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‘झारखंड के हिस्से में अब भी क्यों है कोख में अमीरी और गोद में गरीबी?’

झारखंड बनने के बाद भी ये कारपोरेट जगत, पूंजीवादी ताकतें, और कुलीन वर्ग के लोग आज भी आदिवासियों को लूट रहे हैं। आदिवासी महिला सब्जी लेकर बाजार में आती हैं तो उसकी टोकड़ी ये पहले ही उतार लेते हैं और उसे थोड़े से पैसे दे दिया करते हैं। फिर उसे ऊंची कीमत पर खुद बेचते हैं। तो झारखंड में अभी भी किनाराम और बेचाराम का बोलबाला है। पढ़ें, वासवी किड़ो के साक्षात्कार का पहला भाग

[झारखंड महिला आयोग की पूर्व सदस्य वासवी किड़ो सुपरिचित आदिवासी साहित्यकार व सामाजिक कार्यकर्ता हैं। इसके अलावा वह पत्रकार के रूप में ‘टाइम्स ऑफ इंडिया’ व ‘जनसत्ता’ आदि से संबद्ध रही हैं। इन्होंने झारखंड में अनेक आंदोलनों में हिस्सा लिया और कइयों का नेतृत्व भी किया है। ज्योति पासवान ने उनसे यह विस्तृत बातचीत की है। पढ़ें, इस बातचीत का पहला अंश]

कृपया अपने बारे में विस्तार से बतायें कि आपका जन्म कब, कहां और किस परिवेश में हुआ? आदिवासी साहित्य व समाज को लेकर आपने कबसे काम करना प्रारंभ किया?

आदिवासी साहित्य निश्चित तौर पर साहित्य जगत के लिए बड़ी हलचल पैदा करने वाला एक महत्वपूर्ण अध्याय रहा है। शुरुआत में डॉ. रामदयाल मुंडा, रमणिका गुप्ता, महाश्वेता देवी और भी बहुत से लोग थे, जिनमें मैं भी एक थी। उस समय भी काफी लोग थे, जब साहित्य अकादमी में 2 जून 2002 में आदिवासी समस्याओं को लेकर पहला कार्यक्रम हुआ था, जिसका संचालन मैंने किया था और इसके तुरंत बाद ही दिल्ली में हमलोगों ने रामदयाल मुंडा के नेतृत्व में ऑल इंडिया ट्राइबल लिटरेरी फोरम का गठन किया। रमणिका जी का काफी सहयोग प्राप्त हुआ क्योंकि वह दिल्ली में ही रहती थीं और उनका आवास एक कार्यालय की तरह ही कार्य करता था। आदिवासी साहित्य को समृद्ध करने में इनलोगों ने काफी सहयोग दिया। उसके पहले पूरे भारत में या कह कि पूरी दुनिया में आदिवासी साहित्य का नामोनिशान नहीं था, ना ही उसकी कोई चर्चा थी और ना ही उसका कोई विमर्श था। अभी देखिये, 2002 से 2022 तक लगभग बीस साल हुआ। हमलोगों ने 2018 में ऑल इंडिया ट्राइबल लिटरेरी फोरम गठन की पंद्रहवीं वर्षगांठ मनाया था। इस साल भी 30 जून और 1 जुलाई को हम एक बड़े कार्यक्रम का आयोजन करने जा रहे हैं। यूनेस्को ने 2022 से 2032 के दशक को ‘अंतरराष्ट्रीय आदिवासी भाषा दशक’ की घोषणा की गई है, उसे मनाने की घोषणा के लिए हम इस कार्यक्रम का आयोजन कर रहे हैं। इस कार्यक्रम में आदिवासी साहित्य के विविध पहलुओं पर भी चर्चा की जाएगी, क्योंकि अगर यूनेस्को ने अगर 2022 से 2032 के दशक को ‘अंतरराष्ट्रीय आदिवासी भाषा दशक’ के रुप में घोषित किया है तो आदिवासी लेखकों, कवियों, बुद्धिजीवियों, उपन्यासकारों का यह दायित्व बनता है कि नये-नये कार्यक्रम का आयोजन कर भाषा-दशक को यादगार व सृजनपरक बनाएं। फिलहाल तो मैं इस कार्यक्रम की तैयारी में ही मैं लगी हुई हूं।

