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एक दलित बस्ती की कथा : कैथ का पेड़ (चौथा भाग)

डोरी लाल और गांधीजी के घर कुरुम (गाय), भैंस और भेड़ के चमड़े थान के थान आते थे। कुरुम से जूते के अपर तैयार किए जाते थे, भैंस से सोल और भेड़ से अस्तर बनता था। हर नंबर की अलग-अलग डाइयां होती थीं, जो पट्ठे (मोटे गत्ते) की बनी होती थीं। पढ़ें, कंवल भारती द्वारा लिखित आत्मकथात्मक शृंखला का चौथा भाग

तीसरी कड़ी के आगे

मृत पशुओं की खाल निकालने का काम हमारी बस्ती में ही नहीं, पूरे रामपुर में कोई नहीं करता था। हमारी बस्ती जूता बनाने वाले कारीगरों की बस्ती थी। इस बस्ती की खासियत यह थी कि कोई भी देर रात तक यहां ठक-ठक की आवाज सुन सकता था। यह ठक-ठक जूता बनाने वालों के काम करने की होती थी। इसका मतलब यह था कि बस्ती के किसी न किसी घर में देर रात तक जूता बनाने का काम चलता रहता था। लेकिन वे दिन-रात मेहनत करने के बाद भी सुखी जीवन नहीं जीते थे। जूता-चप्पल और सैंडिलों के एक से बढ़कर एक कारीगर हमारी बस्ती में थे। वे ज्यादातर मजदूरी पर काम करते थे। पर, कुछ कारीगर व्यापार भी करते थे। ऐसे व्यापारी बाजार से कच्चा माल खरीदकर लाते और घर पर जूता-चप्पल बनाकर थोक-व्यापारियों को बेचते थे। वे उद्यमी और व्यापारी दोनों थे। रामनारायण एस. रावत ने अपनी पुस्तक रिकंसिडरिंग अनटचेबिलिटी: चमारर्स एंड दलित हिस्ट्री इन नार्थ इंडियामें चमार जाति को उद्यमी जाति ठीक ही लिखा है। उनके अनुसार चमारों का पतन एक उद्यमी जाति का ही पतन है। इस पतन को मैंने अपनी बस्ती में साक्षात देखा था। 

खैर, मैं बता रहा था कि जाटव बस्ती के कुछ लोग बेहतर कारीगर होने के साथ-साथ बेहतर उद्यमी भी थे। वे स्वयं तो जूता बनाते ही थे, दूसरे कारीगरों को भी काम देते थे। लेकिन ऐसे उद्यमी ज्यादा नहीं थे, गिनती के छह थे– (1) नरोत्तम सरन, जो नेताजी के नाम से मशहूर थे, (2) डोरी लाल, जो सिर पर सफेद साफा बांधकर सर्वपल्ली डा. राधाकृष्णन सरीखे लगते थे, (3) टीका राम, जो अपनी गंजी चांद की वजह से गांधीजी के नाम से जाने जाते थे, (4) ठकरी,  (5) फकीर चंद, और (6) मटरू लाल। लेकिन ये लोग बहुत ही छोटे स्तर के उद्यमी थे।

हमारी बस्ती के जाटवों के पास न बड़ी दुकानें थीं, न कारख़ाने थे, और शो-रूम होने का तो सवाल ही पैदा नहीं होता था। वे अपना सारा उद्यम अपने घरों में ही बैठकर करते थे। उनके घरों के दालान या मड़ैया ही उनके कारखाने, दुकानें और शो-रूम होते थे। दीवालों पर जूते-चप्पलें लाइन से टांगकर उसे शो-रूम बना दिया जाता था। मिट्टी के कच्चे फर्श पर कुछ पत्थर अलग-अलग दूरी पर रखकर उन पर कारीगर काम करते थे, उसी में एक कोने में पैर से चलने वाली चमड़ा सिलने की मशीन भी रखी होती थी, यह उनका कारखाना था। उन पत्थरों में एक पर मालिक भी काम करता था, वहीं से बैठकर वह ग्राहकों से बात करता, आर्डर लेता और व्यापारियों को माल भी बेचता था, इस तरह वह उसकी दुकान भी बन जाती थी। यह शो-रूम, कारखाना और दुकान सब एक ही कमरे में होते थे।

