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हिंदू अगर लड़ते तो भारत गुलाम नहीं होता

यह अकारण नहीं है कि मोहन भागवत का विदेशी प्रभाव से हिंदू धर्म, हिंदू संस्कृति और हिंदू समाज की सुरक्षा के लिए लड़ने का बयान ऐसे समय में आया है, जब उत्तर प्रदेश की भाजपा सरकार को पिछड़ा वर्ग आयोग बनाना पड़ा है, और बिहार में जाति आधारित जनगणना का काम शुरू हो गया है। बता रहे हैं कंवल भारती

दुनिया में शायद ही कोई ऐसा संगठन हो, जो आरएसएस की तरह झूठ पर झूठ गढ़ता हो, और बोलता हो। झूठ गढ़ने और बोलने में आरएसएस का कोई मुकाबला नहीं कर सकता। इसने इतिहास, राजनीति और समाज के बारे में इतने सारे झूठ गढ़े हैं कि वे न सिर्फ निराधार और बेसिर-पैर के हैं, बल्कि शेखचिल्लियों को भी मात देते हैं। ऐसा ही एक झूठ यह है, जो पिछले दिनों मोहन भागवत ने ‘आर्गनाइजर’ और ‘पाञ्चजन्य’ को दिए गए अपने साक्षात्कार में कहा है कि हिंदू समाज एक हजार सालों से युद्ध लड़ रहा है। किस से लड़ रहा है, तो जवाब उन्होंने यह दिया कि विदेशी लोगों, विदेशी प्रभाव और विदेशी षड्यंत्रों से।

आरएसएस के नेता अपने अंधभक्तों और अनुयाइयों को अपने गढ़े गए झूठ इस तरह रटवा देते हैं, जैसे घरों में तोता पालने वाले लोग तोते को अपनी भाषा रटवा देते हैं। फिर नागपुर से लेकर मुंबई तक और  दिल्ली तक कन्याकुमारी तक आरएसएस का आदमी, चाहे बड़ा नेता हो, अधिकारी हो, प्रोफेसर हो, या फिर साधारण मनुष्य, रट्टू तोते की तरह वही बोलता है, जो उसे सिखाया जाता है। वह अपने विवेक का उपयोग नहीं करता। 

अब इस झूठ की पड़ताल करते हैं, जो मोहन भागवत ने बोला है। आरएसएस के सिवा भारत का हर नागरिक जानता है कि अगर हिंदू समाज लड़ा होता, तो भारत न मुसलमानों का गुलाम बनता और न अंग्रेजों का। भारत पर सबसे पहला हमला 711 ईस्वी में मुहम्मद बिन कासिम ने किया था, और बड़ी आसानी से सिंध पर कब्जा कर लिया था, और कोई हिंदू उसके मार्ग में नहीं आया था। उसके बाद 1001 ईस्वी में गजनी के मुहम्मद ने सत्रह बार भारत पर आक्रमण किया। 1173 ईस्वी में मुहम्मद गौरी ने भारत को जीता और शासन किया। वह तीस साल तक भारत को रौंदता रहा। उसके बाद 1221 में मंगोल के चंगेज खान ने झुंडों में धावे बोले। हालांकि ये हमले भारत की सीमाओं पर ही हुए। इन हमलों में सबसे भीषण हमला 1398 में तैमूर लंग के नेतृत्व में हुआ। फिर 1526 में एक नया हमलावर बाबर आया। इसके बाद भी 1738  में नादिर शाह के नेतृत्व में दो हमले और हुए। फिर 1761 में अहमद शाह अब्दाली ने भारत पर हमला किया। उसने पानीपत में मराठों को पराजित किया। 

अगर हिंदू लड़े होते, तो क्या इतने सारे आक्रांता भारत में आ पाते और क्या वे सफल हो पाते? मोहन भागवत के झूठ की एक कलई यहां यह खुलती है कि जिस हिंदू समाज की वह बात कर रहे हैं, वह हिंदू समाज कभी अस्तित्व में था ही नहीं। अस्तित्व में केवल वर्ण और जातियां थीं, जिनके अंतर्गत लड़ने का काम केवल मुट्ठीभर क्षत्रियों का था। शेष विशाल आबादी को शस्त्र धारण करने का ही अधिकार नहीं था। अगर संपूर्ण आबादी को युद्ध की शिक्षा लेने की आजादी दी गई होती, तो भारत को कभी गुलामी के दिन देखने नहीं पड़ते। इस प्रकार मोहन भागवत की एक बात झूठी साबित हो जाती है और यह तथ्य निकलकर सामने आता है कि हिंदू समाज एक हजार सालों से विदेशी हमलावर ताकतों से नहीं लड़ा।

