद्धांत के रूप में तो सवर्ण हिंदुओं ने मान लिया था और कुछेक पुराने और प्रतिष्ठित मंदिरों में बड़े धूम-धड़ाके के साथ उनका प्रवेश करा भी दिया गया था। वैसे उनका खास जोर अछूत बस्तियों में हिंदू देवी-देवताओं के अलग से मंदिर बनवाने पर ज्यादा रहा।” (पृष्ठ 194)

आज दलितों के लगभग हर मोहल्ले-बस्ती में जो मंदिर दिखाई देता है, उसका कारण यही गांधीवादी हिंदुत्व है। पूरे उपन्यास में हमें इस हिंदुत्व का विस्तार दिखाई देता है। मेहतरों के मोहल्ले में रेवरेण्ड दिलावर सिंह का रात का स्कूल चलता था। आर्यसमाजी इसे मेहतरों में ईसाईयों की घुसपैठ समझते थे।

उपन्यास में यहां एक ऐसे यथार्थ का उद्घाटन हुआ है, जो मंदिर-प्रवेश पर हिंदुत्व की अलगाववादी नीति का परिचय देता है। मंदि-प्रवेश दलित आंदोलन का कार्यक्रम नहीं था। वह काँग्रेस और गांधी के हरिजन-उद्धार का कार्यक्रम था। आंबेडकर के नेतृत्व में दलितों ने नासिक में काला राम मंदिर में प्रवेश के लिये सत्याग्रह जरूर किया था, पर उसका उद्देश्य दलितों को यह अहसास कराना था कि हिंदू समाज में उनकी हैसियत क्या है? पर, हिंदुओं ने मंदिर-निर्माण में ही दलितों को दलित बनाये रखने का भी आधार ढ़ लिया था। निश्चित रूप से यहां मदन दीक्षित गांधीवादी हिंदुत्व को स्थापित करते नजर आते हैं, जब वे कहते हैं– “कहा जाता था कि नया मुसलमान अल्लाह-अल्लाह पुकारता है। इसी परिपाटी पर चलकर ये नये हिंदू अपने आपको हिंदू देवी-देवताओं के प्रति पुराने हिंदुओं से भी अधिक आस्थावान साबित करने की कोशिश में लग गये। अछूतों के मोहल्लों-बस्तियों में कीर्तन-मंडलियां बन गई थीं और ‘रघुपति राघव राजाराम’ की गूंज अछूत बस्तियों में भी सुनाई देने लगी थी।” (पृष्ठ 194)

आज दलितों के लगभग हर मोहल्ले-बस्ती में जो मंदिर दिखाई देता है, उसका कारण यही गांधीवादी हिंदुत्व है। पूरे उपन्यास में हमें इस हिंदुत्व का विस्तार दिखाई देता है। मेहतरों के मोहल्ले में रेवरेण्ड दिलावर सिंह का रात का स्कूल चलता था। आर्यसमाजी इसे मेहतरों में ईसाईयों की घुसपैठ समझते थे। वे रविवार के दिन शाम के समय स्कूल में आते, वेद-मंत्रों के साथ हवन करते, ईसाईयों की खाट खड़ी करते और प्रसाद बांटकर अपने घरों को चले जाते थे। यहां मदन दीक्षित लिखते हैं– “मेहतरों को इस सारे प्रोग्राम में प्रसाद की बात सबसे अच्छी लगती थी, ईसाईयों से उन्हें कोई खास शिकायत नहीं थी और (आर्यसमाजी) महाशयों का निराकार-निर्विकार, परमपिता परमात्मा उनकी समझ में बिल्कुल भी नहीं आता था।” (पृष्ठ 148) ये आर्यसमाजी हरिजन-सेवक भी छद्म थे, जो “हरिजनों की ऊँची बिरादरियों के लोगों से संपर्क स्थापित कर हरिजन-सेवा की रस्म अदा कर लेते थे और फिर वापस पहुंचकर कपड़ों सहित स्नान करके शुद्ध हो लिया करते थे।” (पृष्ठ 149)

