संत-मत और रैदास साहेब (चंद्रिका प्रसाद जिज्ञासु का साहित्य – चौथा भाग)

यह कहना कि रैदासजी पर हमला हुआ और उनके शरीर से सहस्र सूर्यों जैसा प्रकाश निकला, तो इसका अर्थ यह है कि उनको जिंदा जलाया गया था। अगर ऐसा हुआ था, तो उस हादसे में मीराबाई पर कोई आंच क्यों नहीं आई थी? पढ़ें, कंवल भारती की समीक्षा

 [भारतीय सामाजिक व्यवस्था के बुनियादी सिद्धांतों में से एक जातिगत भेदभाव और छुआछूत तथा इसके धार्मिक संरक्षण को लेकर आवाजें उठती रही हैं। सत्य शोधन की इस परंपरा का आगाज जोतीराव फुले ने 19वीं सदी में किया। बीसवीं सदी में इस परंपरा को अनेक लोगों ने बढ़ाया, जिनमें मुख्य तौर पर डॉ. आंबेडकर का नाम भी शामिल है। चंद्रिका प्रसाद जिज्ञासु भी ऐसे ही सत्य शोधक थे। कंवल भारती उनकी किताबों की पुस्तकवार समीक्षा कर रहे हैं। इसके पहले अपने पढ़ा जिज्ञासु जी की पहली कृति ‘भारत के आदि-निवासियों की सभ्यता’ की समीक्षा। दूसरी कृति ‘पिछड़ा वर्ग कमीशन की रिपोर्ट और पिछड़े वर्ग के वैधानिक अधिकारों का सरकार द्वारा हनन तथा बाबासाहेब आंबेडकर का कर्तव्यादेश’ की समीक्षा के बाद आज पढ़ें उनकी तीसरी कृति ‘संतप्रवर रैदास साहेब’ की समीक्षा का दूसरा भाग]

चंद्रिका प्रसाद जिज्ञासु की तीसरी कृति : ‘संतप्रवर रैदास साहेब’

  • कंवल भारती

गतांक से आगे

कहना अतिश्योक्ति नहीं कि जिस तरह ब्राह्मणों ने बुद्ध का विकृतीकरण किया, उसी प्रकार उन्होंने कबीर साहेब और रैदास साहेब का भी किया। ब्राह्मणों ने हर उस नायक, विचारक और संत को नकारा, उनका चरित्र-हनन किया और उनके दर्शन को विकृत किया, जिनसे ब्राह्मणवाद के विकास को खतरा था। यही खतरा उन्हें रैदास साहेब से भी था। इसलिए, उन्होंने रैदासजी को अपनी मनगढ़ंत कहानियों से एक चमत्कारी पुरुष बनाने का प्रयास किया। जिज्ञासु ने इस किताब में ऐसी कई मनगढ़ंत कहानियों का खण्डन किया है। ऐसी एक घटना जिज्ञासु के अनुसार, “झाली रानी के दरबार में शस्त्रार्थ होने वाली थी, जिसमें सिंहासन की मूर्ति को अपने पास बुलाने की शर्त थी। ब्राह्मण पंडितों के तीन पहर तक मंत्र पढ़-पढ़ाकर आह्वान करने पर भी मूर्ति टस से मस न हुई और रैदासजी के केवल एक बार भक्ति-भाव से पुकारने पर मूर्ति तुरंत उनकी गोद में आ विराजी।इस कहानी का उद्देश्य भी रैदासजी को सगुणवादी दिखाना है। 

एक और मनगढ़ंत कहानी का खंडन जिज्ञासु जी ने किया है, जिसमें रैदासजी को गंगाजी और ठाकुरजी का भक्त बताया गया है। कहानी इस प्रकार है– 

