दलित-मुक्ति में हिंदी नवजागरण काल की पत्रकारिता और भूमिका (अंतिम अंश)

यदि हम एक अपवाद के रूप में ‘चांद’ की रेडिकल पत्रकारिता को छोड़ दें, तो इस काल की संपूर्ण हिंदी पत्रकारिता ने दलित प्रश्न को गांधी की हिंदू दृष्टि से ही देखा था, उसने डॉ. आंबेडकर की दलित-मुक्ति की दृष्टि से उस प्रश्न को बिल्कुल नहीं देखा। पढ़ें, कंवल भारती के विस्तृत आलेख का समापन अंश

गतांक से आगे

हिन्दी नवजागरण का दूसरा काल बीसवीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध में राष्ट्रीय आंदोलन के समय में शुरु होता है। इस काल में डॉ. आंबेडकर के दलित आंदोलन ने जबरदस्त दस्तक दी थी। उनके पानी के लिये महाड सत्याग्रह, मंदि प्रवेश के लिये कालाराम मंदिर सत्याग्रह और राजनैतिक प्रतिनिधित्व के लिये पृथक निर्वाचन की मांग तथा उस पर हिन्दू नेताओं के साथ हुए पूना समझौते ने दलित प्रश्न को राष्ट्रीय आन्दोलन का मुख्य प्रश्न बना दिया था। यही वह काल है, जब हिंदी लेखन में दलित प्रश्न दिखायी पड़ता है। इस काल के हिंदी लेखकों और संपादकों ने दलित समस्या पर भी कलम चलायी। लेकिन, इसके पीछे सामाजिक सुधार या परिवर्तन की कोई भावना नहीं थी, वरन् वे राजनैतिक दबाव थे, जो कांग्रेस के राष्ट्रीय आंदोलन को प्रभावित कर रहे थे। 

दरअसल, डॉ. आंबेडकर के इस प्रश्न ने राष्ट्रीय आंदोलन के नेताओं को विचलित कर दिया था कि उन्हें अंग्रेजों से आजादी मांगने का क्या हक है, जो अपने ही लाखों देशवासियों को गुलाम बनाकर रखे हुए हैं? आंबेडकर का कहना था कि ऐसी आजादी का दलितों के लिये क्या महत्व, जिसमें उन्हें वचित बने ही रहना है? उन्होंने डंके की चोट पर कहा था कि दलित इस स्वतंत्रता संग्राम में क्यों भाग लें, जबकि यह स्पष्ट दिखायी दे रहा है कि यह आजादी सिर्फ पूंजीपतियों और शासक वर्ग को ही मिलने वाली है? जब डॉ. आंबेडकर ने स्वतंत्र भारत के भावी संविधन की रूपरेखा तय करने के लिये लंदन में होने वाले गोलमेज सम्मेलन में दलितों के लिये पृथक निर्वाचन की मांग की, जिसे ब्रिटिश प्रधान मंत्री के कम्यूनल अवार्ड (सांप्रदायिक निर्णय) में स्वीकार कर लिया गया, तो जैस भूचाल ही आ गया था। 

उस समय के संपूर्ण राष्ट्रीय प्रेस ने इस निर्णय की आलोचना की थी। हिंदी अखबारों और पत्रिकाओं में इस निर्णय की आलोचना मिलती है। स्वयं प्रेमचंद ने अपनी पत्रिका ‘हंस’ में इसकी आलोचना की थी। प्रेमचंद ने पृथक निर्वाचन के विरोध् में 1932 में लिखा था– “हम अपने उन अछूत भाइयों को, जो हमसे रूठ गये हैं, मनायेंगे और उनके चरणों पर गिरकर मनायेंगे। हमें विश्वास है डॉ. आंबेडकर और मि. श्रीनिवासन भी दो राष्ट्र की इस याचना को अस्वीकार न करेंगे। अन्ततः डॉ. आंबेडकर ने पृथक निर्वाचन की मांग को त्याग दिया।”

