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कंवल भारती के शब्दों में उनका अनुवाद-कर्म

इसमें संदेह नहीं कि भारत के सामाजिक, सांस्कृतिक और जातियों के इतिहास पर जितना महत्वपूर्ण काम विदेशी विद्वानों ने किया है, उसका दसवां हिस्सा भी भारतीय विद्वानों ने नहीं किया। भारत के अधिकांश विद्वान अपनी सोच में धर्म और जाति के खांचे से ही बाहर नहीं निकले। बता रहे हैं कंवल भारती

[प्रस्तुत संस्मरण गत 20 अगस्त, 2022 को फारवर्ड प्रेस द्वारा आयोजित ऑनलाइन लोकार्पण कार्यक्रम सह परिचर्चा के दौरान कंवल भारती जी के संबोधन का विस्तार है। परिचर्चा का विषय था– ‘भारतीय समाज के अध्ययन में बाहरी (गैर-भारतीय) समालोचनात्मक दृष्टिकोण का महत्व क्या रहा है?’। तकनीकी कारणों से वे अपने विचार समग्रता में रख नहीं सके थे। प्रस्तुत है उनका यह संस्मरण]

मैं अपने अनुवाद-कर्म के बारे में दो बातें साफ़ कर देना चाहता हूं। पहली यह कि अनुवाद-कर्म मेरा शौक नहीं है, और दूसरी, यह कि अनुवादक बनने की मेरी चाहत कभी नहीं थी। यह सब कैसे अचानक हो गया, मैं खुद नहीं जानता। यह भी अकस्मात ही हुआ कि मेरी पहली नौकरी अनुवादक के रूप में लगी। इसका जिक्र मैं अपने अब्दुल हई वाले से संबंधित संस्मरण में कर चुका हूं। हुआ यह कि एक दिन मैं अपने घर (रामपुर, उत्तर प्रदेश) के बाहर खड़ा उर्दू अखबार ‘नाजिम’ पढ़ रहा था। हमारी गली से काली दाढ़ी वाले एक मौलाना रोज आते-जाते रहते थे। एक दिन उन्होंने उर्दू पढ़ता देखकर मुझसे पूछा, “नौकरी करोगे?” उस समय मैं इंटर (प्रथम वर्ष) का छात्र था। मैंने हां कह दी और इस तरह मैं उनके जरिए रामपुर के इस्लामी प्रकाशन ‘मकतबा अलहसनात’ में बतौर उर्दू-हिंदी अनुवादक मुलाजिम हो गया। वहां से बच्चों के लिए दो पत्रिकाएं निकलती थीं, एक हिंदी में ‘हादी’ और दूसरी उर्दू में ‘नूर’। मुझे ‘नूर’ के कुछ उर्दू मजामीन को ‘हादी’ के लिए हिंदी में अनुवाद करना होता था। आसान हिंदी में अनुवाद करना मैंने वहीं सीखा। इस तरह मेरे अनुवादक बनने की शुरुआत उर्दू से हिंदी में हुई।

