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एक दलित बस्ती की कथा : कैथ का पेड़ (दूसरा भाग)

अगर ये दोनों स्कूल हमारे मुहल्ले में नहीं होते, तो यकीन मानिए, मैं क्या, मेरे मुहल्ले व आसपास के मुहल्ले के निम्नवर्गीय बहुत-से बच्चे नहीं पढ़ पाते। उन दिनों जूनियर हाई स्कूल को ‘मिडिल’ और प्राइमरी स्कूल को मदरसा कहा जाता था, जो आज सिर्फ इस्लामी तालीम के लिए रूढ़ हो गया है। पढ़ें, कंवल भारती द्वारा लिखित आत्मकथात्मक शृंखला का दूसरा भाग

[दलित साहित्य में आत्मकथाओं का खास महत्व रहा है। सामान्य तौर पर आत्मकथाओं के लेखक अपने जीवनानुभवों को उद्धृत करते हैं। इसमें उनकी सफलताएं व असफलताएं भी शामिल होती हैं। कंवल भारती ने आत्मकथा के बजाय सामुदायिक स्तर पर कथा लिखी है। अपनी इस कथा में वह अपने पैतृक शहर रामपुर के उस मुहल्ले के बारे में बता रहे हैं, जहां उनका जन्म और परवरिश हुई।]

पहले भाग के आगे

आज भी जो गलियां और सड़कें मेरे सपने में आती हैं, वे रामपुर के मुहल्ला ‘कैथ का पेड़’ की है, जिसे ‘दरख्त कैथ’ भी बोला जाता है। यह मुहल्ला मेरी जन्मभूमि और कर्मभूमि दोनों है। लेकिन मेरी स्मृतियों में जो ‘कैथ का पेड़’ समाया हुआ है, वह आज का नहीं, बल्कि 1960 से 1970 के बीच का है। तब वह आज जैसा घना मुहल्ला नहीं था, पर महत्वपूर्ण था, क्योंकि उसमें हिंदू और मुसलमान, दोनों समुदायों के श्रमिक वर्ग रहते थे। उनमें न कोई उच्च हिंदू था और न उच्च मुसलमान। वे रोज कुआं खोदकर पानी पीने वाले श्रमिक थे। इसलिए बेहद गरीब थे। फिर भी उनमें संतोष और सब्र था, जो उन्हें अपने-अपने धर्मों की घुट्टी में मिला था। उन्हें किसी से कोई शिकायत नहीं थी। वे भूखे रहकर भी ऊपर वाले का शुक्रिया अदा करते थे। ऊपर वाला उन्हें बद-से-बदतर हाल में रखता, तो भी वे उसकी इबादत में कोई कमी नहीं छोड़ते थे। हमारा यह मुहल्ला एक बड़े से गंदे नाले के किनारे बसा हुआ था, जो मनु के ‘अन्त्यज’ और गांधी जी के ‘अंतिम जन’ का प्रतिनिधित्व करता था, जिसे हम आज हाशिए का समाज कहते हैं।  

इस मुहल्ले का दायरा इतना छोटा है कि इसके चारों ओर हर दो फर्लांग के बाद दूसरा मुहल्ला आ जाता है। झंडा, पक्का पुल, घेर नज्जू खां, पीला तालाब, हमाम वाली गली ऐसे मुहल्ले हैं, जिनके बाशिंदे जब अपने घरों से सौदा-सुलफ लेने बाजार के लिए निकलते हैं, तो वे ‘कैथ का पेड़’ होकर ही गुजरते हैं। यही नहीं, पहाड़ी गेट जाने वाले लोग भी ‘कैथ का पेड़’ होकर ही जाते हैं। यह वह ‘आम मार्ग’ है, जिससे ‘बाजार नसरुल्लाह खां के गेट से पहाड़ी गेट तक सीधे जाया जा सकता है। इस वजह से इस रोड पर दिनभर आवागमन बना रहता है। ‘कैथ का पेड़’ से दो किलोमीटर की दूरी पर ‘हाता’ यानी बूचड़खाना था, शायद अब भी वहीं हो, जिसमें बड़े जानवर– बैल, भैंसें काटे जाते थे। वहां से कटे हुए जानवरों के सिर, पैर, और अन्य हिस्सों के बड़े-बड़े लोथड़े, टाट-बोरियों से ढंककर तांगों में भरकर गोश्त की दुकानों पर ‘कैथ का पेड़’ से होकर ही गुजरते थे। उन्हें देखकर शरीर में अजीब सिहरन दौड़ जाती थी। वैसे, इस मुहल्ले की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि जबसे मैंने होश संभाला, यानी अपनी चार साल की उमर से, 1975 में अपनी शादी होने की उमर तक, यहां कभी सांप्रदायिक दंगे नहीं हुए, और आज तक नहीं हुए, 1992 में भी नहीं, जब पूरे देश में बाबरी मस्जिद को मिस्मार किए जाने के खिलाफ मुसलमानों में रोष था। जबकि उस माहौल में इस मोहल्ले के निम्न वर्गीय हिन्दू, दंगाईयों के आसान शिकार हो सकते थे, पर यहां स्थिति पूरी तरह शांत थी, जैसे कुछ हुआ ही नहीं था। तनाव शहर में था, मुहल्ले में नहीं था। 

