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सच्ची कथाएं रावण की (चंद्रिकाप्रसाद जिज्ञासु का साहित्य – सातवां भाग)

मिथकीय ग्रंथ रामायण में वर्णित रावण के संबंध में बौद्ध धर्म से लेकर गोंड परंपरा तक में अनेक व्याख्याएं हैं। इन व्याख्याओं के निहितार्थ व मनुवादी समाज की वैचारिकी को चुनौती देती चंद्रिकाप्रसाद जिज्ञासु की पुस्तक ‘रावण और उसकी लंका’ का पुनर्पाठ कर रहे हैं कंवल भारती

[भारतीय सामाजिक व्यवस्था के बुनियादी सिद्धांतों में से एक जातिगत भेदभाव और छुआछूत तथा इसके धार्मिक संरक्षण को लेकर आवाजें उठती रही हैं। सत्य शोधन की इस परंपरा का आगाज जोतीराव फुले ने 19वीं सदी में किया। बीसवीं सदी में इस परंपरा को अनेक लोगों ने बढ़ाया, जिनमें मुख्य तौर पर डॉ. आंबेडकर का नाम भी शामिल है। चंद्रिका प्रसाद जिज्ञासु भी ऐसे ही सत्य शोधक थे। कंवल भारती उनकी किताबों की पुस्तकवार पुनर्पाठ कर रहे हैं। इसके तहत आज पढ़ें उनकी छठी कृति ‘रावण और उसकी लंका’ का पुनर्पाठ ]

रावण और उसकी लंका : चंद्रिकाप्रसाद जिज्ञासु की छठी कृति

  • कंवल भारती

जिस प्रकार बुद्ध ने बहुजनों के हित और सुख के लिए अपने धर्म का उपदेश किया था, उसी प्रकार चन्द्रिकाप्रसाद जिज्ञासु ने बहुजन-कल्याण की श्रृंखला के अन्तर्गत बुद्धिवादी और क्रान्तिकारी विचारधारा का प्रचार करने का कार्य अपने लेखन से किया। उनका लेखन स्वान्तः सुखाय नहीं था, बल्कि ब्राह्मणवाद द्वारा मानसिक रूप से गुलाम बनाए गए बहुसंख्यक समाज को जागरूक करके, उन्हें ब्राह्मणवाद की दलदल से बाहर निकालना था। इसलिए उनकी अधिकांश पुस्तकों पर ‘बहुजन हिताय-बहुजन सुखाय’ लिखा होता था। ‘ईश्वर और उसके गुड्डे’ के बाद, इसी श्रृंखला में, उनकी अगली पुस्तक ‘रावण और उसकी लंका’ (1959) आई, जिसे उनके पाठकों ने इतना सराहा कि 1968 तक उसके पॉंच संस्करण हो गए। 1962 के संस्करण में उन्होंने उसमें दो परिशिष्ट-लेख जोड़कर उसे और भी खोजपूर्ण बना दिया था।  

‘रावण और उसकी लंका’ में परिशिष्ट-लेख सहित कुल 11 अध्याय हैं। पहला अध्याय ‘उपक्रम’ है, जिसमें रामलीलाओं के रावण का विचारोत्तक विश्लेषण किया गया है। जिज्ञासु लिखते हैं, “इन रामलीलाओं में, हिसाब लगाया गया है, देश का लगभग बीस करोड़ रुपया हर साल खर्च हो जाता है।” यह ऑंकड़ा आज से करीब 70 साल पहले का है। आज यह राशि कई सौ करोड़ हो सकती है। जिज्ञासु कहते हैं कि “यदि इतना धन शिक्षाक्षा पर खर्च हो, तो प्रतिवर्ष कई विश्वविद्यालय खुल सकते हैं और … प्रतिवर्ष एक लाख रोशन-दिमाग युवक तैयार होकर देश का अज्ञान और दरिद्रता दूर कर सकते हैं।” (रावण और उसकी लंका, पृष्ठ 3) 

लेकिल ब्राह्मण-शासक वर्ग न रोशन-दिमाग युवक पैदा करना चाहता है औ न देश से अज्ञानता और दरिद्रता मिटाना चाहता है, क्योंकि अज्ञानता और दरिद्रता दोनों उसके प्रभुत्व को कायम रखने के लिए जरूरी हैं। 

आगे जिज्ञासु बताते हैं कि रामलीलाओं का एक ही हिन्दू एजेण्डा है– ब्राह्मण-धर्म को मजबूत करना। यथा: “इन रामलीलाओं के द्वारा दशकों पर यह प्रभाव डाला जाता है कि रावण बड़ा पापी था, वह वेद-पुराणादि में वर्णित धर्म को नहीं मानता था, ब्राह्मणों और देवताओं को त्रास देता था, ब्राह्मणों को यज्ञ, जप, होम, कथा-पुराणादि नहीं करने देता था, उसने ब्रह्मभोज, श्राद्धभोज आदि बन्द करा दिए थे। … इसलिए, जब रामलीला सफलतापूर्वक संपन्न हो जाती है, तो ब्राह्मण लोग इसे अपनी धार्मिक विजय मानते हैं।” (वही, पृष्ठ 4)

