दिमागी गुलामी के खिलाफ : (चंद्रिका प्रसाद जिज्ञासु का साहित्य – छठा भाग)

‘अनीश्वरवादियों की दलीलें’ शीर्षक लेख में जिज्ञासु ने ईश्वरवादियों की दलीलों के संबंध में कतिपय भौतिकवादी दार्शनिकों के विचार प्रस्तुत किए हैं। उन्होंने सर्वप्रथम चार्वाक का मत दिया है, जिसके अनुसार, ‘वेद, ईश्वर, आत्मा, स्वर्ग, यज्ञ, श्राप आदि सब धूर्तों की ठगविद्या है।’ बता रहे हैं कंवल भारती

[भारतीय सामाजिक व्यवस्था के बुनियादी सिद्धांतों में से एक जातिगत भेदभाव और छुआछूत तथा इसके धार्मिक संरक्षण को लेकर आवाजें उठती रही हैं। सत्य शोधन की इस परंपरा का आगाज जोतीराव फुले ने 19वीं सदी में किया। बीसवीं सदी में इस परंपरा को अनेक लोगों ने बढ़ाया, जिनमें मुख्य तौर पर डॉ. आंबेडकर का नाम भी शामिल है। चंद्रिका प्रसाद जिज्ञासु भी ऐसे ही सत्य शोधक थे। कंवल भारती उनकी किताबों की पुस्तकवार पुनर्पाठ कर रहे हैं। इसके तहत आज पढ़ें उनकी पांचवी कृति ‘ईश्वर और उसके गुड्डे’  की समीक्षा]

‘ईश्वर और उसके गुड्डे’ : चंद्रिकाप्रसाद जिज्ञासु की पांचवी कृति

  • कंवल भारती

चन्द्रिकाप्रसाद जिज्ञासु की कृति ‘ईश्वर और उसके गुड्डे’ 1959 में आई, और यह वह दौर था, जब भारत को ब्रिटिश की गुलामी से मुक्त हुए एक दशक गुजर चुका था। शासन-सत्ता ब्राह्मणों के हाथों में आई थी। ब्राह्मण ने शासक बनते ही भारत की जनता को धर्म की शिक्षा से दिमागी गुलाम बनाना शुरू कर दिया। इससे द्विज जातियों का तो कुछ नहीं बिगड़ा, क्योंकि वे शासक जातियॉं थीं, परन्तु दलित-पिछड़ी बहुसंख्यक जनता इस शिक्षा में फंसकर और भी गरीब और अशिक्षित हो गई। धर्म के नाम पर थोपे गए ईश्वर और उसके परलोकवादी दर्शन ने आम जनता के दिमागों को कुंद कर दिया। उसने उनके दिमागों में यह कचरा विचार भर दिया कि उनकी गरीबी, अशिक्षा और पिछड़ापन सब ईश्वर की लीला है, किसी को दुख देना और किसी को सुख-सम्प बनाना परमात्मा के हाथ में है, आदमी के हाथ में कुछ नहीं है। जिज्ञासु ने इस पुस्तक के ‘उपक्रम’ में लिखा है कि भारतीय हिन्दुओं के धर्मगुरूओं ने अपने प्रभुत्व और भोगों की सुलभता के लिए, ऐसे ईश्वरों और उनके अवतारों की कल्पना और स्थापना कर रखी है, जो उनके विचारों के अंधभक्त, उनके परम हितैषी, उनके आज्ञानुवर्ती सेवक, उनके मंतव्यों को बलपूर्वक जनता से मनवाने वाले एवं उनके विरोधिों के संहारक हैं, ताकि वे निर्भय, निशंक और निष्कंटक-भाव से जन-शोषण और समाज का दोहन करते रहें, कोई उनके व्यापार में बाधक न हो। (‘ईश्वर और उसके गुड्डे’, चंद्रिकाप्रसाद जिज्ञासु, पृष्ठ 5)

इसलिए जिज्ञासु ने आम जनता को हिन्दू धर्म की दिमागी गुलामी से मुक्ति दिलाने के लिए ईश्वर-संबंधी रूढ़ बातो पर बुद्ध के प्रकाश में विचार किया है। यह 60 पृष्ठों की छोटी सी पुस्तक है, जिसमें उपक्रम और उपसंहार सहित 18 लेख हैं। उपसंहार के अन्तर्गत भी 5 लेख हैं, जो राम के संबंध में हैं। उपक्रम के बाद जिस लेख से किताब की शुरूआत होती है, वह है – ‘ईश्वरवादियों की दलीलें।’ उनके अनुसार ईश्वरवादियों की सबसे बड़ी दलील है कर्तृवाद, यानी कार्य-कारण का सिद्धांत। इस सिद्धांत के अनुसार ईश्वरवादी तर्क देते हैं कि यह अखिल सृष्टि बिना किसी निर्माता के नहीं हो सकती। उसका एक निर्माता है, जो नित्य सत्य है, उसका कभी विनाश नहीं होता। ईश्वरवादी संतों के मत के हवाले से जिज्ञासु लिखते हैं कि सृष्टि में सबसे अधिक ज्ञान और शक्ति-सम्प मनुष्य भी अपनी इच्छा में स्वाधीन नहीं, अपने प्रयत्नों में किसी अज्ञात शक्ति से पराजित हो जाता है। (वही, पृष्ठ 7-8)