लेकिन अंग्रेजी से हिंदी में अनुवाद शुरू करने की कहानी और भी दिलचस्प है। उन दिनों सरकारी स्कूलों में छठी क्लास से अंग्रेजी पढ़ाई जाती थी। मैंने हाईस्कूल तक अंग्रेजी पढ़ी, और बामुश्किल पास होने लायक नंबर हासिल किए। मैं अंग्रेजी में इतना कमजोर था कि हाईस्कूल के बाद मैंने अंग्रेजी छोड़ दी। लेकिन इससे अंग्रेजी को लेकर एक हीन-भावना मेरे अंदर घर गई। इसी दौरान मेरी दूसरी नौकरी रामपुर में ही हिंदी के एक साप्ताहिक अखबार ‘सहकारी युग’ में लगी। उसके मालिक अंग्रेजी के जाने-माने पत्रकार महेंद्र गुप्त थे। हीनभावना फिर आड़े आई, क्योंकि उस अखबार में अंग्रेजी अखबार ‘नार्दन इंडिया’ पत्रिका से, जो वहां डाक से आता था, कुछ न्यूज स्टोरीज को हिंदी में अनुवाद करके देना होता था। मरता क्या नहीं करता। एक मोटी डिक्शनरी खरीदी, और उसकी सहायता से अनुवाद शुरू किया। जहां समझ में नहीं आता था, वहां अपने दिमाग से कुछ गढ़ भी देता था। महेंद्र जी देखते, तो मेरे गढ़े हुए को मुस्कुराकर पढ़ते और कहते, “ठीक है, शाब्दिक अनुवाद बोझिल होता है।” मेरी हिम्मत बढ़ गई, और इस तरह अखबार के जरिए अंग्रेजी को पढ़ने-समझने की मेरी कोशिश रंग लाने लगी। फिर तो मैंने ‘इलेस्ट्रेटेड वीकली’ में हिंदी साहित्य पर डा. धर्मवीर भारती के छपे एक अंग्रेजी लेख का भी अनुवाद किया, ओशो के ‘तांत्रिक सेक्स’ का अनुवाद किया और चेलापति राव के जवाहरलाल नेहरू पर लिखी एक सीरीज का भी अनुवाद किया। नजीर अकबराबादी पर ए.एच. खान के अंग्रेजी लेख का अनुवाद किया और ललित नारायण मिश्र हत्याकांड पर दिलीप गांगुली की रिपोर्ट का अनुवाद किया। ये सब अनूदित लेख ‘सहकारी युग’ में ही छपे। इस तरह आजीविका के दबाव ने मुझे अंग्रेजी से हिंदी का अनुवादक भी बना दिया।

‘सहकारी युग’ की नौकरी छोड़कर मैंने अपना प्रिटिंग प्रेस कायम किया, और बोधिसत्त्व प्रकाशन शुरू किया। यह 1979-80 की बात है। उसी समय ललई सिंह से भेंट हुई, उनके आग्रह पर ‘धम्मविजय’ किताब लिखी। उसी के साथ पहली बार जिस अंग्रेजी किताब का संक्षिप्त हिंदी अनुवाद किया, वह थी रामासामी नायकर की ‘दि रामायना : ए ट्रू रीडिंग’। इसका अनुवाद इसलिए करना पड़ा, क्योंकि ‘सच्ची रामायण’ की एक भी प्रति तब उपलब्ध नहीं थी। लेकिन ये दोनों किताबें मेरे प्रेस से न छपकर, लगभग आठ महीने बाद दिल्ली में मस्जिद मोठ की एक प्रेस से छपकर आईं, क्योंकि रामपुर, जिला प्रशासन मुझ पर कुपित हो गया था, और उसने मेरा प्रेस सील कर दिया था। बाद में वह बैंक द्वारा नीलाम भी कर दिया गया। इस तरह अंग्रेजी से हिंदी में अनुवाद की मेरी पहली पुस्तक या पुस्तिका ‘रामायण : एक अध्ययन’ है।

