अभी हम आदिवासियों का पेट नहीं भरा है : वासवी किड़ो

‘विस्थापन झारखंड को खाए जा रहा है। झारखंड अलग राज्य अगर बना है तो विस्थापन का सवाल तो हल करना ही पड़ेगा। विकास का ऐसा मॉडल लाना पड़ेगा कि कोई आदिवासी गांव ना उजड़े। और जबतक यह मॉडल नहीं आएगा, हमलोगों को आंदोलन करना पड़ेगा।’ पढ़ें, वासवी किड़ो के साक्षात्कार का अंतिम भाग

[झारखंड महिला आयोग की पूर्व सदस्या वासवी किड़ो झारखंड की सुपरिचित आदिवासी साहित्यकार व सामाजिक कार्यकर्ता हैं। इसके अलावा वह पत्रकार के रूप में ‘टाइम्स ऑफ इंडिया’ व ‘जनसत्ता’ आदि समाचार पत्रों से संबद्ध रही हैं। इन्होंने झारखंड में अनेक आंदोलनों में हिस्सा लिया और कइयों का नेतृत्व भी किया है। ज्योति पासवान ने उनसे यह विस्तृत बातचीत की है। पढ़ें, इस बातचीत का दूसरा और अंतिम भाग]

पहले भाग में आपने पढ़ा : ‘झारखंड के हिस्से में अब भी क्यों है कोख में अमीरी और गोद में गरीबी?’

शिबू सोरेन व अन्य नेताओं के साथ आपके संबंध कैसे रहे?

शिबू सोरेन और बाकी नेताओं के साथ बहुत अच्छे संबंध थे। अखबार में काम करने के दौरान मैं उनके प्रेस कांफ्रेंस, रैलियों आदि में रिपोर्टिंग के लिए जाया किया करती थी। शिबू सोरेन ने बहुत पहले ही एक बार मुझे अपनी पार्टी झारखंड मुक्ति मोर्चा से जुड़ने का प्रस्ताव रखा था। लेकिन मैं उस समय अपना ध्यान पढ़ाई में लगाना चाहती थी। परिवार में भी मेरी स्थिति अच्छी नहीं थी, इसलिए मैंने यह तय कर लिया था कि मुझे कुछ बनना था। तो उस समय मैंने राजनीति में आने से मना कर दिया था। दिशोम गुरू से मेरी पहली मुलाकात रांची में हुई थी। तब मेरे साथ एक संथाली महिला थी। वह 1993 में जब गुरू जी सांसद थे और दिल्ली रहते थे, तब वह लड़की उनके घर में खाना बनाने का काम करती थी। वर्ष 2007 में उसके साथ हजारीबाग में गैंगरेप हो गया था। उसने मुकदमा तो दर्ज कराया था, लेकिन कार्रवाई नहीं की जा रही थी। मेरे पास वह 2009 में आयी तब शिबू सोरेन झारखंड के मुख्यमंत्री थे। वह लड़की उनसे मिलना चाहती थी। मैंने उसे गुरुजी से मिलवाया। वहां हेमंत सोरेन भी मौजूद थे। उन्होंने उस लड़की की मदद की। तब से वे लोग मुझे जानते हैं। हेमंत सोरेन के साथ भी मेरे संबंध अच्छे रहे हैं। वर्ष 2016 में हेमंत सोरेन ने एक ‘समन्वय समिति’ का गठन किया था। इस समिति में वामदल और सामाजिक आंदोलनकारियों को सदस्य के रुप में रखा था, जिसमें से एक मैं भी थी। इस समिति की दो-तीन बैठकें हुई थीं। चूंकि विस्थापन एक गंभीर मुद्दा है, इसलिए इन बैठकों में हमने ‘विस्थापित आयोग’ की स्थापना की मांग उठायी थी। मैंने कहा था– देखें, झारखंड में आठ कारणों से विस्थापन हुए हैं। इनमें पहला कारण खनन (कोयला, यूरेनियम, चूना-पत्थर, लौह-अयस्क सहित 49 प्रकार खनिज) है। आदिवासियों की जमीन चली जाती हैं, जिससे उनका विस्थापन होता है। दूसरा यह कि कल-कारखानों की स्थापना , लघु-वृहत सिंचाई परियोजनाओं, पार्क एवं अभयारण्य आदि बनाने, प्राइवेट कम्पनियों की स्थापना, बड़ी-बड़ी सरकारी कंपनियों की स्थापना तथा रेलवे की परियोजनाओं आदि कारणों से झारखंड में विस्थापन हुए हैं। जैसे यहां स्वर्णरेखा परियोजना, दामोदर घाटी परियोजना, अजय बराज, हाइड्रो पॉवर, थर्मल पॉवर इन परियोजनाओं के कारण विस्थापन हुआ है। और सभी विस्थापनों के अलग-अलग स्वरुप हैं। सरकारी और गैर-सरकारी कम्पनियों द्वारा विस्थापन के पुनर्निवेशन फंड भी अलग-अलग तरीके से तैयार किये जाते हैं। मेरा मानना है कि उनमें एकरुपता लानी चाहिए, जिससे परिवार के सभी सदस्यों को नौकरियों एवं मुआवजा का लाभ मिल सके। विधानसभा के कुछ सदस्यों द्वारा विस्थापन आयोग की मांग के मुद्दे को समर्थन भी मिला है। वर्तमान में इस विषय पर गंभीरता से विचार किया जा रहा है। झारखंड के लिए विस्थापन एक बड़ा एजेंडा है। हमलोग विस्थापन मुक्त झारखंड चाहते हैं। हम चाहते हैं कि हमारे विकास के मुद्दों पर बहस हो। सरकार ऐसा विकास लेकर आये कि किसी व्यक्ति का विस्थापन ना हो। बिना विस्थापन के विकास संभव है। केंद्र सरकार ने जिस नीति आयोग का गठन किया है, उसमें एक से बढ़कर एक विद्वान, स्कॉलर बैठे हैं। उनकी लाइब्रेरी में बड़ी-बड़ी पोथियां हैं। ऑक्सफोर्ड से लेकर कैंब्रिज तक की डिग्रीधारी नीति आयोग में बैठे हैं। वे तय करें कि बिना विस्थापन के विकास कैसे किया जाय। आप देखें कि विस्थापन होते ही रहे हैं। औपनिवेशिक अवधि और उसके पहले की अवधि में , आजादी के पहले और आजादी के बाद भी। जब अंग्रेजों का राज था तब रेलवे की पटरी बिछाने के लिए लाखों साल के पेड़ काट दिए गए। आज भी पेड़ों पर निशान लगा दिए गए हैं। उन्हें भी काट दिया जाएगा। आज जो फोरलेन और सिक्सलेन सड़कें बनाई जा रही हैं, उनके कारण लाखों पेड़ काटे जा रहे हैं, जिससे पर्यावरण पर भी बुरा असर पड़ रहा है और जमीन का स्वरुप बदल रहा है। इसका असर आबादी के बसाहट पर भी पड़ता है और संतुलन बिगड़ता है। आदिवासियों की जगह बाहर से नये लोग आकर बस रहे हैं। विस्थापन झारखंड को खाए जा रहा है। झारखंड अलग राज्य अगर बना है तो विस्थापन का सवाल तो हल करना ही पड़ेगा। विकास का ऐसा मॉडल लाना पड़ेगा कि कोई आदिवासी गांव ना उजड़े। और जबतक यह मॉडल नहीं आएगा, हमलोगों को आंदोलन करना पड़ेगा। 