‘अनीश्वरवादियों की दलीलें’ शीर्षक लेख में जिज्ञासु ने ईश्वरवादियों की दलीलों के संबंध में कतिपय भौतिकवादी दार्शनिकों के विचार प्रस्तुत किए हैं। उन्होंने सर्वप्रथम चार्वाक का मत दिया है, जिसके अनुसार, “वेद, ईश्वर, आत्मा, स्वर्ग, यज्ञ, श्राप आदि सब धूर्तों की ठगविद्या है।” उनके अनुसार, “केवल जीवन सत्य है, देह ध्वंस होने पर आत्मा-वात्मा कुछ नहीं रहता।” जिज्ञासु लिखते हैं कि जैन विद्वान भी ईश्वर को नहीं मानते। उनके अनुसार, “जैनों के मत में सृष्टि अनादि है। इसमें जीवाजीव अर्थात जड़ और चेतन दो तत्व हैं। चेतन मनुष्य जब सम्यक दर्शन, सम्यक ज्ञान और सम्यक चरित्र की पूर्णता पर पहुंच जाता है, तो वह सर्वोपरि भगवान पद को प्राप्त करके वंदनीय और दर्शनीय तीर्थंकर हो जाता है।” इसी तरह जिज्ञासु लिखते हैं कि बुद्ध ने भी ईश्वर के संबंध में कर्तावाद का खंडन किया था– “यदि प्रत्येक कार्य का कोई कारण अवश्य है, तो ईश्वर का भी कोई कारण होना चाहिए। यदि जगत का उपादान कारण ईश्वर है, तो जगत में जो बुराई-भलाई, सुख-दुख, दया-क्रूरता, राग-द्वेष आदि देखा जाता है, इस सबका कारण भी ईश्वर को ही होना पड़ेगा।” जिज्ञासु के अनुसार, बुद्ध ने ईश्वरवादियों के इस तर्क को बहुत ही भद्दा और उपहासास्पद कहा है कि ईश्वर की मर्जी के बिना पत्ता नहीं हिलता। “मनुष्य यदि ईश्वर के हाथ की कठपुतली है, तो फिर वह किसी भी भले-बुरे काम या पाप-पुण्य का उत्तरदायी नहीं हो सकता।” क्या ईश्वर सृष्टि का निर्माता है, इसके विरुद्ध बुद्ध का तर्क है कि “यदि सृष्टि को कारण-रहित अनादि कहा जाए, तो उसे अपने कार्य के लिए कर्ता की आवश्यकता नहीं रहती। यदि सृष्टि सादि है तो उसके आरम्भ की करोड़, अरब, खरब वर्षों की कोई अवधि अवश्य माननी होगी। तब प्रश्न होगा कि सृष्टि के पूर्व संख्यातीत समय तक क्या ईश्वर निष्क्रिय-निठल्ला रहा होगा।” (वही, पृष्ठ 12-13)

जिज्ञासु ने महात्मा गांधी के राम की तीखी आलोचना की है। स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान जिन गांधी से जिज्ञासु इतने प्रभावित थे कि अपना एक ट्रैक्ट (काव्य-पुस्तिका) भी उन्होंने ‘भगवान गांधी’ नाम से प्रकाशित किया था, वही गांधी स्वतंत्रता के बाद ब्राह्मण-धर्म के प्रचारक हो गए थे। उन्होंने लिखा कि जिन्हें उन्होंने भगवान गांधी लिखा था, और देश ने जिन्हें राष्ट्रपिता कहा, वह राष्ट्रीयता और राष्ट्रीय धर्म के विरुद्ध आजीवन ‘रघुपति राघव राजा राम’ की घोर सांप्रदायिक धुन लगाते रहे, लेकिन कभी भी वे अपने राजाराम को ईश्वर सिद्ध नहीं कर सके।

ईश्वर के खंडन के बाद, जिज्ञासु ने चौथे लेख में ‘ईश्वर की ओट में शिकार’ विषय पर प्रकाश डाला। इस लेख में जिज्ञासु ने जनता को नकली ईश्वर और उसके पाखंड से सावधान किया है। उनका कथन है– “भोग-विमुख प्राणी अपनी भोग-सुलभता के लिए नाना प्रकार के मायाजाल फैलाकर भोली-भाली जनता को बहकाया और ठगा करते हैं। जब जनता इन्हें पहचानकर इनकी बातों पर अविश्वास करने लगती है, तो ये नकली और गुड्डे ईश्वरों की सृष्टि करके उनसे अपनी पूजा करवाकर जनता को आतंकित और भयभीत करके उसे अपना आज्ञानुवर्ती और दास बना लिया करते हैं। और फिर नाना प्रकार के पाखंड-जाल रचकर जनता का शोषण किया करते हैं। भोली-भाली जनता इनके कारण वास्तविक ईश्वर और यथार्थ धर्म से विमुख होकर इनके द्वारा खड़े किए गए गुड्डे-ईश्वर की चमक-दमक और लीलाओं में फंस जाती है और धर्माभ्यास या मिथ्या धर्म का आचरण करने लगती है। और ये लोग ईश्वर की ओट में जनता का शिकार किया करते हैं।” (वही, पृष्ठ 18)

चंद्रिकाप्रसाद जिज्ञासु की किताब ‘ईश्वर और उसके गुड्डे’ का आवरण पृष्ठ व जिज्ञासु जी की तस्वीर