रावण-वध और उसका कागजी पुतला जलाने के संबंध में जिज्ञासु की अगली टिप्पणी बहुत ही विचारोत्तेजक है। वह लिखते हैं– “हिन्दू गणना के अनुसार रावण त्रेता-युग के अन्त में मारा गया था। तब से आठ लाख चौंसठ हजार साल का द्वापर-युग बीत गया और उसके बाद कलियुग के भी पॉंच हजार वर्ष बीत गए, लेकिन तब से आज तक हर साल रावण का पुतला फूंका जाता है।” जिज्ञासु पूछते हैं, दुनिया बदल गई, ब्राह्मण क्यों नहीं बदलते? “तब से अब तक इन लाखों वर्षों में संसार में न जाने कितना परिवर्तन हो गया –धरती बदल गई, आकाश बदल गया, समुद्र बदल गए, पहाड़ बदल गए, रेगिस्तान बदल गए, जंगल बदल गए, कितने ही देश और नगर उजाड़ होकर मिट्टी में मिल गए, कितने ही बियावान जंगल नगर बन गए, कितने ही साम्राज्य आए और गए, कितनी हुकूमतें बनीं और बिगड़ीं, कितने विजेता काल के गाल में समा गए, कितना महान सामाजिक परिवर्तन हुआ, किन्तु रावण के प्रति ब्राह्मणों को जो कोप हुआ था, जो घृणा हुई थी और जो विद्वेष की आग उनके हृदय में प्रज्वलित हुई थी – वह अब तक प्रशमित नहीं हुई।” 

जिज्ञासु ने अपना मत व्यक्त किया है कि “सीता के साथ राम का कठोर व्यवहार इस कारण से था कि वह आर्य नारी नहीं थी। अन्यथा, पराए घर में रही स्त्री को पुनः अंगीकार कर लेने का आर्यों में रिवाज था। देवगुरु बृहस्पति की स्त्री तारा को चन्द्रमा हर ले गया था और उसने उससे बुध नाम का बच्चा भी पैदा किया। लेकिन ब्रह्मा से प्रार्थी होने पर ब्रह्मा ने चन्द्रमा की भर्त्सना करके तारा को तो बृहस्पति को वापस दिला दिया, किन्तु चन्द्रमा ने अपने पुत्र बुध को अपने पास रख लिया। इस प्रकार बरसों पराए घर में रही पत्नी को, जिसके एक बच्चा भी पैदा हो चुका था, बृहस्पति ने पुनः पत्नी-रूप में ग्रहण किया और देवगुरु देव-समाज से बहिष्कृत भी नहीं हुए।” (वही, पृष्ठ 34)

अन्त में, जिज्ञासु एक मानवीय दृष्टिकोण के आधार पर लिखते हैं– “क्षमाशील सभ्य और सुसंस्कृत मानवों का स्वाभाविक गुण है। फिर जब अपराधी को प्राणदंड देकर वंश-सहित समूल नाश कर दिया गया हो, तब तो प्रतिशोध की भावना को भी भस्मीभूत हो जाना चाहिए, और क्रोध के कारणों को भूल जाना चाहिए। किन्तु इसके विपरीत जब देखा जाता हो कि उसे उत्तेजित करने का असामान्य सामूहिक प्रयत्न हो रहा है, तो प्रत्येक बुद्धिवादी के लिए विचार करने का वह एक विषय बन जाता है।” (वही, पृष्ठ 5)

दूसरे अध्याय में ‘रामायणों में वर्णित रावण’ का उल्लेख है। इसमें वाल्मीकि एवं अन्य संस्कृत-ग्रन्थों में रावण का जो वर्णन मिलता है, उसी को संक्षेप में दिया गया है। यथा : विश्रवा मुनि के वीर्य और कैकसी के गर्भ से रावण, कुम्भकरण और विभीषण तीनों भाइयों का जन्म हुआ। रावण शिव का भक्त था, शिव ने वरदान देकर उसे देवताओं में अजेय बना दिया था। बल प्राप्त करके वह लंका में आया और कुबेर को युद्ध में पराजित करके लंका पर अपना राज्य कायम कर लिया। दानवराज मय की महासुन्दरी कन्या मंदोदरी के साथ उसका विवाह हुआ, जिससे मेघनाद, अक्षय कुमार आदि अनेक पुत्रों का जन्म हुआ। वह वैदिक धर्म का विरोधी था, और देवताओं, ऋषियों तथा ब्राह्मणों को मारता और यज्ञों को भंग कर देता था। वैदिक देवों में उसका भारी आतंक था, इत्यादि। उसके बाद की कहानी सर्वविदित है कि किस तरह अयोध्या के राजा राम द्वारा उसका समूल वध किया गया। 

इसके बाद चन्द्रिकाप्रसाद जिज्ञासु ‘रावण और उसकी लंका’ के तीसरे अध्याय में लिखते हैं कि रावण के बारे में सारा दुष्प्रचार तुलसीदास के द्वारा किया हुआ है। तुलसी ने लिखा है कि “दस सिर ताहि बीस भुजदंडा, रावन नाम वीर बरिबंडा” और रामलीलाओं में रावण का पुतला ऐसा ही बनाया जाता है। इसलिए आम जनता की धारणा है कि रावण के दस सिर और बीस हाथ रहे होंगे।” किन्तु जिज्ञासु कहते हैं कि “वाल्मीकि रामायण इसका समर्थन नहीं करती कि रावण के दस सिर, बीस हाथ और सबसे उपर गधे का सिर था।” उन्होंने लिखा कि “वाल्मीकि से हमें पता चलता है कि रावण परम नीतिज्ञ, विद्वान, सभ्य और सुसंस्कृत मनुष्य था, और उसकी लंकापुरी सुसभ्य मानवों की नगरी थी।” उनके अनुसार वाल्मीकि रामायण में दिखाया गया है कि सीता की खोज करते हुए जब हनुमान ने लंका में प्रवेश किया, तो उसने देखा कि लंका की सड़कों पर बड़े-बड़े महलों की कतारें बिछी हुईं थीं। इस महानगरी में हनुमान ने सात-सात और आठ-आठ मंजिलों की इमारतें देखीं, जिनके फर्श पारदर्शी स्फटिक पत्थरों से जड़े हुए शोभायमान थे। हनुमान को लंका के वनों में सीधे और ऊंचे देवदार और कर्णिकार तथा भली प्रकार फूले और फले हुए खजूर, चिरौंजी, खिरनी, महुआ, केतकी, प्रियंगु, कदम्ब, ताबरी, असन, कोविदार और करवीर के वृक्ष दीख पड़े।” जिज्ञासु के अनुसार, जब सीता की खोज में हनुमान रावण के महल में उसके शयनगृह में पहुॅचे, तो उसने देखा कि रावण की दोनों भुजाएं सोने के बाजुबंदों से सुशोभित थीं। अपनी दोनों भुजाओं से रावण दो शिखरों वाले मंदराचल की तरह सुशोभित हो रहे थे। उनका मुख दोनों कुंडलों एवं उस स्वर्णमुकुट के कारण, जो विचित्र प्रकार के मोतियों और मणियों से जड़ा हुआ और शययनावस्था में अपने स्थान से कुछ खिसक गया था, बड़ा सुन्दर लग रहा था। रावण के सैनिक न बहुत मोटे थे और न बहुत दुबले, न बहुत लम्बे थे, न बहुत ठिगने, न बहुत गोरे थे, न काले, और न कुबड़े थे न बौने।” जिज्ञासु लिखते हैं कि वाल्मीकि द्वारा दी गई इस जानकार से “रावण और उसके आदमियों के संबंध में फैली हुई कुत्सित, वीभत्स, घृणित और विद्वेषपूर्ण धारणा अपने आप उसी तरह निर्मूल हो जाती है, जैसे गदहे के सिर से सींग।” (वही, पृष्ठ 9-14)