एक तरह से देखें तो आदिवासी धीरे-धीरे पतन की ओर जा रहे हैं। आदिवासी संसाधनों के अभाव की चक्की में पिसाते जा रहे हैं। आदिवासी एक ऐसी मौत मर रहे हैं, जिसमें उनका खून तो नहीं बह रहा है, लेकिन विकास के नाम पर उनका नरसंहार किया जा रहा है। लेकिन उनके बारे में कोई बहस नहीं हो रही है। 

भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) का कहना है कि विस्थापन कांग्रेस की देन है। मैं कहती हूं कि अभी तो देश आप (भाजपा के लोग) चला रहे हैं, फिर आप क्यों कोई निदान नहीं निकाल रहे हैं? क्या आदिवासी ही विकास के नाम पर बलिवेदी पर चढ़ता रहेगा। अकेले झारखंड में ही लगभग एक करोड़ से अधिक लोग विस्थापित हैं। जो लोग उजड़ गये, वे तो उजड़ गये। लेकिन बहुत से ऐसे लोग हैं, जिनकी जमीनें सरकार ले लेती हैं और मकान वहीं रह जाते हैं। ऐसे लोग विस्थापित तो नहीं होते हैं लेकिन वे प्रभावित हो जाते हैं। ऐसे में प्रभावितों और विस्थापितों की तादाद अलग-अलग है। प्रभावितों के सवाल को अनदेखा किया जा रहा है। इनके लिए किसी प्रकार की योजनाएं नहीं बनायी गई हैं। जैसे डेढ़माग एक ऐसा गांव है, जिसमें वहां के लोगों के सारे खेत चले गये लेकिन सभी के घर रह गए। अब आप बताएं कि वो प्रभावित होगा या नहीं। उसके खेत चले गये तो अब वे कहां धान लगाएंगें और क्या खाएंगे? ऐसे बहुत से गांव हैं। लकमा नामक एक ऐसा गांव है, जहां मैंने मुख्यमंत्री से एक बार कहा कि अगर आप लकमा से अपनी यात्रा करते हैं तो उस गांव का एक-एक आदमी टीबी से मर रहा है। यह कैसा ‘राष्ट्र निर्माण’ है। आपने 50 हजार लोगों को उजाड़कर फेंक दिया। वहां कारखाने लगाकर बाहर के लोगों को बसा दिया। वह कारखाना भी ऐसा जिसने मुश्किल से केवल चार-पांच साल ही मुनाफा दिया और इसके बाद हमेशा घाटे में ही रहा। अब वह मरणासन्न अवस्था में है। जब ये कारखाने पचास साल बाद बंद हो जाते हैं, तो आदिवासियों को उनसे अधिग्रहित जमीन वापस कर देनी चाहिए। ऐसे में ‘राष्ट्र निर्माण’ के नाम पर आदिवासी अपनी जमीन क्यों दे? झारखंड में अभी वही लड़ाई चल रही है कि आदिवासियों की जमीन वापस करो। 

