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इंद्र मेघवाल की हत्या : जातीय दुराग्रह की पराकाष्ठा

इस देश में किसी भी घटना का महत्व उसकी वीभत्सता या क्रूरता से ज्यादा इस बात का होता है कि ‘अपराधी’ किस जाति का है, क्योंकि हर बात में राजनीति होनी है। इसलिए अलग-अलग नॅरेटिव जातियों के अनुसार बनाए और फैलाए जाते हैं। इस प्रकार एक विशुद्ध मानवाधिकार उल्लंघन का मामला जातिगत राजनीति का हिस्सा बन जाता है। बता रहे हैं विद्या भूषण रावत

राजस्थान में जातिगत उत्पीड़नों की घटनाओं की सूची में एक नई घटना जुड़ गई है। इस बार एक नौ साल के मासूम दलित बच्चे इंद्र कुमार मेघवाल की मौत हो गई। मामला सूबे के जलोर जिले के सायला क्षेत्र के सुराना गांव की है। मृतक मासूम स्थानीय सरस्वती विद्या मंदिर स्कूल में तीसरी कक्षा का छात्र था। उसके परिजनों ने आरोप लगाया है कि स्कूल के प्रधानाध्यापक छैल सिंह ने मासूम को इतनी जोर से मारा कि उसके दिमाग की नस फट गई और 23 दिनों तक मौत से संघर्ष करने के बाद उसकी मौत गत 13 अगस्त, 2022 को गुजरात के अहमदाबाद में एक निजी नर्सिंग होम में हो गई। परिजनों के मुताबिक, इंद्र कुमार मेघवाल का कसूर केवल इतना ही था कि उसने उस मटकी से पानी पी लिया था, जिसमें छैल सिंह के लिए पानी रखा गया था।

मूल घटना 20 जुलाई, 2022 की है। यह तब तक प्रकाश में नहीं आया जबतक कि इंद्र मेघवाल की मौत नही हो गई। इसके पीछे बड़ी वजह यह रही कि परिवार के लोग अलग-अलग अस्पतालों में उसे दिखा रहे थे। घटना के बाद से ही जालोर मे तनाव व्याप्त है और जिला प्रशासन ने एहतियात के तौर पर इंटरनेट बंद कर दिया है। हालांकि देश भर में सोशल मीडिया में दलितों के आक्रोश की अभिव्यक्ति देखी जा रही है। यही वजह भी है कि इस मामले में राजस्थान की कांग्रेसी सरकार ने संवेनशील होते हुए प्रधानाध्यापक छैल सिंह के खिलाफ एससी-एसटी अत्याचार अधिनियम के तहत मुकदमा दर्ज किया और उसे गिरफ्तार कर लिया गया है।  

इस पूरे घटनाक्रम में खास यह कि राजस्थान में भी उत्तर प्रदेश के हाथरस मॉडल के जैसे गत 14 अगस्त, 2022 को इन्द्र कुमार मेघवाल के शव का अंतिम संस्कार पुलिस जोर जबरदस्ती करके करा दिया। वैसे पहले भी पुलिस इस प्रकार के घटनाक्रम मे लोगों को एकत्रित होने से रोकने के लिए ऐसा करती रही है। राजस्थान की अशोक गहलोत सरकार ने इन्द्र कुमार मेघवाल के परिवार को पांच लाख रुपए की आर्थिक मदद दी है, जो कि एससी-एसटी अत्याचार अधिनियम के प्रावधानों के अनुरूप ही है। विभिन्न सामाजिक कार्यकर्ताओ की मांग है कि राज्य सरकार को स्थिति की गंभीरता को देखते हुए तुरंत कार्यवाही करनी चाहिए थी, लेकिन अशोक गहलोत सरकार ने इस पर न केवल देर से कार्यवाही की बल्कि परिवार को जो आर्थिक मदद दी गई, वह भी बेहद कम है। यह वही गहलोत सरकार है, जिसने अभी कुछ दिनों पहले ही उदयपुर मे कट्टरपंथियों के द्वारा मारे गए टेलर मास्टर कन्हैया लाल के परिवार को पचास लाख रुपए की मदद की थी और उसके दोनों बेटों को नौकरी देने का वायदा भी किया था। सवाल यह है कि अशोक गहलोत इस मामले में क्यों ढीले दिखाई दे रहे हैं? 

