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तिलक का राष्ट्रवाद (पहली किस्त)

अगर अंग्रेज नहीं आए होते, और संपूर्ण भारत में पेशवा राज कायम हो जाता, तो शूद्रों, स्त्रियों, किसानों और मेहनतकश जनता का उत्पीड़न और दमन संपूर्ण देश में कितना भयानक होता। क्या तिलक को मालूम नहीं था कि पेशवा राज में औरतों की कितनी दुर्दशा होती थी? बता रहे हैं कंवल भारती

पेशवाराज का पतन और सुधारआंदोलन

बाल गंगाधर तिलक (1856-1920) को हिंदू राष्ट्रवाद का संस्थापक माना जाता है। इसके कारणों पर विचार करना होगा। जब 1818 में पेशवा शासन के पतन के बाद पूना में ब्रिटिश राज कायम हुआ, तो ब्राह्मणों की रातों की नींद उड़ गई। उनकी नींद पेशवाओं का राज खत्म होने से नहीं उड़ी, बल्कि इसलिए उड़ी, क्योंकि ब्रिटिश राज (कंपनी राज) ने वर्णव्यवस्था का राज खत्म कर दिया था। शूद्रों को आज़ादी मिल गई थी, जो पेशवाओं के राज में नहीं थी। मसलन, पेशवा शासन में अछूतों को गले में हांडी और कमर में झाड़ू लटकाकर सड़कों पर चलना पड़ता था, ताकि वे थूकें, तो हांडी में थूकें और सड़क पर उनके पैरों के निशान कमर में लटकी झाड़ू से मिटते चले जाएं। अंग्रेजों ने उन्हें इस गुलामी से मुक्त कर दिया था, और उन्हें पढ़ने-लिखने के साथ-साथ वे अधिकार भी मिल गए थे, जिनसे वे वंचित थे। खिरकी की लड़ाई में जब पेशवा हारे थे, तो उस समय बाजीराव द्वितीय का शासन था। वह शासन कैसा था, उसके बारे में तिलक, फुले, आंबेडकर और सावरकर के जीवनी लेखक धनंजय कीर लिखते हैं कि जिन ब्राह्मणों को शिवाजी ने अपनी स्थापित व्यवस्था से बाहर रखा था, वे बाजीराव द्वितीय के शासन में विशेष अधिकारों से संपन्न शासक वर्ग के रूप में काम करते थे। उन्हें कानूनन दंड से मुक्त रखा गया था। अकाल के भयानक समय में भी बाजीराव की सरकार में केवल ब्राह्मणों को सहायता मिलती थी, शेष किसी भी पीड़ित वर्ग को नहीं। किसानों और मेहनतकश जनता के साथ पेशवा अधिकारी और उनके दत्तक पुत्र अमृतराव का व्यवहार बेहद अमानवीय था। यदि किसान सूखा या अकाल के संकट की स्थिति में सरकार को टैक्स नहीं दे पाते थे, तो वे उनके बच्चों पर कड़ाही से खौलता हुआ तेल डलवा देते थे। निर्दयता से उनकी पीठ पर भारी पत्थर रखकर उनकी झुकी हुई कमर पर चाबुक बरसाते थे। उनके झुके हुए सिरों के नीचे और नाभि के पास बारूद उड़ाया जाता, जिससे उनका दम घुटने लगता था। पेशवा शासक समझते थे कि समाज के निम्न वर्गों का जन्म उच्च वर्गों की दासता करने के लिए ही हुआ है।[1]

इन्हीं पेशवा के संबंध में तिलक ने अपने पत्र ‘महारट्ट” के 20 अगस्त, 1893 के अंक में अपने संपादकीय में लिखा था– “यदि अंग्रेज भारत में नहीं आए होते, तो संपूर्ण देश में पेशवा राज होता।” यह इस बात का प्रमाण है कि ब्राह्मण पेशवा राज का खात्मा नहीं, विस्तार चाहते थे। कल्पना कीजिए, अगर अंग्रेज नहीं आए होते, और संपूर्ण भारत में पेशवा राज कायम हो जाता, तो शूद्रों, स्त्रियों, किसानों और मेहनतकश जनता का उत्पीड़न और दमन संपूर्ण देश में कितना भयानक होता। क्या तिलक को मालूम नहीं था कि पेशवा राज में औरतों की कितनी दुर्दशा होती थी? धनंजय कीर ने लिखा है कि ‘वाई’ इलाके में जब बाजीराव की यात्रा निकलने वाली थी, तो उसकी पूर्व संध्या पर वहां की औरतों ने भयभीत होकर आत्महत्या कर ली थी। इसलिए पेशवा राज के पतन पर ब्राह्मणों के सिवा प्रजा का एक भी आंसू नहीं बहा था। सबसे ज्यादा खुशी औरतों को हुई थी, जो कह रही थीं, “हम बहुत खुश हैं, जो बाजीराव का शासन खत्म हो गया, वह बदमाश इसी के लायक था। उसने गरीबों को पीसा, भगवान की चक्की ने उसे पीस दिया।”[2]