एक बार रैदासजी कुंभ के मेले में प्रयाग गए थे। वहां गंगा के किनारे सत्संग में जब वह उपदेश कर रहे थे, कुछ पंडे-पुजारियों ने आपस में मंत्रणा करके उन्हें नीचा दिखाने और जनता के सामने उनकी धूल उड़ाने का षड़यंत्र रचा, और सत्संग में घुसकर गड़बड़ मचाने लगे। उन्होंने रैदासजी से उल्टे-पुल्टे प्रश्न करके सत्संग को विवाद की सभा बना दिया। कुछ देर सवाल-जवाब होते रहे। पंडे-पुजारी इस बात पर अड़ गए कि चमार को धर्म का उपदेश और ठाकुरजी की पूजा करने का अधिकार कहां लिखा है? रैदासजी ने इस पर बहुत कुछ कहा, पर पंडे-पुजारी किसी तरह कायल न हुए, और बराबर कठहुज्जत करते रहे। अंत में यह शर्त ठहरी कि रैदासजी अपनी शालिग्राम की मूर्ति को और पंडे-पुजारी अपने-अपने ठाकुरों को गंगाजी के जल में तिरावें, जिसकी मूर्ति तैरती रहे, वह जीता और जिसकी डूब जाए, वह हार जायगा। रैदासजी ने यह कहते हुए कि मैं मूर्ति-पूजक नहीं, न मेरी अपनी कोई मूर्ति है, किन्तु मूर्ति पूजने का मनुष्य-मात्र को अधिकार है’, मूर्ति तिराने की शर्त को स्वीकार कर लिया।

“यह बात बिजली की तरह मेले भर में फैल गई। मूर्ति तैरने का तमाश देखने के लिए गंगा के किनारे दशर्कों की अपार भीड़ लग गई। गड़बढड़ी को रोकने और जीत-हार के निर्णय के लिए मेले के प्रबंधक उच्च अधिकारी भी आ गए। पंडे-पुजारी लोग जाल करके अपने-अपने ठाकुरों की काठ की मूर्तियां लाए थे, जबकि रैदासजी को दी गई शालिग्राम की बटिया पत्थर की थी। फिर भी उन्होंने सत्यनिष्ठा के बल पर इस बात की परवाह नहीं की। अधिकारी की आज्ञा पाकर पंडे-पुजारियों ने पहले अपनी मूर्तियां पानी में डालीं। कुछ डूब गईं और कुछ तैरती रहीं। अधिकारी ने तैरती हुईं मूर्तियों को निकालकर अपने निकट लाने को कहा। पंडे-पुजारी निकालकर लाए। अधिकारी ने मूर्तियों की जांच की, तो काठ की निकलीं। जनता खिन्न होकर इन जाली ब्राह्मणों को धिक्कारने लगी। किन्तु रैदासजी ने सबको संबोधित करते हुए संत वाणी में कहा– ‘पंडे-पुजारी लोग इन्हीं मूर्तियों को मेरी मूर्ति के साथ फिर तिरावें।इस पर ब्राह्मण बड़े खुश हुए। निदान रैदासजी ने अपनी मूर्ति और ब्राह्मणों ने अपनी मूर्तियां जल में डालीं। किन्तु आश्चर्य! ब्राह्मणों की काठ की मूर्तियॉ तो पानी में डालते ही डूब गईं और रैदासजी की पाषाण की बटिया जल पर तैरती रही। यह देखकर जाली ब्राह्मण लज्जित हुए … और अधिकारी ने निर्णय दिया कि संत रैदास जीत गए।” (संतप्रवर रैदास साहेब, पृष्ठ 64-65)

चंद्रिका प्रसाद जिज्ञासु की तीसरी कृति ‘संतप्रवर रैदास साहेब’ का कवर पृष्ठ और जिज्ञासु जी की तस्वीर

यह कहानी ब्राह्मणों द्वारा इतनी अधिक लोकप्रिय कर दी गई कि रैदास साहेब के दलित अनुयायी भी इसे उनकी भक्ति के प्रमाण में खूब श्रद्धा से सुनाते हैं। यहां तक कि दलित कवि बिहारीलाल हरितने भी इसे इन शब्दों में कविता-बद्ध किया–