दूसरे लेख में जिज्ञासु ने असली ईश्वर को रेखांकित किया है। वह कहते हैं– “सार्वभौमिक ईश्वर ही असली ईश्वर हो सकता है।” उनका मत है कि ज्ञानी संतों ने ईश्वर को अलख, अगोचर, अनाम, अरूप, अनादि, अनन्त, असीम, अजन्मा, अजर-अमर, अविनाश, अकाल, असंवेद्य, अपरिज्ञेय और महाशून्य भी बताया है। इस आधार पर वह प्रश्न करते हैं, “यदि ईश्वर सचमुच ऐसा ही है, तो फिर निःसन्देह वह किसी जाति-विशेषण या धर्म-विशेष की बपौती नहीं हो सकता। उसे तो केवल इस पृथ्वी का नहीं, वरन् चन्द्र, सूर्य, तारे और आकाश में स्थित अनन्त ब्रह्मांडों का एक मात्र स्वामी होना चाहिए।” जिज्ञासु ने तर्क किया कि ऐसा ईश्वर किसी एक देश की सीमा में ही बंधकर नहीं रह सकता, बल्कि वह सारे देशों, महाद्वीपों और द्वीपसमूहों का विधाता होगा, और उसे सारे देशों की भाषाएं भी आती होंगीं। (वही, पृष्ठ 19-20)

आगे जिज्ञासु ने ‘क्या कवियों द्वारा कल्पित ईश्वर ईश्वर नहीं?’ और ‘असली ईश्वर और कल्पित ईश्वर’ पर विचार करने के बाद विषय को गुड़िया के माध्यम से और स्पष्ट करने के लिए ‘गुड़िया सरकार और गुड़िया खुदाई’ लेख में लिखा है कि कठपुतली के खेल में पीछे छिपा हुआ मदारी तार से बंधी हुई पुतलियों को अपनी इच्छानुसार नचाकर दर्शकों को तमाशा दिखाता है। इसी प्रकार कठपुतली या गुड़िया सरकार होती है, जो अपने प्रभु के संकेतों से चलती हैं। जिज्ञासु के अनुसार द्वितीय महायुद्ध में हिटलर ने जिन देशों को जीता, वहां उसने ऐसी ही गुड़िया सरकारें कायम की थीं, जो उसके हिसाब से चलती थीं। इसी प्रकार उनका मत है कि “पूंजीवादी देशों में एक अधिनायक बना लिया जाता है और सारा शासन-यंत्र उसी अधिनायक की आज्ञा से चलाया जाता है। अधिनायक के पीछे उस देश के बड़े-बड़े पूंजीपतियों की जमात होती है, जो उस गुड्डे के आदेशों द्वारा अपने स्वार्थीं की सिद्ध किया करती है।” जिज्ञासु ने अंत में लिखा कि “उसी तरह पुराने धार्मिक युग में शोषकों और धर्म-गुरुओं ने, अपनी स्वार्थ-सिद्ध के लिए ‘गुड़िया खुदाई’ कायम कर दी थी।” (वही, पृष्ठ 25-26)

जिज्ञासु ने प्राचीन इतिहास से ‘गुड़िया खुदाई’ का एक बहुत ही सुन्दर उदाहरण ‘प्राचीन क्षत्रिय-ब्राह्मण संघर्ष और ब्राह्मणों की विजय’ लेख में दिया है। यह उदाहरण इस प्रकार है–

“ऐतिहासिक काल में गौतम बुद्ध और तीर्थंकर महावीर जैसे ज्ञानी क्षत्रियों का धर्मगुरु के रूप में मैदान में आ जाना तथा ब्राह्मणों, वेदों एवं ब्राह्मणी धर्म की उपेक्षा-पूर्वक अपने जैन-बौद्ध धर्मों का प्रचार करना भी क्षत्रियों का ब्राह्मणों की प्रभुता व गुरुआई न मानने का प्रबल प्रमाण है। किन्तु बहुकालव्यापी इस ब्राह्मण-क्षत्रिय संघर्ष के अन्त में ब्राह्मण विजयी हुए, और क्षत्रिय कॉंछ ढीली करके ब्राह्मणों से दब गए। तब इन दब्बुओं को लताड़ते हुए ब्राह्मणों ने ऊंची आवाज में कहा – “अधिक बलं क्षत्रिय बलं, ब्रह्मतेजो बलं बलम्।” क्षत्रियों को अपने चरणों का दास अपने प्रभुत्व को अमर बनाने के लिए चतुर ब्राह्मणों को ‘गुड़िया खुदाई’ की स्थापना की युक्ति सूझी। उन्होंने अवतारवाद की कल्पना द्वारा राम और कृष्ण के क्षत्रिय आदर्श खड़े किए और उनकी धर्मभीरुता, ब्राह्मण-वत्सलता, अलौकिक सामर्थ्य की प्रशंसा के पुल बांधते हुए उन्हें साक्षात ईश्वर घोषित कर दिया। असली ईश्वर से भी उनके ऐश्वर्य को बढ़ाकर उनसे अपने प्रभुत्व के संरक्षण का काम लिया तथा अपने बुद्धि-कौशल से क्षत्रियों सहित समस्त जनता पर अपनी अद्भुत गुरुआई, महिमा, श्रेष्ठता, पूजनीयता एवं शा देने के भय का आतंक जमा दिया।” (वही, पृष्ठ 27-28)