रावण की खोज आर्यसमाजी विद्वानों ने भी की है, जिसका वर्णन जिज्ञासु ने चौथे अध्याय में किया है। उसके अनुसार चितपावन ब्राह्मण मिस्र के रहने वाले यहूदी हैं और उनका गुरु रावण था। यहूदियों ने “ब्राह्मण बनकर उसी समय महाराष्ट्र में घुसना चाहा था, पर नहीं घुसने पाए। इसलिए महाराष्ट्र ब्राह्मणों में देशस्थ और कोंकणस्थ दो भेद हैं। कोंकणस्थ ही चितपावन हैं। ब्राह्मण होकर संस्कृत में अच्छी योग्यता प्राप्त कर ली और इन्होंने भी अपने रावणादि पूर्वजों के तैत्तिरीय कृष्ण यजुर्वेद को ही स्वीकार किया तथा वहां के साहित्य में कृष्ण यजुर्वेद का वेदत्व तथा मिस्र देश के रीति-रिवाजों को आर्यों के रीति-रिवाजों में मिश्रित कर दिया।” 

आगे आर्यसमाजी विद्वान रघुनंदन शर्मा के उद्धरण से एक और महत्वपूर्ण रहस्य का उदघाटन होता है– “मिस्र देश का ‘महाकालम्पी’ देवता यहां का ‘महाकाल’ बन गया। इसी तरह दत्तात्रेय की सारी कथा और दत्तात्रेय की मूर्खता का विचित्र आकार मिस्र देश का ही है और वहॉं से चितपावनों कायहॉं हुआ। दत्तात्रेय महाराष्ट्र के इष्टदेव हैं। अवधूत-पंथ इन्हीं से चला। सती-प्रथा को भी चितपावनों ने धर्म मानकर शास्त्रों में घुसेड़ा। चितपावन ब्राह्मण सती-प्रथा पर बड़े आसक्त थे, क्योंकि सती-प्रथा का सूत्रपात रावण के घर से है, स्वयं रावण की पुत्रवधू मेघनाद की स्त्री सुलोचना सती हुई थी।” (वही, पृष्ठ 19) 

जिज्ञासु के अनुसार, शर्मा ने द्रविड़ों को आस्ट्रेलिया, मिस्र व फिलीस्तीन से आए हुए विदेशी बताया है। शर्मा के अनुसार समस्त “वेदों का भाष्य करके वेदों की इयत्ता निर्धरित करने का साहस कभी आर्यों ने नहीं किया, परन्तु सन ईसवी की चौदहवीं शताब्दी में सायण नामी एक द्रविड़ ब्राह्मण ने, जिसका आदिम गुरु रावण था, यह साहस किया।” जिज्ञासु ने आर्य पंडित शर्मा के मत को भयावह माना है। उनका कहना है कि इस सारी “स्थापना का आधार मेल्लाडी वेंकट रत्नम की पुस्तक ‘रामा, दि ग्रेटेस्ट फेरो ऑफ इजिप्ट’ है, जिसमें सिद्ध किया गया है कि राम और रावण की सारी कथा मिस्र के रामसेस द्वितीय की कहानी है।” उन्होंने कहा कि “इस मत को मान लेने से रामायण विदेशी बन जायगी, और रावण को विदेशी बनाने से राम से भी हाथ धोना पड़ेगा और सारा गुड़ गोबर हो जायगा।” (वही, पृष्ठ 21)

चंद्रिकाप्रसाद जिज्ञासु और उनकी पुस्तक “रावण और उसकी लंका” का आवरण पृष्ठ

अतः जिज्ञासु का मत है कि “वैदिक सम्पत्ति के लेखक के मत में रावण द्रविड़ है, किन्तु अन्य पुराविदों ने यह भी सिद्ध किया है कि रावण गोंड जाति का था और उसकी लंका मध्य भारत में थी।” (वही, पृष्ठ 22)

जिज्ञासु ने द्रविड़ कड़गम के नेता पेरियार रामास्वामी की पुस्तक ‘रामायणा : ए ट्रू रीडिंग’ के हवाले से लिखा है कि “रावण एक द्रविड़ जातीय राजा था, जिसने बौद्धधर्म ग्रहण कर लिया था। वह प्लेटो और अरस्तू की कोटि का दार्शनिक विद्वान था। चूॅंकि बौद्ध-साहित्य में रावण को उच्च कोटि का व्यक्ति कहा गया था, अतः बौद्ध-विद्वेषी ब्राह्मणों और पंडितों ने रामायणों में, जो उन्हीं की लिखी किताबें हैं, उसका विकृत चित्रण किया। वस्तुतः रावण ने पृथ्वी पर दया और करुणा का शासन किया।” 