उपन्यास में भागीदारी कार्यक्रम को लेखक ने सुम्मेरी नामक पात्र के मार्फत दिखाया है। जब लखनऊ में काँग्रेस की सरकार बनी, तो चुंगी दफ्रतर में हुक्म आया कि हैल्थ डिपार्टमेंट में मेहतरों में से ही जमादार बनाये जायें। जमादार का एक पद खाली हुआ, तो मेहतरों में से उस पद पर सुम्मेरी चौधरी को नियुक्त किया गया, जो हैल्थ कमेटी के मेम्बर साहु कन्हैया लाल और मुंशी इनायत हुसैन का आदमी था। उनके गंदे कामों में सुम्मेरी उनका गुलाम था। वह उनकी सुरा-सुन्दरी वाली इन्तजामिया कमेटी का अंग है। यह पूना-पैक्ट का कार्यान्वयन था, जो इसी तरह हो सकता था। उपन्यास की कहानी इसी ताने-बाने में बुनी गई है। जमादार के पद पर सुम्मेरी की नियुक्ति सोच-समझकर की गई थी। जमादार के पद पर एक मेहतर को रखकर भी सवर्णों ने सत्ता का सूत्र अपने ही हाथों में रखा था। इसी ‘सगुण-दर्शन’ पर गांधीवादी हरिजन उद्धार की आधारशिला रखी गई थी।

दलित समस्या का समाजशास्त्राीय विवेचन

अब मैं उपन्यास में वर्णित मुख्य समस्या पर आता हूं। यह समस्या आर्थिक भी है, सामाजिक भी है और शिक्षा की भी है। इसके मूल में वर्णव्यवस्था का वह तांडव है, जो धर्मांतरण के बाद भी समाप्त नहीं होता है। उपन्यास में इस समस्या को पूरी ईमानदारी से उठाया गया है कि यदि दलितों में शिक्षा लाने का प्रयास किसी ने गंभीरता से किया है, तो वह ईसाई मिशन है। सरकारी स्तर पर अछूतों के लिये यदि कोई स्कूल खुलता भी है, तो उसमें सवर्ण हिंदू अपने बच्चों को पढ़ाने से इनकार कर देते हैं और इस तरह वह स्कूल पूरी तरह अछूत-स्कूल बनकर रह जाता है। उपन्यास में भंगी समुदाय की दो तस्वीरें हैं– एक हिंदू तस्वीर और दूसरी ईसाई तस्वीर। इसी प्रकार ब्राह्मण समुदाय की भी दो तस्वीरें हैं– एक हिंदू तस्वीर और दूसरी ईसाई तस्वीर। यह धर्मांतरण से पैदा हुई तस्वीरें हैं। उपन्यास इस हकीकत को बयान करता है कि सिर्फ दलित ही धर्मांतरण नहीं करता, बल्कि दूसरे लोग भी करते हैं। इन चारों तस्वीरों को हम दो भागों में रख सकते हैं। पहले भाग में धर्मांतरण के पूर्व का हिंदू समाज और दूसरे भाग में धर्मांतरण के बाद का हिंदू समाज। मदन दीक्षित ने दलित समस्या की जड़ खोजने का प्रयास किया है और जड़ है जन्म पर आधारित व्यवस्था, जिसे उन्होंने मंगिया के चरित्र के द्वारा प्रस्तुत किया है। शुरु में वे हमारे सामने भंगी समाज की हिंदू तस्वीर पेश करते हैं।

दलित अस्मिता की दृष्टि से ब्राह्मण के द्वारा मंगिया को रखैल बनाना दलित स्त्री का चरित्र-हनन है। पर, जिस मेहतर समुदाय की मंगिया सदस्य है और जिस तरह के माहौल में मेहतर समुदाय सांसें ले रहा था, उसमें मंगिया का पैदा होना असंभव नहीं था।

