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त्रिवेणी संघ, जिसने डाली हिंदी पट्टी में सामाजिक न्याय की बुनियाद

बिहार में 1930 के दशक के साथ ही खासतौर से उत्पीड़ित जातियों के जागरण ने नए दौर में प्रवेश किया, जिसके केंद्र में पिछड़े थे। पिछड़ी जातियों के साझा पहचान व चेतना ने शक्ल अख्तियार करना शुरु किया। बता रहे हैं रिंकु यादव

आधुनिक इतिहास में जब उत्पीड़न और अन्याय के खिलाफ संघर्ष की बात कही जाती है तब बिहार के गौरवशाली इतिहास को भी शामिल किया जाता है। हालांकि सच यह भी है कि इतिहास के महत्वपूर्ण अध्यायों में त्रिवेणी संघ के संघर्ष का अध्याय शामिल नहीं रहता है और इसके नायकों का नाम नायकों की सूची से गायब रहता है। यह अकारण अचेतन नहीं, बल्कि सचेतन है। एक समय त्रिवेणी संघ ने जीवन के हर क्षेत्र में कायम ऊंची जातियों के एकाधिकार को चुनौती दी थी। संघर्ष के इतिहास के उन अध्यायों से विभिन्न रंगों में रंगी प्रभुत्ववादी शक्तियां अब भी घबराती हैं। यहां तक कि प्रगतिशील-सेकुलर इतिहास बोध में आज भी उत्पीड़ित समूहों के संघर्ष और उसके नायकों को उचित जगह नहीं मिल पाई है।

मसलन, हिंदी पट्टी के प्रमुख राज्यों में एक बिहार में सामाजिक न्याय की शक्तियां ताकतवर हैं, लेकिन त्रिवेणी संघ का संघर्ष व उसके नायकों को विस्मृति के अंधेरे से मुक्ति नहीं मिली है। यह निश्चित रूप से त्रासदपूर्ण और सामाजिक न्याय की जारी लड़ाई व राजनीति के संकट को रेखांकित करता है।

बहुतों को वर्तमान की चुनौतियों पर बात करने के बजाय इतिहास के इतने पीछे के अध्यायों से गुजरना महत्वहीन लग सकता है। लेकिन वर्तमान की चुनौतियां और आगे बढ़ने की जद्दोजहद में हम बार-बार इतिहास से भी गुजरते हैं। यह कोई अतीत मोह नहीं है, अपनी जड़ों को पकड़ने और उससे ताकत लेकर आगे बढ़ने की जरूरत है।

बिहार में 1930 के दशक के साथ ही खासतौर से उत्पीड़ित जातियों के जागरण ने नए दौर में प्रवेश किया, जिसके केंद्र में पिछड़े थे। पिछड़ी जातियों के साझा पहचान व चेतना ने शक्ल अख्तियार करना शुरु किया। उत्पीड़ित जातियों की एकता आगे बढ़ी। जाति से जमात बनने की प्रक्रिया आगे बढ़ी और अलग-अलग जाति संगठनों से साझा संगठन बनाने की ओर कदम बढ़ाया गया। त्रिवेणी संघ का गठन 30 मई, 1933 को उस समय के शाहाबाद जिले (वर्तमान में रोहतास जिला) के करगहर में हुआ। इसके संस्थापकों में चौधरी जे.एन.पी. मेहता, सरदार जगदेव सिंह यादव और डॉ. शिवपूजन सिंह प्रमुख थे। 1935 में प्रदेश स्तर पर त्रिवेणी संघ का गठन हुआ। गणपति मंडल सचिव और दासू सिंह अध्यक्ष बनाए गए। बाद में ऑल इंडिया त्रिवेणी संघ का गठन भी हुआ। उत्पीड़ित जातियों के साझा मंच के बतौर इसने बिहार में स्पष्ट दृष्टि व व्यापक एजेंडा के साथ सामाजिक न्याय की लड़ाई की बुनियाद रखी। पिछड़ों-दलितों के सामाजिक-राजनीतिक सशक्तिकरण का रास्ता खोला।

30 मई, 1933 को सरदार जगदेव सिंह यादव, शिवपूजन सिंह और चौधरी जेएनपी मेहता ने किया था त्रिवेणी संघ का गठन