इस अध्याय में जिज्ञासु ने अनेक उद्धरण रामास्वामी की पुस्तक से दिए हैं। एक उद्धरण इस प्रकार है– “रावण जब युद्ध-क्षेत्र में मरने लगा, उसने राम को अपने निकट बुलाया, और उसके कान में धीरे से करुणा और दया का तत्व समझाया, क्योंकि राम ने उसके साथ केवल छल और धेखे का युद्ध किया था। इस प्रकार हम पाते हैं कि रावण ने सत्य और ईमानदारी का ही प्रचार किया।” और भी : “रावण एक महान विद्वान, एक महान सन्त, वेद-शास्त्र का आचार्य, जनता और स्वजनों का दयालु, त्राता व रक्षक, एक वीर पुरुष, एक महाबलिष्ठ व्यक्ति, एक वीर सिपाही, एक महान धर्मात्मा, ईश्वर का एक प्रिय पुत्र और अगणित आनन्दों का भंडार था।” (वही, पृष्ठ 26-27)

यहां जिज्ञासु ने बहुत ही महत्वपूर्ण प्रश्न किया है कि अगर रावण इनता महान और सुयोग्य महामानव था, तो फिर उसका विनाश क्यों हुआ? जिज्ञासु ने इस प्रश्न के दो उत्तर दिए हैं– “एक यह कि रामचन्द्रजी ने अपनी पैनी कूटनीतिक बुद्धि से रावण के प्रतिद्वन्द्वी बालि को धोखे से मारकर उसकी स्त्री और राज्य-लोलुप भाई सुग्रीव को राजा बनाकर उससे मित्रता कर ली और उसकी अपार वानर सेना लेकर लंका पर चढ़ाई कर दी, दूसरा यह कि रावण के विद्रोही भाई राज्य और स्त्री-लोलुप विभीषण को लंका का राजा बनाने का प्रलोभन देकर राम ने अपना साथी बना लिया और उस घर-भेदी कुलांगार ने अपने भाई रावण के सारे गुप्त भेद राम को बता दिए।” (वही)

द्रविड़ नेता पेरियार रामास्वामी के विचारों के बाद, जिज्ञासु ने छठे अध्याय में रावण के संबंध में “द्रविड़-रामायण की कुछ विचित्र मान्यताएं” पेश की हैं। जिज्ञासु लिखते हैं कि पेरियार रामासामी के इस मत से कि रावण बौद्धधर्मी था और उसने राम को बुलाकर करुणा का तत्व समझाया था, चौंकने का कारण काल-भेद है। उन्होंने कहा, “रामायण और भागवतादि पुराणों में रावण का काल त्रेता-युग का अन्त बताया गया है और बुद्ध को कलियुग में विष्णु का नवॉं अवतार। इस धारणा के वशवर्ती पाठक अवश्य कहेंगे कि त्रेता-युगीन रावण कलियुगी बौद्ध कैसे हो सकता है?” (वही, पृष्ठ 28)

जिज्ञासु ने उपर्युक्त धारणा को साम्प्रदायिक माना और कहा कि साम्प्रदायिक बातों में पक्षपात होता ही है। उन्होंने कहा कि इस काल-भेद के संबंध में यह बात भी विचारणीय है कि “जैन रामायण में सीता को ‘श्राविका’ लिखा है, रावण पंचवटी में जैन-यती के रूप में सीता के पास गया था और सीता ने उसे सप्रेम भोजन कराया था। जिज्ञासु पूछते हैं कि त्रेता में यह ‘यती’ का रूप कहां से आ गया? “क्या इससे यह सिद्ध नहीं हुआ कि रावण और सीता का जन्म जिनेन्द्र महावीर के जैन-धर्म का प्रचार हो जाने के बाद हुआ?” इसके बाद जिज्ञासु वाल्मीकि रामायण के अयोध्याकांड के सर्ग 109 यह श्लोक उद्धरित किया है–

यथा हि चौरः स तथा हि बुद्धस्तथागतं नास्तिकमात्र विद्धि।
तस्माध्यः शाक्यतमंः प्रजानां स नास्तिके नाभिमुखो बुध: स्ठात्।। 

इसमें कहा गया है कि “जैसे चोर दण्डनीय होता है, उसी प्रकार वेद-विरोधी बौद्ध भी दण्डनीय है। तथागत (बुद्ध) और नास्तिक मात्रा भी ऐसी ही समझना चाहिए।” रामायण में ये श्रीराम के विचार हैं, जो उनके द्वारा नास्तिकों के विरोध में जाबालि को समझाया गया है। जिज्ञासु का कहना है कि क्या इससे यह सिद्ध नहीं होता कि वाल्मीकि रामायण की रचना तथागत बुद्ध के धर्म का प्रचार हो जाने के बाद हुई? (वही, पृष्ठ 28-29)

जिज्ञासु ने रामायण के आधुनिक होने के संबंध में एक और तर्क दिया है। उन्होंने लिखा कि रामायण में यवनों (यूनानियों) और दशकों (सीथियनों) के संघर्ष का भी उल्लेख मिलता है। किष्किंधाकांड में सुग्रीव कहता है कि यवनों का देश तथा शकों के नगर कौरवों के देश (हरियाणा) तथा हिमालय के बीच में स्थित हैं। जिज्ञासु पूछते हैं– “यूनानी विजेता सिकन्दर सबसे पहले 326 ई.पू. में भारत आया था और शक यूनानियों के बाद ई.पू. दूसरी शताब्दी में आए। तब, रामायण में यवनों और शकों के भारत-निवास का उल्लेख क्यों है?” वह कहते हैं, “क्या इससे स्पष्ट नहीं होता कि रामायण उनके आगमन के बाद लिखी गई?” (वही, पृष्ठ 29)

