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दलित-बहुजन यायावर की भूटान यात्रा (दूसरा भाग)

लखांग (मठ) की स्थापना सारी वर्जनाओं को तोड़ने वाले दिव्य पागल पुरुष लामा ड्रुकपा किनले को समर्पित है। यहां विदेशी पर्यटकों के अलावा मुख्यतः नवविवाहित दंपत्ति आते हैं। वे सफल दांपत्य जीवन के लिए आशीर्वाद मांगने आते हैं। ऐसे भी जोड़े आते हैं जो निस्संतान होते हैं। पढ़ें, भंवर मेघवंशी के भूटान यात्रा संस्मरण का दूसरा भाग

पहली कड़ी के आगे

वैसे तो आज की दुनिया में विकास का मतलब है– बड़ी-बड़ी गाड़ियां, बहुमंज़िली इमारतें, चौड़ी सड़कें, बड़े-बड़े बांध, बड़े बाज़ार, बड़ी-बड़ी मशीनें आदि। ज़्यादातर जगहों पर विकास का आशय आधारभूत संरचनाओं के निर्माण कार्यों से लगाया जाता है। एक तरफ जहां राष्ट्रीय सकल घरेलू उत्पाद विकास को समझने का माध्यम है, लेकिन भूटान ने विकास को मापने के लिए अपनी अलग समझ बनाई है और एक दूसरा मापदंड अपनाया है। उनके यहां विकास का मानक भूटान के नागरिकों की ख़ुशी है, वे इस बात से विकास का मापन करते हैं कि उनके मुल्क़ के बाशिंदे कितने खुश हैं?

भूटान में ऐसा सदा से नहीं था। वांगचुक राजवंश के चौथे राजा (राजा को यहां ड्रुक ग्याल्पो कहा जाता है) जिग्मे संगेय वांगचुक ने ग्रॉस नेशनल हेप्पीनेस (जीएनएन) को भूटान का जीवन-दर्शन बनाया। सामूहिक राष्ट्रीय ख़ुशी की परिकल्पना की तथा ऐसी नीतियां निर्मित की, जो लोगों के आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक पक्षों में ख़ुशियां लाये ताकि लोग मौज-मस्ती से भरी हंसते-खेलते ज़िंदगी गुज़ारें।

भूटान में नागरिक हों, सरकार हो अथवा राजा, सबकी सोच यह है कि भौतिक और आध्यात्मिक उन्नति एक-दूसरे पर अवलंबित है। भौतिक विकास में भी यही सोचा जाता है कि क्या इसमें लोगो की ख़ुशी निहित है अथवा नहीं? उनका इस मूल्य में अडिग विश्वास है। विकास चाहे वह नागरिक का हो अथवा समाज का अथवा राष्ट्र का, उसे सिर्फ़ लोगों की आर्थिक, सामाजिक, भावनात्मक, आध्यात्मिक और सांस्कृतिक ज़रूरत को आधार बनाकर एक संतुलित दृष्टिकोण रखकर ही प्राप्त किया जा सकता है।

हर भूटानी यह भी विश्वास करता है कि इस धरती पर जो कुछ भी मौजूद है, वह सिर्फ़ उसके उपयोग के लिए नहीं है, बल्कि वह अगली पीढ़ी की विरासत है, जिसे सुरक्षित व संरक्षित करने की उनकी ज़िम्मेदारी है। ख़ुशहाली की उनकी यह समझ बौद्ध धम्म के सहअस्तित्व और सम्यक मार्ग के सार्वजनीन मूल्यों से आती है। ग्रॉस नेशनल हैप्पीनेस के सूत्र को भूटान के राष्ट्रीय विकास के नियम व क़ायदे-क़ानून तय करने में मार्गदर्शक सिद्धांत बनाया गया है। जिसका उद्देश्य भूटान की भू-प्राकृतिक संपदा को नुक़सान पहुंचाये बग़ैर आगे बढ़ना है, जैसा कि उन्होंने अपने संविधान में यह संकल्प जताया है कि भूटान का जंगल कभी भी भू-भाग के साठ फ़ीसदी से कम नहीं किया जाएगा। उसे बनाए रखना तमाम भूटानियों का राष्ट्रीय कर्तव्य है।

भूटान के राष्ट्रीय ख़ुशी सूचकांक के विभिन्न पहलू हैं, जिन्हें सुशासन, स्थायित्व और सतत सामाजिक आर्थिक विकास, पर्यावरण संरक्षण, मानसिक स्वास्थ्य, समय का सदुपयोग, कला का संरक्षण व संवर्द्धन, शिक्षा, स्वास्थ्य, जैव विविधता, सांस्कृतिक वैविध्य, उच्च जीवन मानक तथा सामुदायिक जीवनी शक्ति के रूप में वर्गीकृत किया गया है।