शुरुआत इस तरह होती है– झरगदिया, जन्म का निखट्टू और पक्का पियक्कड़ था। कहने को तो वह चुंगी में नौकर था, लेकिन काम उसकी एवजी में कोई दूसरा ही करता था। तनख्वाह का एक तिहाई भाग हीरालाल जमादार को रिश्वत में चला जाता था, एक तिहाई भाग एवजी लाला ले लेता था और झरगदिया बाकी एक-तिहाई भाग में ही खुश था। इन दामों में उसके लिये यह सौदा भी बुरा नहीं था। (पृष्ठ 11) झरगदिया की पत्नी थी मंगिया। वह भली थी, बिर्त के ठिकानों की कमाई में मिलने वाली रोटियों से उसका और अपना पेट भरती थी। इसी आर्थिक गुलामी के गर्भ से आगे की सारी कहानी जन्म लेती है। चुंगी दफ्तर में औरतों के दलाल हीरालाल जमादार की आँखों में मंगिया का यौवन अटक जाता है। फिर क्या? एक कुचक्र के तहत वह उसे झरगदिया की जगह नौकरी करा देता है। जरूरत मंगिया को भी थी, क्योंकि वह जानती थी कि शराबी पति के सहारे जीवन गुजारना मुश्किल था। चुंगी के नये हैल्थ आफिसर डाॅक्टर सुरेन्द्र नारायण पाण्डेय सुरा-सुन्दरी के शौकीन थे। हीरालाल ने मंगिया को डाॅक्टर की कोठी के काम के लिये तैनात कर दिया। मंगिया हीरालाल के चक्रव्यूह में फंस गई थी। इस संकट से वह उबर नहीं सकी। परिणामतः मंगिया डाॅक्टर की कोठी में ही उसकी रखैल बनकर रहने लगी और उसके अवैध बच्चे की मां बन गई। बच्चे का नाम रखा गया सोहन। आगे के सारे कथा-सूत्र सोहन और उसकी अम्मा मंगिया से ही जुड़े हुए हैं। मुख्यतः कथा के दो सूत्र हैं। पहला सूत्र चुंगी दफ्तर और मेहतर स्त्रियों के बीच चलता है, जिसमें मंगिया के साथ-साथ रम्पिया और रधिया के चरित्र हैं, और दूसरा सूत्र सोहन के भविष्य को संवारने वाले जैकब, फ्लोरा और रेवरेण्ड जोशी के चरित्रों से जुड़ा है। इस सबके माध्यम से समाज व्यवस्था के यथार्थ को उभारने का जटिल काम उपन्यासकार ने किया है।

दलित अस्मिता की दृष्टि से ब्राह्मण के द्वारा मंगिया को रखैल बनाना दलित स्त्री का चरित्र-हनन है। पर, जिस मेहतर समुदाय की मंगिया सदस्य है और जिस तरह के माहौल में मेहतर समुदाय सांसें ले रहा था, उसमें मंगिया का पैदा होना असंभव नहीं था। उपन्यास में, यह मेहतर समाज के लिये उतना घृणित नहीं है, जितना कि वह ब्राह्मण समुदाय के लिये धिक्कृत अभिव्यंजना पैदा करता है। मंगिया का रखैल बनना और एक अवैध् बच्चे की मां बनना उपन्यास की सबसे मूल और महत्वपूर्ण घटना इसलिये है, क्योंकि उसी से दलित मुक्ति का भावी संघर्ष जन्म लेता है। उससे एक नये सामाजिक यथार्थ का उद्घाटन होता है, जो दलित विमर्श को नई अर्थवत्ता और नई ऊर्जा देता है। मंगिया एक साधारण स्त्री से रखैल तक बन जाने के बाद एक संघर्षशील लौह महिला के रूप में विकसित होती है। वह अपने शराबी पति की वजह से हीरालाल जमादार के शिकंजे में फंसने वाली पहली औरत नहीं थी। हीरालाल के पास ऐसी सुंदर औरतों की सेना थी, जिनके पति उसकी शराब पर पलते थे। लेकिन मंगिया ऐसी पहली औरत जरूरत थी, जिसने मेहतर बस्ती की फिर किसी औरत को उसका शिकार नहीं बनने दिया। रखैल बनाने की कहानी मंगिया से शुरु नहीं होती है, पर उस पर खत्म जरूर होती है। वह हीरालाल जमादार, साहू कन्हैया लाल और मुंशी इनायत हुसैन के खिलाफ बस्ती की औरतों में जागरण अभियान चलाती है। औरतों में उन मर्दों से लड़ने का साहस भरती है, जो एक बोतल दारू के लालच में स्वयं अपनी ब्याहता को साहू की खाँची में हाँक आते थे।