फिर 1980 में प्रेस खत्म होने के बाद रामपुर से मेरा दाना-पानी उठ गया, और वहां से उजड़कर मुझे दिल्ली आना पड़ा। खानाबदोशों की तरह जाने कहां-कहां की ख़ाक छानते हुए भटकता रहा। इसी बीच 1982 में नई दिल्ली रेलवे स्टेशन के नजदीक एक बौद्ध संस्थान में नॉर्फक (इंग्लैंड) के बौद्ध भिक्षु महास्थविर संघरक्षित [मूल नाम डेनिस फिलिप एडवर्ड लिंगवुड (26 अगस्त, 1925 – 30 अक्टूबर, 2018)] से भेंट हुई, जो उन दिनों भारत आए हुए थे। अभी हाल में कुछ साल पहले उनकी मृत्यु हुई है। उन्होंने मुझे अनागारिक धर्मपाल (17 सितंबर, 1864 –  29 अप्रैल, 1933) के जीवन-संघर्ष पर अपनी लिखी हुई किताब ‘फ्लेम इन डार्कनेस’ भेंट की। तब तक मैं अनागारिक धर्मपाल के बारे में कुछ नहीं जानता था। इस किताब को पढ़कर ही मैंने धर्मपाल जी के जीवन-संघर्ष और बौद्धधर्म के विकास में उनके योगदान को पहली बार जाना। मेरे मन में आया कि इसका हिंदी अनुवाद होना चाहिए, क्योंकि हिंदीभाषी लोग धर्मपाल जी के बारे में कुछ नहीं जानते। मैंने अपना प्रस्ताव बुद्ध विहार, मंदिर मार्ग, नई दिल्ली के विहाराधीश पूज्य भदंत आर्यवंश नायक महास्थविर के समक्ष इस इरादे से रखा कि वह बुद्ध विहार की ओर से इसे हिंदी में छपवा देंगे। उन दिनों चूंकि मैं दिल्ली में ही मोतिया खान बुद्ध विहार में रहता था, इसलिए भदंत जी के पास जाता रहता था। उनकी एक किताब की प्रूफ रीडिंग और छपाई में भी मैंने कुछ योगदान दिया था, जिसके लिए उन्होंने उस किताब की भूमिका में मेरा आभार भी व्यक्त किया है। लेकिन उनका कहना था कि सवाल छपने का नहीं है, बल्कि इसके प्रकाशनाधिकार का है, जो त्रिरत्न ग्रंथ माला, पुणे के पास है। उनकी बिना अनुमति के न तो इसका अनुवाद किया जा सकता है और ना ही प्रकाशन। अब मेरे लिए यह कठिन काम हो गया था। लगभग इसी बीच मुझे सरकारी नौकरी के लिए लखनऊ जाना पड़ गया, और वहां संयोग से मुझे गर्दिश-काल में बुद्ध विहार, रिसालदार पार्क के हाई प्रीस्ट पूज्य भदंत बोधानंद महास्थविर का संरक्षण मिला। जहां रोटी और रहने की व्यवस्था हो जाए, उससे बड़ा संरक्षण और क्या होगा? वहां मैं छह महीने रहा। वहीं पर रहकर मैंने ‘फ्लेम इन डार्कनेस’ के पहले भाग ‘इंट्रोडक्शन’ का अनुवाद करके उसे त्रिरत्न ग्रंथ माला, पुणे को भेज दिया, साथ में यह पत्र भी लिख दिया कि “अगर इंट्रोडक्शन का अनुवाद आपको अच्छा लगे, तो मुझे किताब का अनुवाद करने की अनुमति प्रदान करें।” लगभग एक महीने बाद मुझे उनका संतोषजनक जवाब मिला। उन्हें अनुवाद पसंद आया, और उन्होंने मुझे आगे अनुवाद करने की अनुमति दे दी। अब समस्या हल हो गई थी। मैंने भंते जी की सहायता से, बहुत से तकनीकी शब्दों को समझकर बुद्ध विहार में रहकर ही उसका अनुवाद पूरा किया। अंतत: 1991 में उसका हिंदी अनुवाद ‘अंधकार में ज्योति’ नाम से त्रिरत्न ग्रंथ माला, पुणे से प्रकाशित हुआ। यह मेरे द्वारा अनूदित यह दूसरी मुकम्मल किताब थी।

रामपुर, उत्तर प्रदेश में अपने अध्ययन कक्ष में कंवल भारती

मेरी तीसरी अनूदित किताब ‘वीजा की प्रतीक्षा में’ है। डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर की अंग्रेजी रचनावली को पढ़ते हुए, मेरी नजर बारहवें वॉल्यूम के पांचवें भाग पर पड़ी, जिसका नाम था ‘वेटिंग फॉर वीजा’। इसमें डॉ. आंबेडकर ने अस्पृश्यता से संबंधित अपने कुछ निजी संस्मरणों और अनुभवों को दर्ज किया है, जो बेहद मार्मिक हैं। हिंदी भाषी जनता को, ख़ास तौर से गैर-दलित वर्गों को उनके अनुभवों से परिचित कराने के लिए मैंने इसका अनुवाद किया, जिसे 2006 में विकास नारायण राय ने अपने ‘साहित्य उपक्रम’ संस्थान से प्रकाशित किया। यह इतना लोकप्रिय हुआ, कि न केवल साहित्य उपक्रम से इसके तीन संस्करण हुए, बल्कि दो अन्य प्रकाशन संस्थानों– सावित्रीबाई फुले प्रकाशन, गोरखपुर ने 2018 में, और आनंद साहित्य सदन, अलीगढ़ ने भी 2019 भी इसका पुनर्प्रकाशन किया।

