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लोकतंत्र में ब्राह्मणवाद (चंद्रिका प्रसाद जिज्ञासु का साहित्य – पांचवां भाग)

जिज्ञासु जी ने अपनी किताब “लोकशाही बनाम ब्राह्मणशाही” में लिखा कि प्रशासनिक ब्राह्मणशाही बहुजनों को उपर उठने नहीं देती, और समाजी ब्राह्मणशाही इन्हें समाज में रगड़ रही है। जिस ब्राह्मणी धर्म ने इनका सर्वस्व अपहरण करके इनकी यह दयनीय दशा बनाई है, उसी के ये अनन्य भक्त हैं। बता रहे हैं कंवल भारती

[भारतीय सामाजिक व्यवस्था के बुनियादी सिद्धांतों में से एक जातिगत भेदभाव और छुआछूत तथा इसके धार्मिक संरक्षण को लेकर आवाजें उठती रही हैं। सत्य शोधन की इस परंपरा का आगाज जोतीराव फुले ने 19वीं सदी में किया। बीसवीं सदी में इस परंपरा को अनेक लोगों ने बढ़ाया, जिनमें मुख्य तौर पर डॉ. आंबेडकर का नाम भी शामिल है। चंद्रिका प्रसाद जिज्ञासु भी ऐसे ही सत्य शोधक थे। कंवल भारती उनकी किताबों की पुस्तकवार समीक्षा कर रहे हैं। इसके तहत आज पढ़ें उनकी चौथी कृति ‘लोकशाही बनाम ब्राह्मणशाही’ की समीक्षा]

लोकशाही बनाम ब्राह्मणशाही : चंद्रिकाप्रसाद जिज्ञासु की चौथी कृति

  • कंवल भारती

सन् 1966 में चन्द्रिकाप्रसाद जिज्ञासु ने ‘लोकशाही बनाम ब्राह्मणशाही’ पुस्तक का प्रकाशन किया। इस पुस्तक में बहुजन समाज के पाठकों के लिए, जो इस भ्रम में थे कि भारत स्वतंत्र हो गया है और संविधान के द्वारा लोकतंत्र कायम हो गया है, लोकतंत्र में उनकी दुर्दशा का चित्रण दिखाया गया था। जिज्ञासु को यह पुस्तक लिखने की आवश्यकता इसलिए हुई, क्योंकि वह भारत के स्वतंत्रता-संग्राम के साक्षी थे। उन्होंने अंग्रेजों की गुलामी के खिलाफ आंदोलन में भाग लिया था। उन्होंने गांधीजी के कहने पर अगड़े-पिछड़े को भूलकर आजादी की लड़ाई में उनका साथ दिया था। उन्होंने दलितों के अधिकारों के खिलाफ गांधीजी के अनशन को देखा था, जिसके दबाव में डॉ. आंबेडकर के साथ पूना-समझौता हुआ था। संविधान-सभा की सारी प्रक्रिया को उन्होंने देखा था, और जिस दिन संविधान बनकर तैयार हुआ और लागू हुआ, उन्होंने भी देश के साथ हर्ष मनाया था। उन्होंने संविधान सभा में डॉ. आंबेडकर के ऐतिहासिक भाषण की रिपोर्टिंग पढ़ी थी, और विश्वास व्यक्त किया था कि सरकार उन सामाजिक और आर्थिक विषमताओं को दूर करने का प्रयास करेगी, जिनकी ओर डॉ. आंबेडकर ने चेतावनी दी थी कि यदि इन विरोधाभासों को शीघ्र खत्म नहीं किया गया, तो इन विषमताओं से पीड़ित लोग इतनी मेहनत से बनाए गए इस लोकतंत्र के मन्दिर को ध्वस्त कर सकते हैं। किन्तु स्वतंत्रता मिलने के बाद जिज्ञासु ने देखा कि दलित-पिछड़ी जातियों के उत्थान और विकास के सारे वादे भुला दिए गए, और सामाजिक और आर्थिक असमानता की खाई पाटने के बजाय और भी चौड़ी की जाने लगी। उन्हें यह देखकर और भी दुख हुआ कि जिस ब्राह्मणवाद के विरुद्ध डॉ. आंबेडकर, स्वामी अछूतानन्द, स्वामी बोधानन्द और स्वयं उन्होंने संघर्ष किया था, उसका प्रभुत्व बढ़ता ही जा रहा है। तब जिज्ञासु ने भारत के विशाल बहुजन समाज को वास्तविकता का परिचय कराने के मकसद से ‘लोकशाही बनाम ब्राह्मणशाही’ पुस्तक लिखकर अपने लेखकीय धर्म का निर्वाह किया।