मोहन भागवत, आरएसएस प्रमुख

अब आते हैं, मोहन भागवत के दूसरे झूठ पर, जिसमें वह बताते हैं कि हिंदू समाज विदेशी प्रभाव से लड़ रहा है। यह विदेशी प्रभाव क्या है? पहले इसे जान लें। इस विदेशी प्रभाव से उनका मतलब है– लोकतंत्र की अवधारणा और स्वतंत्रता, समानता तथा सामाजिक न्याय के सिद्धांत। मोहन भागवत कहते हैं कि यह लड़ाई हिंदू धर्म, हिंदू संस्कृति और हिंदू समाज की सुरक्षा के लिए है। सवाल है कि क्या हिंदू धर्म, हिंदू संस्कृति और हिंदू समाज असुरक्षित है? जिस देश की केंद्रीय सरकार हिंदुओं की हो, राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, सभी राज्यों के मुख्यमंत्री और संपूर्ण मंत्रिमंडल हिंदू हो, न्यायपालिका में हिंदू वर्चस्व हो, शासन-प्रशासन, पुलिस और सेना सब हिंदुओं के नियंतरण में हो, अगर उस देश में हिंदू धर्म, हिंदू संस्कृति और हिंदू समाज को असुरक्षित बताया जा रहा हो, तो इस निर्लज्ज झूठ पर लानत ही भेजी जा सकती है।

अब इस झूठ के पीछे की मंशा को भी देखते हैं। यह मंशा है वर्णव्यवस्था के ध्वस्त होते दुर्ग को बचाने की। वर्णव्यवस्था के दुर्ग को खतरा किससे है? यह खतरा पैदा हुआ है विदेशी यानी पश्चिम की विचारधारा से, जो लोकतांत्रिक है, जो स्वतंत्रता और समानता के सिद्धांतों को मानती है, और जो दलित-पिछड़ी जातियों तथा स्त्रियों की मुक्ति पर जोर देती है। आरएसएस के ब्राह्मणों की सबसे बड़ी शत्रु यही लोकतांत्रिक विचारधारा है, जिसे वे पश्चिम से आयातित मानते हैं। इसी आधार पर वे भारतीय संविधान की भी निंदा करते हैं, जिसमें उनके अनुसार भारतीय अर्थात हिंदू संस्कृति के मूल्यों को शामिल नहीं किया गया है। इस लोकतांत्रिक विचारधारा के साथ न केवल राजनीति में दलित-पिछड़ी जातियों का उभार हो गया है, बल्कि उनकी जागरूक चेतना हिंदू सत्ता के लिए निरंतर चुनौती भी पेश कर रही है। आरएसएस की भरसक कोशिश दलित-पिछड़ी जातियों को हिंदू बनाए रखकर शूद्रत्व के अधिकार-विहीन दायरे में धकेलने की है, जिसमें उसे सत्ता के सहयोग से काफी हद तक सफलता मिल भी रही है, पर पश्चिम की विचारधारा के प्रभाव को रोक पाना उसके लिए संभव ही नहीं है। इसलिए यह अकारण नहीं है कि मोहन भागवत का विदेशी प्रभाव से हिंदू धर्म, हिंदू संस्कृति और हिंदू समाज की सुरक्षा के लिए लड़ने का बयान ऐसे समय में आया है, जब उत्तर प्रदेश की भाजपा सरकार को पिछड़ा वर्ग आयोग बनाना पड़ा है, और बिहार में जाति आधारित जनगणना का काम शुरू हो गया है।