कारीगर दो तरह के थे। एक, अपरमैन, और दूसरा बॉटममैन। अपरमैन जूता या चप्पल का ऊपर का हिस्सा बनाता था, और बॉटममैन उसे कहते थे, जो उस ऊपर के हिस्से को, जिसका तकनीकी नाम ‘अपर’ था, लकड़ी के फरमे पर रखकर पूरा जूता या स्लीपर तैयार करता था। ये दोनों कारीगर जूतों के निर्माण में अनिवार्य तत्व थे, एक के बिना दूसरे का काम चलना मुश्किल था। पर हमारी बस्ती में टू इन वनउस्ताद भी थे, जो अपर और बॉटम दोनों काम बखूबी जानते थे। यद्यपि, हमारी बस्ती में निजी उद्यमियों के माली हालात ज्यादा खराब नहीं थे, मगर इतने अच्छे भी नहीं थे कि बाजार का मुकाबला करते या बाजार में अपना शोरूम खोल लेते। बस, उनकी दाल-रोटी अच्छी चल रही थी। वे किसी के कर्जदार नहीं थे, पर विचारों में इतने पिछड़े हुए थे कि अपने बेटों को हाथसमझते थे। हाथ का मतलब था कमाने वाले लोग। घर में जितने ज्यादा हाथ होंगे, उतना ही ज्यादा उत्पादन होगा और घर में समृद्धि आएगी, यह उनकी सोच थी। वे यह नहीं सोच सके कि समृद्धि शिक्षा से आती है। यदि बेटे पढ़-लिख जाते, तो अपने उद्यम को भी नई तकनीक से नई गति दे सकते थे। लेकिन उन्होंने अपने बेटों को पढ़ाने के बजाए जूतों के काम में ही डाला, जो आगे चलकर आधुनिक तकनीक के सामने टिक नहीं सके और ढेर हो गए। समय बदलने के बाद वे श्रेष्ठ कारीगर या तो कुंठाग्रस्त होकर मर गए या पेट की खातिर नाली के किनारे बैठकर मोची बन गए।

इसके विपरीत जिनके अपने उद्यम नहीं थे, वे दूसरों के कारखानों में मजदूरी पर काम करते थे। बस्ती में ज्यादातर कारीगर मजदूरी पर ही काम करने वाले थे। रामपुर में जूतों के कारखाने मुसलमानों के थे। अतः शहर भर के जाटव कारीगर ज्यादातर उन मुस्लिम कारखानों में ही काम करते थे। इसके अलावा काफी कारीगर अपने लोगों के उद्यमों में भी मजदूरी पर जूते बनाते थे। इन्हीं मजदूर कारीगरों में मेरे पिता भी थे, जो एक मुस्लिम कारखाने में काम करते थे। यहां विशेष रूप से यह भी उल्लेख करना चाहूंगा कि हमारे इन कारीगरों में उस्ताद-शागिर्द की परंपरा चलती थी। जब कोई नया लड़का किसी कारीगर को अपना उस्ताद बनाता था, तो वह अपने उस्ताद को लड्डू या जलेबी लाकर शागिर्दी देता था। जूते बनाने वाले सिर्फ जाटव ही नहीं होते थे, मुसलमान भी होते थे। शफीक, मुश्ताक और जमील नाम के बहुत अच्छे मुस्लिम कारीगर हमारी बस्ती में काम करते थे। एक मुस्लिम, जिसका नाम इस वक्त याद नहीं आ रहा है, मेरे पिता का शागिर्द था। वह उनके साथ कारखाने में काम करता था, उसकी एक आंख में थोड़ा नुक्स था। बाद में रामपुर की मशहूर रजा लाइब्रेरी में वह मुलाजिम हो गया और फिर उसने जूता बनाने का काम छोड़ दिया था। बाद के वर्षों में जब अध्ययन के लिए मैं रजा लाइब्रेरी जाने लगा था, तो वह मुझसे बड़े अदब से अपने उस्ताद के बारे में पूछता था– आपके वालिद साहेब कैसे हैं?” अभी दस साल पहले तक मैंने उसे लाइब्रेरी में ही देखा था, वही दुबला-पतला, सिर पर सफेद टोपी, जो कारखाने में भी उसकी पोशाक थी।