इस पुस्तक पर चर्चा करने से पूर्व बहुजन-संघर्ष का एक संक्षिप्त इतिहास यहां बताना आवश्यक है। भारत में हजारों वर्षों से हिन्दुओं ने एक विशाल समाज को अछूत बनाकर रखा हुआ था, जिनकी छाया को भी हिन्दू अपने लिए अशुद्ध समझते थे। उन्हें गॉंवों की सीमा पर रहने और गन्दे कार्य करने के लिए मजबूर किया गया था। उनके लिए न राजनीति में स्थान था, न समाज में सम्मान था, न शिक्षा थी और न आर्थिक रूप से स्वतंत्रता प्राप्त थी। वे पूरी तरह से हिन्दुओं पर आश्रित गुलाम थे। भारत भले ही अंग्रेजों का उपनिवेश था, पर अछूत हिन्दुओं के उपनिवशे थे। किन्तु दिलचस्प है कि भारत के इस अछूत समुदाय के बारे में हिन्दुओं को जानकारी पहली बार 1927 में हुई, जब डॉ. आंबेडकर ने महाड़ में चोबदार तालाब से अछूतों को पानी लेने का अधिकार दिलाने के लिए सत्याग्रह किया, और उसमें ‘एक हिन्दू का घोषणा-पत्र’ जारी करते हुए मनुस्मृति को जलाया गया। इस आंदोलन से सवर्ण हिन्दुओं में बौखलाहट पैदा हुई। उन्होंने सपने में भी यह कल्पना नहीं की थी कि अछूत उनके खिलाफ विद्रोह करेंगे। हालांकि भारत के सभी राज्यों में सामाजिक असमानता के खिलाफ दलित वर्गों के आंदोलन उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्द्ध में ही आरम्भ हो गए थे, परन्तु प्रत्यक्ष लड़ाई की शुरुआत बीसवीं सदी के पूर्वार्द्ध में बाबासाहेब डॉ. आंबेडकर के आंदोलनों से ही हुई थी। अंग्रेजों से स्वराज मांगने वाले सवर्ण हिन्दू नेताओं से पलटकर यह पूछने का साहस डॉ. आंबेडकर ने ही किया था कि क्या वे लोग, जो अपने ही करोड़ों देशवासियों को हजारों साल से गुलाम बना हुए हैं, अंग्रेजों से स्वराज्य मांगने की योग्यता रखते हैं?

उसी दौर में हिन्दी क्षेत्र में, खास तौर से उत्तर प्रदेश में दलित-पिछड़ी जातियों को उनके सामाजिक और राजनीतिक अधिकारों के लिए जागरूक और संगठित करने के लिए स्वामी अछूतानन्द का ‘आदि हिन्दू’ आंदोलन चल रहा था, जिसमें जिज्ञासु भी एक प्रमुख सहयोगी थे। लेकिन 1933 में स्वामीजी का निधन हो जाने के कारण, यह आंदोलन कमजोर पड़ गया और आगे चलकर ‘आदि हिन्दू सभा’ की सभी शाखाएं डॉ. आंबेडकर के ‘शेडयूल्ड कास्ट्स फेडरेशन’ में विलीन हो गईं। तब जिज्ञासु ‘बैकवर्ड क्लासेस लीग’ के माध्यम से पिछड़ी जातियों के राजनीतिक अधिकारों की लड़ाई में कूद गए। इस संबंध में वह देश के अनेक नेताओं से मिले, जिनमें गांधी और डॉ. आंबेडकर भी शामिल थे। डॉ. आंबेडकर ने उनकी हर सम्भव सहायता करने का आश्वासन दिया, परन्तु गांधी ने उन्हें पिछड़ी जातियों की लड़ाई भूलकर स्वराज आंदोलन में भाग लेने की सलाह दी, उन्होंने कहा कि जातिवाद से स्वराज की लड़ाई कमजोर पड़ जायेगी। गांधी ने उन्हें आश्वासन दिया कि स्वराज मिलने के बाद कमजोर वर्गों का ही पहले उत्थान किया जायेगा। इस आश्वासन पर जिज्ञासु गांधी के स्वराज आंदोलन में सक्रिय हो गए। लेकिन स्वराज मिलने के बाद कांग्रेस सरकार ने पिछड़ी जातियों के साथ ही विश्वासघात किया। जिज्ञासु ने इसका विस्तृत वर्णन अपनी पुस्तक ‘पिछड़े वर्गों के वैधानिक अधिकारों का हनन’ में किया है। 