लेकिन जिस कैथ के पेड़ की वजह से इस मुहल्ले का नामकरण हुआ था, वह पेड़ मेरी स्मृति में पाखड़ (पाकड़) या बरगद का है, जो सड़क के किनारे बुद्धन की दुकान के सामने था। उसकी जड़ें जमीन पर लटकी हुई थीं। उसके नीचे एक बूढ़ा आदमी जमीन पर टोकरी में फल रखकर बेचा करता था। फल भी क्या होते थे– तरबूज, कठा अमियां, शफरियां (अमरूद), बेर, अमरख और बलागुंड (बेल)। कभी-कभी वह गर्मियों में फूट भी बेचता था। यह खरबूजे की ही प्रजाति का एक लंबा फल होता था, जो अक्सर फटा हुआ होता था, शायद उसके फूट नामकरण की यही खास वजह हो। आज यह फल कहीं दिखाई नहीं देता। वह पेड़ गर्मियों में घनी छाया देता था, जिसके नीचे कुछ ठेले वाले ठेले पर बैठकर सुस्ताया करते थे। एकाध आइसक्रीम बेचने वाले भी उसके नीचे अपना ठेला या डिब्बा लेकर बैठ जाते थे। आज वह पेड़ वहां पर नहीं है। सड़क के चौड़ीकरण की क्रूर आरी ने कब उसकी निर्मम हत्या कर दी, और कब वहां दूकानों आदि का निर्माण हुआ, इसकी जानकारी मुझे नहीं है। 

मुहल्ला ‘कैथ का पेड़’ में एक बड़ी सुविधा यह थी कि सरकारी स्तर पर कक्षा 1 से 8 तक की शिक्षा का इंतजाम बहुत अच्छा था। वहां दो स्कूल थे, एक कक्षा 1 से 5 तक का प्राइमरी स्कूल और दूसरा कक्षा 6 से 8 तक का जूनियर हाई स्कूल। इनमें प्राइमरी स्कूल बरगद के पेड़ से, पश्चिम में मुश्किल से 50 कदम की दूरी पर था, जिसका नाम ‘बेसिक स्कूल पीला तालाब’ था। उसमें आस-पास के मुहल्लों के बच्चे पढ़ते थे। इस स्कूल से पांचवी पास करने के बाद छठी कक्षा में दाखिले के लिए अधिकांश छात्र ‘राजकीय सिटी जूनियर हाई स्कूल’ में ही जाया करते थे, जो ठीक ‘बेसिक स्कूल पीला तालाब’ के सामने था। इन दोनों स्कूलों की दूरी मेरे घर से पांच मिनट से भी कम की थी। अगर ये दोनों स्कूल हमारे मुहल्ले में नहीं होते, तो यकीन मानिए, मैं क्या, मेरे मुहल्ले व आसपास के मुहल्ले के निम्नवर्गीय बहुत-से बच्चे नहीं पढ़ पाते। उन दिनों जूनियर हाई स्कूल को ‘मिडिल’ और प्राइमरी स्कूल को मदरसा कहा जाता था, जो आज सिर्फ इस्लामी तालीम के लिए रूढ़ हो गया है। इन दोनों स्कूलों में आसपास के बहुत-से मुहल्लों के बच्चे पढ़ने आते थे। अतः यह कहना गलत न होगा कि इन स्कूलों ने निम्नवर्गीय समुदायों में शिक्षा के विकास में बहुत बड़ी भूमिका निभाई थी, जिसे मैं खुद अपने जीवन में महसूस करता हूं। 