मेरे बारे में आप जो जानकारी चाहती हैं तो मैं आपको बताऊं कि मेरा जन्म रांची में ही हुआ है। रांची एक समय में तो गांव था और शहर के रुप में इसका विकास 1958-60 में हुआ जब हेवी इंजीनियरिंग कंपनी (एचईसी) की स्थापना हुई और कारखाना बना। तब इसका शहरीकरण और औद्योगिकीकरण बहुत तेजी से हुआ। 

हालांकि तब भी रांची एक छोटा शहर हुआ करता था जब मेरी पैदाइश हुई। मेरा जन्म 60 के दशक में हुआ था। मैं अति साधारण परिवेश में पैदा हुई थी। हम किराये के घर में रहते थे, जिसे बाबा (प्रफुल्ल कुमार) ने तीन बड़े भाईयों की पढ़ाई के लिए लिया था। उस किराये के घर में ही मैं पली-बढ़ी थी और वहीं पर मेरी शिक्षा-दीक्षा भी हुई। बाबा प्राइवेट बिजनस में कमाते थे और मेरी मां (गांगो उरांव) बिल्कुल अनपढ़ गृहणी थीं। बाबा तो कुछ पढ़े-लिखे थे, लेकिन कितना, यह पता नहीं, क्योंकि बाबा बहुत जल्दी गुजर गये थे। मैं जब सातवीं या आठवीं कक्षा में थी, तभी बाबा गुजर चुके थे। इसलिए बाबा के बारे में मुझे ज्यादा जानकारी नहीं मिल पायी, क्योंकि मेरी मां उरांव समुदाय से थी और बाबा दूसरे समुदाय के थे। बाबा के गुजर जाने के बाद हमारी परवरिश नानी घर में होने लगी और बाबा के बारे में हमें बताने वाला बाबा की तरफ का कोई व्यक्ति नहीं था। साथ ही, हम जिस किराये के घर में रहते थे, वहां भी हमारे परिवार के अलावा कोई नहीं था। किराये का वह घर अभी भी है। वहां मैंने अभी एक ऑफिस खोल रखा है, क्योंकि मैं वहां 40-45 साल रह चुकी थी। तो एक जुड़ाव सा हो जाता है। उस जगह को मैं छोड़ ही नहीं पाती। वैसे भी वह जगह रांची के हृदयस्थली से बस पांच-सात मिनट की पैदल दूरी पर ही है। मेरी जिंदगी एक कमरे में सिमटी थी। हालांकि यह स्थिति 1994 के बाद हुई थी। उससे पहले तो हमारे पास एक ही कमरा हुआ करता था, जिसमें हम खाना भी बनाया करते थे और उसी में सोना भी होता था और किसी गेस्ट के आने के बाद उसी कमरे में उनके साथ वक्त भी बिताया करते थे। वह मेरे जीवन का अहम समय था। मेरी मां के घर में ही मेरेरे सभी संस्कार हुए। जैसे मेरे सभी भाईयों की शादी वहीं से हुई। उनकी शादी भी उरांव समुदाय में हुईं। मेरी शादी अरेंज मैरेज हुई, लेकिन वह पहचान की शादी हुई और जिनसे मेरी शादी हुई, वे खड़ीहर समुदाय से हैं। 