उल्लेखनीय है कि पृथक निर्वाचन के विरुद्ध महात्मा गांधी ने पूना की यरवदा जेल में अनशन किया था, (क्योंकि कम्यूनल अवार्ड के समय गांधी जी यरवदा जेल में बंद थे।) गांधी जी का अनशन डॉ. आंबेडकर के साथ यह समझौता होने के बाद टूटा था कि दलित सामान्य निर्वाचन प्रणाली को स्वीकार करेंगे। प्रेमचंद के विचार पूना-पैक्ट पर उनकी प्रतिक्रिया के रूप में हैं। प्रेमचंद ने अछूतों के सदा से चले आये सामाजिक अलगाव को महसूस न कर उन पर यह आरोपित किया कि वे राजनैतिक लाभ के लिये हिन्दुओं से रूठ गये हैं। प्रेमचंद ने दो राष्ट्र के सिद्धांत की भी वकालत की और अछूतों को हिंदू राष्ट्र स्वीकार करने की डॉ. आंबेडकर से आशा व्यक्त की थी।

वर्ष 1932 में ही प्रेमचंद ने अछूतों को सरकारी सुविधा दिये जाने के संबंध में अपनी टिप्पणी इस प्रकार व्यक्त की थी– “यदि हम अपने हरिजन भाइयों को उठाना चाहते हैं, तो हमें ऐसे साधन पैदा करने होंगे, जो उन्हें उठने में मदद दें।” वे विद्यालयों में उनके लिये वजीफे और नौकरियों में रियायत का समर्थन करते हुए लिखते हैं– “समय तो इस समस्या को आप ही हल करेगा, पर हिंदू जाति अपने कर्त्तव्य से मुंह नहीं मोड़ सकती।” प्रेमचंद के लिये यह राजनैतिक समस्या थी, जो समय द्वारा अपने आप हल हो जाने वाली थी।

प्रेमचंद का दृष्टिकोण फिर भी सकारात्मक था, जबकि उनक कई समकालीन लेखक तथा पत्र-संपादक दलित-समस्या को अंग्रेजों द्वारा पैदा की गयी विघटनकारी मानते थे। वे राजनैतिक कारणों से गाँधी जी के हरिजनोद्धार के समर्थक बने हुए थे, परंतु डॉ. आंबेडकर के दलित-मुक्ति आंदोलन के समर्थक बिल्कुल नहीं थे, जिसका आधार वर्णव्यवस्था का उन्मूलन था। इस समय की हिंदी पत्रिकाओं में ‘चांद’, ‘हंस’ और ‘विशाल भारत’ काफी प्रगतिशील मानी जाती थीं। इसके बावजूद इन पत्रों में न तो उत्तर भारत के आदि हिंदू आंदोलन की खबरें मिलती हैं और न महाड, नासिक और पूना के ऐतिहासिक दलित-संघर्षों का जिक्र मिलता है। लेकिन गांधी जी के हरिजन-उद्धार को इन पत्रिकाओं ने काफी समर्थन दिया। जब पंजाब में पहली बार सरकार ने एक दलित को रावलपिण्डी के बोर्ड का सदस्य मनोनीत किया, तो ‘चांद’ ने इसको खबर के रूप में छापा। उसने लिखा– “हरिजन भाई का नाम चौधरी हकीम लाल है। आप मेहतर संघ के प्रधान मंत्री हैं। चौधरी हकीम लाल के समर्थन में स्थानीय मेहतर संघ ने नगर में जुलूस निकाला, जिसमें सैकड़ों मेहतरों ने भाग लिया।’’ (अगस्त 1939, पृष्ठ 303)

