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बहस-तलब : भारत काे अतीतोन्मुखी बनाने के निहितार्थ

वर्तमान राजनीतिक हालात को देखें तो लगता है गोया इस देश को ऋषि-मुनियों वाला भारत दुबारा बनना है, जहां शूद्र ब्राह्मणों की सेवा करें, वैश्य धन कमायें और क्षत्रिय हथियार चलाएं। आरएसएस के लोग ऐसे ही भारत को विश्व गुरु बना देना चाहते हैं। बता रहे हैं हिमांशु कुमार

कोई भी देश अगर खुद को बेहतर बनाने की कोशिश नहीं करता तब क्या होता है? तब वह देश बाकी की दुनिया से पिछड़ जाता है। लेकिन अगर कोई देश इतिहास का सफर तय करते हुए जहां तक पहुंचा हो वहाँ से भी पीछे की तरफ चल पड़े तो क्या होगा? भारत आज ऐसा ही देश बन गया है, जो वहां से भी पीछे की तरफ जा रहा है, जहां से अब तक आया था। आज का भारत रामायण काल में जीना चाहता है। यह उन पुराने संघर्षों को आज निबटाना चाहता है, जिनमें इसके मुताबिक़ इसकी हार हुई। यह देश महाराणा प्रताप का बदला अकबर के मज़हब के लोगों से आज चुकाना चाहता है। जबकि यह सभी जानते हैं कि भारत में 80 फीसदी मुसलमान वे हैं जो पूर्व में दलित और शूद्र थे और आज के अकबर वही हैं, जो अखलाक और पहलू खान के रूप में मारे जा रहे हैं।

वर्तमान राजनीतिक हालात को देखें तो लगता है गोया इस देश को ऋषि-मुनियों वाला भारत दुबारा बनना है, जहां शूद्र ब्राह्मणों की सेवा करें, वैश्य धन कमायें और क्षत्रिय हथियार चलाएं। आरएसएस के लोग ऐसे ही भारत को विश्व गुरु बना देना चाहते हैं। हालांकि इतिहास बताता है कि अतीत में भी यह किसी का गुरु नहीं था। आरएसएस का गठन 27 सितंबर, 1925 को हुआ था। तबसे लेकर अब तक भारतीयों को मूर्ख बनाने का एक ज़ोरदार अभियान चलाया जा रहा है, जिसका परिणाम अब हमारे सामने है कि अब आम आदमी भी काल्पनिक अतीत के लिए अपने वर्तमान और अपने भविष्य को बर्बाद करने के लिए तैयार है। 

सवाल यह है कि जनता के वर्तमान और भविष्य को बर्बाद करके फायदा किसका होना है और कोई पार्टी ऐसा क्यों करना चाहती है? 

जाहिर तौर पर इस सवाल का जवाब जटिल नहीं है। लेकिन महत्वपूर्ण सवाल यह है कि जनता अपने वर्तमान और भविष्य को लेकर सजग क्यों नहीं है? और मौजूदा हुकूमत बार-बार वर्तमान सुधारने की बात कहती है तो सवाल यह है कि वर्तमान को सुधारने के निहितार्थ क्या हैं?

गत 26 जनवरी, 2022 को गणतंत्र दिवस के मौके पर उत्तर प्रदेश राज्य सरकार द्वारा प्रस्तुत झांकी

इन्हीं सवालों पर विचार करते हैं। जिस तरह से देश के संसाधनों पर अल्पजनों का कब्जा है। ऐसे में वर्तमान के सुधारने का मतलब यह होना चाहिए कि समाज के अलग-अलग वर्ग के लोगों को आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक भागीदारी मिले। उदाहरण के लिए वर्तमान तभी सुधरेगा जब गुणवत्ता युक्त पढ़ाई सस्ती होगी, जो कि आज एक पूर्णरूपेण व्यवसाय बनता जा रहा है। ऐसे में यदि पढ़ाई सस्ती हुई तो पूंजीपतियों को नुकसान होगा और हुक्मरानों को उनसे मिलनेवाला चंदा प्राप्त नहीं होगा। 