बरगद के पेड़ के निकट ही ‘कैथ का पेड़’ का चौराहा था, जहां से चार रास्ते – बाजार नसरुल्लाह खां, पहाड़ी गेट, पुराना गंज और झंडा मोहल्ले – को जाते थे। इस चौराहे पर स्थित दो दुकानें मेरे मानस पटल पर अमिट रूप से अंकित हैं। एक प्राइमरी स्कूल से सटी हुई गोरे मियां की और दूसरी उसकी दाईं तरफ बने एक ऊंचे-से टीले पर अली जान की दूकान थी। तब मेरी उम्र पांच-छह साल की रही होगी, जब मैंने इन दूकानों पर जाना शुरू किया था। यह जाना एक लालच की वजह से हुआ था। जैसे कुंजड़े ग्राहकों को सब्जी बेचने के बाद हरा धनिया या कुछ मिर्चें मुफ्त में डाल देते थे, उन दिनों दुकानदार भी अपने ‘बाल-ग्राहक’ को सौदा बेचने के बाद कोई चीज मुफ्त में खाने को दे देता था। इसमें चने और परमल की मीठी टिकिया, या बेसन के सेव, या भुने हुए चने या गुड़ होता था। मुफ्त की वह चीज इतनी मूल्यवान होती थी कि आज एक रुपए में भी नहीं मिल सकती। इसी लालच की वजह से अम्मा जो भी सौदा मंगाती, मैं दौड़-दौड़ कर लेने चला जाता था। मैं जब अली जान की दुकान पर जाता, तो एक बड़ा-सा झरबेरी का पेड़ पड़ता था, जिसके कांटों से बचकर ही दुकान पर जाया जाता था। वहां कुछ गलत लौंडे बेर तोड़ कर खूबसूरत लड़कों को पटाने के लिए खड़े रहते थे। पीछे एक घनी बगिया थी, जिसमें आदमी घुस जाए, तो दिखाई नहीं देता था। वे जिस लड़के को पटाते, उसे उसी बगिया में ले जाते थे। कुछ उनके जाल में फंस भी जाते थे और बहुत-से नहीं भी फंसते थे। जो लड़का उनमें से किसी के भी जाल में फंस जाता था, वह रोता हुआ बाहर निकलता था। उन दिनों उस दुष्कर्म की कहीं शिकायत नहीं थी, न पुलिस में और न मीडिया में। उन दिनों दृश्य मीडिया था नहीं, और अखबारों की भूमिका सीमित थी। पीड़ित लड़का शर्म की वजह से अपने घर पर भी शिकायत नहीं करता था। लेकिन एक बार जाटव बस्ती का एक लड़का उनके जाल में फंस गया था। उनसे छूटकर उसने रोते हुए सारी वारदात अपनी मां को बता दी। फिर क्या था? हंगामा हो गया। उसकी मां से पूरी बस्ती डरती थी, क्योंकि उसके ऊपर तमाम देवी-देवता और पीर आते थे। उसने जो हंगामा काटा, तो वह झरबेरी का पेड़ काटने के बाद ही शांत हुआ था। शायद, इससे पूर्व अली जान को भी चेतावनी दी गई थी कि या तो तेरी दुकान रहेगी, या यह झरबेरी का पेड़ रहेगा। उस पेड़ से अली जान भी परेशान था, इसलिए उसने भी पेड़ को ही शहीद होने दिया। लेकिन, मुहल्ले के काफी लोग अली जान को ही इसका दोषी मानते थे। 

एक दलित बस्ती (फाइल फोटो)

कुछ भी हो, ‘कैथ का पेड़’ में अली जान की दुकान सबसे ज्यादा चलती थी। पर, उसकी दुकान पर शाम के समय सबसे ज्यादा भीड़ रहती थी। इसका कारण यह था कि अधिकांश लोग शाम को ही मजदूरी करके घर लौटते थे और उसी वक्त उनके घरों में चूल्हा जलने का इंतजाम होता था। उन दिनों कागज के नोट से ज्यादा सिक्कों की मुद्रा चलती थी। छेद वाले एक पैसे के सिक्के से लेकर इकन्नी, दुअन्नी, और चवन्नी-अठन्नी के सिक्कों  के अलावा ‘कौड़ी’ भी चलती थी, जिसका 1957-58 तक का मैं स्वयं साक्षी हूं। वजन में भी पसेरी, सेर, आस्सेर, पाव भर, छटांक, आधा छटांक और राई चलती थी। उन दिनों मुहल्लों में ही नहीं, बाजार में भी दुकानदार दुकान में ही बोरी बिछाकर उस पर बैठते थे और बोरी के नीचे ही रुपया-पैसा रखते थे। अली जान ने अपनी दुकान में, जहां वह बैठता था, मिट्टी की एक सुराही नुमा मलसिया गढ़वा रखी थी, जिसमें वह ग्राहकों से लिए गए पैसे डालता था और उसी में से निकालकर ग्राहकों को वापस करता था। 