लेकिन इसके बावजूद, समाज में ब्राह्मण-वर्चस्व कायम था, जो सभी सामाजिक सुधारों का विरोध कर रहा था। ब्रिटिश शासन के बावजूद यह ब्राह्मण-प्रभुत्व गैर-ब्राह्मणों को वर्णव्यवस्था के विरुद्ध स्वतंत्रता देने को तैयार नहीं था। पेशवा के बाद, अंग्रेजी राज के प्रभाव से जाति-व्यवस्था के बंधन शिथिल हो गए थे। परिणामत: ब्राह्मणों में भी एक ऐसा पुरोहित वर्ग पैदा हो गया था, जो धर्मशास्त्रों की संहिता का उल्लंघन करके गैर-ब्राह्मणों के लिए भी वैदिक मंत्रों के साथ अनुष्ठान कराने लगा था। दूसरा वर्ग अंग्रेजी-शिक्षित ब्राह्मण-सुधारकों का पैदा हुआ, जिसने धर्मशास्त्रों की उपयोगिता पर ही सवाल उठाने का साहस किया, और तीसरे विद्रोही वर्ग का उभार शूद्र वर्ग में हुआ, जिसने ब्राह्मण-प्रभुत्व को ही नकार दिया। इसी शूद्र वर्ग में महान क्रांतिकारी सुधारक जोतीराव फुले हुए, जिन्होंने शूद्रों की शिक्षा के क्षेत्र में क्रांतिकारी काम किया और ‘गुलामगिरी’ जैसा महान ग्रंथ लिखकर अपने वैज्ञानिक तर्कों से ब्राह्मणों के धर्मशास्त्रों और उनके अवतारवाद की धज्जियां उड़ा दीं।

दस्तावेज बताते हैं कि 1818 में ही, जिस वर्ष पेशवा राज खत्म हुआ, एक ब्राह्मण ने अहमदनगर के सुनारों के लिए वैदिक मंत्रों के साथ अनुष्ठान संपन्न किया। इस पर पूना के ब्राह्मणों ने उस ब्राह्मण का बहिष्कार कर दिया और सरकार से मांग की कि ब्राह्मण की गरिमा को अपमानित करने के लिए सुनारों को दंडित किया जाए। लेकिन अंग्रेज सरकार ने इस पर ध्यान नहीं दिया। तब पूना के ब्राह्मणों ने पंचायत करके सख्त फरमान जारी किया कि सुनार परिवार कदापि वेदोक्त अनुष्ठान नहीं करें, साथ ही यह आदेश भी दिया कि वे नमस्कार की जगह ‘राम राम’ कहें, और शूद्रों की तरह ही दोहरे तह की धोती पहनें, ब्राह्मणों की तरह इकहरी धोती नहीं।[3]

बाल गंगाधर तिलक

इसके बावजूद ब्राह्मणों की धर्म-व्यवस्था के खिलाफ सुधारवादियों के कार्यक्रम जारी रहे। शास्त्री जम्भेकर, भाऊ महाजन, गोपाल हरी देशपांडे जैसे सुधारवादी ब्राह्मण रूढिवादियों के भारी विरोध के बावजूद बाल-विवाह का विरोध, और स्त्रियों की शिक्षा का समर्थन करते रहे। इसी समय गोविंद रानाडे और उनके साथियों ने ‘प्रार्थना समाज’ (1866) कायम किया, जिसका सदस्य बनने की शर्त थी कि उसे ईसाई की बनाई रोटी खानी होगी और मुसलमान का दिया पानी पीना होगा। रानाडे ने जाति का विरोध किया और कहा कि जाति ने हिंदू समाज को इस आधार पर बांट रखा है कि कुछ लोगों को विशेषाधिकार प्राप्त हैं और शेष बहुसंख्यक समाज प्रतिबंधों में जी रहा है। प्रार्थना समाज की आस्था भक्ति आंदोलन में थी, और वे संत तुकाराम को बुद्ध और जीसस की तरह अपना आदर्श मानते थे। उसके सदस्य सुबह की प्रार्थना में तुकाराम के अभंग गाते थे।[4]