दूसरा उदाहरण यह कि वर्तमान तभी सुधरेगा अगर मजदूरों की हालत सुधरेगी। अब उनकी हालत सुधरने का मतलब उनकी मजदूरी का बढ़ना और उन्हें मिलनेवाली सुविधाएं यथा बोनस व काम के निर्धारित घंटे से अधिक काम करने की मजबूरी से छुटकारा है। लेकिन ऐसा होने से पूंजीपतियों का मुनाफा कम हो जाएगा। इसी तरह किसान की हालत सुधरेगी तो कृषि क्षेत्र में पूंजी लगाने वाले कारपोरेट जगत को नुकसान होगा। 

जबकि अगर वर्तमान सुधरेगा तो समाज भी आगे बढ़ेगा। मसलन, सामाजिक सुधार होंगे तो जाति पर आधारित ऊंच-नीच की व्यवस्था खत्म होगी। लेकिन जो वर्ग अपनी जाति की वजह से ही सत्ता, अर्थव्यवस्था और राजनीति पर कब्ज़ा जमाए बैठा है, वह ऐसा क्यों होने देगा? वह वर्ग जाति का अन्याय झेलने वाले लोगों से कहता है तुम लोग सवर्ण वर्चस्व के खिलाफ मत लड़ो, तुम लोग मुसलमानों से लड़ो। उन्होनें हमारे उपर बड़े अत्याचार किये हैं। जबकि काल्पनिक अत्याचारों की पूरी कहानियां आरएसएस ने पिछले सौ सालों में बनाई और फैलाई है। 

इसी तरह आदिवासी इलाकों में जो खनिज हैं, उनके अंधाधुंध दोहन के खिलाफ आवाज़ उठाने वाले सामाजिक कार्यकर्ताओं को जेलों में डाल दिया गया है।अब ऐसे में वर्तमान के सुधारने का मतलब यह कि जनता इस दौलत की लूट को जनता बंद करे। लेकिन इससे नुकसान उन पूंजीपतियों का होगा, जिन्होनें राजनीतिक दलों को चुनाव लड़ने के लिए पैसा दिया था। इसलिए आदिवासियों को भी साम्प्रदायिकता के ज़हर में डुबोया जा रहा है। ताकि वे लोग अपने जल, जंगल और ज़मीन की लूट को रोकने के लिए कोई काम ना करें, बल्कि ईसाईयों और मुसलमानों को दुश्मन समझें और उनके खिलाफ लड़ने में अपनी ताकत और दिमाग खपायें। 

इस सब का नतीजा आज दिखाई देने लगा है। आज देश के लिए काम करने वाले सामाजिक कार्यकर्ता, जिनमें अधिकांश दलित और आदिवासी हैं, बरसों से जेलों में बिना किसी सबूत के पड़े हुए हैं। 

मसलन, पत्रकार सिद्दीक़ कप्पन, जो यूपी के हाथरस एक दलित लड़की के साथ सवर्ण लोगों द्वारा किये गये बलात्कार की रिपोर्टिंग के लिए जा रहे थे, उन्हें फ़र्जी इल्जामों में आज तक जेल में डाला हुआ है। सुप्रीम कोर्ट तक उन्हें ज़मानत नहीं दे रहा है। 

हम पाते हैं कि इस देश में दलितों, आदिवासियों, औरतों को समुचित न्याय नहीं मिला। जबकि संविधान निर्माताओं ने सोचा था कि अब देश मर्दवाद, सवर्ण दबंगई और अमीरों के वर्चस्व से नहीं, बल्कि कानून से चलेगा। लेकिन हम आज़ादी के बाद से जितनी दूर तक आये थे, अब हम पीछे की तरफ का सफर करते हुए जड़ता, सामाजिक सड़न युक्त उन्हीं बंद गलियों में पहुंच गए हैं, जहां से हम चले थे। आज हुकूमत खास तबके के लोगों के हितों के लिए काम कर रही है, जिसका आधार मनुवाद है। 

(संपादन : नवल/अनिल)


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लेखक के बारे में

हिमांशु कुमार

हिमांशु कुमार प्रसिद्ध मानवाधिकार कार्यकर्ता है। वे लंबे समय तक छत्तीसगढ़ में आदिवासियों के जल जंगल जमीन के मुद्दे पर काम करते रहे हैं। उनकी प्रकाशित कृतियों में आदिवासियों के मुद्दे पर लिखी गई पुस्तक ‘विकास आदिवासी और हिंसा’ शामिल है।

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