झारखंड के अलग राज्य बनने के बाद आप तत्कालीन बाबूलाल मरांडी सरकार द्वारा गठित महिला आयोग की सदस्य रहीं। वह अनुभव कैसा था?

बाबूलाल मरांडी ने ‘महिला आयोग’ नहीं बनाया था। भाजपा की सरकार पहली बार 2000 में बनी, तब बाबूलाल मरांडी मुख्यमंत्री बने। यह झारखंड की त्रासदी ही रही है कि महिला आयोग से भी पहले ‘गो-पालन और गो-वंश रक्षा’ के लिए कमीशन बनाई गई। 2005 तक झारखंड में महिला आयोग गठित नहीं की गई। वर्ष 2005 में अर्जुन मुंडा जब दुबारा मुख्यमंत्री बने और जब उनकी सरकार अल्पमत में आ गई, तब गद्दी छोड़ने से पहले उन्होंने दो कमीशन बनाये। एक झारखंड राज्य अनुसूचित जनजाति आयोग और दूसरा झारखंड राज्य महिला आयोग। झारखंड राज्य अनुसूचित जनजाति आयोग को पूरी तरह से दबा दिया गया और 16 सितंबर, 2006 से महिला आयोग अस्तित्व में आया, जिसकी पहली प्रेसीडेंट लक्ष्मी सिंह बनीं जो कि आईएएस अधिकारी थीं। जब 2010 में मैं नामित की गई तब उस समय झारखंड में राष्ट्रपति शासन लागू था। एक सामाजिक कार्यकर्ता ने यह कहते हुए समाज कल्याण विभाग में मेरा नाम प्रस्तावित किया था कि इन्होंने आदिवासी और महिलाओं के लिए बहुत काम किये हैं, इसलिए इन्हें महिला आयोग में लाया जाना चाहिए। हालांकि मुझे अध्यक्ष बनाये जाने की बात चल रही थी, लेकिन तत्कालीन राज्यपाल ने उत्तर प्रदेश की हेमलता एस. मोहन नामक एक महिला, जो रांची में डीपीएस स्कूल की प्रधानाध्यापिका थीं, को महिला आयोग का अध्यक्ष बना दिया। जबकि मैं झारखंड राज्य की महिला थी, लेकिन मुझे सदस्य बनाया गया। और तो और, दूसरी सदस्या अनुराधा चौधरी भी बिहार की थीं। इस तरह देखें, तो यह सब अन्याय झारखंड के साथ हुआ है। यह अन्याय अभी भी चल रहा है। यहां के लोगों को अयोग्य बताया जाता रहा है। 

आप राजनीतिक क्षेत्र में दिलचस्पी लेती रही हैं। लेकिन जहां तक मैं जानती हूँ कि आपने चुनावी राजनीति से परहेज किया है। ऐसा क्यों?

हाँ , मैं राजनीतिक मुद्दों पर लगातार सक्रिय रही हूं। लेकिन मैंने कभी किसी पार्टी को ज्वॉयन नहीं किया। वास्तव में पत्रकारिता के दौरान सभी नेताओं के सम्मेलनों एवं आंदोलनों में जाना होता था। फिर इन मुद्दों पर लिखना, पढ़ना और बहस भी हुआ करता था। हालांकि इन आंदोलन और सम्मेलनों में जाकर ही मेरा ज्ञानवर्द्धन हुआ। शिबू सोरेन जैसे नेताओं ने राजनीति में आने का आमंत्रण भी दिया। लेकिन दुखद बात है कि मैंने किसी भी पार्टी को ज्वॉयन नहीं किया। हालांकि मुझे पार्टी ज्वॉयन कर लेना चाहिए था। 

झारखंड के नेतरहाट में फाररिंग रेंज के विरोध में एक जनसभा को संबोधित करतीं वासवी किड़ो

आदिवासी संस्कृति और भाषा आदि को लेकर आजकल ऐसा कुछ चल रहा है कि गैर-आदिवासी भाषाओं यथा भोजपूरी, मैथिली, मगही आदि को भी सीमित किया जा रहा है। उसके संबंध में आपके विचार क्या हैं? 