इसी तरह महात्मा गांधी पर पूना में बम फेंके जाने पर ‘विशाल भारत’ में संपादकीय विचार में यह छपा– “बम किसने और क्यों फेंका, यह बात अभी तक अनिश्चित है, पर लोगों का अनुमान है कि यह दुष्कर्म किसी कट्टर सनातनी का है, जिसका क्रोध महात्मा गांधी के हरिजन-आंदोलन के कारण पागलपन की सीमा तक पहुंच गया है। यदि यह अनुमान सत्य है तो इसमें संदेह नहीं कि दरअसल यह बम महात्मा जी पर नहीं पड़ा, बल्कि अछूतपन के किले पर पड़ा है, जिससे वह नष्ट-भ्रष्ट हुए बिना नहीं रह सकता।” संपादकीय ने महात्मा जी पर बम फेंके जाने को अछूतपन के राक्षस की अन्तिम समय की छटपटाहट बताते हुए कहा कि “वर्णाश्रम स्वराज-संघ के काले झंडे उस कालिमा के सूचक हैं, जो मृत्यु के समय प्राणियों के चेहरे पर आया करती है।”

“चांद” पत्रिका के अछूत अंक का आवरण पृष्ठ

‘विशाल भारत’ के संपादक बनारसी दास चतुर्वेदी थे, जिनके प्रगतिशील विचारों का प्रभाव ‘विशाल भारत’ में स्पष्ट दिखायी पड़ता है। उन्होंने छुआछूत के विरोध में सनातन धर्म की आलोचना की और इसी संपादकीय में लिखा– “जो मनुष्य-मनुष्य में भेदभाव की दीवार खड़ी करता है, उस नाममात्र के सनातनधर्म को जीवित रहने की आवश्यकता ही नहीं है।” (जुलाई 1934, पृष्ठ 105)

लेकिन ‘विशाल भारत’ के इसी अंक में रघुनाथ प्रसाद पाठक का लेख ‘निरक्षरता का अभिशाप’ छपा है, जिसमें भारतीय समाज के बारे में यह सफेद झूठ बोला गया है कि नीग्रो की तरह भारत में कोई गुलाम नहीं है। इस लेखक ने भारतीय समाज में गुलाम बनाकर रखे गये अछूतों की पूर्ण उपेक्षा करते हुए लिखा है– “यद्यपि भारतीय प्रजा राजनैतिक दृष्टि से पराधी है, फिर भी रंग-विद्वेष या जाति-विद्वेष के मूल से प्रवाहित होने वाली ऐसी असुविधाएं भारतीय प्रजा को नहीं हैं, जैसी नीग्रो जाति को; न उन अर्थों में भारतीय प्रजा गुलाम है, जिन अर्थों में नीग्रो जाति; और ना ही इस पर उस प्रकार के जुल्म और अत्याचार होते हैं, जिस प्रकार के नीग्रो जाति पर।” (पृष्ठ 66) अछूतों की गुलामी और उन पर होने वाले जुल्म इस लेखक को यदि दिखायी नहीं दे रहे थे, तो सिर्फ इसलिये कि नीग्रो और अछूतों को देखने की उनकी दृष्टियां अलग-अलग थीं।