जिज्ञासु स्वराज-शासन की लगभग दो दशक की गतिविधियों को देखकर इस निष्कर्ष पर पहुॅंचे कि भारत में कहने को लोकतंत्र है, पर सर्वत्र ब्राह्मणवाद ही स्थापित किया जा रहा है। उसका यथार्थ दिखाने के लिए ही उन्होंने ‘लोकशाही बनाम ब्राह्मणशाही’ पुस्तक का प्रकाशन किया। इसका ‘प्राक्कथन’ स्वयं में एक स्वतंत्र लेख है, जिसे पढ़ने के बाद पूरी किताब का विषय स्वतः स्पष्ट हो जाता है। इसके आरम्भ में वह लिखते हैं–

“यद्यपि कहने को भारत में लोकशाही व्यवस्था है, लेकिन हकीकत में जहॉं लोकशाही पर कई शाहियां ऐसी लदी हैं कि बेचारी लोकशाही का दम घुट रहा है। सामंतशाही, पूंजीशाही, अमलाशाही, नौकरशाही, नेताशाही इत्यादि और सबकी नानी-अम्मा धमधूसर ब्राह्मणशाही है। इतनी शाहियों के भारी बोझ के नीचे कल की छोकरी बेचारी लोकशाही कुचली जा रही है, आह-आह कराह रही है। इससे वे लोग निस्सन्देह दुखित हैं, जिनके हृदय भारत में लोकशाही स्वतंत्रता आ जाने से खिल उठे थे।” (लोकशाही बनाम ब्राह्मणशाही, पृष्ठ 3)

स्वराज मिलने के बाद, ब्राह्मणों को आनन्द आ गया, क्योंकि स्वाधीन भारत के अब वे स्वाधीन शासक बन गए थे। फिर वे अपने ही स्वराज में ब्राह्मणवाद को कैसे मरने देते? ब्राह्मण-धर्म, ब्राह्मणी संस्कृति और ब्राह्मणी समाज-व्यवस्था को दिन-दूनी और रात-चौगुनी मजबूत किया जाने लगा। इसका सबसे बुरा प्रभाव दलित-पिछड़ी जातियों पर पड़ा, जो स्वराज में अपने विकास का सपना देख रही थीं।

इस पुस्तक में 9 अध्याय हैं, और अन्त में उपसंहार है। इन अध्यायों को देखने से पता चलता है कि ये समय-समय पर लिखे गए उनके स्वतंत्र लेख हैं, जिन्हें ‘लोकशाही बनाम ब्राह्मणशाही’ के अन्तर्गत संकलित किया गया है। केवल ‘प्राक्कथन’ और ‘उपसंहार’ ही पुस्तक के विषय के अनुसार बाद में लिखे गए प्रतीत होते हैं। पहला अध्याय ‘भारत में लोकशाही की स्थिति’ है। इसमें उन्होंने लोकतंत्र को संसार की सर्वोत्तम व्यवस्था माना है। भारत में इसकी जड़ें बौद्ध में मिलती हैं। उनके अनुसार, डॉ. आबेडकर ने इसकी नीति “समता, स्वतंत्रता, भ्रातृत्व और विशुद्ध न्याय को ध्येय और लक्ष्य में रखकर तैयार की है।” (वही, पृष्ठ 9)