उसी चौराहे पर गोरे मियां की दूध की दुकान थी, जो औंटा हुआ दूध बेचता था। पर बाद में उसने आटा बेचना भी शुरू कर दिया था। उसकी भट्टी दुकान के आगे ही थी, जिस पर एक बड़े कढ़ाह में दूध उबलता रहता था। उसमें बड़ी मोटी मलाई आती थी, जिसे वह बलाई कहता था। कभी-कभी दूध फट भी जाता था। जिस दिन दूध फटता, उस दिन मुहल्ले के हम बच्चों के मजे आ जाते थे, क्योंकि फटे हुए दूध को वह फ्री में सबको बांट देता था। जैसे ही गोरे के दूध के फटने की खबर फैलती, वैसे ही हम लोग गिलास, लुटिया लेकर दूध लेने दौड़ जाते थे। उस दूध में शकर डालकर पीने से वह बहुत स्वादिष्ट लगता था। पता नहीं, वह फटे हुए दूध का पनीर या छेना क्यों नहीं बनाता था, और सारा दूध बांट या फेंक क्यों देता था? 

उन दिनों दूध और दही मिट्टी के कुल्हड़ में मिलता था। आज की तरह प्लास्टिक के गिलासों, कपों और थैलियों के बारे में तब कोई सोच भी नहीं सकता था। दूध के लिए घर से बर्तन लेकर जाना पड़ता था और बाकी सामान के लिए दुकानदार कागज की थैलियां रखता था। आटे के लिए घर से कपड़ा या कपड़े का थैला लेकर जाना पड़ता था, उसे कोई दुकानदार कागज की थैली में नहीं देता था। आटे-दाल के लिए मुहल्ले के लोग ज्यादातर बाजार नसरुल्लाह खां में गेट के पास की दुकान पर जाते थे। वहीं पर सब्जी मंडी थी, जिसमें सब दुकानदार मुसलमान (कुंजड़े) होते थे। वहीं वेश्या-बाजार था, जहां शाम होते ही शौकीन लोगों का आना-जाना शुरू हो जाता था। शायद मुहल्ले में आटे की खपत को देखकर ही गोरे खां ने दूध के साथ आटा बेचने का काम भी आरंभ कर दिया था। मुझे यह स्मृति है कि वह गर्मियों में शाम को सड़क पर आटे का ढेर लगाकर बेचता था। गोरे खां के तीन बेटे थे, और सभी कारोबार में लगे थे। एक गाय-भैंस वालों से दूध लाने का काम करता था, दूसरा दुकान पर दूध का काम संभालता था और तीसरा, जो सबसे छोटा था, आटे का कारोबार संभालता था। लेकिन किसको पता था कि उनमें से किसके साथ नियति क्या क्रूर खेल खेलने वाली थी। दुकान की चौकीदारी के लिए वे लोग दुकान के आगे ही चारपाई बिछाकर सो जाते थे। एक दिन सुबह-सुबह हल्ला मच गया। जिसने भी सुना, वह गोरे की दुकान की ओर दौड़ पड़ा। पूरा मुहल्ला गोरे की दुकान पर इकट्ठा और सबके सब परेशान। जिसने भी सुना, वही अवाक्। या अल्लाह! या राम!! यह क्या हो गया? कैसे हो गया? सबके मुंह से बेसाख्ता यही निकल रहा था। पता चला कि रात में किसी समय कोई ट्रक सड़क पर सो रहे एक भाई को कुचल कर चला गया और मौके पर ही उसकी मृत्यु हो गई थी। इस दुखद घटना ने सबकी आंखें नम कर दी थीं। 