मेरे हिसाब से, यह कहना उचित नहीं है कि भोजपूरी, मैथिली, मगही आदि जो गैर-आदिवासी भाषाएं हैं, उन्हें आदिवासी भाषाओं की तरह ही सीमित किया जा रहा है। मेरा मानना तो यह है कि आदिवासी भाषाओं के विकास पर ही अभी तक सही ढंग से ध्यान नहीं दिया गया है। आदिवासी भाषाओं के फलने-फूलने के लिए अभी तक आदिवासी भाषा नीति नहीं बनाई गई है, जबकि झारखंड के अलग राज्य बनने में भाषा का बड़ा योगदान है। इस आंदोलन में रैलियों और जुलूसों को हो, कुरुख, संथाली, मुंडारी आदि स्थानीय भाषाओं में ही संबोधित किया गया। इन्हीं भाषाओं में यहां की जनता को यह समझाया गया कि झारखंड को क्यों अलग राज्य बनाना चाहिए और इस कार्य में जनता का समर्थन क्यों आवश्यक है? जिन भाषाओं का सहारा लेकर यहां के लोगों को संगठित किया गया, राज्य के बने हुए 20 साल हो जाने के बाद भी उन भाषाओं को लेकर कोई ठोस कार्ययोजना नहीं बनी। अकादमिक स्तर पर भी स्थानीय भाषाओं के लिए नीति नहीं बनी। यहां तक कि संथाली, जिसे आंठवी अनुसूची में शामिल कर लिया गया है, फिर भी सरकारी कामकाज इस भाषा में क्यों नहीं किये जा रहे हैं? इतना ही नहीं, आदिवासी भाषाओं को द्वितीय राज्यभाषा का दर्जा भी बहुत सारे आंदोलन करने के बाद मिले। यह कार्य भी राज्य गठन के 10 साल के बाद हुआ जब शिबू सोरेन मुख्यमंत्री बने। अर्जुन मुंडा या भाजपा की किसी सरकार ने यह कार्य नहीं किया। वर्ष 1982-83 में रांची विश्वविद्यालय के तह्त जो ‘क्षेत्रीय एवं जनजातीय भाषा विभाग’ बना, उस विभाग के प्रोफेसरों जैसे रामदयाल मुंडा, प्रभाकर तिर्की, रोज केरकट्टा आदि लोगों के कारण संभव हुआ था। पृथक झारखंड राज्य आंदोलन में भी इन सभी की बड़ी भागीदारी थी। उस विभाग में 1983 से नौ भाषाओं की पढ़ाई होती है। लेकिन इन चालीस सालों में प्रत्येक भाषा के विभाग को अलग करने का कार्य अभी दो साल पहले किया गया, जबकि यह कार्य बहुत पहले हो जाना चाहिए था। अभी भी सभी विभागों को साधन-संपन्न नहीं किया गया है। सभी विभागों को बस एक-एक कमरे दे दिए गए हैं। कंप्यूटर आदि भी नहीं हैं। बस प्रोफेसरों के लिए एक बड़ा सा टेबल लगाकर दो-चार कुर्सियां लगा दी गईं हैं। जबकि विभाग को विभागीय स्वरुप देना जरुरी है। 

दूसरी बात इन भाषाओं में जो शोधार्थी शोध-कार्य कर रहे हैं, जो साहित्यकार लिख रहे हैं, उनके लिए भी रोजगार के अवसर होने चाहिए थे। लेकिन वे डिग्रियां लेकर भी बेरोजगार भटक रहे हैं, क्योंकि उन्हें रोजगार तो तब मिलेगा जब प्राथमिक स्तर पर भी इन भाषाओं को पढ़ाने के लिए किसी नीति का निर्माण किया जाएगा। झारखंड, जो आदिवासियत अस्मिता के साथ प्रकाश में आया और झारखंड की अपनी परम्परा एवं रीति-रिवाज हैं, लेकिन जब वे अपने ही क्षेत्र में उपेक्षित हैं तो हम किसी और भाषा की बात क्या करें? अभी हमारा ही पेट नहीं भरा है, तो हम किसी और के पेट के भरने की बात क्या करें? 

आदिवासी स्त्री लेखन की परिभाषा आपके हिसाब से क्या है? यह हिन्दी और अंग्रेजी में महिलाओं द्वारा रचे जा रहे साहित्य से कैसे अलग है?