प्रार्थना समाज की स्थापना के सात साल बाद, 1873 में पूना में जोतीराव फुले ने ‘सत्यशोधक समाज’ का निर्माण किया। उन्होंने देखा कि गोविंद रानाडे और अन्य सभी ब्राह्मण समाज-सुधारक वर्णव्यवस्था का खंडन नहीं करते थे, तथा अतीत की परंपराओं से मुक्त नहीं हुए थे।[5] फुले ने वर्णव्यवस्था और जातिभेद के खंडन के साथ-साथ उसका समर्थन करने वाले धर्मशास्त्रों को भी अमान्य करार दिया, जिन्हें अस्वीकार करने का साहस ब्राह्मण सुधारक नहीं करते थे। फुले का दर्शन पूरी तरह पश्चिम के ज्ञान-विज्ञान, ख़ास तौर से अमेरिका के स्वतंत्रता संघर्ष से प्रभावित था। अछूतों और लड़कियों के लिए भारत का पहला स्कूल खोलने का श्रेय भी उन्हीं को जाता है। धनंजय कीर ने लिखा है कि फुले के जन्म से पहले आधुनिक अर्थ में भारत में शिक्षा का अस्तित्व नहीं था। उच्च हिंदुओं की आबादी में कुछ निजी स्कूल चलते थे, जिनमें ब्राह्मण संस्कृत, व्याकरण और दर्शन पढाते थे। शूद्रों और स्त्रियों को शिक्षा ग्रहण करने का कोई अधिकार नहीं था। इसलिए फुले ने शूद्रों, अतिशूद्रों और स्त्रियों की शिक्षा के लिए स्कूल खोले, जिससे वे शिक्षित और जागरूक होकर गुलामी की जंजीरों को तोड़ सकें।[6] लेकिन ब्राह्मणों ने उनके समाज-सुधार अभियान का कभी समर्थन नहीं किया। फुले ने अपनी पत्नी सावित्रीबाई को भी पढ़ा-लिखाकर शिक्षिका बनाया, जो उन्हीं के स्कूल में लड़कियों को पढ़ाने लगी थीं। ‘गुलामगिरी’ की भूमिका में उन्होंने ब्राह्मणों द्वारा शूद्रों पर किये जाने वाले अत्याचारों का हृदयविदारक वर्णन किया है, और उनके कष्टों को दूर करने के लिए अंग्रेजी राज की प्रशंसा की है। फुले के इस लेख की तुलना जी. पी. देशपांडे[7] ने 1853 में कार्ल मार्क्स के भारत पर लिखे लेख (इंग्लैंड हैज टू फुलफिल ए डबल मिशन इन इंडिया) से की है, जो कहता है कि ब्रिटिश राज एक ओर प्राचीन एशियाई समाज का विध्वंस, और दूसरी ओर भारत में एक नए समाज का पुनर्निर्माण कर रहा है। मार्क्स भारत में ब्रिटिश राज के भविष्य के बारे में लिख रहे थे, और फुले ब्रिटिश राज के तहत भारत के भविष्य के बारे में सोच रहे थे। फूले ने ब्रिटिश राज में ब्राह्मणवादी व्यवस्था के नष्ट होने की आशा से उसका स्वागत किया था। फुले ने लिखा था कि भारत में ब्राह्मणों के अत्याचार सहते-सहते बहुत से अछूत त्रस्त हो गए। वे इन अत्याचारों से अपनी मुक्ति की प्रतीक्षा उसी तरह कर रहे थे, जिस तरह एक कैदी अपने इष्ट मित्रों, भाई-बहनों और बाल-बच्चों से मिलने के लिए या आज़ादी से घूमने के लिए करता है। “इनकी प्रतीक्षा का अंत तब हुआ, जब इस देश में अंग्रेजी राज कायम हुआ। अंग्रेजों के आगमन के बाद वे बहुत कुछ ब्राह्मणी दासता से मुक्त हो गए, जिसके लिए वे अंग्रेजी शासन के आभारी और ऋणी हैं। वे इनके उपकारों को कभी नहीं भूलेंगे। अंग्रेजों ने वास्तव में इस देश में आकर शूद्र-अतिशूद्रों को हजारों वर्ष के बंदी जीवन से मुक्त कर उनके परिवार के लोगों को सुख-शांति के दिन दिखाए, वरना ब्राह्मणों ने इन्हें पता नहीं कब मिट्टी में मिला दिया होता।”[8]

