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एक शाम जेएनयू छात्रसंघ के नवनिर्वाचित सदस्यों के साथ

छात्रसंघ के लिए यह इम्तहान का वक़्त है कि वह कैसे हठधर्मी प्रशासन से लड़ेगा? कैंपस के छात्रों ने इस बात पर मायूसी ज़ाहिर की कि पिछले दस सालों में प्रशासन का दमन काफ़ी बढ़ा है। जेएनयू छात्रसंघ के नवनिर्वाचित सदस्यों से बातचीत के आधार पर बता रहे हैं अभय कुमार

बीते 29 मार्च, 2024 को शुक्रवार की शाम जब इफ़्तार का वक़्त क़रीब था, जेएनयू छात्रसंघ के नवनिर्वाचित संयुक्त सचिव मोहम्मद साजिद से मुलाक़ात हुई। नर्मदा हॉस्टल और गंगा ढाबा के बीच में खड़े ‘टेफ़ला’ बिल्डिंग में ही जेएनयू छात्रसंघ का ऑफिस है। कुर्ता और जींस पहने साजिद, जिनके चहरे पर छोटी और छंटी दाढ़ी थी, बिल्डिंग के बाहर सीढ़ियों पर बैठे हुए थे। वह ज़ीने (सीढ़ी) पर अपनी मर्ज़ी से नहीं, बल्कि मजबूरी में बैठे हुए थे। बात यह कि छात्रसंघ को अभी भी जेएनयू प्रशासन ने उनके ऑफिस की चाबी नहीं दी है। छात्रों के जनादेश का इससे बड़ा अपमान क्या हो सकता है कि छात्रसंघ के कार्यालय के दरवाज़े जेएनयू छात्रसंघ के लिए बंद हैं? 

अन्य छात्र बतलाते हैं कि लंबे वक्त से छात्रसंघ का दफ़्तर बंद है। इसे जेएनयू प्रशासन की बढ़ती ज़ोर और ज़बरदस्ती न कहा जाए तो और क्या कहा जाए? जिस ‘डेमोक्रेटिक स्पेस’ को छात्रों ने वर्षों से लड़कर बनाया, उसके ऊपर लगातार हमले हो रहे हैं। 

छात्रसंघ के लिए यह इम्तहान का वक़्त है कि वह कैसे हठधर्मी प्रशासन से लड़ेगा? कैंपस के छात्रों ने इस बात पर मायूसी ज़ाहिर की कि पिछले दस सालों में प्रशासन का दमन काफ़ी बढ़ा है। मिसाल के तौर पर, छात्रों के ऊपर बात-बात पर जुर्माना आयद (लगाया) किया गया है। अपनी मांगों को लेकर शांतिपूर्ण तरीके से प्रदर्शन करने पर भारी जुर्माना लगाया जा रहा है। कई केस ऐसे भी देखे गए हैं, जिनमें ‘एक्टिविस्ट’ छात्रों को नए सेमेस्टर में दाख़िला देने से रोक दिया जा रहा है। हॉस्टल के मेस में पहले डिनर के बाद ‘पब्लिक मीटिंग’ होती थी। रात के भोजन के बाद जब दुनिया सोने जाती थी, तो जेएनयू के छात्र देश की समस्याओं पर विचार-विमर्श करते थे। मगर अनुशासन के नाम पर जेएनयू प्रशासन ने छात्रों के सोचने पर पहरा लगाने की कोशिश की है और अब मेस में पब्लिक मीटिंग की इजाज़त नहीं मिलती है। हर रोज़ नया फ़रमान लाया जा रहा है और छात्र-विरोधी क़ानून को सख़्त किया जा रहा है। जाहिर तौर पर लगाई जा रहीं ये पाबंदियां जेएनयू प्रशासन की छात्र और लोकतंत्र विरोधी मानसिकता का परिचायक है। ठीक इसी तरह जेएनयू छात्रसंघ के ऑफिस पर ताला मारना चुनी हुई छात्रसंघ का अपमान है।