इस काल के राष्ट्रीय वातावरण में दलित प्रश्न गूंज रहा था। राजनैतिक, सामाजिक और धार्मिक रूप से जाति एक चर्चित विषय था। अतः इस प्रभाव से हिंदी की पत्रकारिता भी अछूती कैसे रह सकती थी। हिंदी के लेखकों और पत्रकारों ने वस्तुतः इसी काल में जाति-व्यवस्था पर सबसे ज्यादा विचार किया। पर, मुख्यरूप से यह विचार छुआछूत के विरोध पर आधारित था, न कि वर्णव्यवस्था और जातिप्रथा के उन्मूलन पर। ‘विशाल भारत’ के इसी अंक में जगन्नाथ प्रसाद मिश्र का ‘जातीय आदर्श’ लेख छपा है, जिसमें उन्होंने जाति को मजबूत करने पर जोर दिया है। उन्होंने लिखा है– “जिस जाति का आदर्श स्थिर और लक्ष्य अविचलित होता है, वह इस प्रकार की क्षणिक असफलताओं से घबराती नहीं, अपने आदर्श से विचलित नहीं होती।” (पृष्ठ 68) राष्ट्रीय आंदोलन में दलितों और अन्य अल्पसंख्यक समुदायों के प्रतिनिधित्व का प्रश्न उनके लिये क्षणिक अर्थात् क्षण भर में समाप्त हो जाने वाला प्रश्न था। उससे विचलित होकर जाति के आदर्श को कमजोर करने की जरूरत नहीं थी। इसलिये उन्होंने लिखा, “किसी दल या संप्रदाय की मनस्तुष्टि के लिये आप चाटुकारिता पूर्ण साहित्य की सृष्टि करके जातीय जीवन की प्रतिष्ठा नहीं कर सकते; आपको अपने आदर्श के अनुरूप ही साहित्य का निर्माण करना पड़ेगा।” (पृष्ठ 69) यह जातीय आदर्श क्या है, इसे स्पष्ट नहीं किया गया है, जैसे यह पहले से ही स्पष्ट हो। जाति की सुरक्षा ही यह आदर्श हो, ऐसा इन पंक्तियों से स्पष्ट होता है– “जब तक जातीय सभ्यता और संस्कृति की धरा अक्षुण्ण बनी रहती है, तब तक जाति की मृत्यु नहीं होती। मृत्यु मुख में पतित होकर भी वह जाति बार-बार जीवित हो उठती है और नाना रूपों और नाना भावों द्वारा अपनी सत्ता को अभिव्यक्त करता है।” (वही)

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गोलमेज सम्मेलन में कम्यूनल अवार्ड के निर्णय की आलोचना इस काल की लगभग संपूर्ण हिंदी पत्रकारिता ने की। कम्यूनल अवार्ड का मतलब था, ब्रिटिश प्रधानमंत्री का वह निर्णय, जिसमें अल्पसंख्यक समुदायों को विधनसभाओं और परिषदों में आनुपातिक प्रतिनिधित्व दिया गया था। इनमें ईसाई, मुस्लिम, सिख समुदायों के साथ-साथ दलित भी शामिल थे। पर, पूना समझौते के बाद दलितों को इससे अलग कर दिया गया था। हिंदू नेता अल्पसंख्यक समुदायों को भी प्रतिनिधित्व दिये जाने के खिलाफ थे। ‘विशाल भारत’ के इसी अंक में कांग्रेस द्वारा कम्यूनल अवार्ड के संबंध में पारित किये गये प्रस्ताव की कटु आलोचना संपादकीय विचार में की गयी है। लिखा है– “कांग्रेस के इस प्रस्ताव से कोई भी राष्ट्रवादी कदापि संतुष्ट नहीं हो सकता।” (पृष्ठ 108) 

संपादकीय आगे कहता है– “जो लोग राष्ट्रीयता को क्षुण्ण करके भी विभिन्न संप्रदायों के बीच समझौता स्थापित करने का स्वप्न देखते हैं, उन्हें यह स्मरण रखना चाहिए कि इस प्रकार के कृत्रिम समझौते द्वारा आप सांप्रदायिकता के विषाक्त मोह से राष्ट्र को मुक्त नहीं कर सकते।” (पृष्ठ 108-09) इन विचारों में भारत की राजसत्ता पर हिंदू वर्चस्व का अहंकार बोलता है। यह हिंदू बनाम भारतीय के राजनैतिक संघर्ष में हिंदू बनाम हिंदू अर्थात् द्विज बनाम द्विज की वाणी है, जिससे सांप्रदायिकता नष्ट नहीं, विकसित होती है। इसी अंक में ‘मार्डन रिव्यू’ के संपादक रामानंद चट्टोपाध्याय, जो ‘विशाल भारत’ के संचालक थे, का संपादकीय नोट छपा है, जिसमें कम्यूनल अवार्ड की तुलना अमेरिका की दासत्व-प्रथा से कहते हुए कहा गया है– “जिस प्रकार दासत्व-प्रथा को नष्ट किये बिना अमेरिका का संयुक्त राज्य संयुक्त और वास्तव में स्वतंत्र नहीं रह सकता था, उसी प्रकार भारत भी तब तक कि यह कम्यूनल अवार्ड नहीं बदला न जाएगा, तो यही हमारी चिरस्थायी गुलामी का साधन बनेगा।” (पृष्ठ 120)