लेकिन सच यह है कि भारत में समता, स्वतंत्रता, भ्रातृत्व और विशुद्ध न्याय के लोकतान्त्रिक मूल्य अब तक स्थापित नहीं हुए। जिज्ञासु ने इसके लिए तीन शक्तियों को बाधक माना है। ये हैं– (1) ब्राह्मणी वर्णव्यवस्था और जातिभेद, (2) इस्लामी धर्मांध, और (3) कम्युनिस्ट तानाशाही। ब्राह्मणी वर्णव्यवस्था के बारे में उनका कहना है कि भारतीय ब्राह्मणशाही से आशंकित होने के कारण मुसलमानों ने भारतीय लोकतंत्र में मिल-जुलकर रहना पसन्द नहीं किया, और ‘इस्लाम खतरे में’ कहकर देश का बंटवारा कराकर अपना स्वतंत्र मुस्लिम राज्य पाकिस्तान बनवा लिया। कम्युनिस्टों के बारे में उनका मत है कि उन्हें लोकतंत्र पसन्द नहीं है। वे कम्युनिस्ट शासन चाहते हैं। इसका असल कारण यह था कि भारत में कम्युनिस्ट पार्टी ब्राह्मणों के ही हाथों में थी, और वे जातिभेद को समस्या ही नहीं मानते थे। चूंकि वे स्वयं ब्राह्मण थे, इसलिए दलित वर्गों के प्रति उनका दृष्टिकोण भी ब्राह्मणवादी था। अतः जिज्ञासु ने ब्राह्मणवाद को ही प्रधान शत्रु माना, जिसके कारण भारत में लोकतंत्र फल-फूल नहीं पा रहा। स्वतंत्रता के बाद, स्वराज्य में जिस तेजी से ब्राह्मणी हलचलों और ब्राह्मणी धर्म का प्रचार हुआ, उससे, जिज्ञासु के अनुसार, साफ सिद्ध है कि देश का ब्राह्मण गुट देश पर ब्राह्मण-प्रधान शासन चाहता है, जिसे वह ‘भारतीय संस्कृति’ के नाम से देश पर हमेशा लादे रखने के लिए प्रयत्नशील है। उन्होंने लिखा कि यह प्रवृति लोकशाही के पनपने देने में बाधक और घातक है। उन्होंने सन्देह व्यक्त किया कि इस तरह भारत में कभी भी लोकतंत्र की नींव मजबूत नहीं होगी। (वहीं, पृष्ठ 10-11)

दूसरा अध्याय ‘ब्राह्मणी शास्त्रों में शूद्र’ है। इस अध्याय में भारत में लोकतंत्र की जड़ों की तलाश की गई है। उनका मत है कि लोकतंत्र भारत के लिए नई चीज नहीं है। “बौद्धकाल में भारत में छोटे-छोटे गणतंत्र थे।” उनके अनुसार, इन गणतंद्धों के युग में भी ब्राह्मणवाद था, वेद थे, वैदिक व्यवस्था थी और बड़े-बड़े धनवान तथा राजा ब्राह्मणों के अनुयायी थे, किन्तु, “बौद्ध धर्म के प्रचार से ब्राह्मणी प्रभुत्व को धक्का लगा, ब्राह्मणी व्यवस्था और कर्मकांड से जनता का विश्वास उठ गया और बौद्ध धर्म में राजाओं के शामिल होने से वह राजधर्म बन गया। अशोक और चन्द्रगुप्त जैसे सम्राट हुए और विदेशों में भी बौद्ध धर्म का प्रचार हुआ। बड़े-बड़े विश्वविद्यालय खुले, जिनमें पढ़ने के लिए विदेशों से विद्यार्थी आते थे। लेकिन ब्राह्मण इससे कुढ़ते रहे, और इसके विनाश के उपाय सोचते थे। आखिर, उन्हें मौका मिला। शुंगवंशीय राज्य कायम हो गया और राज्य शक्ति से ब्राह्मणवाद पहले से अधिक कठोर रूप में प्रचलित हो गया।” (वही, पृष्ठ 22)