आरएसएस की इस गुप्त मंशा को जानने के बाद अब आते हैं मोहन भागवत के तीसरे झूठ पर, जो विदेशी षड्यंत्रों से हिंदुत्व की रक्षा के बारे में बोला गया है। विदेशी षड्यंत्रों से लड़ने के लिए भारत का रक्षा विभाग और उसकी सेना है, हिंदू समाज इसमें कहाँ से आ गया? असल में मोहन भागवत जिस विदेशी षड्यंत्र का उल्लेख कर रहे हैं, उसका विस्तार से वर्णन ‘राष्ट्रीय आंदोलन और संघ’ नामक एक किताब में किया गया है, जिसे आरएसएस ने ‘राष्ट्र-जागरण अभियान’ के तहत प्रकाशित किया है। इसमें ईसाई मिशनरियों के धर्मांतरण कार्य को विदेशी षड्यंत्र का नाम दिया गया है। इस षड्यंत्र की मैं विस्तृत आलोचना फारवर्ड प्रेस से प्रकाशित अपनी पुस्तक ‘आरएसएस और बहुजन चिंतन’ में कर चुका हूँ। आरएसएस के लेखक ने इस किताब में बताया है कि ‘विदेशी ताकतें विशेष रूप से ईसाई प्रचारक अपने अरबों डालर की घन-संपदा, हजारों कार्यकर्ता, अंतर्राष्ट्रीय स्तर की ताकत, एनजीओ के बड़े-बड़े तंत्र विश्वविद्यालयों में बैठे शिक्षाविदों के दम पर दलितों को नचा रहे हैं, और इसका तात्कालिक लाभ भारत के कुछ राजनेताओं को मिल रहा है और इससे हानि हर उस देशवासी की हो रही है, जिसने भारत देश की पवित्र मिट्टी में जन्म लिया है।’ आरएसएस का यह इतना बड़ा झूठ है, जिसकी कल्पना नहीं की जा सकती। सच यह है कि स्वयं आरएसएस दलितों को नचा रहा है। उन्हें हिंदुत्व के रंग में रंगकर जिस तरह शूद्रत्व के अधिकार-विहीन बाड़े में धकेल रहा है, और उनके वैधानिक हक छीनकर ब्राह्मणों को दे रहा है, उससे क्या यह साबित नहीं होता कि दलितों के साथ वास्तविक षड्यंत्र आरएसएस ही कर रहा है? जिन दलित-आदिवासियों को ईसाई मिशनरियों ने पढ़ा-लिखाकर एक गरिमापूर्ण जीवन दिया है, वह गरिमा ही आरएसएस की आंखों में चुभ रही है। इसलिए वह उसे विदेशी षड्यंत्र बता रहा है, और कह रहा है कि हिंदू समाज उससे लड़ रहा है। यहां दो बातें समझने की हैं। एक यह कि आरएसएस जिस लड़ाई की बात कर रहा है, उसका मिशन दलितों, पिछड़ों और आदिवासियों को शिक्षा से दूर रखकर, भगवा रंग में रंगकर हनुमान की तरह रामभक्त बनाना है, और दूसरी बात यह कि मोहन भागवत जिस हिंदू समाज के लड़ने की बात कर रहे हैं, वह सिर्फ आरएसएस का ब्राह्मण समुदाय है, और कोई नहीं। मोहन भागवत अल्पसंख्यक ब्राह्मण को ही बहुसंख्यक हिंदू समाज बताने का झूठ बोल रहे हैं। यहां जातियां और वर्ण ही सब कुछ हैं, वहां ‘हिंदू समाज’ का शब्द ही लोगों को भ्रमित करने वाला शब्द है, जो वास्तव में हिंदू महासभा और आरएसएस द्वारा गढ़ा गया एक राजनीतिक ढोंग का शब्द है।

अब मोहन भागवत के उस बयान पर आते हैं, जो उन्होंने बड़बोलेपन से मुसलमानों के बारे में दिया है। जैसे कि इस्लाम धर्म नहीं है, कि इस्लाम खतरे में नहीं है, कि मुसलमानों को बड़बोली बयानबाजी छोड़ देनी चाहिए कि वे राजा रहे हैं, इत्यादि। ये बातें वह ऐसे कह रहे हैं, जैसे वह इस देश के मालिक और सर्वेसर्वा हों। वह भाजपा के मालिक और सर्वेसर्वा हो सकते हैं, पर वह देश के सर्वेसर्वा न हैं और न हो सकते हैं। हालांकि भारत के मुस्लिम नेतृत्व ने मोहन भगवत के इस बयान का कोई खास नोटिस नहीं लिया है, अलबत्ता ओबैसी साहब ने जरूर यह टिप्पणी की है कि मुसलमानों और इस्लाम के बारे में बोलने वाले वह होते कौन हैं? पर इसमें संदेह नहीं कि मोहन भागवत का बयान यह दर्शाता है कि वह  ब्राह्मणी सनातन धर्म के अलावा किसी अन्य धर्म को कोई मान्यता नहीं देते हैं। लेकिन इस सच को तो वह नहीं नकार सकते कि जिन धर्मों को वह मान्यता नहीं देते, उन्हीं धर्मों ने पिछले एक हजार सालों में उनके ब्राह्मणवादी वर्चस्व को इतनी मजबूत चुनौती दी है कि अभी तक तिलमिलाए हुए हैं।

(संपादन : नवल/अनिल)

लेखक के बारे में

कंवल भारती

कंवल भारती (जन्म: फरवरी, 1953) प्रगतिशील आंबेडकरवादी चिंतक आज के सर्वाधिक चर्चित व सक्रिय लेखकों में से एक हैं। ‘दलित साहित्य की अवधारणा’, ‘स्वामी अछूतानंद हरिहर संचयिता’ आदि उनकी प्रमुख पुस्तकें हैं। उन्हें 1996 में डॉ. आंबेडकर राष्ट्रीय पुरस्कार तथा 2001 में भीमरत्न पुरस्कार प्राप्त हुआ था।

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