ऐसा ही एक मर्द संता है, जो चुंगी दफ्तर में नौकरी के लिये खुद अपनी पत्नी रम्पिया को रात में साहू के यहाँ छोड़ आता था। नौकरी मिलने के बाद भी वह यह सिलसिला जारी रखता है। मंगिया को जब पता चलता है, तो वह पहले रम्पिया को उसके शराबी पति से छुटकारा दिलाती है और बस्ती के ही एक युवक किसना से उसका ‘कराव’ (दूसरा विवाह) करा देती है। मंगिया की वजह से ही एक अन्य स्त्री रधिया का भी उद्धार होता है, जो सुम्मेरी चौधरी के शिकंजे में फंने जा रही थी। उपन्यास यहाँ एक क्रांतिकारी दलित संचेतना का बोध कराने में सफलता हासिल करता है। वह संचेतना है अपना उद्धार स्वयं करने की। यदि दलित अपनी पीड़ा और समस्या का हल खुद ही तलाश नहीं करेंगे और शोषण के खिलाफ संघर्ष का साहस पैदा नहीं करेंगे, तो मुफ्त की इस गुलाम श्रेणी का उद्धार करने की किसी अन्य को क्या जरूरत पड़ी है? यही वह ‘रेडिकल’ चेतना है, जो दलित आंदोलन का मूलाधर है।

मदन दीक्षित द्वारा लिखित उपन्यास ‘मोरी की ईंट’ का मुख पृष्ठ

उपन्यासकार दिखाना चाहता है कि गांधीवादी हरिजन उद्धार में भागीदारी तो मिली, पर व्यवस्था नहीं बदली। हीरालाल जमादार की जगह मेहतर बिरादरी के सुम्मेरी चौधरी की नियुक्ति तो हो जाती है, पर जो शोषण हीरालाल कर रहा था, वही शोषण सुम्मेरी भी कर रहा है। बस्ती में परिवर्तन के नाम पर सिर्फ इतना होता है कि कुछ मेहतर लड़के फौज में भर्ती हो गये हैं, तो कुछ दूसरा काम करने लगे हैं। कुछ पढ़-लिख भी गये हैं और उन्होंने ठिकानों (मैला उठाना) का काम भी छोड़ दिया है। पर, सामाजिक व्यवस्था में कोई बदलाव नहीं आया है। दलित और सवर्ण के बीच अस्पृश्यता की दीवारें पहले जैसी ही मजबूत हैं। हालांकि, ऐसे लोग भी हैं, जो इस दीवार को वास्तव में गिराना चाहते हैं, पर माहौल दलित के पक्ष में बिल्कुल नहीं है।