तो, पिताजी के नहीं रहने से हमलोगों को बड़ी दिक्कत हुई। एक तो आजीविका का बड़ा सवाल था। जब पिताजी की मृत्यु हुई तो मेरे भाई भी बहुत बड़े नहीं थे। मेरे सबसे बड़े भाई की उम्र भी 16 या 17 साल ही रही होगी। और पिताजी एक छोटा कारोबार किया करते थे। उनका कोयले का बिजनेस था। लेकिन जब कोयला खादानों का राष्ट्रीयकरण हुआ, तब वह कारोबार भी बंद हो गया। इसके बाद बाबा ने मेन रोड पर एक खाने-पीने का होटल शुरु किया था। लेकिन भाई सब पढ़ते थे, इसलिए बाबा के कामों में वे हाथ नहीं बंटाया करते थे। लेकिन दो साल की लंबी बीमारी के बाद जब अचानक पिताजी की मृत्यु हुई, तब जो स्थिति सामने आयी, वह भयावह थी, क्योंकि आर्थिक संकट बहुत ज्यादा थी। तब मैंने मुहल्ले के छोटे बच्चों को ट्यूशन पढ़ाना शुरु किया। हिंदुस्तान लीवर के उत्पादों को घर-घर जाकर बेचने का भी काम करती थी। मैट्रिक के बाद एक सुधा सिन्हा नाम की महिला से मेरी मुलाकात हुई, जो ‘न्यू मैसेज’ नामक पत्रिका निकाला करती थीं। वह बगल में घर की लड़की, जिसके साथ मैं स्कूल जाया करती थी, उसके घर में मेम्बरशिप के लिए आयी हुई थीं। उनका ऑफिस हमारे मुहल्ले में ही था। उन्होंने अपने ऑफिस में हमें कुछ सीखने और सहयोग के लिए बुलाया। मुझे भी लगा कि कुछ करना है, कुछ बनना है, पिताजी हैं नहीं। उन्होंने शुरु में महिलाओं की स्थिति पर लेख लिखने के लिए दिया। फिर मैं वहां जाती थी और लिखा करती थी। बीच-बीच में वह मुझे विज्ञापन एकत्रित करने के लिए भी भेजने लगीं। फिर एक दिन अचानक ‘टाइम्स ऑफ इंडिया’ के नवीन सिन्हा जी ने रास्ते में मुझे रोका और पूछने लगे कि आप सुधा सिन्हा के लिए काम करती हैं क्या? मैंने हां कहा। फिर उन्होंने कहा कि हमारे यहां पटना से ‘टाइम्स ऑफ इंडिया’ का एक नया एडिशन शुरु हुआ है। तो आप क्या हमारे लिए काम करेंगीं? यह बात 1986 की है। मैंने उनसे कहा कि “मुझे तो कोई आइडिया नहीं है। अभी-अभी कॉलेज ज्वॉयन की हूं।” लेकिन दिसंबर, 1986 में मेरा इंटरव्यू हुआ और मुझे कैंपस रिपोर्टर के रुप में चुना गया। यहां मैं पार्ट टाइम काम करती थी। 

संयोग से जब पिताजी जीवित थे तो मेरा दाखिला एक अच्छे स्कूल में कराया गया था। हालांकि वह हिंदी माध्यम का स्कूल था, लेकिन वहां अच्छी शिक्षा मिली। मैंने वहीं से मैट्रिक किया। चूंकि स्कूल हिंदी मिडियम का था, इसलिए अंग्रेजी पर अच्छी पकड़ नहीं थी। लेकिन जब मैं महिला संगठनों और सामाजिक आंदोलनों से जुड़ी तब बहुत से सेमिनारों, गोष्ठियों और कार्यक्रमों में जाने के क्रम में मैंने अंग्रेजी सीख ली। आज से पंद्रह साल पहले मैं अंग्रेजी में बात नहीं कर पाती थी, पर अब इस भाषा पर मेरी अच्छी पकड़ बन गई है। मैं अंग्रेजी में लिखती भी हूं और बोलती भी हूं। स्कूल हिंदी माध्यम का था, इसलिए हिंदी बहुत अच्छे से पढ़ाया गया। इसका लाभ मुझे अखबार में काम करते समय मिला। जब 1990 में मैंने ‘जनसत्ता’ को ज्वॉयन किया, तब वहां संवाददाताओं काे प्रशिक्षण दिया जाता था कि आपको लिखना कैसे है, किस तरह की भाषा और शैली का प्रयोग करना है। जैसे किसी व्यक्ति की अगर हत्या हो गई, तो यह नहीं लिखना है कि किसी व्यक्ति की जघन्य हत्या हो गई, आपको लिखना है कि अमुक व्यक्ति की हत्या हो गई। जनसत्ता में लिखने से मेरी हिंदी और भी मजबूत हो गई। तो यह सब मेरे प्रारंभ के बारे में संक्षिप्त जानकारियां हैं। 

यह विचार कब आया कि साहित्य और समाज सेवा के क्षेत्र में आगे जाना है? क्या आपको किसी तरह के भेद-भाव का सामना करना पड़ा या फिर आपको लगा कि आप शोषण का शिकार हुईं? 