श्री रविदास का सत्य जांचने आए।

ठस गंगाघाट पर सालिगराम तिराए।।

श्री रविदास ने पत्थर के बनवाए।

दूजे लकड़ी के बनवाए अति हर्षाए।।

डालत हरी न उठे धरा को सर के।

क्यों गए काठ के डूब तिरे पत्थर के।। 

ऐसी कहानियां रैदासजी को ठाकुरजी (राम चन्द्र) का भक्त बनाती हैं, जो वे नहीं थे। वे ऐसे किसी भी सगुण देवी-देवता और गंगाजी की भक्ति के कायल नहीं थे। गंगा हो या कोई भी नदी, उसके पानी में कोई भी पत्थर नहीं तैर सकता, चाहे वह ठाकुरजी की मूर्ति ही क्यों न हो। ब्राह्मण यह सच्चाई जानते थे, इसलिए उनके पास लकड़ी की मूर्तियां थीं, जिन्हें तैरना ही था, परन्तु रैदासजी की पत्थर की बटिया का तैरना वस्तु के स्वभाव के ही विपरीत है। इस तरह की अनेक अवैज्ञानिक कहानियों और चमत्कारों का जिज्ञासु ने खंडन किया है, जैसे गंगाजी ने हाथ निकालकर रैदासजी की सुपारी लेना, रैदासजी के लिए गंगाजी का सोने का कंगन देना, ठाकुरजी का नदी से निकलकर रैदासजी का भोग ग्रहण करना, रैदासजी के निमंत्राण पर कन्या के रूप में गंगाजी का आना और बारात का डूबना और मृत बालक के सिर पर हाथ फेरते ही उसका जिन्दा हो जाना, इत्यादि। जिज्ञासु ने इन कथाओं के संबंध में लिखा कि चमत्कार दिखाना मदारियों का काम हुआ करता है। बुद्धवादी लोग चमत्कारों से प्रभावित नहीं होते।उनका मत है– महात्माओं के जीवन-चरित्र के साथ चमत्कारी कथाएं प्रायः दो प्रकार से जुड़ जाया करती हैं। कुछ कथाएं तो उनके गद्दीधारी और चेले लोग अपने गुरु की महिमा बढ़ाकर लोगों को प्रभावित व उनकी ओर आकर्षित करने के लिए जोड़ देते हैं, और कुछ को प्रायः ब्राह्मण गुरु लोग, जिनको जगदगुरु बनने का बहुत शौक है, किसी महात्मा के मत पर अपना सिक्का जमाने के लिए गढ़कर जोड़ दिया करते हैं … जिनका उद्देश्य रैदासजी को मूर्तिपूजक एवं पूर्वजन्म का ब्राह्मण तथा वेद-शसत्र व राम-कृष्ण का अनन्य भक्त सिद्ध करना है।किन्तु जिज्ञासु ने लिखा, “रैदासजी की वाणी पर विचार करने से इस घटाटोप का खंडन स्वतः हो जाता है, और यह सिद्ध हो जाता है कि संत रैदासजी न तो मूर्ति-पूजक थे, (पूर्व जन्म के) ब्राह्मण थे और ना ही ब्राह्मणी धर्म व ब्राह्मणी राम-कृष्ण के भक्त ही।” (पृष्ठ 61-62)

रैदासजी की मृत्यु

जिज्ञासु ने किशोरीदास शास्त्री के चांद’, मई, 1927 में छपे एक लेख से उद्धरित किया है– रैदासजी गृहस्थ थे, और अपने रहने के लिए काशी जैसी जगह ढूंढ़ी थी, जो इनके विरोधियों का केन्द्र थी। वह दिव्य सूर्य काशी में ही उदित हुआ और वहीं अस्त भी।उनका यह भी कहना है कि चित्तौड़ में कुछ दिन रहकर रैदासजी फिर काशी में ही वापस आ गए थे। किन्तु भक्तमालमें यही संकेत मिलता है कि रैदासजी की मृत्यु चित्तौड़ में हुई थी। महात्मा रामचरण का भी यही मत था, जिसका वर्णन जिज्ञासु ने इस प्रकार किया है– 

रैदासजी अपने विशल जीवन के 105 वर्ष काशी में रहकर ब्राह्मण-पंडितों के साथ संघर्ष करते हुए मानव-धर्म का प्रचार करते रहे, बाद में मीराबाई के आग्रह से चित्तौड़ गए, और 15 साल तक उन्होंने वहां भी ब्राह्मणों से टक्कर लेते हुए अपने धर्म का प्रचार किया। अन्त में, एक दिन वह मीराबाई के स्थापित किए हुए श्री कुम्भश्यामके मंदिर में गए, और वहां ध्यान करने के पश्चात उन्होंने बड़े प्रेमानुराग से अपना एक आरती का पद गाया। इस आरती को सुनकर ब्राह्मणों का क्रोध सीमा को पार कर गया। मंदिर से बाहर निकलते ही उन्होंने यह कहते हुए रैदासजी पर घातक प्रहार किया कि ब्राह्मणों के सिवा किसी दूसरे को इस मंदिर में आरती-पूजा का अधिकार नहीं है। इसी समय उनके शरीर से सहस्र सूर्यों जैसा प्रकाश हुआ, और क्षण भर में उनका पार्थिव शरीर उसी तेज में विलीन हो गया।” (पृष्ठ 73-74)