इन प्रमाणों के आधार पर जिज्ञासु ने रामायण की रचना का काल-निर्धारण करते हुए कहा कि आदिकवि वाल्मीकि के रामायण की रचना बुद्ध के कई सौ वर्ष बाद हुई। “अष्टाध्यायी व्याकरण के रचयिता पाणिनी का समय सन ईसवी से 300 वर्ष पूर्व निश्चित हुआ है। वे पंजाब के शालातुर ग्राम में पैदा हुए और उन्होंने पाटलिपुत्र में वर्ष उपाध्याय से शिक्षा प्राप्त की एवं हिमालय में शिव-सेवा के प्रसाद से व्याकरण लिखा। वाल्मीकि रामायण पाणिनी द्वारा निर्दिष्ट संस्कृत का आदि आदिकाव्य माना गया है, अतः उसका रचना-काल पाणिनी के बाद का ही हो सकता है।” (वही) जिज्ञासु ने अपना मत व्यक्त किया है कि “सीता के साथ राम का कठोर व्यवहार इस कारण से था कि वह आर्य नारी नहीं थी। अन्यथा, पराए घर में रही स्त्री को पुनः अंगीकार कर लेने का आर्यों में रिवाज था। देवगुरु बृहस्पति की स्त्री तारा को चन्द्रमा हर ले गया था और उसने उससे बुध नाम का बच्चा भी पैदा किया। लेकिन ब्रह्मा से प्रार्थी होने पर ब्रह्मा ने चन्द्रमा की भर्त्सना करके तारा को तो बृहस्पति को वापस दिला दिया, किन्तु चन्द्रमा ने अपने पुत्र बुध को अपने पास रख लिया। इस प्रकार बरसों पराए घर में रही पत्नी को, जिसके एक बच्चा भी पैदा हो चुका था, बृहस्पति ने पुनः पत्नी-रूप में ग्रहण किया और देवगुरु देव-समाज से बहिष्कृत भी नहीं हुए।” (वही, पृष्ठ 34)

सातवें अध्याय में द्रविड़-संस्कृति और आर्य-संस्कृति का तुलनात्मक अध्ययन किया गया है। कहा गया है कि “आर्य लोग द्रविड़ों को बड़ी घृणा की दृष्टि से देखते थे और उन्हें दस्यु, दानव, राक्षस आदि कहा करते थे, यद्यपि वे ऐसे थे नहीं।” उनके अनुसार इतिहासकारों का मत है कि “आर्य लोगों ने जब भारत में प्रवेश किया, तो उन्हें द्रविड़ों से लोहा लेना पड़ा। द्रविड़ लोग कद में आर्यों से छोटे, कम गोरे, पक्के रंग के, भूरे या काले थे और आर्य लोग लम्बे तथा गोरे-चिट्टे। द्रविड़ लोग काफी बलवान और योद्धा थे, परन्तु आर्य लोग उनसे ज्यादा बलिष्ठ और लड़ाकू थे तथा उनके अस्त्र-शस्त्र भी द्रविड़ों से अच्छे थे, अतः उन्हें पराजित हो, उत्तर भारत छोड़कर दक्षिण भारत में हट जाना पड़ा।” (वही, पृष्ठ 35)

जिज्ञासु ने दोनों संस्कृतियों की विचारणीय तुलना की है, और बताया है कि द्रविड़ जनतंत्रवादी थे, और आर्य राजतंत्रवादी, द्रविड़ मातृप्रधान थे और आर्य पितृप्रधान एवं द्रविड़ों के सिद्धांत में विकेन्द्रीकरण है, और आर्यों में असीम केन्द्रीकरण। परन्तु आगे जिज्ञासु बहुत ही महत्वपूर्ण मत व्यक्त करते हैं कि “हुत काल तक एक देश में निवास करने से द्रविड़ और आर्य दोनों एक-दूसरे से बहुत प्रभावित हुए हैं और अगणित द्रविड़-मान्यताएं आर्यों में और आर्य-मान्यताएं द्रविड़ों में समा गई हैं, जिनका जातिगत पार्थक्य नहीं किया जा सकता, वैयक्तिक भिन्नता अब भी देखी जाती है। सर्वोपरि यह कि बुद्ध-प्रदर्शित माध्यमिक दर्शन एवं विशुद्धि-मार्ग द्वारा जो धार्मिक महाक्रान्ति हुई, उसने भारतीय धर्मों और संस्कृतियों के रुख बदल दिए। सभी अपने धर्मों को बौद्ध-सदाचार और बौद्ध-मान्यताओं के अनुरूप सिद्ध करने लगे।” (वही, पृष्ठ 37)

वहीं, आठवें और उसके बाद के अध्यायों में जिज्ञासु ने रावण की लंका की खोज की है। वह प्रश्न करते हैं कि जिस लंका को रावण के ससुर मेरठ-निवासी मय-दानव ने बनाया, जिस लंका को बन्दर हनुमान ने फूंका, जिस लंका को राम ने फतेह किया, वह रावण की लंका थी कहॉं पर? वे कहते हैं कि न तो वाल्मीकि की रामायण में और न अन्य रामायणों में लंका की स्थिति का कोई स्पष्ट निर्देश मिलता है। उनका मत है कि घटनाओं और संबंधों की गणना के आधर पर लंका पंचवटी के ही आसपास होनी चाहिए। (वही, पृष्ठ 38)