जेएनयू छात्र संघ का ऑफिस पर तालाबंदी की सूरत में, हमारे पास टेफ़ला कैंटीन में बैठने के अलावा और कोई चारा नहीं था। कैंटीन में हमने चाय पी और फिर हमारी गुफ़्तगू का सिलसिला शुरू हुआ। मोहम्मद साजिद ने बतलाया कि वह एक मुस्लिम बुनकर परिवार से आते हैं। उनका आबाई वतन (गृह जिला) उत्तर प्रदेश का मऊ ज़िला है। साजिद ओबीसी श्रेणी में आते हैं और इनका परिवार कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ़ इंडिया (सीपीआई) का समर्थक रहा है। अभी साजिद जेएनयू के फ़ारसी विभाग में पीएचडी कर रहे हैं। उनका रिसर्च मुग़ल बादशाह औरंगजेब के भाई और सत्ता के लिए उनके चिर प्रतिद्वंदी दारा शिकोह पर है। दारा शिकोह की अहमियत इस बात से है कि वह इस्लाम धर्म के साथ-साथ हिंदू धर्म का भी बड़ा जानकार था। उसने धर्मों के बीच में मौजूद समानता पर ज़ोर दिया। उसकी बातें भारत जैसे बहु-धार्मिक और बहु-सांस्कृतिक देश के लिए काफ़ी अहम हैं।

(बाएं से) धनंजय, प्रियांशी आर्य, मोहम्मद साजिद और अभिजीत घोष

बातचीत के दौरान साजिद ने कहा की सांप्रदायिक शक्तियां आज भारत की विविधता के लिए बड़ी ख़तरा बन के उभरी हैं। साजिद ने कहा की छात्रसंघ की प्राथमिकता है कि कैंपस और कैंपस के बाहर नफ़रत की राजनीति करने वाली ताक़तों को शिकस्त दिया जाये।

अगले दिन की शाम को उसी टेल्फ़ा कैंटीन में उपाध्यक्ष अभिजीत घोष से भी मुलाक़ात हुई। वह बंगाल के सिलीगुड़ी के एक ओबीसी समुदाय से आते हैं। उनके पिताजी चावल की खुदरा दुकान चलाकर अपनी जीविका अर्जन करते हैं। सिलीगुड़ी से निकलकर घोष कोलकाता पहुंचे, जहां उन्होंने रामकृष्ण मिशन कॉलेज से अर्थशास्त्र में ग्रेजुएशन किया। उच्च शिक्षा हासिल करने की ख़ातिर, वह दिल्ली पहुंचे और जेएनयू में दाख़िला लिया। जेएनयू से उन्होंने पहले अर्थशास्त्र में पोस्टग्रेजुएट किया और अब स्कूल ऑफ़ सोशल साइंस से पीएचडी कर रहे हैं। घोष किसानों की समस्याओं पर शोध करना चाहते हैं। बातचीत के दौरान उन्होंने बताया कि देश में बढ़ रही किसानों की समस्या के लिए वह केंद्र की नवउदारवादी सरकारें क़ुसूरवार हैं, जिन्होंने लगातार कृषि क्षेत्र की अनदेखी की हैं और पूंजीपति, ख़ासकर वित्तीय पूंजी की लॉबी के लिए कार्य किया है। जेएनयू प्रशासन द्वारा छात्र-विरोधी फ़ैसले और फंड में भारी कमी को अभिजीत नवउदारवादी आर्थिक नीति का दुष्परिणाम मानते हैं, जिसके ख़िलाफ़ लड़ाई लड़ना जेएनयू स्टूडेंट्स यूनियन की कोशिश होगी। 

यह भी पढ़ें – जेएनयू में ‘जय भीम-लाल सलाम’ तो गूंजा, लेकिन चुनौतियां अनेक   

कोरोना महामारी के दौरान भी जेएनयू प्रशासन ने छात्र-विरोधी नीतियां बनाने से गुरेज़ नहीं किया। भारत के सत्ताधारी वर्ग आपदा में भी अवसर की तलाश कर रहे थे। मिसाल के तौर पर, कोरोना महामारी के दौरान जेएनयू प्रशासन ने छात्रों को कैंपस छोड़ कर अपने घर जाने के लिए फ़रमान जारी किया, जैसे कोरोना जेएनयू से बाहर मौजूद ही न हो। महामारी का बहाना बनाकर प्रशासन ने अकादमिक सत्र को काफ़ी देर से शुरू किया। रेगुलर क्लास की जगह, ऑनलाइन माध्यम का सहारा लिया गया। छात्रों की ग़ैर-मौजूदगी में प्रशासन को अपने मुताबिक़ फ़ैसले लेने में सुविधा होती थी। इसी आपदा का बहाना बनाकर प्रशासन जेएनयू छात्रसंघ का चुनाव टालता रहा, ताकि उसकी मनमानी पर कोई सवाल न उठा सके। 