जिज्ञासु आगे बहुत महत्वपूर्ण बात कहते हैं– “इसके विपरीत, यदि ब्राह्मणशही गुट के लेखकों अथवा प्रचलित धरा में बहने वाले भावुक भक्तों के लेखों के प्रमाण देकर उन्हें वेद-शस्त्र के अनुकूल साबित किया जाए, तो यह उनके पवित्र और उदार ज्ञान के साथ विद्रोह तथा उनके श्रद्धालुओं में भ्रांति का प्रचार करके उन्हें अज्ञान के अंधकार में रखने का पातक ही माना जायगा, इसे सत्य का अन्वेषण कदापि नहीं कहा जा सकता।” (पृष्ठ 5)

इस प्रकार, जिज्ञासु के अनुसार, रैदासजी की मृत्यु 120 वर्ष की अवस्था में, ब्राह्मणों के हमलों से हुई। रैदासजी का जन्म संवत 1460 (सन 1403) है। इस दृष्टि से उनके निधन का संवत 1580 (सन 1523) निश्चित होता है, हालांकि यह विवादास्पद है, क्योंकि दलित जातियों के लिए उस समय की राजनीतिक और सामाजिक परिस्थितियों में किसी दलित का 120 वर्ष तक जीना असम्भव नहीं, तो कठिन अवश्य है। जिज्ञासु के अनुसार रैदासजी की मृत्यु का कारण ब्राह्मणों का हमला है। उनका मत महात्मा रामचरण के मत पर आधरित है। यह विश्वसनीय नहीं लगता। निर्गुण संत रैदासजी का श्री कुंभश्यामके मंदिर में जाना और वहां सगुण भक्तों के बीच आरती गाना ही अविश्वसनीय है, क्योंकि जो मूर्ति-भंजक है, वह मूर्ति-पूजा क्यों करेगा? रैदासजी अगर मीराबाई के आग्रह पर भी चित्तौड़ गए होंगे, तो भी वहां उनका सत्संग उनके अपने अनुयायियों के बीच ही हुआ होगा, श्री कुंभश्याम के मंदिर में नहीं। मीराबाई भी निर्गुणवादी संत थीं, उन्हें सगुण और रूप-लीलाधरी कृष्ण का उपासक बनाने का कार्य ब्राह्मण आलोचकों का है। यह कहना कि रैदासजी पर हमला हुआ और उनके शरीर से सहस्रसूर्यों जैसा प्रकाश निकला, तो इसका अर्थ यह है कि उनको जिंदा जलाया गया था। अगर ऐसा हुआ था, तो उस हादसे में मीराबाई पर कोई आंच क्यों नहीं आई थी? हालांकि, ब्राह्मणों में रैदासजी के प्रति तीव्र विरोध देखते हुए, इस घटना से इनकार नहीं किया जा सकता, परन्तु, इसका कारण श्री कुंभश्याम के मंदिर में आरती गाना नहीं हो सकता, क्योंकि यह उनके स्वभाव और दर्शन के ही विपरीत था।

रैदासजी की निर्गुण विचारधारा 

जिज्ञासु ने पुस्तक के उत्तरार्द्धर् में रैदासजी की मूल वाणी और उनकी निर्गुण वैचारिकी प्रस्तुत की है। उन्होंने इसकी भूमिका में रैदासजी की विचारधारा को उनके एक ही पद में व्यक्त कर दिया है। उन्होंने लिखा

कृष्ण, करीम, रहीम, राम, हरि जब लगि एक न पेखा।

बेद-कितेब, कुरान-पुराननि, तब लगि भ्रम ही देखा।।

उदार पंक्ति का जैसे यह अर्थ निकालना ठीक नहीं कि संत रैदासजी साम्प्रदायिक रहीम और करीम के भगत थे, उसी तरह यह अर्थ भी ठीक नहीं कि वे साम्प्रदायिक राम, कृष्ण, हरि, माधव, गोविन्द, गिरधरी, मुरारी, बनवारी आदि हिन्दू अवतारों के भक्त थे। वह क्या थे? उनका सिद्धान्त क्या था? क्या वह प्रचलित रूढ़ियों और परम्पराओं के अंधभक्त थे? अथवा उनमें कुछ सुधर करना चाहते थे? उनकी साधना क्या थी? अपने शिष्यों को उन्होंने क्या उपदेश दिया? इत्यादि बातों को समझने के लिए और उनका सही अध्ययन करने के लिए केवल दो ही साधन उपलब्ध् हैं

  1. उनकी वाणी का विवेकपूर्ण अध्ययन।
  2. उनके समकालीन, उनके सत्संगी, मित्र और उनके दूसरे निर्गुण ब्रह्मवादी संतों की वाणी के साथ उनकी वाणी का तुलनात्मक अध्ययन।” (पृष्ठ 4-5)