इस हादसे के बाद गोरे खां की दुकान काफी समय के लिए बंद हो गई थी। इसी बीच एक नई दुकान बरगद के पेड़ के पास बुद्धन की खुल गई थी। (इसी जगह अभी हाल तक डाक्टर अब्दुल गनी का होम्योपैथिक क्लीनिक देखा गया था।) बुद्धन का लड़का बच्छन भी कभी-कभी दुकान पर बैठता था। मेरा उससे याराना हो गया था। उम्र में भी वह मुझसे कुछ ही साल बड़ा था। उसका घर हमाम वाली गली में था, जो ‘कैथ का पेड़’ से सटा हुआ मुहल्ला था। उसके साथ मेरी खूब छनती थी। उसकी दुकान के सामने, या आज यहां यूनुस क्लीनिक है, उसके सामने एक खाली मैदान था, जिसमें दो पुरानी कब्रें भी थीं, लेकिन वह कब्रिस्तान नहीं था, क्योंकि उसमें कोई भी नई मय्यत नहीं दफनाई जाती थी। हम उन कब्रों पर बैठते भी थे और उनके ऊपर कोयले से चीलमकोड़े (लकीरें बनाना और उन्हें गिनना) भी काड़ते थे। मैदान में अक्सर जंगली घास-पौधे और झाड़ियां उगी रहती थीं, वैसे उसमें दो पेड़ नीम के भी थे और एक छोटा-सा पेड़ बेरी का था, जिस पर छोटे-छोटे गोल बेर आते थे। हम बच्चों के लिए खेलने का वही एकमात्र स्थान मुहल्ले में था। उसी में हम शाम के समय अपने हम-उम्र लड़कों के साथ खेला करते थे। हम सबका प्रिय खेल होता था– ‘छिपा छिपैया, यानी, छिपना और एक-दूसरे को खोजना’। हम सभी किसी पेड़ या झाड़ी के पीछे छिप जाते थे और सभी आसानी से पकड़ में भी आ जाते थे। हम हंसते हुए बाहर आते और फिर उसी खेल में लग जाते थे। चिराग जलते ही मांएं अपने-अपने बेटों को आवाज देती हुई वहां आ जाती थीं। जिस लड़के को अभी अपने घर नहीं जाना होता था, वह अपनी मां की आवाज को अनसुना करके मैदान के दूसरी तरफ निकल जाता था या जहां होता, वहीं छिपा बैठा रहता था। जब कोई आवाज नहीं आती, तो वह फिर खेलने लग जाता था। कभी-कभी मैदान से हटकर हम अन्यत्र भी छिपने-पकड़ने का खेल खेलते थे, लेकिन वह मैदान के पास होता था। मैदान मेरे घर से महज 50 गज की दूरी पर था। बीच में अब्दुर्रहमान (दर्जी) का घर पड़ता था, जिसके मेन दरवाजे में किवाड़ नहीं थे। लेकिन अंदर एक और दरवाजा था, जो भीतर से बंद रहता था। उसके ग्राहक भीतर के उसी दरवाजे की कुंडी खटखटाते थे। भीतर और बाहर के दरवाजे के बीच एक तखत पड़ा रहता था, जिसके नीचे हम लोग छिप जाते थे। यह बात मुहल्ले के बड़े लोग यहां तक कि अब्दुर्रहमान भी जानते थे। एक बार एक औरत सिलाई को दिए हुए अपने कपड़े लेने वहां आई, तो उसे तखत के नीचे हलचल मालूम हुई। उसने जब झांककर देखा, तो उसकी सांस ही अटक गई। वहां दो लड़के आपत्तिजनक स्थिति में लेटे हुए थे, जिनमें एक लड़का उसका बेटा था। उसने दोनों को बाहर खींचा, अपने बेटे को तो दो थप्पड़ मारकर घर भेज दिया, पर दूसरे लड़के को पकड़कर उसके घर उसकी मां के पास ले गई और वहां जाकर जो हंगामा उसने किया, तो जिस बात को कोई नहीं जानता था, उसे पूरा मुहल्ला जान गया। उसके घर के आगे लोगों का मजमा लग गया। लेकिन हैरत की बात यह थी कि लड़के की मां ने उसके बेटे को ही दोषी ठहराया। उसने कहा– “तुझे मलूम नाय, तेरा लौंडा दिन में कित्ती दफा मेरे लौंडे से मिलने आवै? अपने लौंडे को रोक। मेरा लौंडा तो जवान है, जवानी तो जोर मारेगी ही।”

दूसरी औरत ने भी तैश में जवाब दिया– “तो रंडी! शादी क्यों न कर देती, जो लौंडों में मुंह मारता फिरे है।”

“अरी रांड! क्या तुझसे पूछके करूंगी?” 