फुलेके सत्यशोधक समाज की विचारधारा का शूद्र समाज पर परिवर्तनकारी प्रभाव पड़ा। उनकी मृत्यु के बाद अनेक महार अछूतों ने अलग-अलग संगठन बनाकर उनके कार्य को आगे बढ़ाया, और भक्ति-आधारित पृथक महार अस्मिता के पक्ष में ब्राह्मणवादी हिंदूधर्म द्वारा थोपे गए धार्मिक अनुष्ठानों का बहिष्कार किया।[9]

इसी समय वैदिक धर्म के पुनरुद्धार के लिए गुजराती ब्राह्मण दयानंद सरस्वती ने आर्य समाज (1875) की स्थापना की और उसके तहत सनातनी ब्राह्मणों के विरुद्ध एक रेडिकल आंदोलन चलाया। परिमाला वी. राव के अनुसार, महाराष्ट्र में जोतीराव फुले और महादेव गोविंद रानाडे आर्यसमाज आंदोलन के समर्थक थे। इसका कारण था कि दयानंद सरस्वती ने जातिप्रथा के बंधनों को शिथिल करने, छोटी बच्चियों का विवाह न करने, विधवा-विवाह कराने, और लड़कियों की शिक्षा पर जोर दिया था। एक परिवर्तनकारी सुधारक के रूप में स्वामी दयानंद ने जबरन वैधव्य का विरोध करते हुए, ब्राह्मणों को अपनी बेटियों का हत्यारा कहा था। जोतीराव फुले ने शूद्रों के दमन के लिए आर्यों की आलोचना की और इस संबंध में दयानंद सरस्वती तथा आर्यसमाज की शिक्षा की प्रशंसा की थी।[10] धनंजय कीर ने लिखा है कि सनातनी ब्राह्मण दयानंद सरस्वती के इतने प्रबल विरोधी थे कि उनकी जान के दुश्मन बन गए थे। जब रानाडे के निमंत्रण पर दयानंद सरस्वती पूना आए, तो सुधारकों ने उनके स्वागत में उनको एक जुलूस के रूप में ले जाने की घोषणा की। जवाब में सनातनी ब्राह्मणों ने जुलूस को रोकने का फरमान जारी किया। तब सुधारकों ने जोतीराव फुले से सहायता की अपील की, जिसे उन्होंने स्वीकार कर लिया, और अपने सारे अनुयायियों को जुलुस में शामिल होने को बोल दिया। 5 सितंबर, 1875 को दयानंद सरस्वती को हाथी पर बैठाकर जुलूस निकाला गया। जुलूस में भारी भीड़ थी, सबसे आगे रानाडे और फुले साथ-साथ चल रहे थे। पूना के सनातनी ब्राह्मणों ने दयानंद सरस्वती के विरोध में एक गधे को सजाकर तैयार किया, और नाम रखा ‘गर्दाभानंद’। वे एक अलग दिशा से गर्दभ-जुलुस निकालकर उसी जगह पहुंचे, जहां दयानंद सरस्वती का जुलुस पहुंचा। फलत: दोनों दलों के बीच संघर्ष हुआ। रानाडे ने पुलिस बुला ली थी, और पुलिस को विरोधियों को खदेड़ने के लिए लाठी-चार्ज करना पड़ा।[11] परिमाला राव के अनुसार, बाल गंगाधर तिलक दयानंद सरस्वती के प्रमुख विरोधियों में थे, और उन्हीं के समर्थकों ने, जिनमें एक का नाम रामचंद्र नाटू था, दयानंद पर हमला किया था। असल में पूना के चितपावन भूदेवों को, जिनका नेतृत्व तिलक कर रहे थे। इन तीन अलग-अलग विद्रोहों के एक साथ आ जाने से खतरा पैदा हो गया था : एक, दयानंद का पुनर्जागरण आन्दोलन, जो सभी जातियों के लिए वैदिक ज्ञान देने का समर्थन कर रहा था; दूसरा, प्रार्थना समाज का आंदोलन, जो तुरंत जातिव्यवस्था को समाप्त करने और अनिवार्य शिक्षा का समर्थक था; और तीसरा, सत्यशोधक समाज का आंदोलन, जिसने गैर-ब्राह्मणों को पुरोहित बना दिया था। इसके अतिरिक्त एक अन्य महत्वपूर्ण घटना उस दशक में, 1876-78 के दौरान, यह घटित हुई थी कि दक्कन के किसानों ने साहूकारों के खिलाफ, जिनमें अधिकांश साहूकार चितपावन ब्राह्मण थे, विद्रोह करके उनके दो सौ साल के सामाजिक-आर्थिक आधिपत्य को तोड़ दिया था।[12]