जिज्ञासु ने कुछ लेख राम-रावण और विष्णु के अवतारों के संबंध में भी लिखे हैं, जो खोजपूर्ण और ऐतिहासिक महत्व के हैं। ‘राम-रावण युद्ध का ऐतिहासिक रहस्य’ में जिज्ञासु ने कई रहस्यों का उद्घाटन किया है। उन्होंने लिखा है कि आर्य लोग मध्य एशिया से उत्तर भारत में आए और धीरे-धीरे फैलते हुए उन्होंने अयोध्या को अपनी राजधनी बना लिया। उनके अनुसार, प्रत्येक नए देश में पहले आर्यों के मिशनरी पहुॅंचते थे, जमीन कब्जा कर, वहॉं यज्ञ-याग करना आरम्भ कर देते थे। उसके बाद वहॉं उनकी फौजें पहुॅंचती थीं। जिज्ञासु का कहना है कि आर्यों की इस चाल को उस समय के मूलनिवासी लोग समझ गए थे। इसलिए वे उनके हिंसक यज्ञ-यागों को भंग कर देते थे। “इस विघ्न-कारक आंदोलन के गण-नायक विघ्नेश गणेशजी होते थे, जो शिव-पुत्र कहलाते थे। शिव की आराधना से शक्ति प्राप्त करके यहॉं के मूलनिवासी, जिन्हें ब्राह्मण-साहित्य में दैत्य और राक्षस कहा गया है, हमेशा वैदिक देवों और आर्यों से लड़ते थे।” जिज्ञासु ने लिखा है कि रावण एक मूलनिवासी गोंड जाति का शैवी राजा था, जो वैदिक देवों और वैदिक संस्कृति का घोर विरोधी था। उसने अपने साथियों को वैदिक संस्कृति को भंग करने का आदेश दिया था, जो तुलसीदास के शब्दों में इस प्रकार था– “द्विज-भोजन, मख, होम, सराध, सबकै जाए करौ तुम बाध।” इसका परिणाम भी तुलसी ने इन शब्दों में दिया है–

जेहि विधि होई धर्म निर्मूला, सो सब करहिं वेद-प्रतिकूला।
जेहि-जेहि देस देव द्विज पावहिं, नगर-गॉंव-पुर आगि लगावहिं।

जिज्ञासु कहते हैं कि “इस वर्णन में उसी आन्दोलन की प्रतिध्वनि है, जिसे गत महायुद्ध-काल में आक्रमणकारी के विरुद्ध अपनी स्वतंत्रता की रक्षा के लिए चेकोस्लोवाकिया, पोलैंड, यूनान और चीन आदि देशों की जनता ने जारी कर रखा था।” इस नजरिए से उनका कहना था कि रावण द्वारा आर्यों की मुल्कगीरी के खिलाफ अपने देश की रक्षा के लिए लड़ना पाप नहीं था। उनके अनुसार जो लोग उसे पाप कहते हैं, वे आक्रमणकारी आर्यों के हिमायती गुरु ही हो सकते हैं। (वही, पृष्ठ 29-30)

जिज्ञासु ने ‘रावण-संबंधी नई खोज’ का भी रहस्योद्घाटन किया है। उन्होंने दो खोजों का जिक्र किया है। पहली खोज के अन्तर्गत सीता रावण की पुत्री थी। इसीलिए शिव-धनुष तोड़ने की शक्ति रखते हुए भी रावण ने उसे नहीं तोड़ा था, क्योंकि अपनी पुत्री को पत्नी-रूप में ग्रहण करना उचित नहीं था। उनका यह भी मत है कि रावण ने सीता का अपहरण नहीं किया था, बल्कि वह सीता को उसकी सुरक्षा के लिए लंका ले गया था और सीता सहर्ष अपने पिता के साथ लंका गई थी। दूसरी खोज के अन्तर्गत रावण अहिंसा-परायण बौद्ध था। इस बात का उल्लेख, जिज्ञासु के अनुसार, आचार्य नरेंन्द्र देव ने महायानी बौद्ध ग्रन्थ ‘लंकावतार-सूत्र’ के हवाले से अपने ग्रन्थ ‘बौद्ध धर्म-दर्शन’ में किया है। इस संबंध में जिज्ञासु ने अलग से भी एक पुस्तक ‘रावण और उसकी लंका’ लिखी है, जिसमें और भी कई रहस्यों का उद्घाटन किया गया है। 

इस पुस्तक में दो अत्यन्त महत्वपूर्ण लेख – ‘ब्राह्मणों के शाप का आतंक’ और ‘विष्णु के अवतार किस लिए होते हैं’ – हैं। पहले लेख में जिज्ञासु ने दो बातें स्पष्ट की हैं। एक यह कि यद्यपि राम का अवतार रावणादि को मारने और देव-ब्राह्मणों की रक्षा के लिए हुआ था, किन्तु यहां यह बात भी ध्यान में रखने की है कि रामावतार के समय ब्राह्मण-क्षत्रिय-संघर्ष भी मौजूद था। रामावतार की कल्पना ने इस संघर्ष को समाप्त किया था। रामायण में ब्राह्मणों ने क्षत्रिय को भगवान बनाकर उसे अपने आगे झुकाने के लिए बाध्य किया है। जिज्ञासु कहते हैं– “राहुल सांकृत्यायन का कहना है कि राम के सम्पूर्ण आदर्श की रचना एवं रामचरित्र की कल्पना पुष्यमित्रा शुंग की ब्राह्मण-विजय को ध्यान में रखकर बौद्धों के ‘दशरथ जातक’ को उलट-पलटकर ब्राह्मणों ने अपने शाप का आतंक जमाने के लिए की गई।” इससे यह माना जाना चाहिए कि यद्यपि रामायण की कथा काल्पनिक है, पर उसमें तत्कालीन इतिहास का दिग्दर्शन जरूर है। राम के रूप में पुष्यमित्र का चरित्र है, और रावण के रूप में बौद्ध स्तम्भ का। इतिहास का सच भी यही है कि पुष्यमित्र के राज्य में बौद्ध धर्म का समूल उच्छेद किया गया था। 