‘रांड’ कहे जाने पर वह औरत रुआंसी हो गई, क्योंकि वह सचमुच विधवा थी। अब मजमेबाज लोगों की सहानुभूति उसके साथ हो गई थी। कुछ लोगों ने दोनों को समझा-बुझाकर मामला रफा-दफा कराया। एक ने तो मौके का फायदा उठाते हुए पहली औरत से कहा– “खबरदार, जो इसे रांड कहा। भगवान से डर, कोई औरत अपनी मर्जी से रांड नहीं बनती है। खुदा न खास्ता कल तेरे साथ कुछ हो जाए, तो!” और, यह कहकर उसने सहानुभूति में उस दूसरी औरत के सिर पर ऐसा हाथ फेरा कि वह उसे खिसकाते हुए उसकी आधी कमर तक ले गया। लेकिन, वह दूसरी औरत गजब की हिम्मती थी। उसने उसका हाथ पकड़कर ऐसा मरोड़ा कि उसकी सारी सहानुभूति ठंडी हो गई। उसकी हिम्मत सचमुच सराहनीय थी। अगर वह तुरंत उसको सबक न सिखाती, तो ऐसे न जाने कितने अवांछनीय तत्व उसके घर तक पहुंच  जाते। हमारी पूरी जाटव बस्ती में किसी की भी मजाल नहीं थी कि किसी भी लड़की या औरत को कोई छेड़ देता। हम दलित और गरीब होने के बावजूद मजबूत थे। 

लेकिन, मुझे पहली औरत की मानसिकता ने मिस कैथरीन मेयो की याद दिला दी, जिसने अपनी विख्यात पुस्तक ‘मदर इंडिया’ (1927) में लिखा है कि भारतीय स्त्रियां अपने बेटों को जल्दी पुरुष बनाना चाहती हैं और उनकी बेहूदी मर्दानगी पर खुश होती हैं। 

1968 तक हमारे खेल के उस मैदान पर लोगों के घर बनने शुरू हो गए थे और 1970 तक वह मैदान अपना पुराना अस्तित्व खोकर एक छोटी बस्ती में तब्दील हो गया था, जिसमें बरवाल, जाटव, और मुसलमानों के घर आज भी खड़े हैं। उनमें रहने वाले आज के बच्चों को यह मालूम भी नहीं होगा कि यहां कभी मैदान था, जिसमें दो कब्रें और झाड़-झंखाड़ हुआ करते थे। यह मैदान शादी-ब्याह के मौके पर बारात को ठहराने और नाच-गाने के काम भी आता था। उन दिनों जाटवों में जो समर्थ होता था, वह अपनी लड़की की शादी में बारात के मनोरंजन के लिए स्वांग-तमाशे वाली मंडली को बुलाता था, जो रात भर सांग और गाना-बजाना करती थी। सांग अक्सर शाही लकड़हारा, सत्यवान सावित्री, सत्यवादी हरिश्चन्द्र और रूप-बसंत की कहानियों पर खेले जाते थे, जिनमें सारा अभिनय पुरुष पात्र ही करते थे। इस मैदान पर एक सांग की मुझे स्मृति है, पर कह नहीं सकता कि वह मंडली कहां की थी और उसने क्या खेल खेला था, क्योंकि यह बहुत पुरानी बात है, शायद 1964-65 की।  

मुहल्ले में कुछ घर तेलियों के भी थे, जो चौराहे पर ही पुलिया के पास थे। लेकिन वे तेल पेरने या बेचने का काम नहीं करते थे। वे मीठे-नमकीन सेव और चना-परमल की टिकिया बनाकर बेचते थे। उनकी एक दुकान उनके घर के सामने ही थी और दूसरी बाजार नसरुल्लाह खां में कोने पर पान की दुकान के पास थी। उनमें एक बड़े लाला थे, जो हलुवा-पराठा के गजब के कारीगर थे और दूर-दूर तक मशहूर थे। लेकिन यही लाला, जो बड़े-बड़े मेलों में अपनी दुकान लगाते थे, अपने घर में स्पिरिट बेचने का अवैध धंधा भी करते थे, जिसे लोग पानी में मिलाकर नशे के लिए पीते थे। गंगा-स्नान पर कोसी मेले में, दशहरे पर शहर के रामलीला मैदान में और जून के महीने में पनबड़िया में लगने वाली ऐतिहासिक नुमाइश में बड़े लाला की दुकान जरूर लगती थी। इस नुमाइश के लिए हामिद गेट और बाजार नसरुल्लाह खां में पुलिस चौकी के पास से लोकल बसें चलती थीं। इस नुमाइश में बड़े लाला की हलुवा-पराठा की दुकान का अपना अलग ही जलवा होता था। जैसे दिल्ली में पराठे वाली गली मशहूर है, उसी तरह नुमाइश में एक पूरी पट्टी हलुवा-पराठा की दुकानों के लिए जानी जाती थी। वहां दसियों दुकानें हलुवा-पराठा की लगती थीं, पर हिंदू दुकान एक ही होती थी, बड़े लाला की। पूरी नुमाइश में हिंदू-मुस्लिम का भेद नहीं था, पर हलुवा-पराठा की दुकानों पर यह भेद था। लाला हिंदू ग्राहकों को आकर्षित करने के लिए अपनी दुकान में हिंदू देवी-देवताओं के चित्र टांगता था, और ग्राहकों के बैठने के लिए बहुत सारी मेजें और बेंचें डलवाता था। उसके ज्यादातर ग्राहक हिंदू ही थे, क्योंकि वे मुस्लिम होटलों पर नहीं जाते थे। इसके पीछे उनकी धारणा यह थी कि मुस्लिम दुकानों के हलुवा-पराठे में चरबी का इस्तेमाल होता है, जबकि लाला डालडा का इस्तेमाल करता था। अफसोस कि मुस्लिम हलुवा-पराठे को लेकर यह धारणा आज भी हिंदुओं में है।