यह आपने सही पूछा। देखिए, जब पिताजी नहीं थे और मां तो अनपढ़ थी तो मेरे भाईयों के दिमाग में यह था कि कॉलेज तक इसे पढ़ा करके इसकी शादी कर देनी है ताकि वे अपनी जिम्मेदारी से मुक्त हो जाएं। तो 1988-89 में जब मैंने बी.ए. में दाखिला लिया तो वे विवाह के लिए लड़के लाने लगे। फिर मैंने उनसे कहा कि देखो, जब बाबा मरे तो हमें तो किसी ने नहीं देखा। मैं अपनी शिक्षा के लिए इधर-उधर काम करके खुद पैसे जमा करती थी। स्कॉलरशिप का सहारा लेकर मैंने अपनी पढ़ाई की है। यहां तक कि हमारे पीछे तरफ एक पंजाबी फैमिली रहती थी। उनके घर में कुछ समस्या थी। तो बड़े भाई ने कहा था कि देखो ! उनके घर जाकर रोटियां बना देना। मैं काफी दिनों तक शाम के समय उनके घर जाकर रोटियां बनाने गई। मुझे ठीक से याद तो नहीं है कि इसके पैसे कभी दिये गये थे या नहीं। अगर ऐसे करके मैंने अपनी पढ़ाई पूरी की है तो मुझे कुछ बनना है। और मैं तबतक सुधा सिन्हा के संपर्क में आ चुकी थी। यह जान चुकी थी कि महिलाओं के साथ काफी अत्याचार होते हैं। ऐसे में हमारे लिए कुछ बनना तो बहुत जरुरी था क्योंकि हमारे तो पिता भी नहीं थे। हालांकि मुझे सपोर्ट भी मिलता था। लोग मेरी भावनाओं के साथ खड़े भी होते थे। उसी समय 1986 में रांची में अनेक दहेज हत्याएं और बलात्कार की घटनाएं हुईं थीं। रांची वीमेंस कॉलेज में जियोलॉजी की एक प्रोफेसर थीं। उन्होंने पहल किया और महिलाओं व छात्राओं को गोलबंद किया कि इसके खिलाफ चुप नहीं रहना है। वे सड़क पर उतरीं। धीरे-धीरे उनके आंदोलन के साथ काफी लोग जुड़े। फिर उन्होंने ‘महिला उत्पीड़न विरोधी संघर्ष समिति’का गठन किया था। मैं ‘न्यू मैसेज’ की तरफ से उनसे रिपोर्ट लेने जाया करती थी कि यह समिति किन मुद्दों और विषयों पर काम कर रही है। जब मैं इन रिपोर्टों को लिखने लगी तो मेरे सामने महिलाओं के अनेक मुद्दे आए। और 1990 के आसपास काँटाटोली बोलकर (नामक) रांची में एक जगह है। वहां पर तीन आदिवासी लड़कियों के साथ गैंगरेप हुआ था। यह मामला काफी चर्चित भी हुआ। रांची बंद कराया गया। और आंदोलन भी हुए। मैंने भी इन मुद्दों पर खूब लिखा। निवेदिता दत्ता नामक एक महिला को दहेज के कारण प्रताड़ित करके मार दिया गया। और एक रीना अरोड़ा नामक एक पंजाबी महिला थी, जिसे दहेज के लिए जलाकर मार दिया गया था। निवेदिता दत्ता का पति मेकॉन (मेटर्लाजिकल इंजीनियरिंग कंसलटेंट लिमिटेड)) में इंजीनियर था। इन दोनों मामलों में ‘महिला उत्पीड़न संघर्ष समिति’ ने पहल किया तो मेकॉन के दफ्तर के सामने ही हमने विरोध प्रदर्शन किया। अच्छा, इस समिति की बैठक प्रत्येक शनिवार को होती थी और नियम यह था कि हर सदस्य के घर में यह बैठक होगी। तो मैंने भी अपने बारे में उन्हें बताया कि मेरे घर में मुझे भी शादी करने के लिए टॉर्चर किया जा रहा है, पढ़ने से रोका जा रहा है। यहां तक कि जब मैं “न्यू मैसेज” का काम खत्म करके शाम को 6-7 बजे वापस जाती हूं तो मेरे भाई के साथ मेरी मां भी मुझे गालियां देती है। अखबार में मैं ऐसा क्या लिखती हूं कि मुझे दिनभर इधर-उधर घूमना पड़ता है। उन्हें लगता है कि मैं मर्दों के साथ घूमती हूं। इसलिए आप मेरे घर चलिए ताकि उन्हें पता चले कि मैं कोई गलत काम नहीं कर रही हूं। हालांकि सुधा सिन्हा मेरे घर तीन-चार बार आ चुकी थीं। फिर भी घरवाले उनकी बातों को याद नहीं रखा करते थे।