आदिवासी महिलाओं के द्वारा जो साहित्य लिखा जा रहा है, वह उनका भोगा हुआ साहित्य है, यथार्थ का साहित्य है। वे अपने जनजीवन में जिन विडंबनाओं एवं त्रासदी को झेल रही हैं, उसे अपने साहित्य में समेट रही हैं। एक तरफ वे सामाजिक मुद्दों और दूसरी तरफ प्रकृति को आधार बनाकर लिख रही हैं। आदिवासी साहित्यकारों और हिंदी एवं अंग्रेजी में लिखे जा रहे साहित्य में जमीन-आसमान का अंतर है। हिंदी और अंग्रेजी में लिखने वाली महिलाएं ‘स्वान्त: सुखाय’ के लिए लिख रही हैं। जैसे मैं निर्मला पुतुल की कविता की एक पंक्ति का उदाहरण देना चाहती हूं– 

तुम बनाते हो हजारों पत्तल
पर हजारों पत्तल भर नहीं पाते तुम्हारा पेट
तुम्हारे हाथों के बनाये पत्तल, भरते हैं हजारों पेट
पर भर नहीं पाते तुम्हारे पेट। 

यह किसी एक आदिवासी औरत की गाथा नहीं है। ये उन हजारों आदिवासी औरतों की गाथा हैं जो जंगलों से पत्ते चुनकर लाया करती हैं, हजारों दोने-पत्तल बनाती हैं और उन्हें बेचती हैं। जिससे हजारों आदमी का पेट भरता है, लेकिन वो हजारों पत्तल बनाने वाली महिला अपना ही पेट नहीं भर पाती है। 

इस तरह का साहित्य हिंदी और अंग्रेजी में लिख रही गैर-आदिवासी महिलाओं के साहित्य में मिल ही नहीं सकता है, क्योंकि वे अपना दुख लिख रही हैं। उनके सामाजिक सरोकार ही अलग हैं। उनके साहित्य में समाज के सामंती व्यवहार का विरोध, पति का उत्पीड़न, परिवार की उपेक्षा, सामाजिक नियमों एवं परंपराओं का विरोध है। वे अपने समाज के उत्पीड़न एवं अत्याचारों को रेखांकित कर रही हैं। हमारे समाज में सामंती बंधन और दहेज का उत्पीड़न नहीं है। हमें घूंघट में भी नहीं रहना होता है। हमारे समाज में खेत-खलिहान एवं बाजारों में पुरुष और स्त्री साथ-साथ जाया करते हैं। हमारे समाज में खुलापन है, इसलिए हमारी और उनकी अभिव्यक्ति अलग-अलग है। इसलिए इन दोनों के साहित्यों की तुलना नहीं की जा सकती है। हमारे समाज में डायन के नाम पर जो हिंसा है, वह उस समाज में नहीं है। आदिवासी महिलाओं ने इस विषय पर भी लिखा है। 

हाँ, हमारी आदिवासी महिला साहित्यकारों की विस्थापन पर गंभीर रचनाएं नहीं हैं। इस पर बहुत कम लिखा गया है, जबकि रांची में नाक के नीचे विस्थापन का दर्द झेल रही बहुत सी कहानियां मौजूद हैं। लेकिन इन विस्थापितों पर ना तो कविताएं और ना ही कहानियां लिखीं जा रही हैं। इसके लिए मैं लगातार बोलती रही हूं कि साहित्य का संदर्भ बदलना चाहिए। पहाड़-पर्वत बहुत सुंदर हैं, जंगल की हरियाली बहुत अच्छी हैं, आप उन विषयों पर ही सीमित नहीं रहें। आदिवासी समाज के बहुत बड़े-बड़े दर्द हैं, जिन्हें प्रकाश में लाने की आवश्यकता है। जैसा कि मैंने कहा नरसंहार हो रहा है। खून तो नहीं बह रहा है, लेकिन लोग तिल-तिलकर मर रहे हैं। अभी इनकी अभिव्यक्ति शेष है।

आदिवासी साहित्य इसलिए भी अलग है, क्योंकि आदिवासी समाज मानवीय मुल्यों के बहुत करीब है। अन्य तरह का साहित्य भी हैं, पर इतना नहीं है। हमारे समाज मे कोई स्त्री विवाह के बाद जब अपने ससुराल में जाती है और उसे वहां के खान-पान के साथ सामंजस्य करने में किसी तरह की परेशानी होती है, तो भी वह अपने पति को छोड़ने के लिए स्वतंत्र है। हिन्दू समाज की स्त्रियां यह कभी नहीं कर सकती हैं। मेरे ही परिवार में मेरी भाभी मेरे भाई को छोड़कर चली गई थी। आज के दिन में मेरे भाई ने भी दूसरी शादी की और उस भाभी ने भी दूसरी शादी की। हाँ, लेकिन इसे लेकर किसी तरह की हाय-तौबा नहीं मचाया गया। इस तथ्य को मानवीय आधारों पर परखने की कोशिश की गई कि यह उनका जीवन है। जिस तरीके से वे खुश रहकर जीना चाहते हैं, वे उसके लिए स्वतंत्र हैं। 

दलित साहित्य को आप किस तरह से देखती हैं? 