जिज्ञासु कहते हैं– “रामायण ही नहीं, संस्कृत-साहित्य की जिस कथा को देखिए, उसका हेतु या तो ब्राह्मण का शाप है या वरदान।” खुलासा यह कि राम का जन्म ब्राह्मण के वरदान का परिणाम है, दशरथ की मृत्यु का कारण ब्राह्मण का शाप है। शकुन्तला का पति राजा दुष्यंत ब्राह्मण के शाप से अपनी प्रियतमा पत्नी को भूल गया, यहॉं तक कि मेघदूत का यक्ष भी ब्राह्मण के शाप से अपनी प्राणवल्लभा यक्षिणी से वियुक्त हुआ। (वही, पृष्ठ 35-36)

गुड़िया खुदाई के क्रम में जिज्ञासु का लेख ‘महर्षि दयानन्द और उनका सत्यार्थ प्रकाश भी विचारणीय है। भारत में जब भी दलित-पिछड़ों के हक में क्रान्ति हुई, ब्राह्मणों ने उसके खिलाफ प्रतिक्रान्ति की, और पूरी ताकत से उस क्रान्ति को खत्म करके ही दम लिया। जिज्ञासु की दृष्टि में दयानन्द ऐसे ही महर्षि थे, जिन्होंने क्रान्ति के खिलाफ प्रतिक्रान्ति की थी। उन्होंने लिखा– भारत में ‘अंग्रेजी अमलदारी कायम होने पर पाश्चात्य शिक्षा, पश्चिमी बुद्धिवाद और भौतिक विज्ञान के प्रचार तथा ईसाई धर्म के मिशनरियों के धार्मिक तर्कवाद से ब्राह्मणी धर्म की जड़ें हिल गईं थीं, बुद्धिवादी लोगों की श्रद्धा ब्राह्मण-धर्म और ब्राह्मणों के गुड्डे ईश्वरों से हट चली थी, और ब्राह्मण-धर्म के शोषण और अत्याचारों से पीड़ित हिन्दू हजारों की संख्या में ईसाई और मुसलमान हो रहे थे, क्योंकि ईसाई और मुसलमानों का ‘गॉड’ या अल्लाह राम और कृष्ण की तरह गुड्डा-ईश्वर नहीं था, जो एक धर्म-व्यवसायी जाति विशेष के हितों के लिए जन्म लेकर उसके विरोधियों का संहार करता और उसके इशारों पर नाचता हो। इस प्रकार धर्म का किला गिरता देखकर दूरदर्शी ब्राह्मणों की चिन्ता बहुत बढ़ गई। इसी समय ब्राह्मणों में एक महर्षि उत्पन्न हुआ, जिसका नाम दयानन्द सरस्वती था।”

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दयानन्द सरस्वती ने किस तरह प्रतिक्रान्ति को अंजाम दिया, वह जिज्ञासु के शब्दों में इस प्रकार है– “उसने (दयानन्द) ईसाई और मुसलमानी धर्म की शैली पर आर्यसमाज नाम की एक संस्था का प्रवर्तन किया और इस संस्था की मूलाधर ‘सत्यार्थप्रकाश’ नाम की एक पुस्तक लिखकर ब्राह्मणी धर्म को एक नए सांचे में ढालने की कोशिश की। सत्यार्थप्रकाश के समुल्लास में ईश्वर की ही व्यवस्था की गई और इस्लामी धर्म की तरह बड़े जोरों के साथ ‘एक ईश्वर’ का ढिंढोरा पीटा गया; मूर्तिपूजा, बहुदेववाद और अवतारवाद का खंडन किया गया; ब्राह्मणों के राम और कृष्ण आदि गुड्डे-ईश्वरों को वास्तविक ईश्वर न मानकर ‘आदर्श महापुरुष’ बताया गया। इसके सिवा ब्राह्मणों के जन्मवादी वर्ण-विधान का खंडन करके उसे गुण-कर्म के आधर पर स्थापित करने का सुझाव दिया गया; फलित ज्योतिष, पौराणिक क्रिया-कलाप … मृतक-श्राद्ध आदि को पोपलीला ठहराया गया, और … तीर्थों आदि में स्नान-दर्शन के महाफल को ठग-विद्या … बताया गया।” यहॉं तक तो ठीक था। यह सुधार सामयिक और उपयोगी था। किन्तु जिज्ञासु कहते हैं कि अन्तिम समुल्लास में दयानन्द द्वारा दूसरे महान धर्मों को, जो ब्राह्मण-धर्म से अपेक्षाकृत अधिक अच्छे हैं, वेद-विरुद्ध कहकर उनका खंडन भी किया गया। (वही, पृष्ठ 39-40) इसी को प्रतिक्रान्ति कहते हैं कि वैदिक वर्णव्यवस्था का खंडन उन्होंने नहीं किया। असल में ब्राह्मणों के लिए एकेश्वरवाद या बहुदेववाद कोई समस्या नहीं थी; उनकी मुख्य चिन्ता वैदिक वर्णव्यवस्था थी, जिसे वे किसी भी स्थिति में त्यागना नहीं चाहते थे।