मुहल्ले में कोई हकीम-डाक्टर नहीं था। पर इसकी कमी डा. शोर के मतब से पूरी हो जाती थी। उनका मतब हमारे मुहल्ले से दस मिनट की दूरी पर पीर की पेंठ के पास था। हमारे घर में कोई भी बीमार पड़ता, तो बाप वहीं ले जाते थे। डा. शोर एक गोरे-चिट्टे अंग्रेज जैसे लगते थे, सिर पर हैट पहिनते थे। वह आठ आने, बारह आने की तीन पुड़िया दवाई देते थे, जो तीन खुराकें होती थीं और एक-दो खुराकों में ही मरीज ठीक हो जाता था। ज्यादातर बीमारियां जाड़ा-बुखार और खांसी की ही होती थीं। डा. शोर की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि वह अपने शिफाखाने में रात को बैठते थे। उन दिनों रात में बैठने वाले वह रामपुर के एक मात्र डाक्टर थे। डा. शोर की मृत्यु के बाद कुछ समय तक उनके डाक्टर बेटे ने क्लीनिक चलाया था। पर, वह चला नहीं, या कोई और कारण रहा, वे अपनी सारी सम्पत्ति बेचकर रामपुर से चले गए। आज उस जगह पर मुस्लिम लड़कियों की इस्लामी तालीम का मदरसा चलता है। 

फोड़े और चोट-फोट के इलाज के लिए हमारी बस्ती के लोग पुराना गंज में ‘फूल के ससुर’ के पास जाते थे। यह नाम उन दिनों हमें अजीब नहीं लगता था, पर आज लगता है। वह सर्जन थे, पर उनका असली नाम क्या था, यह नहीं मालूम। वह मुहल्ले में ‘फूल के ससुर’ के नाम से ही विख्यात थे। एक बार मैं वहां अपने दो साल के भाई के गरदन के पास के फोड़े का आपरेशन कराने गया था। तब मेरी उम्र कोई 16 साल की थी। डाक्टर ने पांच मिनट में ही चीरा लगाकर, मवाद निकालकर पट्टी कर दी थी। कह नहीं सकता कि आज वह क्लीनिक वहां है या नहीं, पर संभवत: उनकी कोई पीढ़ी उसे चला जरूर रही होगी।