दलित साहित्य बहुत संगठित और बहुत ही समृद्ध साहित्य है। वह अपने समाज की पीड़ा को बहुत ही जबरदस्त ढंग से अभिव्यक्त करता है। दलित लेखकों की संख्या भी अधिक हैं और उन्हें विस्तार भी मिला है। आदिवासियों को वह विस्तार पहले नहीं मिला। दलितों ने बहुत अच्छे से अपने आपको संगठित किया। डॉ. आंबेडकर उनके लिए खड़े हुए और उन्होंने दलितों को रास्ता दिखाया। आदिवासियों को रास्ता दिखाने वाले नेताओं जैसे मरांग गोमके जयपाल सिंह मुंडा आदि नेताओं को तत्कालीन भारतीय राजनेताओं ने इतना दबाया कि उनकी आवाज आज भी आदिवासियों तक नहीं पहुंच पायी है। आंबेडकर साहित्य में ब्राह्मणवाद, पूंजीवाद और सामंतवाद के खिलाफ जोरदार हमला भी किया जाता रहा है। दलित आंदोलनकारियों से लेकर दलित लेखकों के छोटे-बड़े बहुत से फोरम बने हुए हैं। लेकिन आदिवासियों में इनका अभाव है। दलित आदिवसियों की तुलना में ज्यादा संगठित हैं। 

क्या आपको नहीं लगता है कि आदिवासी लेखकों और गैर आदिवासी लेखकों के बीच एक समन्वय की स्थिति हो। सूचनाओं के आदान-प्रदान में तेजी आए, ताकि आदिवासी साहित्य का विस्तार हो और आदिवासी साहित्य भी समृद्ध हो। 

हमने आदिवासी साहित्य सम्मेलन में यह बात रखी है कि ‘ट्राइबल इंडिया’ ‘अनसीन इंडिया’ है। यह अदेखा भारत है, जिसे देखा-परखा जाना अभी बाकी है। आदिवासी भारत को अभी भी लोग नहीं देख पाए हैं। इसमें नक्सलवाद, जमीन की लूट, महाजन की प्रथा, आदिवासियों के साथ किए गए अत्याचार हैं। इसलिए यह अशांत है। आदिवासियों के लिए कोई ठोस योजना नहीं है कि इन्हें स्कूल में कैसे डाला जाय, कैसे इन्हें शिक्षित किया जाय? इन इलाकों में विद्यालयों का अभाव है। आपको जानकर हैरानी होगी कि हमारे उन गांवों में जहां हो, संथाल, गोंडी, कुरुख, मुंडारी आदि भाषाएं हैं, के आदिवासी बच्चे हिंदी में बात नहीं कर सकते हैं। आप कैसा भारत बना रहे हैं। साठ सालों तक कांग्रेस ने राज किया। उन्होंने कैसा भारत बनाया? 2014 से भाजपा है, ये लोग कैसा भारत बना रहे हैं कि आदिवासी ही भारत के नक्शे से गायब हैं? इसलिए आदिवासी साहित्य सम्मेलन में हमने यह सवाल बहुत गंभीरता से उठाया। हमने कहा कि आदिवासी इतने दबे रहे, उपेक्षित रहे कि साहित्य जगत में भी आदिवासी साहित्य देर से आया। आदिवासियों को बोलने के लिए मंच भी नहीं दिया गया। जैसे वारुल सोलमने लिखते हैं– 

हम स्टेज पर गए ही नहीं
उन्होंने हमें मंच पर बुलाया ही नहीं
उन्होंने हमें अंगुली से जहां बैठने की जगह दिखाई
हम वहीं बैठ गए।
वो मंच पर चढ़ गए और हमारा दुख हमें ही बताते रहे,
जो कि कभी उनका हुआ ही नहीं। 

यह चलता ही रहा है। वो हमें मंच पर बुलाकर हमारी बात सुनना ही नहीं चाहते हैं। सारे लोग मंच पर चढ़कर जाते हैं और आदिवासियों को ही बिठाकर उनकी ही बातें उन्हें ही सुनाते हैं। आप आदिवासी से सुनें, उन्हें बोलने और लिखने दें, उन्हें गाने और नाचने दें। तब देखिये कि आदिवासी क्या कहना चाहते हैं। 