उसी दौरान बड़ी तेज़ी से जेएनयू की लाल दीवार पर भगवा रंग पोतने की कोशिश की गई। प्रोफेसर की कुर्सी पर उनको बैठाया जा रहा है, जो सलाहियत से कमज़ोर और संघ की विचारधारा के मज़बूत पैरवीकार हैं। सत्ता की मिठाई खाने के लिए, बहुत सारे तथाकथित प्रगतिशील प्रोफेसर भी अब ‘भगवा निक्कर’ पहनकर घूम रहे हैं। जेएनयू में एडमिशन के दौरान भी प्रशासन ने अपने मुताबिक़ नियम क़ानून को बदल दिया। इंटरव्यू में संघ से जुड़े हुए उम्मीदवारों को तरजीह दी गई। वहीं, भेदभाव के सबसे ज़्यादा शिकार दलित, बहुजन, मुस्लिम और महिला उम्मीदवार बने। सब से अफ़सोस-नाक बात तो यह है कि जेएनयू कैंपस में छात्राओं का अनुपात कम होता जा रहा है। प्रशासन की ढिलाई की वजह से, यौन शोषण की घटनाएं बढ़ती जा रही हैं। 

सेंट्रल पैनल में जीत दर्ज करने वाली, बापसा की प्रियांशी आर्य ‘जेंडर जस्टिस’ के लिए काफ़ी मुखर रही हैं। बापसा से जुड़ने से पहले, वह दिल्ली विश्वविद्यालय के इंद्रप्रस्थ कॉलेज में पढ़ती थीं। जेएनयू में अभी वह दर्शनशास्त्र में पीएचडी कर रही हैं। उनके शोध का विषय विश्लेषणात्मक दर्शन में लिंग का सवाल है। उनका मानना है किदर्शनशास्त्र को सामाजिक और ज़मीनी हक़ीक़तों से दूर ले जाना उचित नहीं है। प्रियांशी इस बात से काफ़ी दुखी हैं कि जेएनयू में वंचित समाज के छात्रों के साथ काफ़ी भेदभाव हो रहा है, जिसे दूर करना उनकी पहली कोशिश होगी। उन्हें इस बात की काफ़ी ख़ुशी है कि वह बापसा जैसे आंबेडकरवादी संगठन से जुड़ी हुई हैं, क्योंकि यह संगठन ही वंचित समुदाय के छात्रों के अधिकारों के लिए लड़ता है। 

प्रियांशी ने बतलाया कि ‘स्टडी सर्किल’ के माध्यम से वह बापसा से जुड़ी थी। बापसा के प्रति उनका लगाव इसलिए भी था कि वह ख़ुद वंचित समाज से आती हैं। वह उत्तराखंड के नैनीताल ज़िले के हल्द्वानी से संबंध रखती हैं और इनके पिताजी एक बैंक के मुलाजिम रहे। मगर दलित होने की वजह से उनके पिताजी के साथ भेदभाव हुआ और उन्हें नौकरी से निकाल दिया गया। दलित समाज में पैदा होने की वजह से प्रियांशी के परिवार को काफ़ी अज़ियत (मुसीबतें) झेलनी पड़ी। मगर मुश्किल की इस घड़ी में जब उनका साथ किसी ने भी नहीं दिया, तब उनका परिवार डॉ. आंबेडकर की विचारधारा की तरफ लौटा। समाज के हाथों जातिवादी अन्याय को समझने के लिए, प्रियांशी के पिता आंबेडकर को पढ़ने लगे। यह बात तब की है जब प्रियांशी बहुत छोटी थीं और स्कूल के दिनों से ही उसने आंबेडकरवादी विचारधारा से रू-ब-रू हो गईं। शायद यही वजह थी कि जेएनयू आने के बाद बापसा में शामिल होने में उन्हें ज़्यादा वक़्त नहीं लगा। हालांकि प्रियांशी छात्रसंघ का चुनाव भारी मतों से जीत ली है और वह कैंपस में काफ़ी लोकप्रिय भी हैं, मगर उन्होंने सक्रिय राजनीति जैसे – चुनाव लड़ने के बारे में – अभी मन नहीं बनाया है। वह बाबासाहेब की राह पर चलते हुए वंचितों में शिक्षित, संगठित होने और अन्याय के खिलाफ बोलने की ताक़त पैदा करना चाहती हैं। 