यह सामाजिक यथार्थ हमें आगे के कथा-सूत्र में धर्मांतरण की तस्वीरों में दिखाई देता है। ये तस्वीरें एक मेहतर और एक ब्राह्मण परिवार की हैं। ये दोनों परिवार लगभग एक ही समय ईसाई बनते हैं। दोनों एक धर्म के हो जाते हैं। पर, इसके बावजूद दोनों के बीच ब्राह्मण और मेहतर का वर्णभेद और जातिभेद बना रहता है। इसका कारण भी उपन्यास में स्पष्ट नजर आता है। मेहतर परिवार सम्मान और प्रतिष्ठा के लिये ईसाई धर्म ग्रहण करता है, तो ब्राह्मण परिवार अंग्रेजी सत्ता से आर्थिक लाभ के मकसद से ईसाई धर्म अपनाता है। इस प्रकार, दोनों की धर्मांतरण करने की परिस्थितियां अलग-अलग हैं और नई परिस्थितियों में भी दोनों की सामाजिक स्थितियां यथावत रहती हैं, सबसे ज्यादा यथास्थितिवादी ब्राह्मण परिवार है, जो ईसाईयत में भी अपने ब्राह्मणत्व पर गर्व करता है।

जिस ईसापुर के मिशन स्कूल में मंगिया डाॅक्टर पांडेय का सिफारिशी पत्र लेकर अपने बेटे सोहन को भर्ती कराने जाती है, उसके प्रभारी विशप रेवरेण्ड जैकब कार्नीलियस के दादा खैराती मेरठ छावनी में लालकुर्ती इलाके के एक मामूली मेहतर घसीटे के बेटे थे। खैराती अंग्रेज सैनिक अधिकारी के घरेलू नौकर थे। वहां वह ईसाई बन गये। नाम मिला– कार्नीलियस। उसी अंग्रेज अधिकारी ने खैराती के बेटे श्यामू को मिशन स्कूल में भर्ती करा दिया था। अब वह सैमुअल था और एम.ए. करने के बाद स्कूल में अध्यापक था। प्राइमरी स्कूल की अध्यापिका मार्था से उसका विवाह हो जाता है। मार्था भी मेहतर मूल की ईसाई है। जैकब कार्नीलियस इन्हीं सैमुअल और मार्था दम्पत्ति का बेटा है।

अंग्रेज अधिकारी के घर काम करते समय खैराती जो बहुत बड़ी चीज महसूस करता है, वह यह है कि वहां कोई उसकी जाति नहीं पूछता है। जातीय अपमान बहुत पीड़ादायक होता है दलित के लिये, और खैराती को इसी पीड़ा से अंग्रेज के यहां रहकर बहुत बड़ी मुक्ति मिलती है। यह महत्वपूर्ण मुक्ति है, इसका वर्णन नहीं किया जा सकता। अधिकारी के घर आने वाले दूसरे अंग्रेज भी खैराती से वैसा ही व्यवहार करते हैं, जैसा वे आपस में एक-दूसरे से करते हैं। उसे बोध होता है कि ईसाईयत में जाति का रोग नहीं है। इससे प्रभावित होकर वह ईसाई बन जाता है। पर, आगे चलकर उसे शीघ्र ही यह भी एहसास हो जाता है कि ईसाई समाज में भी मेहतर की जाति उसका पिंड नहीं छोड़ती है। यह एहसास उसे उन ईसाईयों के संपर्क में आने के बाद होता है, जो उच्च वर्ग से आये थे। इस तरह के अनेक दृष्टान्त उपन्यास में मौजूद हैं। एक दृष्टान्त उस समय का है, जब सैमुअल का बेटा जैकब एस.एल.सी. का इम्तिहान प्रथम श्रेणी में पास करता है, तो भूगोल के अध्यापक विन्स्टन दिलीप सिंह अपने बेटे को बोलते हैं, “वह भंगी का बेटा तो फर्स्ट डिवीजन में पास हुआ है और तुम ससुरे राजपूतों के बेटे होकर भी थर्ड डिवीजन में पास हुए हो।”