सस्ती का जमाना था, लोग बताते हैं कि दो-ढाई रुपए के हिसाब से थोक में जूता जाता था। लागत भी तब डेढ़-दो रुपए ही आती थी। पर, मुझे पांच-छह रुपए प्रति जोड़े की स्मृति है, जिसमें लागत तीन-चार रुपए आती थी। हमारे यहां ज्यादातर नूकट, बूट और लेडीज स्लीपर बनाए जाते थे। आर्डर पर भी जूते-चप्पल बनाए जाते थे। मुझे याद है, खबरिया गांव से कुछ लोग साल-छह महीने में आते थे, और डोरी लाल से जूते बनवाकर ले जाते थे। एक बार की बात है, उनके पास एक ऐसा आदमी जूता बनवाने आया, जिसके पैर के अंगूठे के पास एक बड़ी सी गांठ थी। गांठ की वजह से वह जूता नहीं पहन पाता था। डोरी लाल ने उसके पैर का नाप लिया और एक हफ्ते बाद उसे आने को कहा। आठ रुपए जूते की कीमत भी तय हो गई। वह आदमी कुछ बयाना देकर चला गया। उनके लिए ऐसा जूता बनाना, जो पैर की गांठ में आराम से आ जाए, सचमुच बड़ी चुनौती थी। पर, उस चुनौती को उन्होंने बखूबी निभाया। हफ्ते भर बाद जब उस ग्राहक ने अपने जूते पहनकर देखे, तो वह खुशी से उछल पड़ा था। इसके लिए डोरी लाल ने सबसे पहले फरमे पर ठीक उस जगह पर, जहां ग्राहक के पैर की गांठ आती थी, कच्चे पट्ठे की कतरनें चिपकाकर एक बड़ा-सा कूबड़ बनाया था। उसके बाद उस पैर के अपरको भी विशेष आकार देकर बनाया गया था। तब तैयार हुआ था वह खास जूता। ज्यादातर ग्राहक आवाज करने वाले जूते बनवाने आते थे। ऐसे जूते, जिन्हें पहनकर चलने के बाद चर्रमर्र-चर्रमर्र की आवाज होती थी, ग्रामीण क्षेत्रों में ऐसी आवाज वाले जूते ज्यादा पसंद किए जाते थे। उनको पहनकर दूर से ही पता चल जाता था कि कोई आ रहा है। यह आवाज अवांछनीय तत्वों के लिए भी संकेत होती थी और उसके घर वालों के लिए भी। हांलाकि वह संकेत कभी-कभी जूता पहनने वाले के लिए घातक भी होता था, पर फिर भी पता नहीं क्यों, वे आवाज वाले जूते ही पसंद करते थे। जूते में आवाज डालने के नाम पर कारीगर ग्राहकों से ढेर सारा सूखा नारियल मंगवा लेते थे, जबकि उसमें नारियल का कोई काम नहीं होता था। वे उस नारियल को घर में ही खा लिया करते थे। जूते में आवाज पैदा करने के लिए एक खास किस्म के पेड़ के बीजों को सोल (तली) में लगाया जाता था, जिसे बिच्छू फलकहते थे। उन बिच्छुओं को मिट्टी के तेल (केरोसिन) में भिगोकर रखा जाता था, फिर लगाया जाता था। वे बिच्छू ही जूते में चर्रमर्र की आवाज करते थे।

