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संत-मत और रैदास साहेब (चंद्रिका प्रसाद जिज्ञासु का साहित्य – तीसरा भाग)

किताब के ‘निवेदन’ में जिज्ञासु ने बहुत महत्वपूर्ण मुद्दा उठाया है। बाबासाहेब के लाखों अनुयायियों ने बौद्ध बनकर कबीर और रैदास आदि संतों से अलगाव बना लिया था। बहुत से कबीर और रैदास पंथ के साधु भी बौद्ध भिक्षु बन गए थे, जिसके कारण, कबीर और रैदास आदि संत उनकी दृष्टि में अप्रासंगिक हो गए थे। कंवल भारती की समीक्षा

[भारतीय सामाजिक व्यवस्था के बुनियादी सिद्धांतों में से एक जातिगत भेदभाव और छुआछूत तथा इसके धार्मिक संरक्षण को लेकर आवाजें उठती रही हैं। सत्य शोधन की इस परंपरा का आगाज जोतीराव फुले ने 19वीं सदी में किया। बीसवीं सदी में इस परंपरा को अनेक लोगों ने बढ़ाया, जिनमें मुख्य तौर पर डॉ. आंबेडकर का नाम भी शामिल है। चंद्रिका प्रसाद जिज्ञासु भी ऐसे ही सत्य शोधक थे। कंवल भारती उनकी किताबों की पुस्तकवार समीक्षा कर रहे हैं। इसके पहले अपने पढ़ा जिज्ञासु जी की पहली कृति ‘भारत के आदि-निवासियों की सभ्यता’ की समीक्षा। दूसरी कृति ‘पिछड़ा वर्ग कमीशन की रिपोर्ट और पिछड़े वर्ग के वैधानिक अधिकारों का सरकार द्वारा हनन तथा बाबासाहेब आंबेडकर का कर्तव्यादेश’ की समीक्षा के बाद आज पढ़ें उनकी तीसरी कृति ‘संतप्रवर रैदास साहेब’ की समीक्षा]

चंद्रिका प्रसाद जिज्ञासु की तीसरी कृति : ‘संतप्रवर रैदास साहेब’

  • कंवल भारती

हिंदी में संत रैदास पर यह पहली मुकम्मल किताब है, जिसमें चन्द्रिका प्रसाद जिज्ञासु ने उनके जन्म, शिक्षा, गुरू, कृतित्व और दर्शन पर बुद्धवादी दृष्टि से विचार किया है। इस किताब का नाम है– ‘संतप्रवर रैदास साहेब’। इसके दो खंड हैं, पूर्वार्द्ध और उत्तरार्द्ध। पूर्वार्द्ध में रैदास साहेब का जीवन-चरित्र है, और उत्तरार्द्ध में उनकी वाणी, साधना तथा वैचारिकी का निरूपण किया गया है। पूर्वार्द्ध का प्रकाशन 1959 में हुआ था। उसका दूसरा और तीसरा संस्करण क्रमश: 1961 और 1964 में हुआ था। किन्तु 1969 में इसका चौथा संशोधित-परिवर्द्धित संस्करण निकला। इसका दूसरा खण्ड उत्तरार्द्ध का प्रकाशन 1968 में हुआ था। 1969 में जिज्ञासु ने दोनों खण्डों को एक ही जिल्द में कर दिया था। मेरी आलोचना का आधार यही जिल्द है।

इस किताब को लिखने की आवश्यकता क्यों पड़ी? इसका कारण बताते हुए जिज्ञासु लिखते हैं– 