खैर, अब आदिवासी साहित्य का विस्तार तो किया जा रहा है। ‘ऑल इंडिया ट्राइबल लिटरेरी फोरम’ के माध्यम से हमने मिजो, संथाली और अन्य आदिवासी भाषा में लिखे रचनाओं का हिंदी और अंग्रेजी में अनुवाद कराया है। यही कारण है कि हिंदी जगत के लोग आज आदिवासियों के बारे में इतना कुछ जान सके हैं। विडंबना यह भी है कि देश के विभिन्न भागों में आदिवासी भाषाओं में लिखे गये रचनाओं का आपस मे भी आदान-प्रदान नहीं है। इसीलिए एक ‘आदिवासी भाषा साहित्य अकादमी’ का गठन होना चाहिए, ताकि सभी आदिवासी रचनाओं को एक स्थान पर लाया जा सके और विचारों का आदान-प्रदान हो। इसके लिए हम प्रयासरत हैं। 

मैं आदिवासी साहित्यकारों से यही अपील कर रही हूं कि उन्हें अब लिखना आ गया है, उन्हें एक मार्ग मिल चुका है। वे नदियों, पहाड़ों और झरनों पर रोमांटिक कविताएं लिख रहे हैं, वे सब लिखें, उससे कोई दिक्कत नहीं है। पर वह जो उजड़ा आदिवासी है, वह कैसे अपनी भाषा भूल गया है, कैसे नाचना-गाना भूल गया, मांदर-नगाड़े बजाना भूल गया, अपनी पहचान खो दी, जीविका खो दी, अच्छा स्वास्थ खो दिया, वह पढ़ नहीं पा रहा है। इन विषयों पर कौन लिखेगा?

हाल ही में आपकी नई किताब आयी है। कृपया इसके बारे में बताएं।

मेरी नई पुस्तक का नाम ‘भारत की क्रांतिकारी आदिवासी औरतें’ है। इस पुस्तक में मैंने यह दिखाने का प्रयास किया है कि भारत में जितने भी आदिवासी विद्रोह हुए हैं, उन विद्रोहों में आदिवासी महिलाओं की क्या भूमिका रही है। उन महिलाओं ने अंग्रेजी सेनाओं का मुकाबला कैसे किया, फांसी के तख्ते पर झूल गयीं। इस तरह की कई कुरबानियां देकर उन आदिवासी महिलाओं ने अपने जल-जंगल- जमीन, अपने समाज और समुदाय की रक्षा की। इस पुस्तक मैं मैंने यही उद्घाटित करने की कोशिश की है कि आदिवासी समाज में कुछ भी एकतरफा नहीं है। किसी भी संघर्ष में मर्द और औरत की बराबर की भागीदारी है। जैसे रोहतास गढ़ में रानियों ने भी राज किया और लड़ाईयां भी लड़ीं और वे अंत तक हारी नहीं। वे लड़ते-लड़ते मरीं। गया मुंडा की पत्नी ने गोद में बच्चा लेकर रांची के डी.सी. पर कुल्हाड़ी चला दिया था। अपनी इस किताब को मैं ‘प्राइमरी बुक’ मानती हूं। मैं मानती हूँ कि यह एक आधार है। इस पर शोध करके बहुत से तथ्य खोजे जा सकते हैं और हजार पन्नों की एक किताब बन सकती है। संसाधनों के अभाव और पत्रकारिक जीवन में मैंने जितनी जानकारी प्राप्त की, उनके आधार पर मैंने इसे तैयार किया। आदिवासी महिलाओं के इतिहास को अभी भी संग्रहित नहीं किया गया है। रांची विश्वविद्यालय ने भी आदिवासी इतिहास को संजोने का कार्य नहीं किया है। जबकि उन्हें इस भूमिका का निर्वहन करना चाहिए था।

आदिवासी महिलायें विवाह का निर्णय लेने के लिए स्वतंत्र हैं, जिनके कारण वर्तमान में आदिवासी महिलाओं ने गैर-अदिवासियों से भी विवाह किया है। क्या इससे आदिवासी भाषा, समाज और संस्कृति पर कोई प्रतिकूल असर पड़ा है? 

हाँ , इससे एक तरह का नुकसान तो हो रहा है। हालांकि संविधान के द्वारा ही सभी महिलाओं को अपनी इच्छानुरुप विवाह करने का अधिकर प्राप्त है। आप उन्हें नहीं रोक सकते हैं। लेकिन अभी हाल ही में एक रिपोर्ट पढ़ रही थी, जिसमें गांवों की उन आदिवासी महिलाओं का उल्लेख है, जो मुखिया या सरपंच बन रही हैं। गैर-आदिवासी सरकारी योजनाओं का लाभ लेने के उद्देश्य से उन आदिवासी महिलाओं को टारगेट करके उनसे विवाह कर रहे हैं। संथाल परगना के इलाके में बड़े पैमाने पर यह चल रहा है।