एक दलित बस्ती (फाइल फोटो)

डोरी लाल के ही भाई थे गांधीजी यानी टीका राम। दोनों के घर हमारी ही बखरी में आमने-सामने थे। वह भी अपने घर पर ही काम करते थे। वह बहुत सीधे-सादे, सच्चे और नेक इंसान थे। मैंने उन्हें कभी किसी से लड़ते-झगड़ते नहीं देखा। शायद इसी वजह से उन्हें गांधीजी का खिताब लोगों ने दे दिया होगा। डोरी लाल और टीका राम दोनों ही निरक्षर थे। गिनती भी वे दस से ज्यादा नहीं जानते थे। लेकिन, पेंसिल से, जिसे वे दोनों भाई पिल्सन बोलते थे, कापी पर दस-दस लकीरें खींचकर अपने काम का हिसाब रख लेते थे। लेकिन, फिर भी पढ़े-लिखे थोक व्यापारी उनको चूना लगा जाते थे। डोरी लाल ने इसी को भांपकर अपने छोटे बेटे चंद्रपाल को शकीला आपा के घर, जो सड़क पर हमारी बाखर के सामने ही था, पढ़ने बैठा दिया था। मैं भी पढ़ने शकीला आपा के ही घर जाता था। हम दोनों ने कक्षा एक तक की पढ़ाई शकीला आपा के घर पर ही की थी, और अगले वर्ष स्कूल में हम दोनों का ही दाखिला सीधे दूसरी कक्षा में हुआ था। खैर, चंद्रपाल ने पांचवीं कक्षा के बाद पढ़ाई छोड़ दी थी। शायद उनके बाप का काम उतने से ही चल गया था और वह खुद भी आगे पढ़ना नहीं चाहता था।

लेकिन, टीकाराम ने अपने किसी भी बच्चे को नहीं पढ़ाया था। उनकी अपने घर में चलती भी नहीं थी, चलती थी तो उनकी पत्नी मानती की। मानती एकदम-से हिटलर स्वभाव की थी। उसका आतंक ऐसा था कि घर में उसकी मर्जी के बिना बरतन तक नहीं खड़कता था। अगर किसी दिन उसकी मर्जी के खिलाफ कोई काम हो गया, या काम में घाटा आ गया, या गांधीजी की गलती से भैंस या गाय के चमड़े में कोई गलत कटिंग हो गई, तो क्या मजाल कि उस दिन घर में चूल्हा जल जाए! और क्या मजाल कि उसका पति या बच्चा रोटी की बात कह दे! डंडा तो उसका बाद में चलता था, जुबान पहले शुरू हो जाती थी। जब उसकी जुबान चलती थी, उसका पति सहम जाता था, और जुबान भी ऐसी-वैसी नहीं, अश्लील! जिसे सुनकर नौ ताज्जुब करें, और तेरह थूकें। पर, मानती पर उसका कोई असर नहीं पड़ता था। वह अपनी लड़की को भी ऐसी-ऐसी गालियां देती थी कि बाखर की लुगाईयां तक दांतों में उंगली दबा लेती थीं। लेकिन, वही मानती, जो अपने घर में हिटलर थी, दूसरों की गरीबी में बड़ा काम आती थी। अगर, उसे पता चलता कि किसी के घर में फाका है, तो वह मदद के लिए पहुंच जाती थी। पुराना गंज में बनियों की दुकानों पर आना-जाना भी उसी का था। इसलिए बाखर की गरीब स्त्रियां जरूरत पड़ने पर अपने सोने-चांदी की चीजें (जेवर) भी उसी से गिरवी रखवाती थीं। वह चीज लेकर पुराना गंज जाती और घंटे-आधे-घंटे बाद लौटकर आकर उसे पैसे दे देती थी। उस चीज का ब्याज भी बनिए को उसी के हाथों भिजवाया जाता था और अगर ब्याज अदा नहीं हो पाता था, तो उस गिरवी रखी चीज को बिकवाया भी उसी के हाथों जाता था। पर हकीकत यह थी कि मानती पुराना गंज जाती तो थी, पर जेवर को गिरवी रखने या बेचने तक का सारा काम अपने घर से ही करती थी। ब्याज का पैसा भी वह अपने ही घर में रखती थी और बेचने का पैसा भी अपने ही घर से देती थी। वह बनिए की दुकान पर सिर्फ चीज का वजन और मूल्य जानने के लिए जाती थी, और उसी हिसाब से बाखर की गरीब लाचार औरतों को डील करती थी। वह पढ़ी-लिखी बिल्कुल नहीं थी, लेकिन हुनर की धनी थी। यह हुनर ही था कि उसका पति और उसके बच्चे तक उसके इस राज को नहीं जान पाए थे। यह राज तब खुला, जब उसकी मृत्यु हुई, और एक मलसिया में तमाम अप्रत्याशित जेवर और बेगिनती नोट भीगे हुए निकले थे, जिन्हें कई दिन तक उसके छोटे बेटे ने सुखाए थे।