लखांग (मठ) में लेखक भंवर मेघवंशी

यह तो हुईं सैद्धांतिक बातें। वैसे सिद्धांत तो लगभग सभी जगह शानदार ही होते हैं, लेकिन जो विचारों में प्रकट होता है, क्या वही व्यवहार में भी परिलक्षित होता है? इसलिए यह सवाल उठना लाज़िमी है कि क्या पूरा भूटान वाक़ई बहुत खुशहाल है? या यह सब किताबी दावे है अथवा जुबानी जमा खर्च भर है? 

आंखन-देखी तथ्य यह है कि भूटान के अलग-अलग इलाक़ों के अलग-अलग हाल हैं। वहां विभिन्न जिलों में ख़ुशहाली का स्तर अलग है। आंकड़े बताते हैं कि भूटान में 20 जिले,15 उप जिले तथा 205 क्षेत्र हैं। यहां ग्राम पंचायतों को गियोग कहा जाता है और निर्वाचित सरपंच या प्रधान को गप कहा जाता है। भूटान की आबादी लगभग 8 लाख है और साक्षरता दर 65 प्रतिशत है। जीवन प्रत्याशा 70 फीसदी आंकी गई है। वर्तमान में भूटान का 70 प्रतिशत भू-भाग वन से आच्छादित है।

खैर, आंकड़ों का मोह त्याग कर हम फिर लौटते हैं ख़ुशहाली की बात पर तो इस बारे में हम भूटान की जनगणना और राष्ट्रीय ख़ुशी सूचकांक सर्वे-2015 के तथ्यों पर गौर कर सकते हैं जो हमें बताते है कि भूटान के मोंगर, तरशिंग, जेमगांग जैसे जिले कम खुश हैं। हा घाटी, चुका, त्रशीयांगस्ते और वांगदुपोंड्रांग जिले अपेक्षाकृत खुश हैं। पुनाखा, थिम्फु ठीकठाक ख़ुश हैं। वहीं गासा, भूमथांग, सिरिंग, रोंग़्सा, समस्ते और पेमागत्से में लोग काफ़ी खुश हैं। सबसे अधिक खुशी तो पारो, डांगा, सरपांग और समद्रुप जोंगखार जिले में है।

इस खुशहाली का राज क्या है? बौद्ध जीवन मूल्य तो है ही, उनका खानपान भी ख़ुशियों में गुणोत्तर वृद्धि करता है। यहां के लोग अच्छी मात्रा में शराब पीते हैं। देशी हथकढ़ी जोवो खुद बनाते है और विशेष पात्रों में संजोते है। शराब सहेजने के पात्र धार्मिक सामग्री के साथ बेचे जाते हैं। पारो में एक प्राचीन प्रार्थना स्थल पर तो बुद्ध प्रतिमा के समक्ष मैने विभिन्न प्रकार की शराब की भरी बोतलें रखी देखी और मैं आश्चर्यचकित था। यहां शराब को अपवित्र अथवा ख़राब वस्तु नहीं माना जाता है। शराब की बिक्री और उसका सेवन बहुत सामान्य बात है। मैने अपनी पहली भूटान यात्रा के दौरान रिसोर्ट में कुछ चीवरधारी भिक्खुओं को शराबनोशी करते हुए देखा तो मैं बहुत अचंभित हो गया था, लेकिन बाद में इसे यहां सामान्य व्यवहार के रूप में जाना। भूटान में हर क़िराना स्टोर को शराब बिक्री का लाइसेंस है। इसलिए शराब यहां आसानी से सर्वत्र उपलब्ध है। जिसको पीना है पिये और जिसे न पीना हो ना पिये, इसे लेकर समाज में कोई टैबु नहीं है।

बात पीने-पिलाने और जीवन के उत्सवों की हो तो भूटानी लोग इसमें काफ़ी उदार नज़र आते हैं। उन्होंने ऐसे प्रतीक और आदर्श खोजे हैं, जो आनंद लेने को आध्यात्म समझते हैं। वैसे तो भूटान में सदियों से अनगिनत संख्या में भिक्खुओं और शोधकों ने भ्रमण किया, लेकिन उनमें सबसे मनमौजी भिक्खु का नाम है लामा ड्रुकपा किनले, जो एक तिब्बती लामा थे। वे हिमालयी बौद्ध धम्म की वज्रयानी शाखा के ड्रुकपा काग्ये मत के बेहद लोकप्रिय योगी थे। वे इस बात के लिए जाने जाते थे कि वे अपने अति बलशाली शिश्न का प्रयोग लोगों की सोई चेतना जगाने और नकारात्मक शक्तियों को वश में करने के लिए करते हैं। वे रूढ़िभंजक संत थे। उनकी शिक्षा में सुरापान से लेकर संभोग तक की बातें समाहित थीं। वे अपनी असीमित इच्छाओं और अनियंत्रित कार्यकलापों की वजह से दिव्य पागल पुरुष माने जाते हैं। भूटानी समाज में उनका अद्भुत स्थान है।