वस्तुतः परम संत रैदासजी का जीवन-चरित्र भ्रमों और भ्रान्तियों के घटाटोप में ऐसा छिपा हुआ था कि उनके दिव्य तेजोमय स्वरूप का स्पष्ट दर्शन नहीं होता था। मेरे मन में यह बात चिर समय से खटक रही थी। इधर बोध्सित्त्व बाबासाहेब आंबेडकर द्वारा र्ध्मान्तरण और बौद्धर्ध्म के प्रचार से यह आवश्यकता अधिक बढ़ गई थी कि परम संत रैदासजी के भक्तों और बाबासाहेब के भक्तों के बीच विचारों की जो एक खाई सी दिखाई देती है, उसे किसी प्रकार पाटा जाए। अतः जैसा मेरी समझ में आया, बुद्धिवादी शैली से उन भ्रांतियों के बादलों को हटाकर इस दिव्य सूर्य का दर्शन कराने का मैंने प्रयास किया।” (निवेदन से)

निवेदनमें जिज्ञासु ने बहुत महत्वपूर्ण मुद्दा उठाया है। बाबासाहेब के लाखों अनुयायियों ने बौद्ध बनकर कबीर और रैदास आदि संतों से अलगाव बना लिया था। बहुत से कबीर और रैदास पंथ के साधु भी बौद्ध भिक्षु बन गए थे, जिसके कारण, कबीर और रैदास आदि संत उनकी दृष्टि में अप्रासंगिक हो गए थे। इसका एक आधार यह भी था कि कबीर और रैदास के जन्म की जो कहानियां प्रचलन में थीं, वे ब्राह्मणवादी थीं, और उनके पदों में जो ईश्वरवाद था, वह बौद्ध धर्म में नहीं था। इसलिए जिज्ञासु की संत प्रवर रैदास साहेबपुस्तक ने इस वैचारिक खाई को पाटने का बड़ा काम किया। 

पूर्वार्द्ध खंड में तीन अध्याय हैं। पहले अध्याय में लेखक ने जन्म और रामानन्द के शिष्यत्व पर विचार किया है। दलित वर्ग के संतों और नायकों के जन्म के संबंध में ब्राह्मणी ग्रन्थों में बहुत ही घृणित और अपमानजनक कहानियां लिखी गई हैं। इन कहानियों में कबीर और रैदास को पूर्वजन्म का ब्राह्मण और स्वामी रामानन्द ब्राह्मण का शिष्य लिखा गया है। जिज्ञासु ने ब्राह्मणी ग्रन्थों में लिखी गईं इन कहानियों का बहुत ही तार्किक तरीके से खंडन किया है। उनके अनुसार, ब्राह्मणी ग्रन्थ भक्त-कल्पद्रुम’ (पृष्ठ 417-18) में रैदासजी के संबंध में इस प्रकार लिखा है

रैदासजी पहले जन्म में ब्रह्मचारी रामानन्दजी के चेले थे। भिक्षा करके गुरुसेवा व भगवत्प्रसाद किया करते थे। एक दिन पानी बरसता था, सो एक बनिया, जो कि बहुत दिन से कहता था, परन्तु (ब्रह्मचारी) उसकी भिक्षा कभी भी न लेते थे, उस दिन उसी के यहां से रसोई की सामग्री ले आए। जब रामानन्दजी भोग लगाने लगे, तो भगवान ध्यान में न आए। तब रामानन्दजी ने ब्रह्मचारी से बूझके उस बनिए का वृत्तांत बूझा। विचारा तो उसका लेन-देन चमारों के साथ मालूम हुआ। रामानन्दजी ने ब्रह्मचारी को शाप दिया कि तुझको चमार का जन्म मिले। तो ब्रह्मचारी ने ब्राह्मण का तन छोड़कर चमार का जन्म लिया। परन्तु भगवद्भक्ति व गुरु के प्रताप से पहले जन्म का स्मरण बना रहा। जनमे, तब ही माता का दूध पीना छोड़ दिया कि बिना गुरुमंत्र का उपदेश हुए खाना-पीना निषेध है। रामानन्द को भगवान ने आकाशवाणी से कहा कि ब्रह्मचारी को तुमने घोर दंड दिया, उस पर दया उचित है। रामानन्दजी उस आज्ञा से चमार के घर गए। मंत्र उपदेश करके रैदासजी नाम ध्रा और दूध पीने की आज्ञा दी।” (संतप्रवर रैदास साहेब, पृष्ठ 24)