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जिस चौथी किताब का मैंने अनुवाद किया, वह प्रोफ़ेसर श्यामलाल (पूर्व कुलपति, जोधपुर विश्वविद्यालय, राजस्थान विश्वविद्यालय और पटना विश्वविद्यालय) की किताब ‘अनटचेबुल्स मूवमेंट इन इंडिया’ है, जो राजस्थान के बैरवा समाज का सांस्कृतिक इतिहास है। इसका अनुवाद भी मैंने अपने शौक के लिए किया। यह स्वराज प्रकाशन, नई दिल्ली से 2011 में प्रकाशित हुई। इस किताब का मुझे कोई पारिश्रमिक नहीं मिला, बस इसे छप जाना ही मेरा ध्येय था।

पांचवीं किताब कैथरीन मेयो की ‘मदर इंडिया’ है। इसे हिंदी में लाने का मुझ पर दबाव मेरे भीतर से था, बाहर का कोई दबाव नहीं था। इसका कारण यह था कि इस अमेरिकन लेखिका ने भारत आकर, यहां रहकर, यहां के लोगों के सांस्कृतिक-धार्मिक और राजनीतिक जीवन का, दलितों के पशु-तुल्य रहन-सहन और उनके साथ हिंदुओं के अलगाववादी अमानवीय व्यवहार का, दलितों के मुक्ति-संघर्ष का, भारत की महिलाओं के नारकीय जीवन की यंत्रणाओं का, और यहां के धर्मगुरुओं, राजनेताओं और समाजसुधारकों की कथनी-करनी का जो जीवंत वर्णन किया है, वैसा भारत के किसी लेखक और इतिहासकार ने नहीं किया। इस किताब को पढ़कर मैं जिस अनजाने यथार्थ से परिचित हुआ, उसे हिंदी के पाठकों को भी अवगत कराना मैंने अपना दायित्व समझा। बगैर यह सोचे कि इसके हिंदी अनुवाद को छापेगा कौन, मैं अपने काम में लग गया। मैंने इसका अनुवाद 2017 में पूरा किया। लेकिन इसका प्रकाशन दो साल बाद फारवर्ड प्रेस, नई दिल्ली से हुआ। इस किताब के आने से हिंदी में एक बड़ा काम हुआ। यह अनुवाद काफी लोकप्रिय हुआ, और अनेक लेखकों ने इसकी प्रशंसा की।

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मेरी छठी अनूदित कृति ‘डॉ. आंबेडकर और वाल्मीकि समाज’ है। यह भी प्रोफेसर श्यामलाल की 2018 में प्रकाशित पुस्तक ‘आंबेडकर एंड दी भंगीज : एफॉर्ट्स फॉर देयर अपलिफ्टमेंट’ का अनुवाद है। इस पुस्तक का अनुवाद भी मैंने अपनी ही आंतरिक प्रेरणा से किया। मेरा ऐसा मानना है कि भारत के लोगों और इतिहास का सही अवलोकन या तो दलित वर्ग के शोधार्थी विद्वान कर सकते हैं, या विदेशी विद्वान, जो हिंदू-मुसलमान की सांप्रदायिक और जातीय चेतना से मुक्त होते हैं। उनका चिंतन निस्पृह और निष्पक्ष होता है। प्रोफेसर श्यामलाल ने अपनी इस पुस्तक में कांग्रेस के ब्राह्मण-तंत्र द्वारा स्थापित उस आंबेडकर विरोधी दुष्प्रचार का खंडन किया है, जिसने एक साजिश के तहत वाल्मीकि समाज को डॉ. आंबेडकर के आंदोलन और विचारों से नहीं जुड़ने दिया। इस दुष्प्रचार में गांधी की भूमिका सर्वाधिक थी, जिसका पर्दाफाश प्रोफेसर श्यामलाल ने पूरी शिद्दत से इस किताब में किया है। इसलिए वाल्मीकि समाज के हित में इस किताब को हिंदी में लाना मेरे लिए एक जरूरी मिशनरी काम था। इसे 2020 में दास पब्लिकेशन, नई दिल्ली ने प्रकशित किया।