डोरी लाल और गांधीजी के घर कुरुम (गाय), भैंस और भेड़ के चमड़े थान के थान आते थे। कुरुम से जूते के अपर तैयार किए जाते थे, भैंस से सोल और भेड़ से अस्तर बनता था। हर नंबर की अलग-अलग डाइयां होती थीं, जो पट्ठे (मोटे गत्ते) की बनी होती थीं। उनसे अपर, सोल और टापियां (हील्स) काटकर उन पर पेंसिल से नंबर डाल दिए जाते थे। अपरों को लकड़ी के फरमों पर चढ़ाकर बॉटम तैयार किया जाता था। हमारे घर की दीवाल डोरी लाल के घर से सटी हुई थी और गांधीजी का घर हमारे सामने ही था। तीनों घरों के आंगन के बीच सिर्फ एक नाली थी। इसलिए चमड़े के कटने, अपर बनने, सोल बनने, और फरमों पर बॉटम बनने तक का सारा काम मैं रोज ही देखता था। अपर सिलने वाली मशीन दोनों भाईयों की साझे में थी, इसलिए कभी-कभी दोनों घरों के अपर उनमें से कोई भी एक आदमी सिल देता था। लेकिन, गांधीजी के बनाए जूतों में हमेशा कुछ-न-कुछ नुक्स रह जाता था, जिसे देखकर थोक व्यापारी माल नहीं लेता था या औने-पौने दाम में खरीदता था। लेकिन इधर व्यापारी विदा होता, और उधर मानती गांधीजी की क्लास लेती, उस दिन वह अपनी पत्नी के रोष के जबरदस्त शिकार होते थे। मानती काम के दौरान साये की तरह गांधीजी के साथ रहती थी, शायद उसी से वह तनाव में रहते थे और उसका असर उनके काम पर पड़ता था।