चंद्रिका प्रसाद जिज्ञासु की तीसरी कृति ‘संतप्रवर रैदास साहेब’ का कवर पृष्ठ और जिज्ञासु जी की तस्वीर

जिज्ञासु ने लिखा कि यही कहानी कुछ शब्दों के फेरबदल के साथ संत वाणी संग्रहऔर रविदासजी की बानीमें भी लिखी गई है। उन्होंने इस कहानी को अस्वाभाविक और मनगढ़ंत कहा। उनके अनुसार, इस कहानी के लिखने वाले में चमार जाति के प्रति असीम नीचता का भाव भरा हुआ है। उन्होंने कहा– यदि यह कथा सत्य है, तो फिर रैदासजी की भक्ति आदि की कोई महिमा नहीं, महिमा उस ब्राह्मण की है, जो उनके शरीर के भीतर घुसा हुआ था।… शाप पाते ही ब्रह्मचारी का मर जाना, और इस कमरे से उस कमरे में जाने की तरह, बिना रज-वीर्य के संयोग के ही घुरबिनिया चमारिनके पेट में पहुंच जाना, और जन्म लेते ही अपनी माता का, जिसके रक्त से ही भ्रूण का पोषण होता है, तिरस्कार करना, अपने को ब्राह्मण और जननी को चमारिन समझकर माता की छाती में मंंह न लगाना, इत्यादि बातें अस्वाभाविक और ईश्वरीय नियम के नितांत विपरीत हैं।” (वही, पृष्ठ 27)

जिज्ञासु ने जोर देकर लिखा कि माता का तिरस्कार करने वाला तो साधरण मनुष्य भी कहलाने योग्य नहीं है, ऐसे महापाप को रैदास जैसा संत कैसे कर सकता है? उन्होंने इस गल्प का खंडन करते हुए साफ-साफ लिखा कि संत रैदास सच में ही चमार थे। वह रघुराम के वीर्य और माता रघुरानी के रज के संयोग से ही गर्भ में आए थे।उन्होंने कहा कि इसका प्रमाण है कि रैदासजी ने अपने पदों में साफ-साफ स्वयं को चमार कहा है। (वही, पृष्ठ 28)

ब्राह्मणों ने रैदासजी को ब्राह्मण ब्रह्मचारी बनाने की मिथ्या कहानी क्यों गढ़ी? इसका कारण बताते हुए जिज्ञासु लिखते हैं– ब्रह्मचारी की कथा की गढ़न्त इस उद्देश्य से की गई प्रतीत होती है कि ब्राह्मणों की यह एक मिथ्या धरणा है कि धर्म का ज्ञान अथवा मस्तिष्क का विकास ब्राह्मण के सिवा किसी दूसरे में, जो ब्राह्मण के वीर्य से उत्पन्न नहीं है, हो ही नहीं सकता। अपनी इस धांधलेबाजी की पुष्टि में ब्राह्मण लोग ऐसी लचर दलीलें दिया करते हैं, जैसे कि कांच की खान से हीरा कैसे निकल सकता है? वे कहते हैं कि कांच की खान में यदि हीरा पाया गया, तो मान लेना चाहिए कि वह किसी तरह बाहर से आकर उसमें पड़ गया है। अपनी इस भ्रांति को सत्य सिद्ध करने के लिए जब कभी वे किसी दबी-पिछड़ी जाति के मनुष्य में ज्ञान और प्रज्ञा का प्रकाश देखते हैं, तो पहले तो उसके ज्ञान को झूठा सिद्ध करने की कोशश करते हैं, किन्तु जब देखते हैं कि उनके झुठलाने से वह झूठा नहीं होता, जनता उस पर विश्वास और श्रद्धा करती है, और उसके तर्कों के उत्तर भी उनकी बुद्ध में नहीं आते, तो झख मारकर उसके आगे सिर झुका देते हैं, और कुटिलतापूर्वक यह सिद्ध करने लगते हैं कि अरे भैया, यह तो अमुक देवता के अवतार थे, अथवा वह किसी ब्राह्मण के वीर्य से उत्पन्न थे, इत्यादि।” (वही, पृष्ठ 29)