वैसे देखा जाए तो विपक्षी भाजपा भी इस विषय को मजबूती से नहीं उठा रही है और वह इसे केवल कांग्रेस सरकार की असफलता करार दे रही है। इस मामले में हालांकि बहुजन समाज पार्टी (बसपा) ने मजबूती से सवाल पूछने का साहस जरूर दिखाया है। लेकिन जमीन पर चंद्रशेखर आजाद और उनकी पार्टी के लोग ही दिखाई दे रहे हैं। 

घटना को लेकर दो प्रकार की प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं। अधिकारी और छैल सिंह के परिवार और उनकी स्वजाति के लोग कह रहे है कि छुआछूत की कोई घटना नहीं थी, क्योंकि स्कूल में सभी बच्चों के लिए के नल लगा हुआ है। यह भी बताया जा रहा है कि स्कूल मे कुल 8 अध्यापकों में से 5 दलित समाज के हैं और छैल सिंह का पहले से ऐसा कोई आपराधिक रिकार्ड नहीं रहा है। कई लोग इन्द्र मेघवाल के परिजनों और छैल सिंह के लोगों के बीच समझौता की बातचीत का ऑडियो भी सोशल मीडिया पर साझा कर रहे हैं और यह जोर देकर बता रहे हैं कि इस घटना में  जातिवाद जैसी बात नहीं है। इसके लिए स्कूल के एक दलित अध्यापक का विडियो भी सार्वजनिक किया गया है कि उनके स्कूल मे कोई भेदभाव नहीं होता। 

यह मानना असंभव है कि स्कूल में भेदभाव नहीं हुआ होगा। यदि यह उत्तर प्रदेश की बात होती तो कुछ देर के लिए माना जा सकता है कि अब इस राज्य में ऐसी बातें बातें आसान नहीं हैं।  हालांकि भाजपा के सत्ता मे आने के बाद से सवर्ण जातियों की चौधराहट बढ़ी है और दलितों पर हमले भी बढ़े हैं, लेकिन फिर भी वहां लोग लड़ रहे हैं, क्योंकि बसपा के उदय के बाद से ही उत्तर प्रदेश मे बहुत बदलाव हुए हैं। फिर पिछड़े समुदायों की पार्टिया भी खड़ी हुई हैं, लेकिन यह भी सच है कि इन दलों के आपसी अंतर्द्वंद्व का लाभ मनुवादी शक्तियों को मिला है।  

राजस्थान में दलितों के साथ त्रासदी यह है कि यहां दलितों का अपना कोई नेतृत्व नहीं है। उन्हें उन दो पार्टियों पर निर्भर रहना पड़ता है, जिनकी लगाम जातिवादियों के हाथ में है। इंद्र मेघवाल हत्या के मामले में ही अभी एक कांग्रेस के विधायक पानाचंद्र मेघवाल ने त्यागपत्र दिया है। लेकिन क्या इस्तीफा देना कोई समाधान है? सवाल तो यह है कि  20 जुलाई, 2022 को इंद्र मेघवाल को उसके प्रधानाध्यापक छैल सिंह ने पीटा और उसकी मौत 13 अगस्त, 2022 को उसकी मौत हुई। इतने दिनों तक क्या लोगों ने कोई प्रयास किया? मतलब यह कि क्या इस घटना का पता राजस्थान के जन-संगठनों को था या नहीं? यदि था तो उन्होंने क्या प्रयास किए और यदि नहीं था तो भी यह उनकी असफलता ही कही जाएगी। 

इस घटनाक्रम से दो बातें उभरकर सामने आ रही हैं। एक, यह कि राजस्थान में दलितों का उत्पीड़न बहुत अधिक होता है और उत्पीड़क जातियों में राजपूत, जाट और गुर्जर शामिल हैं। राजस्थान के सामाजिक ताने-बाने से बहुत अधिक परिचित नहीं हूं, इसलिए यह नहीं कह सकता कि इन तीनों जातियों में कौन ज्यादा उत्पीड़क है और कौन कम। ऐसे ही मुझे नहीं पता कि ब्राह्मणों का कितना वर्चस्व है। हालांकि परंपरागत राज्य होने के कारण ब्राह्मणों की सांस्कृतिक सत्ता तो वहां बरकरार है। यह बात दावे के साथ कही जा सकती है।

गत 17 अगस्त, 2022 को राजस्थान के जालोर में इंद्र कुमार मेघवाल की हत्या के आरोपी शिक्षक छैल सिंह के समर्थन में जुटे लोग

लेकिन मुख्य सवाल यह है कि अशोक गहलोत इस प्रश्न पर बात करने को क्यों तैयार नहीं हैं? क्या सवर्ण समाज के लोग अपने किसी अपराधी को अपराधी मानने को तैयार नहीं हैं? क्या कोई जातिगत पंचायत की बैठक हुई है, जिसने राज्य सरकार पर कोई दवाब बनाया है? यदि राजस्थान में कोई छुआछूत नहीं है तो सरकार को बताना चाहिए। और यदि उसके पास इसकी मुकम्मिल जानकारी नहीं है तो उसे निजी और सरकारी स्कूलों का सर्वेक्षण करवाना चाहिए कि वहां दलित छात्र-छात्राओं के साथ कैसा व्यवहार किया जाता है। 

छैल सिंह राजपूत, राजपुरोहित या भौमिक राजपूत?  