उपरोक्त उद्यमियों में केवल दो ने अपने पक्के मकान बनवाए थे। एक नरोत्तम सरन उर्फ नेताजी ने खपरैल तुड़वाकर दो मंजिला घर बनवाया था। नीचे एक बड़ा-सा आंगन या सहन था, दायीं तरफ दो कमरे थे, बायीं तरफ एक कमरा और एक बैठक थी, जिसके तीन दरवाजे बाहर सड़क की ओर और दो दरवाजे भीतर घर में खुलते थे। इसी बैठक में उनका जूतों का कारोबार चलता था। सहन के ऊपर छत नहीं थी। दो जीने थे, जो दोनों तरफ ऊपर बने कमरों तक जाते थे। वह हमारी बस्ती का पहला पक्का मकान था, जिसके बनने के बाद नेता जी ने अपनी बेटी शकुंतला की धूम-धाम से शादी की थी। यह बस्ती की पहली शादी थी, जो दिल्ली से हो रही थी। दहेज में उन्होंने घर-गृहस्थी का वह सारा सामान दिया था, जो उस समय प्रचलित था, और हम जैसों की पहुंच से दूर था। लेकिन यही मकान, उनके कारोबार के पतन के दौरान, लिपाई-पुताई तक के लिए तरस गया था। और नेताजी की मृत्यु के बाद तो स्थिति यह हो गई थी कि छतों की कड़ियां तक गल कर नीचे लटक गई थीं, जिससे छतों से बरसात का पानी चूने लगा था। उनकी मृत्यु के बाद उनके भतीजे जगदीश सरन उस मकान में रहते थे, क्योंकि नेता जी की दो बेटियां थीं, जो दोनों शादी के बाद ससुराल चली गईं थीं, उनमें छोटी बेटी सुनैरी की मृत्यु शादी के एकाध साल बाद ही हो गई थी, उनके एक बेटा भी था, जो विक्षिप्त-सा था, और उसका कुछ भी पता नहीं चल सका कि वह कहां गया। इसी साल जब मैं जगदीश सरन की मृत्यु पर उस घर में गया, तो मुझे उस घर को देखकर बड़ा दुख हुआ था। मैं सोच नहीं सकता था कि यह वही घर है, जो किसी समय बस्ती की शान हुआ करता था। घर सड़क से छह फुट नीचे धंस गया था, जिस बैठक में नेता जी का कारोबार चलता था, उसकी छत में प्लास्टिक बंधी हुई थी। ऊपर की मंजिल के कमरे पूरी तरह गायब थे, जीनों का नामोनिशान नहीं था। लगता था 20-25 सालों से वह निरंतर टूट रहा था, और उसकी सुध लेने वाला कोई नहीं था। सुध ली भी नहीं जा सकती था? अनेक कारणों से जाटवों का जूतों का काम ठप हो गया था। प्लास्टिक और इंकलाट आ गई थी, उसके लिए जिन यंत्रों की जरूरत थी, वो उनके पास नहीं थे। सो, जगदीश भी दाल-रोटी लायक ही कमा पा रहे थे। उसी में अपने दो बेटों और एक बेटी को थोड़ा बहुत पढ़ा-लिखा भी दिया था। जगदीश के बेटों ने पढ़-लिखने के बाद जूतों का काम करना ठीक नहीं समझा, उसको आधुनिक रूप देने के लिए उनके पास संसाधन भी नहीं थे। सरकारी नौकरी के लिए उन्होंने बहुत हाथ-पैर मारे, कहीं नौकरी नहीं मिली। कोई दस साल पहले मैंने सुना था कि जगदीश का एक बेटा वीडियोग्राफी का काम करने लगा है, और दूसरे बेटे का पता नहीं। बेटी पोलियो परियोजना में सुपरवाइजर लग गई है। पर वह भी संविदा पर है। अब क्या स्थिति है, नहीं जानता। किसी का विवाह हुआ या नहीं, यह भी नहीं पता।