जिज्ञासु ने सिंहल-द्वीप को लंका मानने वाली धारणा का खंडन किया है। वे कहते हैं कि सैकड़ों-सैकड़ों मील दूर सिंहल-द्वीप को लंका बताने के पीछे ब्राह्मणों की मुख्य भावना बौद्ध धर्म के प्रति घृणा प्रदर्शित करना है। उनका कहना है कि क्योंकि सिंहल (श्रीलंका) हीनयानी बौद्धों का केन्द्र है, और जनता में उसके प्रति बड़ी श्रश्रद्धा है, इसीलिए ब्राह्मणों ने रावण के चरित्र को अत्यन्त काला चित्रित किया और सिंहल को लंका कहकर उसे राक्षसों का गढ़ बताया। (वही, पृष्ठ 39)

फिर लंका कहॉं स्थित थी? इस संबंध में जिज्ञासु ने सरदार कीबे महोदय का मत व्यक्त किया है, जिसके अनुसार “रावण की लंका मध्य भारत में अमरकंटक पर्वत के उपर थी।” इस मत के विरुद्ध इस शंका का भी कीबे महोदय ने समाधन किया है कि अमरकंटक के पास सागर कहॉं है, जिसे हनुमान ने पार किया था और जिस पर राम ने सेतु बांधा था? जिज्ञासु के अनुसार कीबे महोदय ने इस शंका का समाधान इस प्रकार किया है–

“वस्तुतः ‘दंडक’ शब्द शाबरी भाषा का है, जिसका अर्थ ‘जलमय’ या ‘जल-प्लावित’ होता है। अमरकंटक की तली में आज तक एक बड़ा भारी दलदल है, जिसको कोई पार नहीं कर सकता। इस पर सरलता से अनुमान किया जा सकता है कि राम के समय में वहां पानी का कितना बड़ा संग्रह रहा होगा। उसको अगर सागर की उपमा दी जाए, तो कौन सी असंभव बात है? 

“अमरकंटक के किनारे का जलाशय ही सागर या महासागर था, जिसको तैरकर (या काव्य की भाषा में कूदकर) हनुमान लंकापुरी को पहुॅंच गए थे और अन्त में राम ने इसी पर सेतु बांधकर अपनी वानर-सेना का रावण की राजधनी में प्रवेश कराया था। इस स्थल में शिव के मंदिरों की भी बहुतायत है।” (वही, पृष्ठ 41-42)

जिज्ञासु के अनुसार कीबे का यह भी मत है कि लंका शब्द गोंड भाषा का है, जिसका अर्थ है– टीला। उनके अनुसार, इस प्रान्त में गोंडों की बहुतायत है। हालांकि, उनको यह नहीं मालूम कि रावण कौन था, परन्तु वंश-परम्परा की रूढ़ि द्वारा वे इतना जानते हैं कि वे रावण-वंश के हैं। वे यह भी लिखते हैं कि 1891 की जनगणना में लाखों गोंडों ने अपने को रावण-वंशी लिखाया था। (वही, पृष्ठ 42-43)

जिज्ञासु के अनुसार, सरदार कीबे लिखते हैं कि गोंडों में एक राजा हुआ संग्राम सिंह, जिसके सोने के सिक्कों में उसके नाम के आगे पौलस्त्य-वंश खुदा मिलता है। इससे साफ हो जाता है कि सीता का हरण अमरकंटक के आसपास के इलाके में ही हुआ था और उसी के निकट राम-रावण युद्ध हुआ था। उनका मत है कि राम ने गोंडों के विरोधी उरॉंवों और शबरों को अपने पक्ष में कर लिया और उनकी सहायता से विजय पाई। वे लिखते हैं– “यही उरॉंव प्राचीन काल में वानर कहलाते थे (या इनको वानर लिखा गया), शबरों की कदाचित ‘यक्ष’ संज्ञा रही हो। ये दोनों अब भी अमरकंटक के पास पाए जाते हैं। शबरों की संख्या 1911 की जनगणना में छह लाख और उरॉंवों की नौ लाख थी।” (वही, पृष्ठ 43)

सरदार कीबे के मत के आधार पर जिज्ञासु का निष्कर्ष है : “उपर्युक्त तर्क-प्रमाण उद्धरणों से यह सिद्ध हो जाता है कि रावण, द्रविड़ कहिए या गोंड़, भारत का आदिनिवासी था और राम-रावण-युद्ध वस्तुतः आर्य और आदिवासी युद्ध था, जिसमें आर्यों की विजय हुई और जिन दूसरे उरॉंव, शबर इत्यादि आदिनिवासियों ने अपने ही देशबंधुओं के विरुद्ध विजातीय आर्य रामचन्द्र की युद्ध में सहायता की, उन्हें आर्य कवियों ने बन्दर और भालू की उपाधि प्रदान करके उनकी आर्य-भक्ति की सराहना की। उन ‘जयचन्दों’ के लिए यही उपाधि उपयुक्त भी थी।” (वही, पृष्ठ 45)