सातवीं किताब, जिसका मैंने हिंदी अनुवाद किया, वह महाराष्ट्र सरकार द्वारा 1982 में प्रकाशित ‘सोर्स मॅटेरियल ऑन डॉ. आंबेडकर एंड दी मूवमेंट ऑफ अनटचेबुल्स’ है, जिसके संपादक डॉ. बी. जी. कुंते एवं सहायक संपादक बी. एन. पाठक हैं। इसमें संपादकों ने 1915 से 1956 तक चार दशकों के डॉ. आंबेडकर के व्यक्तित्व और जीवन-संघर्ष तथा उनके द्वारा चलाए गए दलित मुक्ति के आंदोलन की छोटी-बड़ी सूचनाओं का संकलन किया है, जो उन्हें तत्कालीन अख़बारों की खबरों, उनमें प्रकाशित पत्रों-लेखों एवं खुफिया पुलिस की गोपनीय रिपोर्टों के रूप में मिला। यह एक अलग तरह का प्रामाणिक दस्तावेजीकरण है, जो दलित-आंदोलन पर पक्ष-विपक्ष दोनों दृष्टिकोणों से प्रकाश डालता है। डॉ. आंबेडकर के जीवन-संघर्ष और आंदोलन पर हिंदी में पुस्तकें तो कई लिखी गई हैं, पर इस तरह का दस्तावेजी साहित्य हिंदी में नहीं था। इसलिए मैंने हिंदी के बहुजन पाठकों को यह दस्तावेज उपलब्ध कराने के लिए अपनी अंत:प्रेरणा से ही इसका अनुवाद करना जरूरी समझा। इसका प्रकाशन आनंद साहित्य सदन, अलीगढ़ ने ‘डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर और अछूतों का आंदोलन’ नाम से वर्ष 2019 में संविधान दिवस के अवसर पर किया।

मेरे द्वारा अनूदित आठवीं किताब ‘कबीर और कबीरपंथ’ है, जिसका प्रकाशन फारवर्ड प्रेस, नई दिल्ली द्वारा किया गया है। यह लंदन के ईसाई पादरी विद्वान एफ. ई. केइ की अंग्रेजी पुस्तक ‘कबीर एंड हिज फॉलोअर्स’ का अनुवाद है, जो 1931 प्रकाशित हुई थी। उन्होंने इसे 1920 के दशक में लंदन विश्वविद्यालय से अपनी पीएचडी थीसिस के लिए लिखा था। जिस दौर में यह थीसिस लिखी गई, उसमें कबीर किंवदंतियों में ज्यादा थे, इतिहास में कम। केइ साहब ने किंवदंतियों का ऐतिहासिक विश्लेषण किया और इतिहास के कबीर को स्थापित किया। कबीर के बारे में उनकी राय आम तौर से कबीर के उन पदों पर आधारित है, जो कबीर बीजक और सिखों के आदिग्रंथ में मिलते हैं। ‘इतिहास के कबीर’ और ‘कबीर का साहित्य’ इस किताब के महत्वपूर्ण अध्याय हैं, इसमें उनका जो विश्लेषण है, वह मेरे देखने में हिंदी में इससे पहले कभी नहीं आया। शायद केइ पहले लेखक थे, जिन्होंने रामानंद को कबीर का गुरू मानने से इंकार किया और संबंधित तथ्यों के आधार पर प्रश्नचिन्ह लगाया। वह ऐसे भी पहले लेखक हैं, जिन्होंने कबीर के शिष्यों, उनके द्वारा स्थापित पंथ, पंथ की शाखाओं तथा उन शाखाओं के साहित्य और संस्कारों पर भी आश्चर्यजनक शोध किया है। उन्होंने कबीरपंथ के मठों को भी खोजा। उन्होंने कबीर की मृत्यु के मिथक का भी खंडन किया है और जो वास्तविक स्थिति थी, उसे बताया है। इस किताब का अनुवाद करने के लिए भी मुझे किसी ने नहीं कहा, यह मेरा खुद का ही प्रोजेक्ट था, और अपनी ही अंत:प्रेरणा से मैंने हिंदी पाठकों के लिए इसका अनुवाद करने का काम अपने हाथ में लिया। इसके प्रकाशन में विलंब जरूर हुआ, पर ‘देर आयद दुरस्त आयद’ फारवर्ड प्रेस ने इसका बेहतर ढंग से प्रकाशन किया।