एक और डाक्टर ‘बड़ मुच्छा’ की याद आ रही है, जिनकी दुकान बाजार नसरुल्लाह खां में, सब्जी मंडी (जो अब स्वार रोड पर चली गई है) के ठीक सामने थी। वह डाक्टर नहीं थे, पर दवाई सस्ती देते थे, इसलिए हमारी बस्ती के लोग खांसी-बुखार की दवाई उसी से लेने जाते थे। उनका असली नाम भी मैं नहीं जानता। पर यह नाम इसलिए पड़ा था, क्योंकि उनकी मूंछें काफी बड़ी और घनी थीं। इन ‘बड़ मुच्छा’ साहेब के यहां से हमारे घर में 1978 तक दवाई आती रही थी, जिसका कारण अज्ञानता के साथ-साथ गरीबी भी थी। इसी  गरीबी और अज्ञानता में मेरे 9 वर्षीय बेटे की मृत्यु इन्हीं ‘बड़ मुच्छा’ साहेब की दवाई से हो गई थी। लेकिन फिर भी इसमें वह उतने दोषी नहीं थे, जितनी दोषी मेरी मां और मैं था। बच्चे को खांसी और बुखार हुआ था। अम्मा ‘बड़ मुच्छा’ से दवाई ले आई, जिसने कोई फायदा नहीं किया। दूसरे दिन अम्मा ने जाकर उससे कहा कि “फायदा नहीं हुआ, तेज करके दवाई दे दो।” उसने ऐसी तेज करके दवाई दी कि बच्चे की तबीयत और बिगड़ गई। उसकी आंखें चढ़ गईं और सांस आनी बंद हो गई। मैं और विमला (पत्नी) तुरंत बच्चे को लेकर रिक्शे में बैठकर राजद्वारे की तरफ भागे। लेकिन उस दिन इतवार था, डाक्टरों के अवकाश का दिन। संयोग से डाक्टर मिश्रा ‘मिश्रा मेडिकल हाल’ पर ही खड़े मिल गए थे। उन्हें तुरंत बच्चे को दिखाया। पर बच्चा तो रास्ते में ही हम सबको छोड़कर संसार से विदा हो चुका था। डाक्टर ने कहा, इसमें अब कुछ नहीं है। विमला की चीख निकल गई थी। हम उल्टे पैर वापिस घर आए। मेरी अंधविश्वासी अम्मा ने कहा कि अगर मैं जाहर पीर के आगे बच्चे को लेटा देता, तो ठीक हो जाता। ये बातें मेरी अम्मा ने बच्चे की लाश पर रोते हुए कही थीं। गमी के मौके पर ऐसी बातों से बचा जाता है, पर अम्मा तो जाहर की भक्त थी, अनाप-शनाप बोले जा रही थी। मैंने अम्मा से कहा, “यह तू क्या पागलपन की बात कर रई है? जाहर को बुरा-भला मैं कहता हूं, तो मरना मुझे चहिए था।” असल में जिस रात बच्चे की तबीयत बहुत ज्यादा गंभीर थी, उसी रात हमारी बाखर में मोहनिया के घर में जाहर पीर का रतजगा था, भगतों ने रातभर डफली पर जाहर के छंद गाए थे। मेरी अम्मा रतजगे में गई थी। उस ने मोहनिया या भगतों से मेरे बच्चे के बारे में कहा होगा। वह सुनकर रात में ही हमारे घर आई और विमला से बोली कि लल्ला को भगत जी के पास लेकर चल, ठीक हो जाएगा। मैंने बकी गालियां– “पहले तू उस भुतनिया वाले भगत से अपने लंगड़े लौंडे की टांग ठीक करवा ले, फिर लल्ला को ठीक करइए।” फिर मैंने कहा, “तुझे जरा भी शरम नाहै, बालक बीमार है, और तू रतजगा करवा रई है।” वह गुस्से में बड़बड़ाती हुई वहां से चली गई।  

हमारी बस्ती के ज्यादातर लोग इन्हीं दो डाक्टरों के पास इलाज के लिए जाते थे। बाजार नसरुल्लाह खां में हकीम कल्लू मल भी मशहूर थे। वह मुंआ (मुंह के छालों) की दवाई की पुड़िया मुफ्त में देते थे। वह एक लाल रंग की दवाई होती थी, जिसे जीभ पर लगाकर लार टपकानी पड़ती थी। वह सिर्फ एक ही पुड़िया मुफ्त में देते थे, दूसरी पुड़िया मांगने पर उसका पैसा लेते थे। हकीम कल्लू मल का असली परिचय मुझे बाद में 1968 में मिला, जब मेरे भीतर कविता का कीड़ा कुलबुलाया और मेरे एक हितैषी आर.डी. सागर ने मेरी खराब तुकबंदी से खीजकर मुझे रामपुर के कवि कल्याणकुमार जैन ‘शशि’ को अपना गुरु बनाने की सलाह दी। बात मेरे भी दिल को लग गई थी। उनका पता पूछकर जब मैं उस स्थान पर उनसे मिलना पहुंचा, तो मैं यह जानकर अवाक् रह गया कि जिन हकीम कल्लू मल से मैं मुआ की पुड़िया लेकर आता था, वे ही हिंदी के प्रख्यात कवि कल्याणकुमार जैन ‘शशि’ हैं। 

क्रमश: जारी

(संपादन : राजन/नवल)


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लेखक के बारे में

कंवल भारती

कंवल भारती (जन्म: फरवरी, 1953) प्रगतिशील आंबेडकरवादी चिंतक आज के सर्वाधिक चर्चित व सक्रिय लेखकों में से एक हैं। ‘दलित साहित्य की अवधारणा’, ‘स्वामी अछूतानंद हरिहर संचयिता’ आदि उनकी प्रमुख पुस्तकें हैं। उन्हें 1996 में डॉ. आंबेडकर राष्ट्रीय पुरस्कार तथा 2001 में भीमरत्न पुरस्कार प्राप्त हुआ था।

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