जिज्ञासु ने रैदासजी के जीवन से जुड़ीं ऐसी सभी चामत्कारिक घटनाओं का खंडन किया है। वे इस कथा की आलोचना करने हुए लिखते हैं– इस कथा में पारसऔर साधु-रूप में भगवतये दोनों बातें संदिग्ध हैं। किन्तु इसमें एक बड़ा भारी तत्व रैदासजी की लोभ-हीनता का है।

ब्राह्मणों ने अपनी वर्णव्यवस्था में शिक्षा ग्रहण करने का अधिकार अपने सिवा किसी अन्य वर्ण को नहीं दिया था। इसलिए भारत में मुसलमानों और ईसाइयों के आगमन तक शूद्र-अतिशूद्र जातियों में कोई शिक्षित नहीं था। यहां सबके लिए शिक्षा का द्वार सबसे पहले मुसलमान शासकों और उनके बाद अंग्रेजों ने ही खोला था। इन जातियों को जब पढ़ने का अवसर मिला, तो उनमें एक से एक मेधावी प्रतिभाएं पैदा हईं। अगर भारत में मुस्लिम शासन नहीं आता, तो कबीर और रैदास जैसी प्रतिभाएं कभी पैदा नहीं होतीं। इसलिए, जिज्ञासु ने ब्राह्मणी कहानियों का खंडन करने के बाद लिखा– संत रैदासजी ने चमार जाति में जन्म ग्रहण करके ब्राह्मणों की इस भ्रांति को चेलैंज देकर मिथ्या सिद्ध कर दिया, और प्रत्येक विरोधी को, जो उनसे अड़ा, अपने ज्ञानबल व योगबल से पराजित व लज्जित कर दिया। उन्होंने केवल चमार जाति के सामने ही नहीं, अपितु भारत की समस्त छोटी या नीच समझी जाने वाली जातियों के सामने अपना एक सुन्दर आदर्श उपस्थित कर दिया, जो उनमें जीवन-ज्योति जगाकर उन्नति के शिखर पर पहुंचा सकता है।” (वही, पृष्ठ 29-30)

रैदासजी के गुरू रामानन्द नहीं

जिज्ञासु ने ब्राह्मणों के इस मत का भी, कि रैदासजी के गुरू रामानन्द थे, जोरदार खंडन किया है। उन्होंने लिखा कि वैष्णवों की प्रसिद्ध पुस्तक रामपटलमें चारों सम्प्रदायों के कर्तव्यों तथा उनके धर्म के प्रचारक 52 द्वारों का वर्णन है।उसके अनुसार, “श्रीरामानन्द (रामानुजी) स्वामी, श्री निम्बादित्य स्वामी, श्री विष्णुस्वामी और श्रीमाधवानन्द स्वामी, ये चारों धर्मशील पृथ्वी पर धर्म-स्थापन करने वाले हुए। इन महापुरुषों के 52 अनुयायी हुए, जो द्वारानाम से प्रसिद्ध हैं।और यह भी लिखा है कि इनमें 33 द्वारा श्रीरामानन्दीय वैष्णवों के हैं।जिज्ञासु ने इन सभी द्वाराकी सूची दी है, जिसमें, उनके अनुसार, “इस सूची में कबीर, नाभा, पीपा, कूपा और नामदेव इत्यादि के नाम तो हैं, परन्तु रैदासजी का नाम नहीं है।जिज्ञासु प्रश्न करते हैं– “जब गुरु की सूची में चेले का नाम नहीं, और चेले की वाणी में गुरु का नाम नहीं, तो यह बात किस आधार पर मान ली जाए कि संत रैदासजी रामानन्द स्वामी के शिष्य थे?” (वही, पृष्ठ 32-33)