एक अन्य दृष्टान्त पार्कर हाईस्कूल का है। वहां जॉन कार्नीलियस (मंगिया का बेटा सोहन) तिमाही इम्तिहान में पहले स्थान पर आता है, जबकि सुधीर सक्सैना दूसरे स्थान पर आता है। इसे जानकर सुधीर के पिता कहते हैं, “कोई भंगी होगा या चमार। ससुरों ने नाम भी कैसे-कैसे रख लिये हैं, जैसे सीधे लंदन से चले आ रहे हैं।” जॉन का ईसाई होना उनके लिये काफी नहीं है। “ईसाई होने से क्या होता है, भंगी तो भंगी ही रहेगा।”

ऐसी ही एक घटना जॉन के साथ तब घटती है, जब वह ईसापुर के मिशन स्कूल से अपनी अम्मा के साथ मेहतर मौहल्ले में आता है। ग्यारह वर्ष का बालक जॉन बसंता की दूकान से दो पैसे के मुंगौड़े लेने जाता है। वहां मौजूद ठाकुर महताब सिंह लड़के को पहचान कर कहता है– “जानते हो, यह किसका लड़का है? मंगिया का लौंडा है। कौन कह सकता है कि यह किसी भंगिन की औलाद है? अंग्रेजी पढ़ रहा है, किसी दिन बड़ा अफसर बनकर आयेगा तो देखना कैसे मुँह में मूतेगा?” इसके बाद का दृश्य जॉन के लिये बेहद अपमानजनक है। बसंता उसके दो पैसे पटिया पर रखवाकर पानी से धोकर गल्ले में रखता है और मुंगौड़ों को एक दोने में सड़क पर नाली के किनारे रखकर उसे दिये जाते हैं। जॉन इस अपमान को बरदाश्त नहीं कर पाता और जूते की ठोकर से मुंगौड़ों को सड़क पर बिखेर देता है।

डॉ. आंबेडकर के मत को ही जॉन भी जोरदार ढंग से रखता है। मंगिया का बेटा और जैकब का दत्तक पुत्र जॉन इलाहाबाद के इरविन क्रिश्चियन कालेज में छात्रा है। यह कालखंड 1945 का है। भारत में राजनीतिक सत्ता के बदलाव का माहौल था।

यह दलित चेतना का विद्रोही तेवर वस्तुतः जॉन में ही पैदा हो सकता था। जॉन की शिक्षा-दीक्षा, संस्कृति सब बदल गई थी। मेहतर बस्ती का कोई भी बालक जॉन नहीं बन सकता था। धर्मांतरण कुछ और दे या न दे, पर वह दलित को मानसिक रूप से जरूर बदल देता है। सोचते-समझने और देखने का यह परिवर्तन जॉन में निस्सन्देह धर्मांतरण और नये सांस्कृतिक वातावरण की देन था। उपन्यास इस वास्तविकता को रेखांकित करता है कि जहां उच्च वर्ण ने धर्मांतरण करके भी अपनी पूर्व वर्णव्यवस्था को बनाये रखने की कोशिशें कीं, वहां दलित जातियों के लिये धर्मांतरण एक आवश्यकता थी, वह उनकी अस्मिता और मुक्ति की तलाश में एक वरदान साबित हुआ। उपन्यास धर्मांतरण के इस सच को भी उजागर करता है कि उच्च वर्ण के लोगों ने ईसाई बनने के बाद अपने नये नामों के साथ अपने पूर्व नामों को भी सुरक्षित रखा, जैसे विन्स्टन दिलीप सिंह, फ्लोरा पन्त और रेवरेण्ड जोशी। परन्तु, दलितों ने ईसाईयत में जाकर सब कुछ बदल दिया था, पुराना कुछ बाकी नहीं रखा था, भले ही हिंदू समाज-व्यवस्था में वे अभी भी अछूत थे। उच्च वर्णों के सामने ईसाई बनने की क्या मजबूरी थी, इसे उपन्यास में अल्मोड़ा के नंदलाल पंत और मोहन चन्द्र जोशी द्वारा किये गये धर्मांतरण की अन्तःकथा में देखा जा सकता है। कथा के अनुसार उनका ईसाई बनना ईसाई अधिकारियों से घनिष्ठ संबंध बनाकर उनके आधार पर अपनी फर्म ‘जोशी एण्ड पन्त कन्ट्रैक्टर्स’ के लिये जंगलात के ठेके हासिल करना था। पर, कथा बताती है कि “नीची जातियों के प्रति उनके अभिजात्य दर्प में कोई कमी नहीं आई थी। वे खुद ईसाई साहबियत के साथ अपना ब्राह्मण अभिजात्य भी बनाये रखना चाहते थे। डोम-चमारों के ईसाई हो जाने पर भी वे उन्हें डोम-चमार ही मानकर उनसे एक निश्चित दूरी बनाये रखते थे।” (पृष्ठ 57)