ऐसे ही छात्रसंघ के निर्वाचित अध्यक्ष धनंजय भी दलित समाज से आते हैं। उनका जन्म बिहार के गया ज़िले के गुरारू इलाक़े में हुआ था। उनके पिता श्याम बिहार प्रसाद पुलिस के नौकरी से सेवानिवृत्त हो चुके हैं। धनंजय की पढ़ाई दिल्ली विश्वविद्यालय और आंबेडकर विश्वविद्यालय में हुई। इसके बाद वह जेएनयू के आर्ट्स एंड एस्थेस्टिक्स स्कूल में पहुंचे, जहां वह अभी पीएचडी कर रहे हैं। उनका शोध-विषय मुशायरा (शेर-ओ-शायरी) से जुड़ा है। वह इसका अध्ययन करना चाहते हैं कि कैसे मुशायरा सरकार और कुलीन वर्ग की दमनकारी नीतियों के ख़िलाफ़ एक प्रतिरोध का स्वर बनकर उभरता है। मिसाल के तौर पर, नागरिकता विरोधी आंदोलन के दौरान मुशायरा जनता की आवाज़ बनकर उभरें। जेएनयू के पूर्व छात्र उमर ख़ालिद और शरजील इमाम ने भी सीएए के ख़िलाफ़ शांतिपूर्ण तरीक़े से मुज़ाहिरा (प्रदर्शन) किया, मगर अफ़सोस की बात है कि उन्हें सरकार की ग़लत नीतियों के ख़िलाफ़ बोलने के लिए जेल में डाल दिया गया है। इन तमाम पहलुओं को धनंजय अपने रिसर्च में समाहित करना चाहते हैं। मगर बतौर अध्यक्ष उनकी बड़ी ज़िम्मेदारी है कि वह कैसे छात्रों के हक़ में काम करें और नफ़रत से मुक़ाबला करें। उन्हें इस बात की भी चिंता है कि संघ परिवार और उनसे जुड़े हुए संगठन जेएनयू के ख़िलाफ़ नफ़रत का माहौल बना रहे हैं। अगर इसे रोका नहीं गया, तो यह बड़ा घातक साबित होगा।

धनंजय की कामयाबी के पीछे उनकी वर्षों की कैंपस राजनीति में सक्रियता है। इनकी एक बड़ी खूबी यह है कि यह बड़ी आसानी से आम छात्रों के लिए खड़े रहते हैं। हाल के सालों में आइसा जब कमज़ोर हो रहा था तो उन्होंने संगठन को मज़बूत किया। यही वजह है कि संगठन ने उन्हें अपना चेहरा बनाया और छात्रों ने भी धनंजय की क़ियादत (नेतृत्व) पर भरोसा जताया है। करीब 27 साल के बाद जेएनयू छात्रसंघ को इस बार एक अध्यक्ष मिला है, जो दलित वर्ग से संबंध रखता है, और यह इस बात का सूचक है कि जेएनयू कैंपस में दलितों के लिए राह आसान नहीं है। मगर इन विपरीत परिस्थितियों में आशा की किरण यह है कि जेएनयू छात्रसंघ में लगातार दलित और पिछड़ों की लीडरशिप उभर रही है। इस बार के सेंट्रल पैनल में दो दलित और दो ओबीसी पदाधिकारी हैं। जेएनयू में दलित-बहुजन विमर्श के फैलते दायरे का अंदाज इसी से लगाया जा सकता है कि कल तक जिस ‘लाल’ जेएनयू में आंबेडकर को नज़रअंदाज़ किया जाता था, उसी कैंपस में चप्पे-चप्पे से ‘जय भीम-लाल सलाम’ की आवाज़ें गूंज रहीं हैं। 

(संपादन : राजन/नवल/अनिल)


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लेखक के बारे में

अभय कुमार

जेएनयू, नई दिल्ली से पीएचडी अभय कुमार संप्रति सम-सामयिक विषयों पर विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं के लिए स्वतंत्र लेखन करते हैं।

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