वासवी किड़ो, आदिवासी सामाजिक कार्यकर्ता व साहित्यकार

तो बस उसी समय से यह विश्वास बढ़ता गया क्योंकि मैं जिस जमाने में घर से निकली, उस जमाने में औरतों के घर से निकलने में काफी पाबंदियां थीं। मेरे घर में ही इतनी पाबंदियां थीं। तो उस समय महिला उत्पीड़न संघर्ष समिति, न्यू मैसेज, झारखंड आंदोलन इसके अलावा विस्थापन को लेकर कई आदिवासी आंदोलन चल रहे थे। इन सब से मेरा जुड़ाव रिपोर्टिंग के सिलसिले में हुआ। इन सबके कारण मैं सामाजिक मुद्दों से काफी गहराई से जुड़ती चली गई। फिर मुझे लगा इन मुद्दों पर काम करने में संभावनाएं हैं और इसमें बहुत काम किया जा सकता है। भारत के महिला मुक्ति आंदोलन में हमारा जुड़ाव 1993 में हुआ। 1995 में बीजिंग में ‘विश्व महिला सम्मेलन’ हुआ, उस समय तक मैं देश के सारे बड़े महिला समिति से मैं जुड़ चुकी थी। विस्थापन के खिलाफ ‘कोयलकारो जल विद्युत परियोजना’ में मेरी भागीदारी रही। हालांकि मैं बतौर रिपोर्टर ही जाती थी। लेकिन आंदोलन के नेतृत्वकर्ताओं के साथ मेरा गहरा तालमेल था। तो उन संगठनों की रणनीति बनाने में, सूचनाओं का अदान-प्रदान करने में, रिपोर्टिंग करने के दौरान मुझे यह समझ में आ गया कि आदिवासी समाज के मुद्दे क्या हैं, आदिवासी महिलाओं का शोषण, इसके अलावा अन्य समाजों की महिलाओं के साथ हिंसा आदि सभी मुद्दों पर गहरी समझ बन चुकी थी। आदिवासी हों या गैर-आदिवासी महिलाएं, सभी के साथ हिंसा के सवाल जुड़े हैं। बस हिंसा का स्वरुप अलग-अलग है। इसके स्वरुप समय-समय पर बदलते जा रहे हैं। जैसे अभी डिजिटल युग है, तो हिंसा का स्वरुप बदल गया है। वर्ष 1998 में मैंने ‘नेतरहाट फायरिंग रेंज हटाओ’ आंदोलन में बतौर नेतृत्वकर्ता हिस्सेदारी की। अब तो 28 साल हो चुके हैं और अभी भी यह आंदोलन चल रहा है। हाल ही में 21 अप्रैल से 25 अप्रैल, 2022 तक पदयात्रा का कार्यक्रम था। तो इसमें हुआ यह भाजपा कि जो पूर्ववर्ती सरकार थी, उसने हम तीन-चार लोगों के उपर मुकदमा दर्ज कर दिया। फिर 2015 में भी ‘कोर कैपिटल’ आंदोलन का नेतृत्व भी मैंने किया। इस मामले में भी मेरे उपर मुकदमा दर्ज किया गया। यह दोनों मुकदमे झूठे थे। जबकि नेतरहाट में हमलोग जनजुटान के लिए गये थे, जो हर साल 22 और 23 मार्च तक आयोजित की जाती है। और दूसरे मामले में तो हम अपने खेत मे ‘आषाढ़ी पूजा’ के लिए गये थे। लेकिन हम पर भड़काउ भाषण लगाने का आरोप लगाया गया और फर्जी मुकदमा दर्ज कर दिया गया। तो इस तरह सामाजिक सरोकार बनता चला गया और मैं समाज सेवा के क्षेत्र में जुड़ती चली गयी।