यहां यह बताना आवश्यक है कि जहां जोतीराव फुले अछूतों और स्त्रियों की शिक्षा का समर्थन करने की वजह से दयानंद सरस्वती के प्रशंसक थे, वहां दयानंद सरस्वती ने भी फुले के ‘सत्यशोधक समाज’ नाम से प्रेरित होकर अपने ग्रंथ का नाम ‘सत्यार्थ प्रकाश’ रखा था, जो 1875 में छपा था। ‘सत्यार्थ प्रकाश’ प्रश्नोत्तरी संवाद शैली में लिखा गया ग्रंथ है, जो फुले के 1873 में प्रकाशित ग्रंथ ‘गुलामगिरी’ की शैली है। यही नहीं, फूले ने ‘गुलामगिरी’ में हिंदुओं के अवतारों का खंडन किया है, और दयानंद सरस्वती के ‘सत्यार्थ प्रकाश’ में भी ईश्वर के अवतार लेने का खंडन मिलता है।

हालांकि महाराष्ट्र में आर्यसमाज अपनी जड़ें नहीं जमा सका था, क्योंकि वहाँ पेशवाओं के ब्राह्मण राज द्वारा स्थापित जातिव्यवस्था इतनी मजबूत थी कि हिंदू उसे छोड़ने को तैयार नहीं थे। दूसरे, दयानंद सरस्वती के वैदिक धर्म को महाराष्ट्र की जनता समझ नहीं पाई थी, और तीसरे, पूना के सनातनी ब्राह्मणों ने अपनी प्रतिक्रियावादी ऐंठन के साथ उन सभी लोगों को, जो समाज में परिवर्तन लाने के लिए, एक नए ज्ञान के लिए, अस्पृश्यता के उन्मूलन के लिए, सामाजिक न्याय और सामाजिक समानता के लिए आवाज उठा रहे थे, हिंदू धर्म और देश का शत्रु घोषित कर दिया था।[13]

उन्नीसवीं सदी में रानाडे और जोतीराव फुले के आंदोलनों के बावजूद समाज नहीं बदला। बीसवीं सदी में डॉ. आंबेडकर ने भारत में जाति के विनाश और समता-मूलक समाज की स्थापना के लिए लगभग तीन दशकों तक लड़ाई लड़ी, लेकिन ब्राह्मणों ने समाज को नहीं बदलने दिया। यह एक बड़ा सवाल है कि ब्राह्मण परिवर्तन क्यों नहीं चाहते? वे स्वयं को बदलना क्यों नहीं चाहते? देश भर के तमाम समाज-सुधारकों की आवाजें मुट्ठी-भर सनातनी ब्राह्मणों के विरोध के तले क्यों दबकर रह गई? क्यों ब्राह्मणवाद इस इक्कीसवीं सदी में भी सामाजिक परिवर्तन के खिलाफ चट्टान की तरह बाधा बनकर खड़ा हुआ है? इस प्रश्न का एक ही उत्तर है कि जिस दिन ब्राह्मण अपनी वर्णव्यवस्था के खिलाफ सामाजिक न्याय और समानता के सिद्धांत को स्वीकार कर लेगा, उसी दिन वह उसका शासक वर्ग का स्तर खत्म हो जाएगा, जिसे वह छोड़ना नहीं चाहता।