आप देखेंगे कि जो आदिवासी लड़कियां थोड़ी पढ़ने में ठीक-ठाक हैं, या फिर एक अच्छे पद पर हैं, उन्हें टारगेट करके उनके साथ विवाह किया जा रहा है। यह एक षड़्यंत्र भी लगता है ताकि आदिवासियों की संख्या को कम किया जा सके। इनसे पैदा होने वाले बच्चे गैर-आदिवासी संस्कृति में चले जाते हैं, जिससे आदिवासियों की संख्या जो ऐसे भी कम है, वह और भी घट जाती हैं। चूंकि औरत में मातृशक्ति है, उसे परिवार बढ़ाने वाला माना जाता है, इसलिए जब औरतें दूसरे समाज में चली जाती हैं तो आदिवासी समाज की आबादी घटने की संभावना बढ़ने लगती है। समाज को यह भय रहता है कि इससे आदिवासी आबादी में कमी आएगी और हमारी संस्कृति का क्षरण होगा। यह खतरा तो लगातार बना ही है। दिल्ली काम करने जानेवाली लड़कियां बिहारी, बंगाली और जो कोई भी उन्हें आश्रय देते हैं, उनके साथ वे विवाह कर लेती हैं। 

एक दूसरी बात भी है कि आप इस तरह के संबंधों को नहीं रोक सकते हैं। प्रेम किसी से भी हो सकता है। इस इमोशन को भी कोई रोक नहीं सकता है। लेकिन विडंबना यह है कि जब यह प्रेम घर में जाता है तो उस घर में जाति और धर्म सब कुछ है। जिस कारण कई ऐसे उदाहरण देखने को मिले हैं जिसमें आदिवासी लड़कियों को गैर-अदिवासी घरों में वह सम्मान नहीं मिल पाता है, जो वह अपने समाज में पाती हैं। 

आदिवासी संस्कृति पर यह एक बड़ा हमला भी है। कुछ शादियां परिपक्वता के आधार पर की जा रही हैं। फिर भी निश्चित तौर पर आदिवासी समाज को इससे नुकसान पहुंच रहा है। समाज यह सोचने के लिए विवश है कि हमारे समाज की लड़कियां गैर-आदिवासी समाज में क्यों जा रही हैं? हमारे समाज में क्या परिवार में कोई कमी हैं, उनकी देखभाल अच्छे तरीके से नहीं हो पा रही है? क्या कारण हैं – सामाजिक या सांस्कृतिक? इन विषयों पर अब आदिवासी समाज के अगुआ और आदिवासी संगठन देखने लगे हैं कि उन्हें गैर-आदिवासी समाज में क्या मिल रहा है और हम उन्हें क्या नहीं दे पा रहे हैं? 

आपकी आने वाली पुस्तकें कौन-कौन सी हैं और यह भी कि आप इन दिनों किन परियोजनाओं पर काम कर रही हैं? 

मैं विस्थापन पर आधारित दूसरा खंड लाने की योजना बना रही हूं। पहले खंड में मैंने भारत में जितने विस्थापन विरोधी आंदोलन चल रहे हैं, जैसे मेधा पाटकर का नर्मदा घाटी परियोजना, पेरियार बाँध, हीराकुंड जल परियोजना, भाखड़ा-नांगल बाँध परियोजना, झारखंड में चलने वाली सभी परियोजनाओं के विस्तृत आँकड़े दिये हैं। लेकिन विस्थापन के कारणों में माइनिंग के क्षेत्र को पूरी तरह से समायोजित नहीं किया है। आंकड़े तो विस्तृत रुप में दिये हैं, लेकिन खनन के कारण जो समुदाय प्रभावित हुआ है, मैं उसके इस प्रभाव को दूसरे खंड में लाना चाहती हूं। 

दूसरी योजना औषधीय पौधों पर भी मेरा काम है। जैसे महुआ पर मेरी किताब है। वैसे ही मैं सात फूलों पर भी किताब लाना चाहती हूं। 

आज की पीढ़ी के लेखकों के लिए आपका संदेश क्या है ?

आज की पीढ़ी के लेखकों को ज्यादा से ज्यादा घूमना चाहिए और जितना अधिक हो सके, पढ़ना चाहिए। बड़े लेखकों से बातें करें, उनके साथ समय व्यतीत करें। अगर उन्होंने यह व्यवहार नहीं किया तो वे अच्छे लेखक नहीं बन पाएंगे। आज के लेखकों को ज्वलंत मुद्दों की पहचान करनी चाहिए और उन सवालों पर उन्हें लिखना चाहिए। 

(संपादन : नवल/अनिल)


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दलित पैंथर्स : एन ऑथरेटिव हिस्ट्री : लेखक : जेवी पवार 

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