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जिज्ञासु ने यहां स्पष्ट किया है कि बौद्धकाल में ब्राह्मण अपने जिस साम्राज्य को खो चुके थे, उसे उन्होंने पुष्यमित्र शुंगग के राज्यकाल में राज्य-शक्ति से पुनः कायम कर लिया था। आगे ब्राह्मणों ने अपनी वैदिक संस्कृति और वर्णव्यवस्था को सुरक्षित रखने के लिए जो भी बन पड़ा, वह किया। उन्होंने अपनी वर्णव्यवस्था बचाने के लिए मुगलों से समझौते किए और उन्हें अपने धर्म में हस्तक्षेप न करने के लिए मनाया। हालांकि अंग्रेजी राज्य में भी ब्राह्मणों ने अपनी वर्णव्यवस्था को मरने नहीं दिया था, किन्तु अंग्रेज न्यायप्रिय और समतावादी थे, इसलिए, उन्होंने कानून के सामने सबको बराबरी का दर्जा दिया और ब्राह्मण-धर्म की बहुत सी अमानवीय प्रथाओं के खिलाफ कानून बनाकर उनके अमल पर रोक लगाई। इसके विरोध में ब्राह्मणों ने जनता में ‘धर्म पर खतरे’ का भ्रम फैलाकर ‘कंपनी सरकार’ के खिलाफ बगावत करा दी, जिसे वर्णवादी ब्राह्मण लेखकों ने झूठ-मूठ भारत का पहला स्वतंत्रता-संग्राम लिख मारा, जबकि वह ब्राह्मणों का दलित जातियों के खिलाफ विद्रोह था, जिसे कुचल दिया गया था। इस विद्रोह के बाद, भारत का शासन ब्रिटेन की महारानी ने अपने हाथों में ले लिया। तब ब्राह्मणों ने दबाव बनाया कि महारानी धर्म के मामले में हस्तक्षेप न करें। चूंकि ब्रिटेन को भारत पर शासन करना था, इसलिए उसने धर्म में दखल न देने की घोषणा कर दी, परन्तु चूंकि वे न्यायप्रिय थे, इसलिए साथ में यह भी घोषणा कर दी कि धर्म, जाति, नस्ल, रंग और लिंग के आधर पर भेदभाव नहीं किया जायेगा। बस, ब्राह्मणवाद का खेल इसी से बिगड़ गया। और, हिन्दुओं के नेता गांधी ने स्वराज के नाम पर ‘अंग्रेजों भारत छोड़ो’ का आंदोलन आरम्भ कर दिया। वे स्वराज चाहते थे, पर दलितों की स्वतंत्रता के विरोधी थे।

स्वराज मिलने के बाद, ब्राह्मणों को आनन्द आ गया, क्योंकि स्वाधीन भारत के अब वे स्वाधीन शासक बन गए थे। फिर वे अपने ही स्वराज में ब्राह्मणवाद को कैसे मरने देते? ब्राह्मण-धर्म, ब्राह्मणी संस्कृति और ब्राह्मणी समाज-व्यवस्था को दिन-दूनी और रात-चौगुनी मजबूत किया जाने लगा। इसका सबसे बुरा प्रभाव दलित-पिछड़ी जातियों पर पड़ा, जो स्वराज में अपने विकास का सपना देख रही थीं। ध्यान रहे कि पिछड़े वर्गों के दमन पर ही ब्राह्मणवाद फलता-फूलता है। यह दमन वह दो प्रकार से करता है, एक दलित-पिछड़ों की शैक्षिक प्रगति को रोककर, या कमजोर करके और दो, उन्हें आर्थिक रूप से परनिर्भर या गरीब बनाकर। स्वराज मिलने के बाद, ब्राह्मण-शासकों ने ये दोनों काम किए। उन्होंने ये काम इस तरह किए कि सांप भी मर जाए, और लाठी भी न टूटे। अर्थात्, लोकतंत्र भी दिखाई देता रहे, और ब्राह्मणवाद भी मजबूत होता रहे। ब्राह्मणशाही भारत में किस तरह काम कर रही है, जिज्ञासु ने इसे बहुत तर्क-संगत ढंग से इस पुस्तक में दिखाया है।  

जिज्ञासु ने पुस्तक के छठे अध्याय में, ‘अग्रसर हिन्दुओं के संगठित समूह और उसके भोगैश्वर्य’ पर बहुत ही महत्वपूर्ण प्रकाश डाला है। उन्होंने लिखा है, “द्विजातीय हिन्दुओं में यद्यपि सनातनी ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य ही हैं। इन्हीं को आर्य सन्तान कहा जाता है, किन्तु आजकल कायस्थ लोगों ने भी द्विजातियों से मेल कर लिया है, और अपने को द्विजाति समझने लगे हैं।” (वही, पृष्ठ 37)