इसका खुलासा जिज्ञासु ने अगले लेख ‘आर्यसमाज के साथ ब्राह्मण पंडितों का पैक्ट और उसका परिणाम पाकिस्तान’ में किया है। उन्होंने कहा– “वैदिक धर्म की जय बोलकर कुछ चंट ब्राह्मण पंडित आर्यसमाज के कर्ता-धर्ता बनकर उसका संचालन करने लगे। फलतः ईसाई और मुसलमान आदि वेद-विरुद्ध धर्मों के साथ आर्यसमाज के अगणित शास्त्रार्थ हुए। जलसों में खुल्लमखुल्ला आर्य समाज को ‘सफरमैना की पल्टन’ कहा जाने लगा, और इस धार्मिक संघर्ष के परिणाम में देश में ऐसा सांप्रदायिक विद्वेष का बवंडर उठा, जिसके कारण बेशुमार दंगे हुए, राष्ट्रीयता की अर्थी निकल गई, और सैकड़ों वर्षों की संतों व महापुरुषों द्वारा स्थापित सहिष्णुता की रगड़ से बना भारत का शांत वायुमंडल विषाक्त हो गया।” 

इसी विषाक्त वायुमंडल ने भारत का सांप्रदायिक विभाजन कराया, जिसका दोषी, जिज्ञासु की दृष्टि में, आर्यसमाज है। इस विभाजन का, जिज्ञासु ने, बहुत ही रोचक रूपकों के साथ चित्राण किया। उन्होंने लिखा– “इस आर्यसमाज-ब्राह्मण पैक्ट का देश को अत्यन्त अवांछनीय कुफल मिला। जिस प्रकार आर्य हिटलर ने सारे संसार पर नाजी-प्रभुत्व स्थापित करने के लिए सार्वभौम महायुद्ध छेड़कर यहूदियों को बलि का बकरा बनाया था, इसी प्रकार समस्त भूतल पर या कम से कम समस्त भारत में आर्यराज्य अथवा ब्राह्मण-प्रधान हिन्दू-राज्य कायम करने की महती आकांक्षा से मुसलमान और ईसाई आदि वेद-विरुद्ध धर्मों को बलि का बकरा बनाकर यूप से बांध दिया गया था, किन्तु सारा गुड़ गोबर तब हो गया, जब मनचले वैदिक आर्य मिशनरियों ने शुद्धि करके सबको उदरस्थ कर जाने के इरादे से, खंडन के खंग को उपर उठाया ही था कि रस्सी तुड़ाकर बकरे मैदान में भाग गए और ऐसा उधम मचाया कि भारत की राष्ट्रीयता की टांग तोड़ दी और अखंड भारत के दो खंड करके देश के एक विशाल भाग को पाकिस्तान बना दिया।” (वही, पृष्ठ 42)

भारत के विभाजन के बाद, ब्राह्मणों को कोई पश्चाताप नहीं हुआ, वरन् उन्हें अब ब्राह्मण-धर्म का विस्तार करने की खुली छूट मिल गई थी। इसका वर्णन जिज्ञासु ने ‘सांप्रदायिक विस्तार का एक नया लटका, कीर्तन’ लेख में किया है। लेख के आरम्भ में ही वह लिखते हैं कि “पाकिस्तान बन जाने से ब्राह्मणी धर्म का अपरिमित हित हुआ।” वह किस तरह? उन्होंने लिखा कि आबादी-परिवर्तन के समय जो भारी रक्तपात और विनाश का वीभत्स कांड हुआ, उससे लोकतंत्र का नया पौध तो झुलस गया, पर ब्राह्मणी राज्य और ब्राह्मणी संस्कृति के गिरते-सूखते महावृक्ष की जड़ें हरी होने लगीं। “कल जो आर्यसमाजी मूर्तियों और सत्यनारायण की कथा आदि का खंडन करता देखा जाता था, आज वह हिन्दू मन्दिरों और कथाओं का जबरदस्त हिमायती बनकर उनके लिए विधर्मियों से लड़ने और जान देने को तैयार है।” 