दूसरा पक्का मकान तपेश्वरी के बाप फकीरा ने बनवाया था। उन्होंने कब्रिस्तान वाले मैदान में जमीन का एक टुकड़ा खरीद कर मकान बनवाया था। काम करने के लिए एक बड़ी-सी बैठक या दालान, और रहने के लिए उसी से सटे तीन कमरे। कड़ियों की छत थी, जिस पर चढ़ने के लिए जीना बनाया नहीं था, चढ़ने-उतरने के लिए वे लकड़ी की सीढ़ी का इस्तेमाल करते थे। मकान में प्लास्तर भी नहीं हुआ था, नंगी ईंटें ही पूरे घर में दिखाई देती थीं। वह उसे राम मड़ैयाकहते थे। जब मकान बनकर तैयार हुआ, तो एक दिन मैं उनके सामने से निकल रहा था। गर्मियों के दिन थे। वह दालान में खुररी खाट पर बैठे हुए बीजना (हाथ का पंखा) झल रहे थे। मुझे बुलाकर बोले, “लल्ला, इस पर राम मड़ैयालिखवा देगा?” मैंने कहा, “दादा, प्लास्तर के बाद ही तो लिक्खा जागा। तुम राम मड़ैयाचों लिखवा रये हो? इसमें का राम रैगा?” यह सुनते ही दादा का तो दिमाग घूम गया। बोले, “लल्ला, कैसी बातें करै है? जे राम ने ई तो बनवाया है, हमारी का औकात?” मैंने जवाब दिया, “तो हमारा घर क्यों न बना देता राम? तुम का जानते न हो, मेरे बाप कित्ती पूजा पाठ करै हैं? हर सुम्मार को नंगे पैर भमरौआ जावैं जल चढ़ाने।दादा को जवाब देते नहीं बना, हालांकि वह जानते सब थे। उनका धार्मिक स्वभाव तो था, पर कोई बड़ा धार्मिक आयोजन उनके घर में होते हुए मैंने नहीं देखा था। उनके मकान बनने का राज उनके तीन कमाऊ पूत– राम भरोसे लाल, दौलत राम और तपेश्वरी थे, जिन्होंने मिलकर वह मकान बनाया था। वे तीनों अपने कमरों में रहते थे, पर बुढ़ऊ बैठक बनाम दुकान में पड़े रहते थे। वह जानते थे कि अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ता है और घर का निर्माण धर्म से नहीं, अर्थ से होता है। खैर, ‘राम मड़ैयाकी बात फिर कभी नहीं उठी और न उन्होंने राम मड़ैयाकभी लिखवाई।

लेकिन राम का नाम जाटव-संस्कृति में ऐसे घुला-मिला था, जैसे वह उनके रक्त में हो। उठते-बैठते, सोते-जागते और काम पर जाते या काम से आते, हर समय राम का नाम लेना अनिवार्य था। असल में जाटवों में अभिवादन के लिए ‘राम-राम’ कहा जाता था। कुछ लोग ‘जय राम जी की’ बोलकर भी अभिवादन करते थे। लेकिन ‘जय श्री राम’ कोई नहीं बोलता था। हमारी संस्कृति में राम का अर्थ दशरथ-पुत्र राम नहीं था, बल्कि कबीर और रैदास की परंपरा से निकला ‘निर्गुण राम’ था। जाटवों में कबीर, रैदास, गोरखनाथ और गुरु नानक की बहुत मान्यता थी, यह मैं बता चुका हूं। शहर में रैदास-जयंती कमेटी थी, जो हर साल रैदास-जयंती जुलूस के साथ मनाती थी। उसमें निर्गुण गुरुओं के पद गाए जाते थे। उस समय तक कांग्रेस की मेहरबानी से डॉ. आंबेडकर का नाम जाटव समाज में नहीं आया था। मेरे पड़ोस में रहने वाले डोरी लाल कबीर का यह पद अक्सर गया करते थे–

जग में चार राम हैं, तीन राम व्यवहार

चौथा राम निज सार है, ताका करो विचार।

आकार दशरथ घर डोले, निराकार घट-घट में बोले।

बोले कौन राम? घट-घट का राम?

जाटव संस्कृति में राम के रचे-बसे होने का अर्थ यही है।

(आगे जारी….)

(संपादन : राजन/नवल)

लेखक के बारे में

कंवल भारती

कंवल भारती (जन्म: फरवरी, 1953) प्रगतिशील आंबेडकरवादी चिंतक आज के सर्वाधिक चर्चित व सक्रिय लेखकों में से एक हैं। ‘दलित साहित्य की अवधारणा’, ‘स्वामी अछूतानंद हरिहर संचयिता’ आदि उनकी प्रमुख पुस्तकें हैं। उन्हें 1996 में डॉ. आंबेडकर राष्ट्रीय पुरस्कार तथा 2001 में भीमरत्न पुरस्कार प्राप्त हुआ था।

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