इस देश में किसी भी घटना का महत्व उसकी वीभत्सता या क्रूरता से ज्यादा इस बात का होता है कि ‘अपराधी’ किस जाति का है, क्योंकि हर बात में राजनीति होनी है। इसलिए अलग-अलग नॅरेटिव जातियों के अनुसार बनाए और फैलाए जाते हैं। इस प्रकार एक विशुद्ध मानवाधिकार उल्लंघन का मामला जातिगत राजनीति का हिस्सा बन जाता है। मसलन, इंद्र मेघवाल की हत्या के आरोपी छैल सिंह के बारे में अनेक लोगों ने कहा कि वह राजपुरोहित समाज से आता है, जो ब्राह्मण होते हैं। दूसरों ने कहा कि वह राजपूत है। फ़िर यह बात सामने आई कि वह भौमिक राजपूत है, जो राजस्थान मे पिछड़े वर्ग में शामिल है और जालोर और उसके आसपास के इलाकों मे इस जाति का दबदबा बताया जाता है। राजपूत इस जाति को पूरी तरह से राजपूत नहीं मानते हैं और ये अपने को किसी से कम भी नहीं समझते। ठीक वैसे ही जैसे बिहार और पूर्वांचल के भूमिहार जाति के लोगों को ब्राह्मण नहीं माना जाता और भूमिहार खुद को ब्राह्मण से श्रेष्ठ समझते हैं। अब बात यह है कि चाहे किसी भी जात का हो, मामला दलित उत्पीड़न का है और उसकी भयवाहता का है, इसलिए इसकी न केवल कटु निंदा होनी चाहिए, बल्कि कार्रवाई का ऐसा उदाहरण पेश किया जाय कि स्कूलों मे कोई ऐसी हरकत दुबारा न कर सके। 

लेकिन दुखद यह कि जो लोग अभी गुजरात में पिछड़े वर्ग के छात्रों द्वारा दलित वर्ग की महिला द्वारा बनाए गए खाने के बहिष्कार पर चुप्पी साधे थे, वे अचानक से सक्रिय हो गए हैं। जिन्होंने तमिलनाडु मे 60 वर्षों बाद भी दलित महिला सरपंच को तिरंगा न फहराने देने की धमकी को लेकर एक शब्द नहीं बोला, वे भी आज सोशल मीडिया पर अभियान चला रहे हैं। सवाल इस बात का नहीं है कि राजपूतों ने या पिछड़ों ने या ब्राह्मणों ने छुआछूत की है। सवाल यह है कि क्या हम इस पर ईमानदारी से बहस करेंगे? जब एक बच्चे के साथ अन्याय हुआ है तो हमें बोलना ही होगा। छुआछूत का सवाल वर्णवादी व्यवस्था का सवाल है, जिसने हम सभी को दुष्प्रभावित किया है। यह प्रश्न हमारी चरमराती राजनीतिक व्यवस्था का भी है, जो हर मुद्दे को वोट की राजनीति से तोल कर, उसके नफे-नुकसान के आधार पर कोई निर्णय लेती है। 

इंद्र मेघवाल की हत्या के संदर्भ में अब जो कहानियां सामने आ रही हैं, वे नाना प्रकार की हैं। मसलन बताया जा रहा है कि सरस्वती विद्या मंदिर एक निजी स्कूल है, जिसके दो पार्टनर है। एक छैल सिंह और दूसरा अशोक जीनगर, जो कि दलित समाज से आता है। यह भी बताया जा रहा है कि स्कूल के कुल 8 अध्यापकों में से पांच दलित वर्ग के हैं और मटके जैसे कोई बात ही नहीं है। बस अध्यापक ने मासूम इंद्र मेघवाल को पीट दिया था।

दरअसल यह बताने में सब पूरी ऊर्जा लगा रहे हैं कि गांव अच्छा है वहां  ‘छुआछूत’ नहीं होता। हालांकि गांव अच्छे इसलिए होते हैं, क्योंकि हर जाति की अपनी-अपनी ‘गिरोहबंदी’ होती है और सब अपनी ‘सीमाएं’ जानते हैं। जब तक दलित खेत मजदूर, सफाई का काम आदि पारंपरिक काम करते रहेंगे तब किसी को क्या परेशानी होगी। दरअसल परेशानी तो तब होती है जब एक सफाईकर्मी का बेटा अच्छे कपड़े पहन ले और बुलेट चलाए या वह बड़ी-बड़ी मूंछों पर ताव देकर सेल्फ़ी ले या शादी में घोड़े पर सवार होने की जिद करे। अब ये परंपराएं सवर्णों के लिए जन्मना आरक्षित है। असल में दलित मूलतः इन परंपराओं के बिना ही अच्छे हैं, लेकिन ऐसी परंपराओं पर बहस क्यों चले, जिन पर ब्रह्मणवाद का कॉपीराइट है। 