ऐसी ही कटु आलोचना हमें सरकारी नौकरियों में आरक्षण की व्यवस्था पर मिलती है। ‘विशाल भारत’ ने तो यहां तक लिखा कि “हिंदुओं या मुसलमानों को कुछ अधिक नौकरियां मिल जाएंगीं, इससे न तो देश को स्वभाग्य-निर्णय का अधिकार प्राप्त हो सकता है और न उन लक्ष-लक्ष (लख-लख) उपेक्षित और निर्यायित मनुष्यों के भाग्य में कोई परिवर्तन हो सकता है, जो अन्न-वस्त्र के अभाव में अत्यंत दयनीय जीवन व्यतीत कर रहे हैं।” (अगस्त 1934, पृष्ठ 232-33) ‘विशाल भारत’ के इस सम्पादकीय में यह भाग्यवादी चिंतन किनके हितों को सुरक्षित कर रहा था और किनके हितों पर कुठाराघात, इसे आसानी से समझा जा सकता है। नौकरियां दलितों के लिये रोजगार थीं, जो दलित-मुक्ति में क्रान्तिकारी भूमिका निभा सकती थीं। पर, हिंदू व्यवस्था के समर्थक दलित-मुक्ति के आर्थिक आधार पर बात नहीं कर रहे थे। वे बस छुआछूत का विरोध करते थे और उसी को दलित-मुक्ति मानते थे।

‘अछूतोद्धार’ कैसे होगा, इस पर एक सज्जन का पत्र ‘चांद’ के जनवरी 1930 के अंक में छपा है। उन्होंने मुजफ्फरपुर (बिहार) के आर्य-समाजियों के अछूतोद्धारर पर प्रकाश डाला है। आर्य समाजियों ने एक सभा की, जिसमें “भंगियों (मेहतरों) को बुलाया गया। व्याख्यानदाता ने बड़े उच्च स्वर से लोगों को ललकार कर कहा कि ऐ हिंदू भाइयो! अगर तुम लोग जरा भी हिंदू जाति की भलाई चाहते हो तो उठो और इन भंगियों के हाथ का पानी पियो। इसका प्रभाव लोगों पर कड़ाके के साथ पड़ा, विशेषकर विद्यार्थियों पर। वे लोग बेधड़क पानी पीने लगे।” (पृष्ठ 585) यह अछूतोद्धार आर्य समाजियों द्वारा हिंदू जाति की भलाई के लिये किया जा रहा था, अछूतों की भलाई से उनका कोई संबंध नहीं था।