यह भी पढ़ें – अब आदिवासी अपने शत्रुओं की पहचान कर सकते हैं : शिबू सोरेन

और यह आदिवासी साहित्य का जो स्वरुप है, यह तो बड़ा अनोखा है। वर्ष 2002 में साहित्य अकादमी में ही इसकी शुरुआत की गई। इसमें चर्चाएं हुईं और आदिवासी लेखक अपने मुद्दों को लगातार उठाने लगे। अनेक साहित्यारों की कृतियों को अपने स्तर पर प्रकाशित भी कराया। मैं चाहती थी कि यह साहित्य जो आज तक दुनिया के सामने नहीं आया है , तो इसे लोगों के बीच लाया जाना चाहिए। क्योंकि आदिवासी साहित्यकार अपनी भाषा में ही लिखा करते थे। हमलोगों ने 2002 से अबतक 40 आदिवासी भाषाओं के साहित्य को संकलित किया है। अभी मैंने ‘ऑल इंडिया लिटरेरी फ़ोरम’ का रजिस्ट्रेशन भी करा लिया है। और आगामी 30 जून और 1 जुलाई को एक कार्यक्रम भी हम करने जा रहे हैं। 

आप एक सक्रिय राजनीतिक कार्यकर्ता भी रही हैं और झारखंड आंदोलन में भी सक्रिय रहीं। कृपया उस दौर के अपने अनुभव बताएं। 