किस तरह ब्राह्मणवाद ने सामन्ती अवशेषों का समर्थन करके सामाजिक परिवर्तन को रोकने में भूमिका निभायी, उपन्यास इसका बेबाक चित्रण करता है। पर, एक सुखद अनुभूति तब होती है, जब आगे चलकर कहानी में एक नाजुक मोड़ आता है। पन्त खानदान में तीसरी पीढ़ी की फ्लोरा पंत और खैराती खानदान में तीसरी पीढ़ी के जैकब के बीच प्यार के अंकुर फूटते हैं और दोनों विवाह-बंधन में बंध जाते हैं। यह उपन्यास की रचनात्मक परिणति है। फ्लोरा पंत और जैकब का मिलन ब्राह्मण और दलित के बीच वैचारिक समता की स्वीकृति होने के साथ-साथ सामाजिक परिवर्तन के लिये जरूरी भूमिका भी है।

इस उपन्यास में, जो सबसे बड़ी कमी खटकती है, वह यह है कि जिस व्यापक राष्ट्रीय परिदृश्य से उसके चरित्र आते हैं, उससे जो राजनीतिक और सामाजिक बहस उभरती है, उसमें डॉ. आंबेडकर कहीं नहीं है। उसमें गांधी, मालवीय और तिलक के नाम तो आते हैं, अंग्रेज सरकार का पक्ष भी आता है, पर डॉ. आंबेडकर का नाम नहीं आता है, जिनका मत उस काल का सशक्त दलित पक्ष था। सम्भवतः यह लेखक के गांधीवादी सरोकारों का परिणाम है। रेवरेण्ड जोशी और जैकब के बीच जो बहस चलती है, उसमें जोशी का पक्ष गांधीवादी नजर आता है, पर जैकब का दलित विमर्श गांधीवादी कतई नहीं लगता। उसमें डॉ. आंबेडकर बोलते हैं। मुलाहजा फरमाएँ– जैकब पूछता है– “तो क्या अछूत जातियां हमेशा इसी तरह सताई जाती रहेंगी?” जोशी का जवाब है कि अछूत और नीची कही जाने वाली जातियाँ भी एक-दूसरे को नीचा मानती हैं। इस अभिशाप से छुटकारा कैसे मिल सकता है? जैकब कहता है– शिक्षा से।