यद्यपि, ‘चांद’ जो अपने समय की सबसे अधिक प्रगतिशील पत्रिका थी, गांधी जी के अछूतोद्धार की समर्थक थी, पर इस कार्य में किसी भी ढोंग और पाखंड की विरोधी थी। इस पत्रिका के एक अंक में ‘कांग्रेस और अछूत’ नाम से संपादक की एक लंबी टिप्पणी है, जिसमें “राष्ट्र की कमजोरियों का पोषण” करने वाले “राष्ट्र के पूज्य और सम्मानित महारथियों” पर क्षोभ व्यक्त किया गया है। कांग्रेस ने अछूतोद्धार-उपसमिति बनायी थी, जिसके सदस्य सेठ जमनालाल बजाज और पंडित मदल मोहन मालवीय थे। यह समिति कितनी गंभीर थी, इसका खुलासा करते हुए ‘चांद’ के संपादक ने लिखा है, “अछूतोद्धार समिति के सदस्य सेठ जमनालाल जी बजाज ने कराँची में अछूतों की सभा में भाषण देते हुए उन्हें समझाया कि मनुष्य-गणना के समय इन लोगों को अपने को अछूत नहीं, वरन् हिंदू बतलाना चाहिए। इससे सरकार को अछूतों की अधिक संख्या का पता नहीं चलेगा और वह भारतवासियों की कमजोरियों के लिये उन्हें लज्जित न कर सकेगी।” (पृष्ठ 639) सेठ जी को सरकार की चिंता थी, अछूतों की नहीं। इस पर ‘चांद’ के संपादक ने उन्हें फटकारते हुए लिखा– “हम नहीं समझते कि इससे बढ़कर अछूतोद्धार का ढोंग और क्या हो सकता है! सेठ जी के इस कथन से मालूम होता है कि अछूतोद्धार-समिति अछूतों की दशा सुधारने के लिये इतनी उत्सुक नहीं है, जितना वह सरकार की दृष्टि में उच्च वर्ण के हिंदुओं को प्रतिष्ठित बनाने के लिये व्याकुल है। रोग को मिटाने का प्रयास नहीं किया जा रहा है, य प्रयत्न किया जा रहा है कि उसे छिपाकर संसार की आँखों में धूल झौंकने का।” (वही) संपादक ने सवाल किया– “क्या मनुष्य-गणना की संख्याओं में परिवर्तन हो जाने से ही अछूतों का उद्धार हो जायेगा? अथवा, सरकारी अफसरों की दृष्टि में उच्च वर्ण के हिंदुओं का प्रतिष्ठित साबित हो जाना ही दलित अछूतों का सबसे बड़ा स्वार्थ है?” (वही) 

‘चांद’ पत्रिका के संपादक पर डॉ. आंबेडकर के दलित आंदोलन का प्रभाव दिखायी पड़ता है, क्योंकि आगे जो उन्होंने लिखा है, वह एक तरह से डॉ. आंबेडकर के ही विचार हैं– “सच बात तो यह है कि कांग्रेस अमीरों की संस्था है। वह अछूतों, मजदूरों और किसानों का साथ वहीं तक देना चाहती है, जहां तक इन श्रेणियों की सहानुभूति अमीरों के स्वार्थ-साधन में सहायक हो सकती है। कांग्रेस को इस बात से कुछ मतलब नहीं कि अछूतों की दशा सुधरती है या बिगड़ती है, समाज में उन्हें नागरिकता के अधिकार प्राप्त होते हैं या वे चिरकाल तक पद-दलित, परतंत्र ही बने रहते हैं। कांग्रेस का प्रधान उद्देश्य अछूतों को फुसलाकर उनके द्वारा अमीरों के स्वराज का समर्थन कराना है।” (वही)

काँग्रेस ने अछूतोद्धार की बात 1930 में ही करनी शुरु की थी, जब लंदन के गोलमेज सम्मेलन में डॉ. आंबेडकर ने दलितों को, अल्पसंख्यक वर्ग साबित करते हुए स्वतंत्र भारत की शासन-सत्ता में प्रतिनिधित्व दिये जाने की मांग की थी। कांग्रेस का ‘अछूतोद्धार’ के पीछे का मकसद खुद को संपूर्ण हिंदुओं की प्रतिनिधि पार्टी प्रदर्शित करना था। डॉ. आंबेडकर ने कांग्रेस के दावे का खंडन किया और इस बात को साबित किया कि सिर्फ धार्मिक अलगाव ही किसी समुदाय को अल्पसंख्यक नहीं बनाता है, वरन् सामाजिक भेदभाव भी बनाता है। उन्होंने इसी आधार पर दलितों को हिंदू नहीं माना और एक पृथक अल्पसंख्यक समुदाय घोषित किया। राष्ट्रीय आंदोलन में इसी दलित प्रश्न ने कांग्रेस और महात्मा गांधी का अछूतों के प्रति ध्यान आकृष्ट किया था और हरिजनोद्धार कार्यक्रम उनकी राजनैतिक विवशता थी। लेकिन कम्यूनल अवार्ड के बाद उन हिंदू लेखकों के भी स्वर बदल गये थे, जो दलित प्रश्न का समर्थन कर रहे थे।