देखिये, जब मैं कॉलेज में पढ़ रही थी, उन्हीं दिनों अखबार में भी लिख रही थी। आंदोलनों से भी जुड़ी हुई थी। तो मैं सब कुछ समझ तो रही ही थी। उस समय भावनाएं भी बहुत कोमल थीं। बहुत सी चीजें समझ में आती थीं और बहुत सी नहीं भी। लेकिन लगता था कि अलग झारखंड राज्य बनाए जाने का जो आंदोलन हो रहा है, वह शोषण और अत्याचार, महाजनों और सूदखोरों के खिलाफ एक बड़ी लड़ाई है, जिसे ‘झारखंड मुक्ति मोर्चा’ के बैनर तले एक राजनीतिक रुप दिया गया। इन आंदोलनों से यही बातें निकलकर आती थीं कि झारखंड जो बिहार का ही एक हिस्सा है, जिसे दक्षिण बिहार के नाम से जाना जाता था, जहां अपार खनिज-संपदा, कोयला आदि भंडार हैं। लेकिन वही झारखंड इतनी घोर विपन्नता और गरीबी में डूबा है। यह ‘कोख में अमीरी और गोद में गरीबी’ वाली स्थिति क्यों है? बिहार सरकार को 75 फीसदी राजस्व का आवंटन होता था, जबकि झारखंड के विकास के लिए मात्र 25 फीसदी। जबकि झारखंड से ही सारा कोयला या अन्य कीमती खनिज-संपदा जाती थीं। फिर भी यह दोहरा व्यवहार क्यों? गांवों में पीने के लिए पानी नहीं है, स्कूल, सड़कें, अस्पताल व बिजली जो विकास के सामान्य पैरामीटर हैं, उनका भी बड़ा घनघोर अभाव रहा है और आदिवासी शुरु से ही शोषण के चक्की में पिसता रहा है। जैसे वह महाजनों से अगर 100 रूपए उधार लेता था तो जिंदगी भर उसका सूद चुकाता रहता था, पर उसे महाजन यही कहते थे कि अभी भी तुम्हारे सूद के रुपए देने बाकी हैं। वर्ष 1760 से महाजनों के खिलाफ जो आंदोलन शुरू हुआ वह शिबू सोरेन तक चला। इतने लंबे इतिहास को भी जब मैंने देखा तो वह इन्हीं महाजनों और सूदखोरों के खिलाफ, बेगारी, शोषण और अत्याचार के खिलाफ ही आंदोलन था। आपको दिशोम गुरू शिबू सोरेन का इतिहास बता रही हूं। शिबू सोरेन के पिता सोबरन मांझी के पास एक आदिवासी महिला अपने गोद में छोटे बच्चे को लेकर गयी और कहा कि विष्णु साव उसके खेत से सब धान उठाकर ले जा रहा है। जबकि उसने अपने सारे सूद चुकता कर दिये हैं। फिर सोबरन मांझी ने वहां जाकर विष्णु साव को बहुत मारा और कहा कि खबरदार, यहां से धान नहीं ले जा सकते हो। इसके बाद यह खबर पूरे इलाके में फैल गई कि सोबरन मांझी ने एक महाजन को खूब पीटा है। यहां से संथाल एकजुट हो गए। उन्हें लगा कि अब महाजनों के खिलाफ एक गोलबंदी होगी और इसी गोलबंदी में महाजनों और सूदखोरों के खिलाफ बिगुल फूंका। इसी क्रम में सोबरन मांझी की महाजनों के द्वारा हत्या करवा दी गयी, जिसे गुरुजी (शिबू सोरेन) ने अपनी आंखों से देखा और गुरुजी के हृदय में जो ज्वाला जली तो उन महाजनों के खिलाफ उन्होंने एक बिगुल फूंका और उसी का परिणाम है कि हम अलग झारखंड राज्य में सुख-चैन से जी रहे हैं। और भी लोग हैं, जिन्होंने गुरुजी का सहयोग किया।