नौवें अध्याय में जिज्ञासु ने ‘रावण की महानता और पांडित्य’ का वर्णन किया है। वे लिखते हैं कि रावण के मरने पर वाल्मीकि ने राम के मुख से उसे ‘महात्मा’ कहला दिया– “महात्मा बलसम्पतो रावणो लोक रावणः।” इससे रावण के संत-स्वरूप को समझा जा सकता है। जिज्ञासु के अनुसार, रावण के पांडित्य और उसकी महानता की दो बातें लोक-प्रसिद्ध हैं– “एक यह कि रावण अपने समय का महान ज्योतिषविद् भी था। राजा दशरथ द्वारा रामचन्द्र की जन्मकुंडली बनवाने के लिए वह बुलाया गया था और उसने जो भविष्य-फल कहा, ठीक वही बातें राम के जीवन में संघटित हुईं। दूसरी यह कि सेतु बॉंधने के पूर्व जब शिल्पी नल-नील के अनुरोध से श्रीरामचन्द्रजी शिवलिंग की श्रीविधि स्थापना के लिए प्रस्तुत हुए, तो प्रतिष्ठा के लिए तत्कालीन महान शैवाचार्य रावण को बुलाया गया। रावण आया और उसने राम से पूछा– ‘कौन स्थापना करेगा?’ राम ने कहा– ‘दशरथ-पुत्र राम।’ रावण ने पूछा– ‘तुम सपत्नीक हो या विपत्नीक?’ और सपत्नीक कहने पर रावण ने कहा– ‘अपनी पत्नी को वामॉंग में बैठाओ।’ राम ने कहा– ‘वह तो तुम्हारे यहॉं कैद है। उसी को छुड़ाने के लिए यह आयोजन हो रहा है।’ रावण ने कहा– ‘ओह ! सीता तुम्हारी ही पत्नी है। अच्छा, शिवपूजा के लिए उसे मैं बुलवाए देता हूॅं।’ यह कहकर वह लंका से सीता को ले आया, और राम के वामांग में बिठाकर विधिवत शिवार्चना करा दिया और सीता को पुनः अपने साथ लंका वापस ले गया।” (वही, पृष्ठ 46)

जिज्ञासु के इस मत पर यदि बुद्धिवादी दृष्टि से विचार किया जाए, तो दो बड़ी आपत्तियॉं दिमाग में उभरती हैं। पहली यह कि अगर रावण ज्योतिष का ज्ञाता था, और उसने राम के बारे में जो भविष्य-फल कहा, ठीक वही सब बातें राम के जीवन में घटित हुईं, तो फिर रावण बौद्ध नहीं हो सकता, जिसका उल्लेख ‘लंकावतार-सूत्र’ में मिलता है, क्योंकि बौद्ध धर्म भाग्यवादी नहीं है। अगर रावण ज्योतिषी था, तो उसे ब्राह्मण होना चाहिए। और चूॅंकि ब्राह्मण अबध्य है, इसलिए उसका वध नहीं किया जा सकता। दूसरी आपत्ति यह है कि जब रावण शैवाचार्य के रूप में राम के समक्ष उपस्थित हुआ, और यह मालूम था कि वह सीता का अपहरणकर्ता है, तो राम ने उसे वहीं क्यों नहीं मार दिया? एक अपहरणकर्ता से पूजा-विधान क्यों कराया गया? यही नहीं, जब रावण पूजा-विधन में राम के साथ बैठाने के लिए सीता को लंका से वापस लेकर आया, तो उसी समय सीता को बलपूर्वक प्राप्त क्यों नहीं कर लिया गया? और सबसे अहम प्रश्न यह कि पूजा सम्पन्न होने के बाद सीता पुनः रावण के साथ वापस क्यों चली गई? वह रावण के साथ वापस जाने से इन्कार कर सकती थी। आगे फिर कोई भी लड़ाई रावण के साथ नहीं होती, और न इतना बड़ा नरसंहार होता। इससे तो यही पता चलता है कि मामला कुछ और ही था। 

आगे, जिज्ञासु ने लिखा है कि रावण वेदों का ज्ञाता और भाष्यकार था। उनके अनुसार, “रावण का वेद-भाष्य तो अप्राप्त है, केवल उसका जिक्र अन्य भाष्यों में है, जिससे अनुमान होता है कि परवर्ती भाष्यकारों ने रावण-भाष्य से सहारा लेकर अपने भाष्य रचे और फिर मूल भाष्य को नष्ट करा दिया, ताकि साहित्य-चोरी पकड़ी न जाए।” उनके मतानुसार रावण को कृष्ण-यजुर्वेद का मंत्र-सृष्टा भी बताया जाता है, जिसमें 18 हजार मंत्र हैं। वे यह भी लिखते हैं कि वेदों का सस्वर पाठ करने की प्रणाली का आविष्कार रावण ने ही किया था। “रावण जब सीता के समीप जाता, तो वेद-मंत्रों का सस्वर संगायन करता हुआ आता था।” (वही, पृष्ठ 46-47) 

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इस मत के अनुसार यदि रावण वेद-समर्थक और वेदों का भाष्यकार था, तो फिर वह वेद-विरोधी और ब्राह्मण-द्रोही कैसे हो सकता है? कोई वेद-समर्थक भी हो और वेद-विरोधी भी हो, दोनों बातें एक साथ कैसे हो सकतीं हैं? जो रावण रामायण और रामचरितमानस की कथाओं में वेदों और ब्राह्मणों का विरोधी है, वह कभी भी वेद-समर्थक नहीं हो सकता। फिर सवाल यह भी है कि जो रामकथा मिस्र के रामसेस द्वितीय के जीवन की नकल बताई जा रही है, वहॉं रावण भी वास्तविक चरित्र कैसे हो सकता है? यह भी कैसे हो सकता है, जैसा कि जिज्ञासु ने लिखा है कि संस्कृत साहित्य में ‘शितांडव-स्तोत्र’ और ‘उड्डीस-तंत्र’ ग्रन्थों के रचयिता स्वयं रावण हैं, और रावण तंत्र-शास्त्र का भी पंडित था। (वही, पृष्ठ 47)