अत: सुधार-आंदोलनों की चुनौतियों से निपटने के लिए चितपावन ब्राह्मणों ने स्वयं को संगठित किया, और सामाजिक क्रांति की धारा के विरुद्ध तीव्र प्रतिक्रांति करने के विचार से राष्ट्रवादी समूह बनाया। इस समूह में शामिल होने वाले चितापावनों में विश्वनाथ नारायण मंडलिक, जो पेशवाओं से संबंधित थे, महादेव बल्लाल नामजोशी, विष्णु शास्त्री चिपलूनकर और बाल गंगाधर तिलक थे। मंडलिक ने 1864 में ‘नेटिव ओपिनयन’, चिपलूनकर ने 1874 में ‘निबन्ध-माला’, और तिलक ने 1881 में मराठी में ‘केसरी’ और अंग्रेजी ‘दि महारट्ट’ नाम से पत्रों का प्रकाशन आरंभ किया। इन पत्रों के माध्यम से उन्होंने प्रार्थना समाज, जोतीराव फूले और दयानंद के विचारों का खंडन करना शुरू किया। और हिंदू संस्कृति और सभ्यता की सर्वोच्चता को स्थापित करने के अभियान में लग गए।[14]

इस संबंध में डॉ. आंबेडकर ने अपने व्याख्यान ‘रानाडे, गाँधी और जिन्ना’ में लिखा है कि महाराष्ट्र में ब्राह्मण बुद्धिजीवियों के दो सैद्धांतिक वर्ग थे– पहला वर्ग सनातनी ब्राह्मणों का था, जो अपने विचारों में रूढ़िवादी और अराजनीतिक था, और दूसरा अपने विचारों में आधुनिक था, पर अपने उद्देश्यों में राजनीतिक था। पहले वर्ग का नेतृत्व चिपलूनकर के हाथों में था, और दूसरे वर्ग के नेता तिलक थे। और दोनों ही सुधार-विरोधी थे।[15]

[1] ‘महात्मा जोतीराव फुले, फादर ऑफ इंडियन सोशल रिवोल्यूशन’, धनंजय कीर, पॉपुलर प्रकाशन, मुंबई, दूसरा संस्करण, 1974, पृष्ठ 4

[2] वही, पृष्ठ 5

[3] ‘फाउंडेशन ऑफ तिलक्स नेशनलिज्म’, परिमाला वी. राव, ओरिएंट ब्लैक स्वान, नई दिल्ली, 2011, पूष्ठ 7

[4] वही, पृष्ठ 11-12

[5] ‘कांसेप्ट ऑफ इक्वलिटी’, बी. एन. गांगुली, इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ एडवांस्ड स्टडीज, शिमला, 1975, पृष्ठ 5

[6] धनंजय कीर, उपरोक्त

[7] सिलेक्टेड राइटिंग्स ऑफ जोतीराव फुले, जी. पी. देशपांडे, लेफ्टवर्ड बुक्स, नई दिल्ली, 2002, पृष्ठ 18

[8] जोतीराव फूले, ‘गुलामगिरी’, अनुवाद : एस. मूर्ति, कल्चरल पब्लिशर्स, लखनऊ, 1994, पृष्ठ 21

[9] परिमाला वी. राव, उपरोक्त, पृष्ठ 14

[10] वही, पृष्ठ 16-18

[11] धनंजय कीर, उपरोक्त, पृष्ठ 139

[12] परिमाला वी. राव, उपरोक्त, पृष्ठ 16

[13] वही, पृष्ठ 138

[14] वही, पृष्ठ 17-18

[15] डॉ. बाबा साहेब आंबेडकर : राइटिंग्स एंड स्पीचेज, खंड एक, पृष्ठ 218

क्रमश: जारी

(संपादन : नवल/अनिल)

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लेखक के बारे में

कंवल भारती

कंवल भारती (जन्म: फरवरी, 1953) प्रगतिशील आम्बेडकरवादी चिंतक आज के सर्वाधिक चर्चित व सक्रिय लेखकों में से एक हैं। ‘दलित साहित्य की अवधारणा’ ‘स्वामी अछूतानंद हरिहर संचयिता’ आदि उनकी प्रमुख पुस्तकें हैं। उन्हें 1996 में डॉ. आंबेडकर राष्ट्रीय पुरस्कार तथा 2001 में भीमरत्न पुरस्कार प्राप्त हुआ था।

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