यह भी पढ़ें – इंद्र मेघवाल हत्याकांड : मटकी छिपाने से नहीं छिपेगा जातिवादी घृणा का सच

अब सवाल आता है कि मास्टर साहब ने बच्चे को कितना मारा? मुझे तो नहीं पता लेकिन एक हकीकत है। चलिए मान लिया कि उन्होंने बच्चे को जाति के आधार पर न मारा हो, लेकिन मारा तो है। और मारा भी तो बेरहमी से मारा। तभी तो बच्चे की हालत खराब हो गई। क्या अध्यापक द्वारा बच्चे को मारा जाना अपराध नहीं होना चाहिए? मैं इस प्रकार की मार का भुक्तभोगी रहा हूं। उस समय मैं चौथी कक्षा का छात्र था और सरकारी नगरपालिका स्कूल मे पढ़ता था। एक दिन सबसे किनारे की पंक्ति मे आगे से दूसरे नंबर पर बैठा था। हमारे गुरुजी जिन्हें भट जी कहते थे, गणित पढ़ा रहे थे। वह दौर ऐसा था जब हम सभी जमीन पर बैठते थे। गुरुजी को मेरे ऊपर गुस्सा आ गया, क्योंकि मैंने सवाल का उत्तर लिखने की बजाए प्रश्न ही कॉपी में लिख दिया। उन्होंने मुझे लातों से मारना शुरू किया और फिर जब उनकी लातें थक गईं तो बेंत से मेरे ऊपर हमला बोला। इससे मेरा सिर फट गया और खून बहने लगा। गुरुजी थोड़ा सहम गए और उन्होंने मुझे तुरंत घर भेज दिया। रोते हुए मैं घर वापस गया तो मेरे पिताजी ने स्कूल के प्रधानाध्यापक को इसके विरोध मे एक पत्र लिखा। हालांकि गुरुजी ने बाद में मेरे ऊपर हाथ नहीं उठाया, लेकिन उनके कारण मेरे दिल मे जो डर बैठा, वह उस क्लास से पास होकर ही खत्म हुआ। 

अपना संस्मरण मैं इसलिए दे रहा हूँ क्योंकि बच्चों को बेरहमी से पिटने की घटनाएं होती हैं। गांवों मे अध्यापक जातीय दुराग्रह के कारण से भी ऐसा आचरण करते हैं। उत्तर प्रदेश के कई इलाकों मे अभी भी टीचर दलित बच्चों से दूर रहते है और हाथ से मारने की बजाए, लंबी छड़ी का इस्तेमाल करते है ताकि बच्चे में डर भी बना रहे और ‘छूत’ भी न हो।

बहरहाल, राजस्थान में जो हुआ है, वह शर्मनाक और निंदनीय है। हम अपने बच्चों के साथ कैसा व्यवहार करते हैं, वह दिखाई देता है। लेकिन उससे भी खतरनाक ये तब होता है जब समाजों के बीच मे इसको लेकर अलग-अलग नॅरेटिव बनने शुरू होते है। अब सवर्णों का समूह यह कह रहा है कि स्थानीय दलितों की ओर से बाहर के लोग इसको हवा दे रहे हैं और छैल सिंह ने ऐसे ही चांटा मारा होगा, तो ऐसी बातें नहीं पचती हैं। 

(संपादन : नवल/अनिल)


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लेखक के बारे में

विद्याभूषण रावत

विद्याभूषण रावत सामाजिक कार्यकर्ता, लेखक और डाक्यूमेंट्री फिल्म निर्माता हैं। उनकी कृतियों में 'दलित, लैंड एंड डिग्निटी', 'प्रेस एंड प्रेजुडिस', 'अम्बेडकर, अयोध्या और दलित आंदोलन', 'इम्पैक्ट आॅफ स्पेशल इकोनोमिक जोन्स इन इंडिया' और 'तर्क के यौद्धा' शामिल हैं। उनकी फिल्में, 'द साईलेंस आॅफ सुनामी', 'द पाॅलिटिक्स आॅफ राम टेम्पल', 'अयोध्या : विरासत की जंग', 'बदलाव की ओर : स्ट्रगल आॅफ वाल्मीकीज़ आॅफ उत्तर प्रदेश' व 'लिविंग आॅन द ऐजिज़', समकालीन सामाजिक-राजनैतिक सरोकारों पर केंद्रित हैं और उनकी सूक्ष्म पड़ताल करती हैं।

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