सवर्ण-अभिजात्य नेतृत्व में चल रही आजादी की लड़ाई की मुख्य धारा में अंग्रेजों से राज हासिल करने का सवाल था, लेकिन दलितों-पिछड़ों के लिए आजादी केवल अंग्रेजों के वापस अपने देश लौट जाने भर का सवाल नहीं था। उनके लिए सदियों से चली आ रही गुलामी से आजादी का सवाल भी महत्वपूर्ण था। बिहार की जमीन से त्रिवेणी संघ ने आजादी की लड़ाई में हाशिए के छोर से वैचारिक-राजनीतिक हस्तक्षेप किया।

जैसा कि आज भी जाति के प्रश्न और सामाजिक न्याय के सवालों पर ब्राह्मणवादी शक्तियों और सवर्ण वाम-प्रगतिशीलों की प्रतिक्रिया आती है, वैसे ही प्रतिक्रिया उस दौर में भी थी। कांग्रेस के लिए त्रिवेणी संघ सरकार और जमींदार प्रायोजित था तो किसान सभा की नजर में जातिवादी संगठन था। स्वामी सहजानंद और राहुल सांकृत्यायन आदि की धारणा भी त्रिवेणी संघ के बारे में ऐसी ही थी। कांग्रेस समर्थित अखबार भी त्रिवेणी संघ को जमींदारों द्वारा संचालित संगठन साबित करने की कोशिश में लगे थे। यहां तक कि 1937 में अंतरिम चुनाव के वक्त अपने दौरे में पंडित जवाहरलाल नेहरू ने भी पटना और आरा की सभा में त्रिवेणी संघ की आलोचना की। उन्होंने (त्रिवेणी संघ का नाम न लेते हुए) राजनीतिक संप्रदायों के उभरने पर आश्चर्य व्यक्त किया। जात-पांत के विचार से अपनी असहमति जताते हुए उन्होंने हर किसी से राष्ट्रीय हित को आगे बढ़ाने के लिए काम करने की अपील की। (प्रसन्न कुमार चौधरी व श्रीकांत, बिहार में सामाजिक परिवर्तन के कुछ आयाम, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, 2010, पृ. 122)

त्रिवेणी संघ पर लगाए जा रहे आरोपों के उलट सच्चाई यह थी कि उस दौर के बिहार के सभी बड़े नेता अपनी-अपनी जाति के संगठनों में संलिप्त थे। स्वतंत्रता आंदोलन की अगुआई कर रही कांग्रेस पर सवर्णों का कब्जा था। संगठन के नेतृत्वकारी निकायों और चुनाव में उम्मीदवार के बतौर पिछड़े-दलितों के लिए दरवाजा बंद था। जबकि पिछड़े-दलित आजादी की लड़ाई में जमीन पर खून-पसीना बहा रहे थे, जेल व दमन झेल रहे थे। यहां तक कि किसान सभा पर भी भूमिहार-ब्राह्मण जाति के खुशहाल कायमी रैयतों का कब्जा था। लगान में जाति आधारित भेदभाव और तरह-तरह के अबवाब (जमींदार के द्वारा मालगुजारी के अतिरिक्त वसूला जानेवाला कर), जिसे त्रिवेणी संघ ने छिपा लगान की संज्ञा दी थी, किसान सभा के मुद्दों से गायब थे। 

त्रिवेणी संघ को लेकर आज भी भ्रम फैलाया गया है कि यह तीन जातियों – यादव, कुशवाहा और कुर्मी – का संगठन था। हिंदी व्याकरण के आधार पर त्रिवेणी के ‘त्रि’ को तीन जातियों से जोड़ दिया जाता है। इस तरह का भ्रम उस दौर में भी फैलाया जाता था। उस दौर में त्रिवेणी संघ के नेताओं ने ऐसे भ्रमों का खंडन स्पष्ट रूप में किया था कि यह वास्तविक खेतिहर समुदायों, व्यवसायियों और मजदूरों का संगठन है। जरूर ही त्रिवेणी संघ के गठन के केंद्र में तीन प्रमुख पिछड़ी जातियों के लोग थे। लेकिन यह तमाम उत्पीड़ित जातियों के साझा मंच के बतौर ही आगे बढ़ा। संगठन की दृष्टि संकीर्ण नहीं थी और एजेंडा व्यापक था। 1940 ई. में यदुनंदन प्रसाद मेहता द्वारा लिखित ‘त्रिवेणी संघ का बिगुल’ तमाम दुष्प्रचार व आरोपों का जवाब देता है। 