विभाजन के बाद भारत की सारी सत्ता ब्राह्मणों के हाथों में थी। अब वे निरंकुश थे। अतः उन्होंने ब्राह्मणी धर्म को कायम करने के लिए पूरी शक्ति लगा दी। जिज्ञासु ने उस समय के ऐसे यथार्थ को चित्रित किया है, जिसे आज के लोग निश्चित रूप से भूल गए होंगे, परन्तु जिन्होंने उस दौर को देखा है, वे उसे अभी भी अपने मस्तिष्क के चलचित्र में साफ-साफ देख सकते हैं, जिसने ब्राह्मणवाद को फैलाने में बड़ी भूमिका निभाई थी। जिज्ञासु लिखते हैं– “उन्होंने (ब्राह्मणों ने) अपने धर्म की जड़ें मजबूत करने के लिए ‘कीर्तन’ नाम का एक नया लटका निकाल दिया। आजकल वही चालू है। सारे देश में कीर्तन की धूम है। बड़े-बड़े कीर्तन-निधि उत्पन्न हो गए हैं। देश के एक छोर से दूसरे छोर तक नगर-नगर, ग्राम-ग्राम, मुहल्ले-मुहल्ले कीर्तन-मंडलियां कायम हैं। घर-घर कीर्तन और अखंड कीर्तन होने का रिवाज चल पड़ा हैं। यहां तक कि सरकारी रेडियो द्वारा भी कीर्तन सुनाया जाता है। … बरसाती मेढकों की तरह बेशुमार रंग-बिरंगे स्वामी निकल पड़े हैं। (उनकी) मोहिनी वाणी (द्वारा) गीता और रामायण के व्याख्यानों में धरती-आकाश एक कर दिया जाता है, अवतारवाद की पुष्टि और भक्तिवाद के सीमातीत प्रचार में तमाम दुनिया की फिलासफी छौंकी और साइंस की टॉंगें तोड़ी जाती हैं। … इस समस्त महाप्रयत्न के परिणाम में ढोल, मृदंग, हारमोनियम, बेला, सारंगी, झॉंझ, मजीरा आदि साजबाज और हंगामे के साथ ‘हारे रामा, हारे कृष्णा’ की रट लगवाकर भोली-भाली जनता को राम-कृष्ण आदि ब्राह्मणों के गुड्डे ईश्वरों का अंधभक्त बनाया जाता और … ब्राह्मणशाही धार्मिक साम्राज्य की हिलती हुई जड़ें मजबूत की जाती हैं।” आगे जिज्ञासु लिखते हैं कि “जब कीर्तन की चक्की में हिन्दुओं के मस्तिष्क को पीसकर मैदा बना दिया जायेगा, तो फिर बुद्धिवाद का अंकुर उगेगा किस तरह?” (वही, पृष्ठ 43-44)

जिज्ञासु ने बिल्कुल सही कहा कि ब्राह्मणों ने हिन्दू समाज में बुद्धिवाद पैदा न हो, इसीलिए कीर्तन का लटका शुरू किया था। पुस्तक के उपसंहार में जिज्ञासु का कहना है कि इस तरह का ब्राह्मणवादी प्रचार “जातीय अधिनायकवाद” अर्थात् “राष्ट्रीय फासीवाद” है। उनके अनुसार ईश्वर के गुड्डे बनाकर भोली-भाली जनता को उनका अधंभक्त बनाना धार्मिकता नहीं, अपितु “प्रज्ञापराध” है। उन्होंने कहा कि प्रतिवर्ष रामलीला कराना और रावणादि के कागजी पुतले फूॅंकना उपहासास्पद हुड़दंग है, न कि भारतीय संस्कृति है। (वही, पृष्ठ 45)

पुस्तक के अन्त में जिज्ञासु ने पॉंच परिशिष्ट-लेख दिए हैं– पहला ‘महात्मा गांधी के राम’, दूसरा ‘महर्षि दयानन्द और राम-कृष्णादि अवतार’, तीसरा ‘कबीर साहेब के राम’, चौथा ‘सन्तप्रवर रैदास साहेब के राम’ और पॉंचवॉं ‘रामायण में भी राम के ईश्वरर होने में आशंका’। ये पांचों लेख बहुत ही महत्वपूर्ण हैं, जिन पर यहां थोड़ी चर्चा जरूरी है। पहले लेख में जिज्ञासु ने महात्मा गांधी के राम की तीखी आलोचना की है। स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान जिन गांधी से जिज्ञासु इतने प्रभावित थे कि अपना एक ट्रैक्ट (काव्य-पुस्तिका) भी उन्होंने ‘भगवान गांधी’ नाम से प्रकाशित किया था, वही गांधी स्वतंत्रता के बाद ब्राह्मण-धर्म के प्रचारक हो गए थे। उन्होंने लिखा कि जिन्हें उन्होंने भगवान गांधी लिखा था, और देश ने जिन्हें राष्ट्रपिता कहा, वह राष्ट्रीयता और राष्ट्रीय धर्म के विरुद्ध आजीवन ‘रघुपति राघव राजा राम’ की घोर सांप्रदायिक धुन लगाते रहे, लेकिन कभी भी वे अपने राजाराम को ईश्वर सिद्ध नहीं कर सके। (वही, पृष्ठ 50) 

जिज्ञासु के शब्दों में, “वस्तुतः महात्माजी की यह सांप्रदायिक रामधुन केवल ब्राह्मण-पंथी हिन्दुओं को भुलावा देने के लिए थी, उनकी निजी मान्यता कुछ और ही थी। एक बार उन्होंने कहा था– ‘मैं अब तक कहता था : ईश्वर सत्य है, किन्तु अब मैं कहता हूॅं : सत्य ही ईश्वर है।’” किन्तु जिज्ञासु प्रश्न करते हैं– “जो पुरुष सत्य को ईश्वर मानता हो, उसे रामधुन का सांप्रदायिक बखेड़ा खड़ा करने की क्या जरूरत?” जिज्ञासु लिखते हैं– “इस प्रश्न का उत्तर यही हो सकता है कि जैसे चिड़ियों को जाल में फंसाने के लिए दाना छिटकाया जाता है, उसी तरह ‘बम्हनिया हिन्दुओं’ पर अपना धार्मिक प्रभाव डालकर उन्हें अपनी राजनीति में जकड़ने के लिए महात्माजी की यह रामधुन थी।” (वही, पृष् 47-48) 