ब्राह्मणों ने सिर्फ रैदासजी को रामानन्द स्वामी का शिष्य ही नहीं बनाया, बल्कि उनके जीवन के साथ ऐसी चमत्कारिक घटनाएं भी जोड़ दीं, जो उन्हें सगुणोपासक और कर्मकांडी बनाती हैं। इन घटनाओं का विश्लेषण जिज्ञासु ने दूसरे अध्याय में किया है, जिसमें रैदासजी के बाल्य-जीवन और उनकी शिक्षा का वर्णन किया गया है। उनके जीवन के संबंध में भी ऐसी ही एक कथा पारस पत्थर की है, जो भक्तमालके अनुसार, इस प्रकार है– 

उनकी (रैदासजी की) तंगी की दशा देखकर भगवान को दया आई और साधु के रूप में पास आकर उनको पारस पत्थर दिया और उसे छुआकर उनकी लोहे की रापी-सुतारी को सोने की बनाकर भी दिखा दिया, किन्तु रैदासजी ने उस पत्थर को लेने सें इनकार कर दिया। साधु ने हठ की, तो लाचार होकर कहा कि छप्पर में खोंस दो। … सो साधु छप्पर में उस पारस को रखकर चले गए। तेरह महीने पीछे आए, और रेदासजी का वृत्तांत वैसा ही देखा। पूछा कि पारस का क्या हुआ? रैदासजी ने कहा, जहां आप रख गए, तहां ही होगा, मुझको उसे हाथ लगाने से भय होता है। भगवत् उसे लेकर चले गए।” (वही, पृष्ठ 42) 

जिज्ञासु ने रैदासजी के जीवन से जुड़ीं ऐसी सभी चामत्कारिक घटनाओं का खंडन किया है। वे इस कथा की आलोचना करने हुए लिखते हैं– इस कथा में पारसऔर साधु-रूप में भगवतये दोनों बातें संदिग्ध हैं। किन्तु इसमें एक बड़ा भारी तत्व रैदासजी की लोभ-हीनता का है।” 

भक्तकल्पद्रुमके लेखक ने रैदासजी के धनवान होने की एक और कथा लिखी है, जिसे जिज्ञासु ने इस प्रकार लिखा है– 

एक दिन पूजा की पिटारी में पांच मोहरें निकलीं। रैदास को भगवत्सेवा से भी भय होने लगा। भगवत् ने स्वप्न में आज्ञा की कि यद्यपि तुमको कुछ लोभ नहीं है, परन्तु अब जो कुछ हम देवें, उसे अंगीकार करो। तब रैदासजी ने अंगीकार किया, और एक पक्का धर्मशाला बनाकर भगवत्-भक्तों को उसमें बसाया, और फिर एक भगवत् मन्दिर तैयार करके भॉंति-भॉंति के अन्दोबे और झालर, सुनहरी बंदनवार, दीवारगीरी व छतबन्द इत्यादि से सजा कि जो दशर्न करने वाले आते थे, मन्दिर की शभा व भगवत्-मूर्ति की छवि देखकर मोहित हो जाते थे। पूजा प्रतिष्ठा सब ब्राह्मणों के हाथ से होती थी। जिसके पीछे जहां रैदासजी आप रहते थे, तहां एक स्थान दोमहला बनवाया और बड़ी प्रीति से भगवत्-आराधना आरम्भ किया।” (वही, पृष्ठ 44)