एक भूटानी अत्सरा, जिनका काम लोगों के बीच खुशियां बांटना होता है

पुनाखा जिले में छिम्मी लखांग इस दिव्य पागल पुरुष का मठ है। हालांकि छिम्मी का मतलब लोग बताते हैं कि जहां पर कुत्ते नहीं पाये जाते। लेकिन अब तो इस मठ और इसके पास के गांवों में ख़ूब कुत्ते मिलते हैं। मैं 2017 में जब एक बौद्ध उपासक डी. एन. केराला और उनकी पत्नी शांति केराला के साथ दूसरी बार भूटान के सफ़र पर था तब इस गांव की एक किसान महिला नागो के होम स्टे पर दो दिन रुका था और नागो के खेत में स्थित घर से पैदल हमने छिम्मी लखांग तक की दूरी तय की थी।

इस लखांग (मठ) की स्थापना सारी वर्जनाओं को तोड़ने वाले दिव्य पागल पुरुष लामा ड्रुकपा किनले को समर्पित है। यहां विदेशी पर्यटकों के अलावा मुख्यतः नवविवाहित दंपत्ति आते हैं। वे सफल दांपत्य जीवन के लिए आशीर्वाद मांगने आते हैं। ऐसे भी जोड़े आते हैं जो निस्संतान होते हैं। कुल मिलाकर बात यह है कि छिम्मी लखांग प्रजनन शक्ति बढ़ाने संबंधी प्रार्थनाओं के लिए मशहूर है।

दिव्य पागल पुरुष लामा ड्रुकपा किनले का शिश्न संतानोत्पत्ति और सौभाग्य का प्रतीक माना जाता है। उनके शिशन के छल्ले लोग अपनी चाभियों में लगाए रखते हैं। बाज़ार में ये छल्ले भारी मात्रा में दिखते हैं। लोग अपने घरों के प्रवेश द्वार पर शिश्न की प्रतिमा लगवा देते हैं अथवा दीवारों पर उसकी पेंटिंग करवाते हैं। यहां तक कि भूटान के उत्सवों में किए जाने वाले नृत्यों में शिशन के मुखौटे पहनकर लोग जमकर नाचते हैं। यह बहुत सामान्य बात है। शिश्न प्रतीक के बहुत सारे खुलेआम उपयोगों से किसी की भावना आहत नहीं होती, बल्कि जिस दिव्य पागल पुरुष का शिश्न सर्वत्र व्याप्त है, उनके नाम से भूटान में हज़ारों बच्चे छिम्मी अथवा किनले नाम से जाने-पहचाने जाते हैं। ऐसे बच्चों को आजीवन कुछ ख़ास दर्जा प्राप्त होते हैं। सर्दी-जुकाम के इलाज में इन बच्चों का मूत्र इस्तेमाल किया जाता है। हालांकि अब आधुनिक चिकित्सा के बढ़ते प्रभाव के चलते पारंपरिक चिकित्सा पद्धतियां कम इस्तेमाल में लाई जाती हैं, फिर भी छिम्मी लखांग की प्रार्थनाओं से प्रभावित बच्चे ख़ास तो माने ही जाते हैं।