दरहकीकत, त्रिवेणी संघ ने धार्मिक, सामाजिक, राजनीतिक व आर्थिक साम्राज्यवादियों के खिलाफ बिगुल फूंका था। सामाजिक न्याय की आंदोलन की नींव डालनेवाला यह संगठन धार्मिक धांधलियों, लूट, अन्याय, अत्याचार, अंधेरगर्दी और स्वार्थों का अंत सदा के लिए कर देना चाहता था। वह जन्म आधारित ऊंच-नीच के खिलाफ था और जाति के खात्मे का आकांक्षी था। 

जरूर ही त्रिवेणी संघ बाहरी और भीतरी दोनों सरकारों के खिलाफ था। उसका मानना था कि भीतरी सरकार जमींदार, पूंजीपति और अपने को ऊंच तथा दूसरों को छोटे समझनेवाले अभिमानियों से बनी हुई है, जो गरीबों और वंचित समाज के लिए फिरंगी सरकार से भी खतरनाक है। ‘त्रिवेणी संघ का बिगुल’ में उल्लेखित है कि “त्रिवेणी संघ किसी भी सरकार को, जो बुरी हो, दूर करना चाहता है, बल्कि वह भीतरी सरकार की जड़ को भी उखाड़ देना चाहता है। यही भीतरी सरकार जमींदार, पूंजीपति और अपने को ऊंचा तथा दूसरों को छोटा समझने वाले अभिमानियों से बनी हुई है, जो गरीबों और अनुन्नत समाज के लिए विदेशी सरकार से भी अधिक खतरनाक है। जिसे हम कहते हैं राजनीतिक साम्राज्यवाद, जो पब्लिक वर्क्स से लेकर सरकारी महकमों तक या हेठ से ऊपर तक (नीचे से लेकर ऊपर तक) अपना आतंक फैलाए हुए है। गरीबों की वहां दाल नहीं गलती। यदि कोई भी अनुन्नत समाज का आदमी वहां पहुंच जाता है तो उन्हें छींक आने लगती है और कानाफूसी हो जाती है कि यह छोटी कौम का है – आने न पावे, ठहरने न पावे आदि-आदि।

ये बातें न केवल सरकारी नौकरियों तक ही रह गई है, बल्कि कांग्रेस-जैसी देशभक्त कहलाने वाली संस्था में भी आ गई है जैसा कि विगत चुनावों में देखा गया है।

(त्रिवेणी संघ का बिगुल, फारवर्ड प्रेस, नई दिल्ली द्वारा ऑनलाइन प्रकाशित आलेख से उद्धृत)

त्रिवेणी संघ ने आर्थिक साम्राज्यवाद के स्रष्टा के बतौर जमींदार, पूंजीपति तथा सरकार, चाहे वह देशी हो या विदेशी, को चिह्नित किया था। वह जमींदारों द्वारा खुला लगान के साथ छिपा लगान-बेगारी, नजराना के खिलाफ भी था। त्रिवेणी संघ किसानों के साथ न्याय, मजदूरों को मुनाफे के अनुसार मजदूरी, मजदूरों की सर्विस का ख्याल करने के साथ प्रोविडेंड फंड या पेंशन की व्यवस्था, वेतन की असमानता और बेकारी के सवाल पर भी बात करता था। त्रिवेणी संघ का साफ मानना था– जमीन अपने हाथ से हल चलानेवाले किसानों की है। त्रिवेणी संघ सेकुलर मूल्यों के साथ था, वह हिंदू-मुसलमान के बीच झगड़े के लिए पंडित और मौलवी को जिम्मेवार मानते हुए प्रेम-भाईचारे की बात करता था। 

कुल मिलाकर त्रिवेणी संघ तमाम किस्म के अन्याय-गैरबराबरी के खिलाफ उत्पीड़ितों के आत्मसम्मान और नागरिक अधिकारों की दावेदारी करता है और राष्ट्र निर्माण की दृष्टि व सामाजिक-आर्थिक व राजनीतिक न्याय के व्यापक एजेंडा के साथ सामने आता है।

आज भी बढ़ते सवर्ण एकाधिकार और कॉरपोरेट कब्जा के हमलावर फासीवादी मुहिम के खिलाफ बिहार की जमीन से उभर रहे बहुजन आंदोलन के सामने यही चुनौती खड़ी है कि वह सामाजिक न्याय की राजनीति के सीमा-संकट से पार जाते हुए व्यापक एजेंडा पर बहुजनों की एकजुटता व स्वतंत्र दावेदारी को बुलंद करे। त्रिवेणी संघ के विरासत की यही मांग है। 

(संपादन : राजन/नवल/अनिल)


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लेखक के बारे में

रिंकु यादव

रिंकु यादव सामाजिक न्याय आंदोलन, बिहार के संयोजक हैं

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