इन द्विजातीय हिन्दुओं के ऐश्वर्य का चित्रण करते हुए जिज्ञासु लिखते हैं– “यदि वंश-परंपरा से चले आए खानदानी द्विजातीय अग्रसर हिन्दुओं की धार्मिक राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक दशा पर गहरी दृष्टि डाली जाए, तो इन्हीं के हाथ में देश का सारा धन, धरती, व्यापार, सामाजिक प्रतिष्ठा, राजनीतिक अधिकार तथा देश का नेतृत्व और प्रशासन की शक्ति आदि सब कुछ पाया जायगा। देश और समाज के ये ही संचालक हैं, देश के सभी क्षेत्रों और सभी संस्थाओं के ये ही अगुआ, नेता और कर्णधार हैं। सरकारी नौकरियों, केन्द्रीय और प्रान्तीय कौंसिलों तथा स्थानीय म्युनिसिपल और डिस्ट्रिक्ट बोर्डों में इन्हीं की तूती बोल रही है। शिक्षा विभाग में इन्हीं का अड्डा जमा है। कांग्रेस, आर्य-समाज, सनातन धर्म, हिन्दू सभा, विवेकानन्द तथा रामतीर्थ मिशन आदि सब इन्हीं की बपौती हैं। बड़े-बड़े प्रेसों, अखबारों और प्रकाशनों का सारा काम इन्हीं की मुट्ठी में है … सरकारी और गैर-सरकारी सारी सत्ता इन्हीं के हाथों में होने से ये लोग जो चाहते हैं, वही इस देश में होता है। बड़े-बड़े धर्मगुरु, स्वामी-संन्यासी भी इसी गुट के लोग नजर आते हैं। एक लेखक ने लिखा है कि इस समूह के पास जितना धन है, उसका 25 लाखवां हिस्सा भी गरीब दलितों के पास नहीं है।’ (वही, पृष्ठ 37-38)

जहां, कुछ दलितों ने नौकरियों में आने के बाद पक्का घर और कुछ सुविधएं अर्जित की हैं, वहां वे सुविधाएं द्विजातियों को जन्म से ही प्राप्त थीं। जिज्ञासु ने इसका वर्णन इस प्रकार किया है–

“जहां ये रहते हैं, इनकी बस्तियां साफ, बाजारें साफ, चौड़ी डामर व सीमेंट की सड़कें, टाइल जड़ीं गलियां, बड़े-बड़े आलीशान मकान, महल, कोठियां, बंगले और चमचमाते देव-मन्दिर हैं।… मुलाकात के कमरे, श्रृंगार के कमरे, शयन के कमरे, अध्ययन के कमरे, महिला निवास, भोजनागार, स्नानागार, अतिथि निवास, सब अलग-अलग। नित नूतन डिजाइनों की साड़ियों और सोने के आभूषणों से शोभायमान उनकी महिलाएं। … शासन-सत्ता, राजनीति, नेतागिरी, अफसरी, महाजनी, ठेकेदारी और विविध व्यापार आमदनी के द्वार, आदि सभी प्रकार का सुख, भोग-विलास और ऐश्वर्य-प्रभुता इन्हें प्राप्त है।” (वही, पृष्ठ 38-39)

जिज्ञासु आगे लिखते हैं कि ये लोग शारीरिक श्रम के कठोर काम नहीं करते, बल्कि वे शारीरिक श्रम के कठोर काम करने वालों को शूद्र, दास, सेवक, नीच और अछूत समझते हैं, और उनसे घृणा करते हैं।

जिज्ञासु ने सातवें अध्याय में ‘अनुलोम-विलोमों की वर्तमान परिस्थिति’ का वर्णन किया है। ब्राह्मण ग्रंथों में जो अनुलोम वर्णसंकर जातियां हैं, वे सभी पिछड़ी जातियां हैं और जिन्हें वे विलोम वर्णसंकर कहते हैं, वे सभी अछूत अर्थात दलित जातियां हैं। जिज्ञासु ने लिखा है कि डॉ. आंबेडकर के संघर्ष के परिणामस्वरूप दलित जातियों को, पूना-समझौते के माध्यम से, “जो सुविधाएं मिलीं, उनसे उनकी बहुत सी सामाजिक कठिनाइयां दूर हो गईं, शिक्षा का द्वार खुल गया, सरकारी नौकरियों में भी उनका हक कायम हो गया। इस सबसे वे अपनी कष्टपूर्ण दशा से धीरे-धीरे प्रगति कर रहे हैं।” 

भारतीय संविधान की प्रस्तावना, चंद्रिकाप्रसाद जिज्ञासु और उनकी किताब “लोकशाही बनाम ब्राह्मणशाही” का टाइटिल पेज