लेकिन अनुभव के बारे में अगर मैं बात करूं तो आज भी अनुभव वही हैं, जो पहले थे। देखिये संथाल विद्रोह में क्या हुआ था। किनाराम और बेचाराम दो बड़े व्यापारी थे। किनाराम के पास एक बड़ा बोरा था और बेचाराम के पास एक छोटी बोरी था। वे संथालों के पास धान के बदले नमक आदि सामान बेचते थे। वे जब सामान देते तो छोटी बोरीसे निकालते और और बदले धान बड़े बोरे में रखते थे। संथालों को यह लगा कि हमारी चीजों को लेते समय तो ये अपना बड़ा बोरा निकालते हैं, लेकिन जब हमें समान देते हैं तो छोटी बोरी का उपयोग करते हैं। तो लूटने की जो नीयत है, वह आज भी कायम है। संथाल विद्रोह के ये कैरेक्टर बेचाराम और किनाराम आज भी जिंदा हैं। देश की बड़ी-बड़ी कंपनियां आदिवासियों की जमीनें ले लेती हैं पर उसके एवज में उन्हें बहुत थोड़ा देती हैं। झारखंड भारत के संविधान के पांचवीं अनुसूची का इलाका है। पाँचवी अनुसूची के इलाके में आदिवासी समाज अपनी मान्यताओं, प्रथाओं, रीति-रिवाजों को संचालित करने के अधिकारी हैं। लेकिन आज इस अनुसूची के प्रावधानों का उलंघन किया जा रहा है। उनके सारे संसाधन, वन-संपदा, खदान-खनिज को आप लूट रहे हैं और बदले में आप क्या दे रहे हैं? परिवार के एक सदस्य को नौकरी देंगे तो अगर चार भाई है तो अन्य तीन कहां जाएंगे? उनके माता-पिता का भरण-पोषण कैसे होगा? तो झारखंड बनने के बाद भी ये कारर्पोरेट जगत, पूंजीवादी ताकतें, और कुलीन वर्ग के लोग आज भी आदिवासियों को लूट रहे हैं। आदिवासी महिला सब्जी लेकर बाजार में आती हैं तो उसकी टोकड़ी ये पहले ही उतार लेते हैं और उसे थोड़े से पैसे दे दिया करते हैं। फिर उसे ऊंची कीमत पर खुद बेचते हैं। तो झारखंड में अभी भी किनाराम और बेचाराम का बोलबाला है। ये मेरे गहरे अनुभव हैं। यही कारण है कि आदिवासियों की अर्थव्यवस्था बढ़ नहीं पा रही है। आदिवासी व्यापारी नहीं बन पा रहे हैं, क्योंकि 10 एकड़ जमीन में वह आदिवासी पुश्तों से खा रहा है। लेकिन उस दस एकड़ जमीन के बदले में अगर आप केवल 10 लाख रुपए और एक नौकरी दोगे तो वह कितने दिन जी पाएगा? अगर आदिवासी के जमीन के नीचे कोयला है तो आदिवासी को मालिक बना दो। कोर कैपिटल के खिलाफ आदिवासियों ने बड़ी कुरबानी दी। आपने कहा कि गरीबी मिटेगी तो भूखमरी बढ़ गई, अशिक्षा मिटेगी तो निरक्षरता बढ़ गई, खुशहाली आएगी तो बदहाली बढ़ गई। विस्थापन बढ़ गए। कंपनियां खुलीं, लेकिन कोई आदिवासी प्रबंधक, महाप्रबंधक नहीं बना। आप बाहर से इन्हें ला रहे हो। तो आदिवासी को आप इस लायक भी नहीं बनाते हैं। जो बाहर से आते हैं वो मां के पेट से ही बनकर निकलते हैं क्या? आप आदिवासियों को भी उतना शिक्षित करो। लेकिन आप ऐसा नहीं करोगे क्योंकि आप आदिवासियों को आगे नहीं बढ़ाना चाहते हो। आप उनकी जमीन, खनिज संपदा को केवल लूटना चाहते हो। आदिवासी अपनी शर्तों पर विकास चाहता है, उन्हें विकास करने दो। तो ये मेरे कड़वे अनुभव हैं। झारखंड बनने के पहले और बाद में भी रक्तपात हुए। आदिवासियों का खून बहना बंद नहीं हुआ। साठ गोलीकांड हुए। सब भाजपा के कार्यकाल में। भारत सरकार के आदिवासी मामलों के मंत्रालय का आप आंकड़ा देख लें। भारत का कोई भी आदिवासी समाज 50 फीसदी भी साक्षर नहीं हुआ है। तो अगर आप इन्हें साक्षर नहीं कर पा रहे हैं तो यह पैसा कहां जा रहा है? ये वो बड़े सवाल हैं, जिनका जवाब सरकार नहीं दे पा रही हैं। कांग्रेस हो या भाजपा सभी ने आदिवासियों का शोषण किया। बस इनके तरीके अलग-अलग थे। कांग्रेस ने तो अपने नेताओं की बात भी नहीं मानी। जवाहरलाल नेहरू ने ‘पंचशील सिद्धांत’ का सुझाव दिया था। अगर उसे ही मान लिया गया होता तो जमीन और खनिज-संपदा पर आदिवासियों का मालिकाना हक होता और ट्राइबल एरिया का शासन-प्रशासन आदिवासियों के प्रथाओं एवं मान्यताओं के आधार पर होता। भाजपा भी उसी राह पर चली, जिन पर चलकर कांग्रेस आदिवासियों के साथ गलत करती आयी। 

क्रमश: जारी

(संपादन : नवल/अनिल)


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लेखक के बारे में

ज्योति पासवान

दिल्ली विश्वविद्यालय से हिंदी साहित्य में एम.ए. ज्योति पासवान काज़ी नज़रुल विश्वविद्यालय, आसनसोल, पश्चिम बंगाल में पीएचडी शोधार्थी हैं

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