जिज्ञासु ने ठीक ही इसकी आलोचना की है कि इस कहानी के पीछे ब्राह्मणी साजिश रैदासजी को सगुणवादी सिद्ध करने की है। जब रैदास जी निर्गुण ईश्वर के उपासक थे, तो यह पूजा की पिटारी कैसी? भगवत्-मन्दिर और भगवत्-मूर्ति कैसी? और ब्राह्मणों के हाथ से पूजा-प्रतिष्ठा कराने का क्या अर्थ?” जिज्ञासु ने इस कहानी का उपहास उड़ाते हुए लिखा है– क्या संत रैदासजी को खुद भगवत्-पूजा करना नहीं आता था, जो वह ब्राह्मणों से पूजा-प्रतिष्ठा कराते थे? फिर जब पिटारी के भगवान की पूजा रैदासजी खुद कर लेते थे, तो मन्दिर के भगवान की पूजा वह खुद क्यों नहीं करते थे? क्या पिटारी के भगवान को छू लेते थे, और मन्दिर के भगवान को छूने से डरते थे? क्या उन्हें भय था कि उनके छूने से मन्दिर के भगवान अशुद्ध हो जायेंगे?” आगे आलोचक जिज्ञासु का यह मत गलत नहीं है– सच तो यह है कि ये ही वे सब हिन्दू-हृदय के नीचता-पूर्ण भाव हैं, जिनके कारण आठ करोड़ मानव-प्राणी अछूत बनाए गए।” (वही, पृष्ठ 44-45)

जिज्ञासु की आलोचना की पैनी दृष्टि ने पूजा की पिटारी में पांच मोहरेंकी गल्प पर भी सुन्दर व्यंग्य किया– भगवान ने रोज पांच मोहरें देने का झंझट क्यों पाला? क्या यह पूजा की मजदूरी थी? जिस दिन करें, पावें, न करें, न पावें? लेखक को झूठ गढ़ना भी न आया। इसी तरह की झूठी, आशमयी और बेहूदा बातों ने देश के अगणित लोगों को निठल्ला और हरामखोर बना रखा है। हिन्दुस्तान हरामखोरों व भिखमंगों का देश बन गया है।” (वही, पृष्ठ 44)

जिज्ञासु ने इस सारी कथा को उटपटांग और बेसिर-पैर की बताते हुए लिखा– इसके गढ़ने का प्रयोजन साफ यही दिखाई देता है कि इसे सुनकर पैसे वाले चर्मकार लोग भी बढ़िया झालर, छतगीरी, दीवारगीरी और चंदावादार मन्दिर बनवाया करें और ब्राह्मणों से उसमें भगवत्-मूर्ति की  कराकर पूजा के लिए उसे ब्राह्मणों को सौंप दिया करें, और ब्राह्मण विधाता बनकर उनकी छाती पर बैठ जाया करें तथा उनकी कमाई का आनन्द से भोग किया करें और उनके बाल-बच्चों को भंग-ठंडई, नाच-गाना आदि दुर्गुण सिखाकर उनका विनाश किया करें, और अन्त में उस पुख्ता इमारत के मालिक भी खुद बन जाया करें।” (वही, पृष्ठ 45)

इस अध्याय में एक महत्वपूर्ण वर्णन रैदासजी की “शिष्या मीराबाई कें संबंध में है। डा. रामकुमार वर्मा ने अपनी पुस्तक हिन्दी साहित्य का आलोचनात्मक इतिहासऐतिहासिक दृष्टि से मीराबाई को रैदासजी का गुरू मानने में संदेह किया है। उनका तर्क है कि रैदास कबीर के समकालीन थे, अधिक से अधिक संवत. 1550 या 1560 तक जीवित रहे हों गे। मीराबाई का जन्म 1555 में हुआ था, अतः इन संवतों को ध्यान में रखते हुए, मीराबाई रैदास से मिलकर उन्हें अपना गुरु नहीं बना सकतीं।वर्माजी का मत है कि संभव है, चित्तौड़ की रानी (झाली) भ्रम से मीराबाई मान ली गईं हों और संतों ने मीराबाई की रचना में रैदास संबंधी पद लिखकर मिला दिए हों।उनका कहना है कि ऐसी अवस्था में मीराबाई के वे समस्त पद, जिनमें रैदास का उल्लेख है, प्रक्षिप्त मानने होंगे।” 