आगे उन्होंने दुख व्यक्त करते हुए लिखा कि “किन्तु बेचारे अनुलोमों की अवस्था में युगानुरूप कोई परिवर्तन नहीं हुआ, बल्कि इस पूंजीशाही युग में वे पहले से भी अधिक पिस और चुस गए हैं। उन्होंने कहा कि पिछड़ी जातियों की संख्या विशाल है, पर उनमें कोई डॉ. आंबेडकर जैसा महान नेता नहीं हुआ, जो उनके लिए संघर्ष करता, उन्हें संगठित करके उनकी जिन्दगी में रूह फूॅंकता, और उनके सामने कोई लक्ष्य पेश करता।” उन्होंने लिखा कि “इन्होंने देश की आजादी की लड़ाई में हिस्सा लिया, उसके लिए कष्ट सहन किए, त्याग किए, जेल-यातनाएं सहीं, सूली पर चढ़े, जिलावतन किए गए, लेकिन इस सबका फल इन्हें नहीं मिला। इसका फायदा इनके अगुआ अग्रसर [सवर्ण] हिन्दुओं ने उठाया। ये बेचारे भगत के भगत और दास के दास ही बने रहे।” (वही, पृष्ठ 41-42)

उन्हें किस तरह गरीब बनाया गया, उस पर जिज्ञासु ने लिखा कि जिन पिछड़ी जातियों के पास कुछ जमीनें थीं, सरकार ने उन्हें भी उनसे शहरों के विस्तार के नाम पर कुछ मुआवजा देकर छीन लिया। “शिक्षा की इनमें बहुत ही कमी है और उच्च शिक्षा प्राप्त करने में इनकी दरिद्रता बाधक है।” जिज्ञासु बताते हैं कि इनको पिछड़ा और गरीब बनाने में सबसे बड़ा योगदान ब्राह्मणशाही का है। लेकिन कैसे? इसका उत्तर उन्होंने इन शब्दों में दिया है– 

“प्रशासनिक ब्राह्मणशाही इन्हें उपर उठने नहीं देती, और समाजी ब्राह्मणशाही इन्हें समाज में रगड़ रही है। जिस ब्राह्मणी धर्म ने इनका सर्वस्व अपहरण करके इनकी यह दयनीय दशा बनाई है, उसी के ये अनन्य भक्त हैं। ब्राह्मणों ने इन्हें भक्त-सेवक और दास रहने का ऐसा पाठ पढ़ाया है कि ये उसी में डूब-उतराया करते हैं। ये लोग ब्राह्मणों से बहुत डरते और उनके आज्ञानुवर्ती सेवक रहते हैं, और बड़ी श्रद्धा से उनके फैलाए धर्म का पालन करते हैं। चतुर ब्राह्मण इन्हें अपना भोजन, अपने अधिकार की चीज और चारागाह समझते हैं, और इनकी धन-सम्पत्ति धर्म के नाम से, देव-पूजा के नाम से, दान के नाम से, पुण्य के नाम से, परोपकार के नाम से … हड़प लेना अपना कर्तव्य समझते हैं। 

“इन लोगों के सर पर ब्राह्मणी वर्णव्यवस्था-चक्र और ब्राह्मणी धर्म का भूत इतने जोरों से सवार रहता है कि ये लोग अपनी-अपनी जातियों की उत्पत्ति किसी ऊंचे वर्ण की सिद्ध करने के लिए सैकड़ों-हजारों रूपया भेंट करके ब्राह्मण पंडितों से व्यवस्थाएं लेते हैं, वंशावलियां लिखवाते हैं, जनेऊ पहिनते हैं, ब्राह्मणों से हवन कराते हैं, ब्रह्मभोज कराते हैं, बड़ी श्रद्धा के साथ तीर्थ, व्रत और दान करते हैं … और मन्दिर बनवाकर खुश होते हैं।” (वही, पृष्ठ 44)

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ब्राह्मणवाद किस तरह फलता-फूलता है, इसका भी जिज्ञासु ने बहुत ही सम्यक विश्लेषण किया है। उनके अनुसार, “ब्राह्मणवाद का आधार और बल सामन्तवाद और पूंजीवाद है। ब्राह्मणी शास्त्रों में साफ कहा है कि ब्रह्म-शक्ति का विकास क्षत्रिय-शक्ति के संयोग से होता है।” इसका अर्थ है कि तलवार के बल से भारत में ब्राह्मणवाद फूला-फला। “विजयी आर्य राजाओं ने जब ब्राह्मणों को अपना पुरोहित, याचक, मंत्रा, साहित्य-निर्माता, विधि-निर्माता और न्यायाधीश बनाया, तो ब्राह्मणी धर्म और ब्राह्मणवाद अप्रतिहत गति से बढ़ने लगा।” (वही, पृष्ठ 46)