इन आठ किताबों के अलावा मैंने तीन अन्य अनुवाद भी किए हैं, जो अभी प्रकाशित नहीं हुए हैं। उनमें पहली, श्यामलाल की एक और महत्वपूर्ण पुस्तक का अनुवाद ‘मेहतर समाज का सांस्कृतिक इतिहास’ है; दूसरी किताब 1857 और भारत पर अंग्रेजों की विजय पर डॉ. आंबेडकर के आलोचनात्मक लेखों का एक लघु संग्रह ‘अंग्रेजों की भारत विजय और दलित मुक्ति’ नाम से है; और तीसरी महत्वपूर्ण किताब ‘देवताओं के गुलाम’ है, जो कैथरीन मेयो की ही वर्ष 1929 में प्रकाशित एक और क्रांतिकारी किताब ‘स्लेव्स ऑफ द गॉड्स’ का अनुवाद है। इस किताब में मेयो ने हिंदू समाज की बारह हृदय-विदारक कहानियां लिखी हैं, जो सती, अस्पृश्यता, विधवा, अशिक्षा, और अत्याचारों की हकीकतों का दस्तावेज है। इन विषयों पर भारत के महान नेताओं, सुधारकों और विचारकों की टिप्पणियां इस किताब को दस्तावेजी बनाती हैं।

इसमें संदेह नहीं कि भारत के सामाजिक, सांस्कृतिक और जातियों के इतिहास पर जितना महत्वपूर्ण काम विदेशी विद्वानों ने किया है, उसका दसवां हिस्सा भी भारतीय विद्वानों ने नहीं किया। भारत के अधिकांश विद्वान अपनी सोच में धर्म और जाति के खांचे से ही बाहर नहीं निकले। वे ज्यादातर धर्म-मुग्ध ही रहे, यहां तक कि भारत के वामपंथी विद्वानों ने भी वेद, उपनिषद और गीता में ही न्याय, विज्ञान और इतिहास खोजने की मूर्खता की। सामाजिक परिवर्तन के जितने भी नायक भारत में हुए, उन सबको खारिज करने और ठिकाने लगाने का ही काम भारत के हिंदू विद्वानों ने किया। ये अंग्रेज ही थे, जिन्होंने वस्तुस्थिति को खोजने के लिए काम किया। और वे इसलिए खोज सके, क्योंकि वे संकीर्ण दृष्टि के नहीं थे। ये अंग्रेज ही थे, जिन्होंने भारत में अछूत जातियों की पहचान की और उनकी जनगणना की। ये अंग्रेज विद्वान ग्रियसन ही थे, जिन्होंने भारतीय भाषाओं और बोलियों पर मौलिक खोज की। जिस विदेशी विद्वान ने चमार जाति का अभूतपूर्व इतिहास खोजा, वह जी. डब्लू. ब्रिग्स थे। जिस अंग्रेज विद्वान ने भारत की जातिप्रथा पर उल्लेखनीय काम किया, वह जे. एच. हटन थे, और जिन्होंने भारत के मूल निवासियों की खोज की वह अंग्रेज विद्वान गुस्ताव ओपर्ट थे। भारत इन विदेशी विद्वानों का ऋणी है, जिन्होंने अपनी खोजों से एक नई दुनिया भारतीयों के सामने प्रकट की। इनमें से बहुत से शोध-ग्रंथों का हिंदी अनुवाद अभी नहीं हुआ है, जिन्हें किए जाने की जरूरत है।

(संपादन : नवल/अनिल)

लेखक के बारे में

कंवल भारती

कंवल भारती (जन्म: फरवरी, 1953) प्रगतिशील आम्बेडकरवादी चिंतक आज के सर्वाधिक चर्चित व सक्रिय लेखकों में से एक हैं। ‘दलित साहित्य की अवधारणा’ ‘स्वामी अछूतानंद हरिहर संचयिता’ आदि उनकी प्रमुख पुस्तकें हैं। उन्हें 1996 में डॉ. आंबेडकर राष्ट्रीय पुरस्कार तथा 2001 में भीमरत्न पुरस्कार प्राप्त हुआ था।

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