लेकिन, पूना-पैक्ट के बाद गांधी जी ने हरिजन सेवक संघ का निर्माण किया और ‘हरिजन’ नामक पत्र भी निकाला। ‘विशाल भारत’ में हमें एक लेख हरिजन सेवक संघ की गतिविधियों के बारे में मिलता है। हालांकि यह लेख “हरिजनों के व्यवसाय” के बारे में है, जिसमें कहा गया है कि “यदि वास्तव में संघ को हरिजनों का सुधार करना है तो संघ के कार्यकर्ताओं को चाहिए कि वे गांवों में जाकर रहें, उनको उनकी आर्थिक अवस्था कैसे सुधरे, इसके उपाय सोचें और उनके अन्दर शिक्षा और संगठन का प्रचार करें, जिससे वे पशुवत जीवन बिताना छोड़कर मनुष्यता की ओर झुकें। सिर्फ मन्दिरों के बरामदों पर चढ़ा देने से तथा वोटर-लिस्ट में उनका नाम छपवा देने से कोई लाभ नहीं हो सकता।” (जुलाई 1934, पृष्ठ 21)

इस लेख के लेखक रामजीवन शर्मा हैं। वे हरिजनों के लिये किस तरह की शिक्षा चाहते हैं, यह भी वे इस लेख में स्पष्ट कर देते हैं। उन्होंने पैतृक व्यवसायों को ही अच्छे ढंग से करने की तकनीकी शिक्षा देने का पक्ष लिया है। उदाहरण के लिये, वे चमारों के पेशे के बारे में लिखते हैं कि, “अब जूतों के व्यवसाय पर मुसलमानों का एकाधिपत्य हो गया है, जिससे चमारों का यह व्यवसाय उनके हाथ से निकल गया है।” इसलिये वे हरिजन सेवक संघ को सुझाव देते हुए कहते हैं कि “यदि आज भी उनको पूंजी तथा चमड़े का सामान बनाने की शिक्षा मिले, तो वे मुसलमानों से पीछे कदापि नहीं रहेंगे।… संघ को चाहिए कि वह गांव-गांव में नहीं, तो कम से कम हर जिले में तो एक-एक आश्रम ऐसा जरूर खोले, जहां चमार भाइयों को इस तरह की शिक्षा दी जाय।” (वही, पृष्ठ 19)

स्पष्ट है कि ‘विशाल भारत’ के यह लेखक दलितों के लिये स्कूल-कालेजों की शिक्षा की बात नहीं कर रहे हैं और न यह चाहते हैं कि दलित अपने घृणित और अपमानजनक पेशों से मुक्त होकर अन्य सम्मान जनक जीविका अपनायें। वे विकास और राजसत्ता में भी दलितों को भागीदार बनाने की कोई बात नहीं करते हैं। दरअसल गांधी और कांग्रेस के हरिजनोद्धार की दिशा भी यही थी। यदि हम एक अपवाद के रूप में ‘चांद’ की रेडिकल पत्रकारिता को छोड़ दें, तो इस काल की संपूर्ण हिंदी पत्रकारिता ने दलित प्रश्न को गांधी की हिंदू दृष्टि से ही देखा था, उसने डॉ. आंबेडकर की दलित-मुक्ति की दृष्टि से उस प्रश्न को बिल्कुल नहीं देखा। दलितों ने इसी कारण से वैकल्पिक दलित पत्रकारिता को स्थापित करने की दिशा में कदम बढ़ाया।

(समाप्त)


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