डॉ. आंबेडकर के मत को ही जॉन भी जोरदार ढंग से रखता है। मंगिया का बेटा और जैकब का दत्तक पुत्र जॉन इलाहाबाद के इरविन क्रिश्चियन कालेज में छात्रा है। यह कालखंड 1945 का है। भारत में राजनीतिक सत्ता के बदलाव का माहौल था। कालेज के ईसाई विद्यार्थियों ने अंग्रेजी सत्ता के खात्मे के अन्देशे से बौखलाकर एक दिन दीवारों पर गांधी, नेहरू और भारतीयों को अश्लील गालियां लिख दीं। हंगामा खड़ा हो गया और कालेज बन्द कर दिया गया। जब ऐरिक को यह पता चला, तो उन्होंने जॉन से कहा, “यह तुम लोगों ने अच्छा नहीं किया।” इस पर जॉन विचारोत्तेजक जवाब देता है– “बट दे रैस्क्ल्स रियली डिजर्ब इट, नाना जी!” (वे इसी काबिल हैं।) यह दलित वेदना थी, जो आक्रोश बनकर जॉन के अन्दर से फूट पड़ी थी। यह धरा आगे बढ़ती है। ऐरिक जॉन को टोकते हैं, “यह तुम क्या कह रहे हो?” जॉन कहता है, “लेकिन, जब वे लोग मुझे भंगिन की औलाद कहकर चिढ़ाते थे, तब उन्हें तो कोई नहीं रोकता था।” वह आगे कहता है, “दुर्भाग्य तो हमारा है, नाना जी, और इसे आप भी नहीं समझ सकेंगे। ईसाई होने पर भी आप हैं तो ब्राह्मण। लेकिन हम लाख ईसाई हो जायें, पर रहेंगे भंगी के भंगी।” जॉन डॉ. आंबेडकर के विचार को ही रखता है, “मुसलमानों को उनका पाकिस्तान मिल जायेगा और सिख हिंदुओं के ही एक वैरिएंट हैं। रह गये अछूत और ईसाई, हिंदुओं के आजाद हिन्दुस्तान में इन्हें एक नई गुलामी के सिवाय और मिलने वाला क्या है?” जॉन का विचार गलत नहीं है। आजाद भारत की तस्वीर उसकी तसदीक करती है। मदन दीक्षित ने सही लिखा है कि शताब्दियों की दुत्कारी और सताई हुई अछूत जातियां सवर्णों की उदारता के लौलीपाप में बहल गई। (पृष्ठ 195)

मदन दीक्षित पूरे उपन्यास में सिर्फ एक जगह डॉ. आंबेडकर का स्मरण करते हैं। बसंता की दुकान पर जब उन्हें नन्हें जॉन को ठाकुर मेहताब सिंह अपमानित करता है, तो वहां मौजूद हरद्वारी लाल शरारत से मुस्कुराकर कहता है, “महात्मा गांधी ने डॉ. आंबेडकर से समझौता न किया होता और मुसलमानों की तरह अछूतों की भी सीटें अलग हो जातीं, तो तुम्हारी यह ठकुराई भी धरी-की-धरी रह जाती।” लेकिन उपन्यास का सबसे मार्मिक विमर्श वह निर्णायक बहस है, जो मिस्टर आर्थर गिल्बर्ट और रेवरेण्ड जैकब के बीच होती है। जैकब कहता है, “हम इस गलतफहमी में फंस गये हैं कि धर्मों का टकराव ही इस देश की मुख्य समस्या है।” जबकि, “हमारी समस्या पन्द्रह सौ वर्षों से जड़ पड़ी हुई जन्म पर आधरित सामाजिक व्यवस्था है। हम हिंदू, मुस्लिम, सिख या ईसाई कुछ भी हों, लेकिन इसी व्यवस्था को बन्दरिया के मरे हुए बच्चे की तरह छाती से चिपकाए बैठे हैं।” आर्थर का जवाब है, “इस तरह की बातें करके तुम अकेले क्रूसेडर बनकर रह जाओगे।” जैकब विप्लव-नाद करता है, “यह तुम्हारा वहम है आर्थर! आज भी मैं अकेला नहीं हूँ। आज भी मेरी तरह से सोचने वाले लोग हैं। तुम यकीन करो या न करो, मुझे तो भविष्य के क्षितिज पर अपने जैसे क्रूसेडरों के ठठ के ठठ जमा होेते हुए दिखाई दे रहे हैं।” भविष्य के क्षितिज पर ठठ के ठठ जमा होते क्रूसेडरों का सन्देश सिर्फ इस उपन्यास का विजन नहीं है, वह दलित विमर्श की अर्थवत्ता भी है। यही अर्थवत्ता इस उपन्यास को दलित साहित्य में प्रवेश कराती है।

(संपादन : नवल/अनिल)


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