जिज्ञासु ने अपनी पुस्तक के अन्त में दो लेख परिशिष्ट रूप में दिए हैं। पहले लेख में इस प्रश्न पर विचार किया गया है कि ‘क्या सीता रावण की पुत्री थी?’ यह लेख ‘प्रकाश रामायण’ पर आधारित है। जिज्ञासु लिखते हैं, “‘रावण और उसकी लंका’ पुस्तक के दो संस्करण निकल जाने के बाद लखनऊ के दैनिक ‘नवजीवन’ के साप्ताहिक परिशिष्ट अंक (14 अक्टूबर 1962) में, एक लेख प्रकाशित हुआ, जिसमें कश्मीरी ‘प्रकाश रामायण’ का हवाला देकर लेखक ने बताया कि सीता रावण की पुत्री थी।” इस पर जिज्ञासु की टिप्पणी है– “जितनी रामायणें उतने मेल की राम-कथा। जैन-रामायण के अनुसार सीता जैन-श्राविका है और रावण जैन-यती के रूप में पंचवटी गया था। सीता ने उसकी सादर अभ्यर्थना की थी। बौद्ध-जातकों में दशरथ-जातक के अनुसार सीता राम की बहिन थी। ये सब विविधताएं इस बात की पुष्टि करती हैं कि सारी राम-कथा वस्तुतः कवियों की कल्पना है, और इस ‘माइथालोजी’ का मूल उद्गम मिस्र देश के रामसेस द्वितीय की कहानी ही है।” (वही, पृष्ठ 49)

परिशिष्ट का दूसरा लेख रावण के अहिंसा धर्मी बौद्ध होने के संबंध में है। इसका आधार महायानी बौद्ध धर्म का ग्रन्थ ‘लंकावतार-सूत्र’ है, जिसमें कहा जाता है कि बुद्ध द्वारा रावण को उपदेश दिया गया है। जिज्ञासु के अनुसार इस ग्रन्थ में दस परिवर्त हैं। पहले परिवर्त में लंका के ‘राक्षसाध्पि’ रावण का बुद्ध से संभाषण है। दूसरे परिवर्त में महामति बोधिसत्व बुद्ध से एक सौ प्रश्न पूछता है, जो सभी धर्म के मूल सिद्धांन्त से संबंधित हैं। तीसरे परिवर्त में बुद्ध के असंख्य नामों का उल्लेख किया है, जिनमें राम, व्यास, इन्द्र, वरुण नाम भी शामिल हैं। इसके बाद सातवें परिवर्त तक विज्ञानवाद के सूक्ष्म सिद्धांतों की चर्चा है। आठवें परिवर्त में हिंसा और मांस-भक्षण का निषेध है। नौवें परिवर्त में अनेक धरणियों का वर्णन है। और अन्तिम दसवें परिवर्त में 884 श्लोकों में विज्ञानवाद के साथ-साथ यह भी बताया गया है कि बुद्ध के निर्वाण के एक सौ वर्ष बाद व्यास, कौरव, पांडव, राम और मौर्य (चन्द्र गुप्त) होंगे और उनके नन्द गुप्त राज्य करेंगे, और फिर उसके बाद म्लेच्छों का राज्य होगा। एक अन्य स्थल पर पाणिनी, वाल्मीकि और कौटिल्य आदि ऋषियों के बारे में भी कहा गया है। (वही, पृष्ठ 55-56)

‘लंकावतार-सूत्र’ के दसवें परिवर्त के आधर पर जिज्ञासु ठीक ही कहते हैं कि इससे यही निष्कर्ष निकलता है कि रामायण, महाभारत, गीता, राम और कौरव-पांडव आदि का आविष्कार बुद्ध के बाद हुआ। वे आगे कहते हैं कि अगर कोई ब्राह्मण विद्वान यह कहे कि ‘लंकावतार-सूत्र’ झूठा है, या उसका दसवॉं परिवर्त आधुनिक है, तो वह वाल्मीकि रामायण के अयोध्या कांड (सर्ग 109, श्लोक 34) में रामचन्द्र द्वारा जाबालि को कहे गए इन वचनों से अपना अज्ञान दूर कर सकता है, जिसमें बुद्ध और नास्तिकों को चोर कहा गया है। इससे यह बात भी साफ हो जाती है कि रामायण की रचना बौद्धधर्म का प्रचार हो जाने के बाद लिखी गई। रामायण के ‘किष्किंधा’ कांड में ‘यवनों का देश’ और ‘शकों का नगर’ का भी उल्लेख किया गया है, इससे पता चलता है कि रामायण यवनों और शकों के भारत में आने के बाद ही लिखी गई। (वही, पृष्ठ 55)

लंकावतार-सूत्र से दो निष्कर्ष और भी निकाले जा सकते हैं– एक यह कि रावण काल्पनिक पात्र नहीं है, बल्कि वह बुद्ध का समकालीन था, और रामायण की रचना के समय एक प्रभावशाली बौद्ध -स्तम्भ रहा होगा; और दूसरा यह कि जब लंकावतार-सूत्र में वाल्मीकि, व्यास और पाणिनी का उल्लेख मिलता है, तो यह क्यों नहीं हो सकता कि उसकी रचना भी वाल्मीकि, व्यास और पाणिनी के बाद हुई हो। 

समग्रतः जिज्ञासु की पुस्तक ‘रावण और उसकी लंका’ मिथकों और इतिहास के बीच कई विचारोत्तेजक सवाल उठाती है, और यह विचार करने के लिए बाध्य करती है कि राम-रावण-कथा की कल्पना बुद्ध के धर्म के प्रति घृणा की स्थापना करने और बौद्धों के बढ़ते प्रभाव से ब्राह्मणवाद के ढहते किले को बचाने के लिए की गई थी। रामायण के अनुसार राम ब्राह्मण-साम्राज्य के पुनरुद्धारक हैं।

(संपादन : नवल/अनिल)


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कंवल भारती

कंवल भारती (जन्म: फरवरी, 1953) प्रगतिशील आम्बेडकरवादी चिंतक आज के सर्वाधिक चर्चित व सक्रिय लेखकों में से एक हैं। ‘दलित साहित्य की अवधारणा’ ‘स्वामी अछूतानंद हरिहर संचयिता’ आदि उनकी प्रमुख पुस्तकें हैं। उन्हें 1996 में डॉ. आंबेडकर राष्ट्रीय पुरस्कार तथा 2001 में भीमरत्न पुरस्कार प्राप्त हुआ था।

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