जिज्ञासु आगे बहुत महत्वपूर्ण बात कहते हैं– इसके विपरीत, यदि ब्राह्मणशही गुट के लेखकों अथवा प्रचलित धरा में बहने वाले भावुक भक्तों के लेखों के प्रमाण देकर उन्हें वेद-शस्त्र के अनुकूल साबित किया जाए, तो यह उनके पवित्र और उदार ज्ञान के साथ विद्रोह तथा उनके श्रद्धालुओं में भ्रांति का प्रचार करके उन्हें अज्ञान के अंधकार में रखने का पातक ही माना जायगा, इसे सत्य का अन्वेषण कदापि नहीं कहा जा सकता।” (पृष्ठ 5) 

जिज्ञासु ने यह दावा नहीं किया कि रैदासजी के बारे में उनका विश्लेषण अकाट्य सत्य है, वरन् उन्होंने यह जरूर कहा कि यह एक निष्पक्ष विचारपूर्ण युगानुरूप अन्वेषण और सत्य की खोज है।आइए, देखते हैं कि यह सत्य की खोज क्या है?  उत्तरार्द्ध में बीस अध्याय हैं, जिनमें बीसवें अध्याय में रैदासजी की साखियों और पदों का संग्रह है। पहले अध्याय में भारत में प्रचलित छह मुख्य धर्मों का विवेचन किया गया है। इन छह धर्मोंमें तीन भारतीय हैं, और तीन विदेशी। भारतीय धर्मों में उन्होंने संत धर्म, जैन धर्म और बौद्ध धर्म का उल्लेख किया है, जबकि उनके अनुसार आर्य-वैदिक धर्म, इस्लाम और ईसाई धर्म विदेशी हैं। उनके अनुसार पारसी, यहूदी और आदिवासी धर्म भी हैं, पर उनकी प्रधानता नहीं है, और सिख धर्म, राधस्वामी, लिंगायत को वे संत धर्म का ही अंग मानते हैं। संत धर्म के बारे में उनका मत है– परम्परा की दृष्टि से संत धर्म भारत का अत्यंत प्राचीन धर्म है। पुरातत्वीय खोदाई में सिंधु-सभ्यता के जो चिन्ह धरती के भीतर तुपे हुए मिले हैं, उनमें वीतराग ध्यानावस्थित संतों की मूर्तियां मिली हैं। सिंधु-सभ्यता आर्य-पूर्व सभ्यता मानी गई है, जबकि आर्य लोग यहां नहीं आए थे। अतः संत धर्म वैदिक आर्य धर्म से प्राचीन है। शैव, जैन, बौद्ध धर्म तथा गोरख, कबीर, रैदास, नानक, दादू आदि संत सब संत-परम्परा के हैं। योगी, यती, अर्हत, श्रमण, तीर्थंकर, बुद्ध, सुगत, तथागत आदि सब संतों के नाम हैं।” (पृष्ठ 11)

दूसरे अध्याय में जिज्ञासु ने मध्यकालीन संत-मत का मूल स्रोतक्या है, यह बताया है। इस अध्याय में उनका निष्कर्ष है कि निर्गुण ब्रह्मवादी रैदास, कबीर, दादू, नामदेव आदि सभी संत सुन्न-समाधि, हठयोग और चरित्र की विशिद्ध के कायल थे। इस आधार पर उनका मत है कि यह शून्यता बौद्ध धर्म की देन है, जिसका प्रभाव संत-मत पर पड़ा। तीसरे अध्याय में उन्होंने निर्गुणवाद पर बौद्ध धर्म के प्रभाव को और भी तर्क-संगत ढंग से प्रस्तुत किया है। उन्होंने लिखा है– बुद्ध ने मानव-मस्तिष्क से पांच भ्रांतियों को निकाला– 1. ईश्वर, 2. आत्मा, 3. वेद, 4. हिंसापूर्ण वैदिक कर्मकाण्ड तथा 5. वर्णव्यवस्था और जातिभेद की सामाजिक व्यवस्था। उनका मत है कि संतों की देशना भी इन्हीं भ्रांतियों के विरुद्ध थी। उनके मतानुसार संतों ने युगीन परिस्थितियों के अनुरूप ईश्वर का सहारा जरूर लिया, परन्तु परलोक, आवागमन, पुनर्जन्म आदि को नहीं माना, जो आत्मा पर आधरित हिन्दू दर्शन है।

(संपादन : नवल/अनिल)

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