दूसरे लेख में जिज्ञासु ने यह स्पष्ट किया है कि महर्षि दयानन्द ने राम और कृष्ण आदि अवतारों का खंडन किया था। उन्होंने उनके ग्रन्थ ‘सत्यार्थप्रकाश’ से उद्धरित किया है– “प्रश्न है, ईश्वर अवतार लेता है या नहीं? उत्तर है, नहीं। क्योंकि ‘अजएकमान्’ एवं ‘सपर्यगाच्छुक्रमकायम्’ आदि यजुर्वेद के वचन हैं। इन वचनों से सिद्ध है कि ईश्वर जन्म नहीं लेता।” (वही, पृष्ठ 51)

तीसरे और चौथे लेखों में जिज्ञासु ने कबीर और रैदास साहेब के ‘राम’ पर चर्चा की है। उन्होंने बताया है कि इन संतों के राम साम्प्रदायिक अर्थात राजा राम नहीं थे, बल्कि ‘आतम राम’ थे। इसके समर्थन में जिज्ञासु ने कबीर और रैदास साहेब के कई पद उद्धरित किए हैं। कबीर ने कहा– 

प्रथमै सालिगराम है, दूजे फरसा राम।
तीजे राजा राम हैं, चौथे आतम राम।
रमै निरन्तर आतमा, सब घट आठौ जाम।
याही ते संतन धरयो, राम तासु को नाम।

जिज्ञासु के अनुसार, रैदास साहेब ने भी एक सार्वभौम ईश्वर की प्रतिष्ठा की; उन्होंने अपनी वाणी में दाशरथी राजाराम की उपासना का निषेध और ‘सत्यराम’ की उपासना का आदेश दिया है। जिज्ञासु द्वारा उद्धरित रैदास साहेब का यह पद बहुत ही सुन्दर है, जिसकी पंक्तियॉं हैं– :भाई रे, राम कहॉं मोहि बताओ? सत्यराम ताके निकट न जाओ।” (वही, पृष्ठ 52-57)

पॉंचवें लेख में उन्होंने गोस्वामी तुलसीदास के रामचरितमानस से कुछ उद्धरण देकर बताया है कि सीता के पति राम ईश्वर नहीं है। कथा बालकांड की है। जिज्ञासु लिखते हैं, अगस्त्य के आश्रम में शिवजी ने राम को ‘सच्चिदानन्द’ कहकर प्रणाम किया। इस पर सती को शंका हुई–

“संकर जगत-वंद्य जगदीसा, सुर नर मुनि सब नावत सीसा।
तिन्ह नृपसुतहि कीन्ह परनामा, कहि सच्चिदानन्द परधमा।”

सती सोच में पड़ गईं कि अरे, यह क्या तमाशा है? जगत-वंद्य जगदीश शिवजी, जिनके आगे सुर नर मुनि सब झुकते हैं, उन्होंने एक राजा के बेटे को सच्चिदानन्द कहकर कैसे प्रणाम किया? क्योंकि–

“ब्रह्म जो व्यापक विरज अज, अकल अनीह अभेद।
सो कि देह धारी होइ नर, जाहि न जानत वेद।

“जो सर्वव्यापक है, अजन्मा, कला-चेष्टा-रहित, अभेद और अखंड है तथा जिसे वेद भी नहीं जानते, क्या वह कभी देहधारी मनुष्य हो सकता है?”

आगे जिज्ञासु टिप्पणी करते हैं कि सतीजी की यह शंका ऐसी है कि सारे अवतारवाद को खत्म कर देती है। किन्तु तुलसीदास इसे ‘नारी-स्वभाव की मूर्खता’ बताकर रामचरित्र कथने लगे। पर वह एक भूल कर बैठे। “भूल यह है कि सतीजी ने शिवजी के साथ राम को पत्नी के वियोग में विलाप करते देखा, फिर उन्हीं सती का, हजारों-हजारों वर्षों बाद, पार्वती रूप में सीता को राम पति मिलने का वरदान देना कैसे संभव हुआ?” (वही, पृष्ठ 57-58)

इन पांच साक्षियों के आधार पर जिज्ञासु का निष्कर्ष है कि दशरथ-पुत्र रामचन्द्र ईश्वर नहीं हो सकते। वे ब्राह्मणों के परम भक्त और हितैषी सूर्यवंशीय क्षत्रिय राजा थे, जिन्होंने वैदिक धर्म के विरोधी रावण को मारकर ब्राह्मणी धर्मव्यवस्था कायम की थी। “बाद में ब्राह्मण कवियों ने अपनी इच्छा के अनुरूप उनका चरित्र चित्रण करके उन्हें अपना ‘गुड्डा ईश्वर’ बनाकर अपरिमित प्रचार किया और अनुचित लाभ उठाया।” 

इस पुस्तक ने निस्सन्देह 1970 के दशक में दलित-पिछड़ी जातियों की तीसरी ऑंख खोली थी। 

(संपादन : नवल/अनिल)


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