मैने इस बार की अपनी तीसरी भूटान यात्रा में शिश्न के इस प्रतीक पर तब गौर किया जब हम लोग सिंपली भूटान म्यूज़ियम में वहां की लोक संस्कृति को देख रहे थे। हमारी गाइड सोनम ने बेहद अदब के साथ एक जगह रुकते हुए लामा ड्रुकपा किनले की पेंटिंग दिखाते हुए माफ़ी मांगी और वहां बनी शिश्न की प्रतिमा के बारे में जानकारी दी। मैं वहां बनी शिश्न की प्रतिमा और लामा ड्रुकपा किनले की छवि देखकर रोमांचित था। बाद में पारो शहर में बाज़ार भ्रमण के दौरान एक दुकान में टंगे सुंदर बैग पर मेरी नज़र पड़ी। मुझे वो भा गया। वह हस्तनिर्मित खादी का झोला था। मैने सोचा कि ख़रीद लेना चाहिए। मैंने वहां मौजूद महिला दुकानदार से भाव पूछा तो पता चला कि यह पंद्रह सौ रुपए का झोला है। मैं मूल्य जानकार थोड़ा अचंभित हुआ। मुझे लगा कि यहां बहुत महंगाई है अथवा ये पर्यटकों से ज़्यादा न्युट्रम (रुपये) वसूलते होंगे। मैने मोलभाव करना शुरू किया, लेकिन दुकान की मालकिन महिला ने एक भी रुपया कम करने से इंकार कर दिया। मैंने कहा कि हमारे यहां यह बैग ज्यादा से ज्यादा पांच सौ रुपए में मिल सकता है। आप क्यों तीन गुणा अधिक धन वसूल रही हैं? तब उनके द्वारा दिए गए जवाब से मुझे पता मालूम चला कि इस झोले की दूसरी तरफ़ लामा ड्रुकपा किनले का शिश्न छपा हुआ है और ये झोले सिर्फ़ नवदंपत्ति ख़रीदते हैं। अब मैं नवदंपत्ति की श्रेणी में तो था नहीं, इसलिए मैने झोला तो नहीं ख़रीदा पर एक फ़ोटो ज़रूर झोले के साथ खिंचवा लिया और यह सोचते हुए आगे बढ़ चला कि भूटानी समाज में एक अलग तरह का गरिमापूर्ण खुलापन है, जहां सेक्स को लेकर कोई ग्रंथि नहीं पाली जाती है। जीवन में उसकी ज़रूरत के मद्देनज़र उसको सम्मानित स्थान दिया गया है।

पूरे भूटान में तिब्बती लामा ड्रुकपा किनले के शिश्न का ऐसा जलवा चारों तरफ़ बिखरा हुआ है कि उसको समर्पित एक मठ है। वह घरों के दरवाज़े पर चस्पा है। दर-ओ-दीवारों पर चित्रित है। उसके मुखौटे, छल्ले और झोले हैं।मतलब यह कि वह एकदम सहज स्वीकार्य है। शायद इसी खुलेपन और स्वीकार भाव के कारण यौन उत्पीड़न और बलात्कार जैसे मामले भूटान में नगण्य हैं।

भूटानी उत्सवों में अत्सरा नामक एक विदुषक चरित्र है, जो लाल मुखौटा और उसके ऊपर बड़ा-सा कपड़े का शिशन धारण किए रहता है। यह एक मनोरंजक किरदार है, जो अपने मज़ेदार चुटकुलों के लिए जाना जाता है। अत्सरा का मतलब होता है गुरु, जो लोगों को चिंतामुक्त जीवन का संदेश देता है। उत्सवों में अत्सरा की भूमिका लोगों को हंसाते हुए निजी जीवन में निश्चिंत, खुशहाल, स्वस्थ और स्वच्छ रहने की शिक्षा देना है।

मैंने पाया कि भूटान में खुशहाली के सूचकांक को निरंतर चलायमान और वेगवान बनाने में इस बात का भी बहुत योगदान है कि वहां का समाज फ़र्ज़ी नैतिकताओं की गिरफ़्त में नहीं है और यथार्थवादी है। ज़िंदगी के राग-रंग, पर्व-त्यौहार और उत्सवों तथा जीवन के हर पहलू का आनंद लेना है। मांसाहार, शराब और सेक्स को लेकर पाप का भाव नहीं है। उन्होंने इन सब बातों का सामान्यीकरण करके समाज और राष्ट्र को ग्रंथियों से मुक्त कर खुशहाली की तरफ कदम आगे बढाया है। उनकी ख़ुशियों में इन प्रतीकों तथा उनके पीछे के कथानकों और जीवनशैली का बड़ा योगदान माना जा सकता है। 

क्रमश: जारी

(संपादन : नवल/अनिल)


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लेखक के बारे में

भंवर मेघवंशी

भंवर मेघवंशी लेखक, पत्रकार और सामाजिक-सांस्कृतिक कार्यकर्ता हैं। उन्होंने आरएसएस के स्वयंसेवक के रूप में अपना सार्वजनिक जीवन शुरू किया था। आगे चलकर, उनकी आत्मकथा ‘मैं एक कारसेवक था’ सुर्ख़ियों में रही है। इस पुस्तक का अंग्रेजी अनुवाद हाल में ‘आई कुड नॉट बी हिन्दू’ शीर्षक से प्रकाशित हुआ है। संप्रति मेघवंशी ‘शून्यकाल डॉट कॉम’ के संपादक हैं।

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