इस तरह, जिज्ञासु के अनुसार, राज्य-शक्ति अर्थात सामन्तशाही के बल से ब्राह्मणवाद फूला-फला। ब्राह्मण सारे समाज का विधाता बन गया और उसने जो चाहा, समाज में वही हुआ। लेकिन, जब सामन्तशाही नष्ट हुई, तो जिज्ञासु लिखते हैं कि उसके बाद ब्राह्मणवाद पूंजीवाद के बल पर आगे बढ़ा। उनके अनुसार, “आजकल ब्राह्मणवाद को बल पूंजीपतियों से मिलता है, नेताओं से मिलता है, प्रशासकों से मिलता है, और पूरी कोशिश की जा रही है कि ब्राह्मणी संस्कृति को भारत का राष्ट्र धर्म और राष्ट्रीय संस्कृति बना दिया जाए।” (वही, पृष्ठ 50) 

आज कांग्रेस का राज नहीं है, परन्तु आज भी भारतीय जनता पार्टी के हिन्दुत्ववादी राज्य में ब्राह्मण ही मुख्य राज्य-शक्ति बना हुआ है। आज भी ब्राह्मणी संस्कृति को भारत का राष्ट्र धर्म और राष्ट्रीय संस्कृति बनाने का प्रयास किया जा रहा है। जो उसका विरोध कर रहा है, उसके विरुद्ध दमनात्मक कार्यवाही की जा रही है, उन्हें जेलों में सड़ाया जा रहा है। इस तरह आज भी ब्राह्मणवाद लोकतंत्र का हनन कर रहा है और बहुजनों के विकास को रोकने के लिए सारे हथकंडे अपना रहा है। जिज्ञासु ने सही आशंका व्यक्त की थी कि लोकतंत्र भारत में सम्भवतः कभी मजबूत नहीं होगा।

इस पुस्तक के दूसरे, तीसरे और चौथे अध्यायों में ब्राह्मणी शास्त्रों में शूद्र, वर्णसंकर जातियों और शूद्रों के विरुद्ध बनाए गए कानूनों का उल्लेख किया गया है। इसे पढ़कर ब्राह्मणवाद का असली चेहरा सामने आता है, जो बेहद अमानवीय है। इस चेहरे से कोई भी मानववादी संवेदनशील व्यक्ति प्रभावित नहीं हो सकता। इन अध्यायों से हमें दो बातें पता चलती हैं– एक, यह कि ब्राह्मणवाद क्या है, दूसरी, यह कि वह देश के लिए कितना घातक है। आज तो सारे गैर-ब्राह्मण लोग जानते हैं कि ब्राह्मणों ने शूद्रों के लिए कितनी अन्यायपूर्ण व्यवस्था बनाई थी, परन्तु पिछली सदी में पचास और साठ के दशकों में बहुजन पाठकों ने इस किताब से ही पहली बार जाना था कि ब्राह्मणवाद क्या है और उसने किस प्रकार की क्रूर जातिवादी व्यवस्था बहुजनों के लिए बनाई थी, जिसने हजारों साल से उनके स्वतंत्र विकास को अवरुद्ध किया हुआ था। इन अध्यायों के केन्द्र में यह प्रश्न भी है कि अगर ब्राह्मण लोकतांत्रिक और न्यायप्रिय होते, तो क्या वे वर्ण-विभाजन करते, और जातिव्यवस्था का निर्माण करके बहुजनों के मानवीय अधिकारों का दमन करते?

(संपादन : नवल/अनिल)

लेखक के बारे में

कंवल भारती

कंवल भारती (जन्म: फरवरी, 1953) प्रगतिशील आम्बेडकरवादी चिंतक आज के सर्वाधिक चर्चित व सक्रिय लेखकों में से एक हैं। ‘दलित साहित्य की अवधारणा’ ‘स्वामी अछूतानंद हरिहर संचयिता’ आदि उनकी प्रमुख पुस्तकें हैं। उन्हें 1996 में डॉ. आंबेडकर राष्ट्रीय पुरस्कार तथा 2001 में भीमरत्न पुरस्कार प्राप्त हुआ था।

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