वर्माजी की दलील का आधर संवत है। जिज्ञासु ने इस दलील का खंडन करते हुए लिखा– कदाचित वर्माजी ने यह नहीं पढ़ा कि रैदासजी ने अपने पदों में कबीर साहेब के सदेह परमधम जाने का उल्लेख किया है। यथा– ‘निर्गुन का गुन देखो आई, देही सहित कबीर सिधई।इससे यह मान लेना पड़ेगा कि कबीर साहेब के समकालीन होते हुए रैदासजी उनके गुप्त होने के बाद भी जीवित रहे, और विद्वानों ने इस समय को कम से कम पांच साल बताया है। कबीर साहेब का, 119 वर्ष की आयु में, संवत 1575 में गुप्त होना सर्वमान्य है। अतः रैदास जी कम से कम संवत 1580 तक जीवित रहे।इस आधर पर, जिज्ञासु का मत है– 1555 में जन्म-प्राप्त मीराबाई रैदासजी के परमधाम जाने के समय कम से कम 35 साल की थीं। ऐसी दशा में, और विशेषतः तब, जब जीवन के अंतिम 15 साल रैदासजी ने चित्तौड़ में बिताए और वहां सदेह परमधम को गए, मीराबाई का उनकी चेली होना जरा भी असम्भव प्रतीत नहीं होता।जिज्ञासु ने रैदासजी के उल्लेख वाले मीराबाई के पदों को प्रक्षिप्त नहीं माना। उन्होंने डा. वर्मा के मत का खंडन करते हुए मत व्यक्त किया– यह भी सोचने की बात है कि ऐसा साधु कौन हो सकता है, जो अकारण झूठ-मूठ मीराबाई को रैदासजी की चेली प्रसिद्ध करने के लिए इतना बड़ा साहस करे कि मीराबाई के नाम से खुद कविता करके उनकी शब्दावली में अपने शब्द घुसेड़ दे? और घुसेड़ना सम्भव भी तो नहीं।” (वही, पृष्ठ 58-59)

असल में हिन्दी के द्विज आलोचकों की समस्या यह है कि उन्हें एक राजघराने की स्त्री का एक चमार संत की शरण में जाना सहन नहीं है। इसलिए डा. रामकुमार वर्मा के द्विज मानस ने इस तथ्य पर विचार नहीं किया कि हिन्दुओं के शास्त्रों में स्त्री को दीक्षा देने का विधान नहीं है। उनके शास्त्रों में एक स्त्री का पति को छोड़कर संन्यास ग्रहण करना अधर्म की श्रेणी में माना गया है। ऐसी स्थिति में यह असम्भव ही था कि कोई हिन्दू सगुणवादी संत गृह-त्यागी मीराबाई को दीक्षा देता। ऐसा उल्लेख भी मिलता है कि काशी में ही मीराबाई को ब्राह्मणों ने अपमानित करके मन्दिर से निकाला था, तब यदि मीराबाई ने निर्गुण संत रैदासजी को अपना गुरु बनाया हो, तो इसमें आश्चर्य क्यों? निर्गुणवाद में जातिभेद, धर्मभेद और लिंगभेद नहीं है, और दूसरे, वह मन्दिर और शास्त्रवाद के विरोध में है। यह सत्य मीराबाई के पदों से भी प्रमाणित होता है, जिनमें शस्त्रावाद के विरुद्ध खुला विद्रोह है।

(संपादन : नवल/अनिल)


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लेखक के बारे में

कंवल भारती

कंवल भारती (जन्म: फरवरी, 1953) प्रगतिशील आम्बेडकरवादी चिंतक आज के सर्वाधिक चर्चित व सक्रिय लेखकों में से एक हैं। ‘दलित साहित्य की अवधारणा’ ‘स्वामी अछूतानंद हरिहर संचयिता’ आदि उनकी प्रमुख पुस्तकें हैं। उन्हें 1996 में डॉ. आंबेडकर राष्ट्रीय पुरस्कार तथा 2001 में भीमरत्न पुरस्कार प्राप्त हुआ था।

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