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उत्तर प्रदेश में गैर-जाटव दलितों के रूख से कांग्रेस के लिए बढ़ीं उम्मीदें

संविधान बचाने का मुद्दा इतना असरदार था कि दलित समाज की दो बड़ी जातियां – कोरी और धोबी – को इंडिया गठबंधन द्वारा एक भी टिकट नहीं दिए जाने के बावजूद बड़े पैमाने पर इन जातियों ने सपा और कांग्रेस को वोट दिया। बता रहे हैं प्रो. रविकांत

2024 के लोकसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) नरेंद्र मोदी के चेहरे के बावजूद 240 सीटों पर सिमट गई। हालांकि राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) को मिली 293 सीटों पर जीत के साथ मोदी सरकार बनाने में कामयाब रहे। ज्यादातर राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह मोदी के अहंकार की हार है। इससे मोदी का गुरुर टूटा है। लेकिन सामंती मिजाज वाले भारतीय समाज में क्या अहंकार को इतना निकृष्ट माना जा सकता है?

एक सवाल यह भी कि भाजपा के पास पूंजी, प्रबंधन और प्रचार तंत्र की व्यापक मौजूदगी के बावजूद नरेंद्र मोदी की हार का असली कारण क्या है? यह भी सच है कि राम मंदिर राजनीतिक मुद्दा नहीं बनने के बावजूद जनवरी-फरवरी में विपक्ष बहुत उत्साहित नहीं था। विपक्ष न तो एकजुट था और ना ही उसके पास पर्याप्त संसाधन थे। कांग्रेस का बैंक खाता सील कर दिया गया था। चुनाव के पहले से लेकर चुनाव के दरमियान भी विपक्षी नेताओं पर ईडी और इनकम टैक्स की छापेमारी होती रही। अरविंद केजरीवाल और हेमंत सोरेन जैसे दो मुख्यमंत्री जेल भेज दिए गए। सैकड़ों विपक्षी नेताओं को ईडी के डर और प्रलोभन के जरिए भाजपा में शामिल कराया जाता रहा। गुजरात के सूरत और मध्य प्रदेश के इंदौर लोकसभा क्षेत्र में तो मुख्य प्रतिद्वंदी कांग्रेस उम्मीदवार ही पीछे हट गए।

यानि विपक्ष को निहत्था बनाकर नरेंद्र मोदी 400 से अधिक सीटें जीतने के इरादे से चुनावी मैदान में दाखिल हुए। इसी उत्साह या अहंकार में नरेंद्र मोदी ने ‘अबकी बार 400 पार’ का नारा दिया। लेकिन 400 सीटें क्यों? इस पर भाजपा के अनेक नेताओं और प्रत्याशियों ने बेबाक बयान दिए। उनका कहना था कि संविधान बदलने के लिए इतना बड़ा बहुमत चाहिए। और संविधान बदलने का मतलब है कि हिंदू राष्ट्र बनाना और मनुस्मृति के आधार पर नया संविधान लिखा जाना।

देखा जाय तो भाजपा की हार या कहिए कि 240 तक सिमट जाने के पीछे यही सबसे बड़ी वजह रही। संविधान बदलने की बात पर सबसे ज्यादा प्रतिक्रिया दलित समाज में हुई। इसका असर आदिवासी और पिछड़े समाज में भी हुआ। लेकिन दलितों के लिए यह सिर्फ अधिकारों का नहीं, बल्कि भावुकता का भी मुद्दा बना। उनके लिए संविधान सिर्फ एक कानून की किताब नहीं, केवल अधिकारों की गारंटी नहीं, बल्कि बाबा साहब आंबेडकर के शब्दों और सपनों का संग्रह भी है।

चुनाव प्रचार के क्रम में सपा नेता अखिलेश यादव के साथ रोड शो करते राहुल गांधी

यह भी गौरतलब है कि पिछले एक दशक से जिन राज्यों में दलित समाज के बीच बहुजन नायकों की जयंतियां मनाई जा रही हैं, संविधान की प्रस्तावना दोहराई जा रही है, वहां इस बार भाजपा को शिकस्त झेलनी पड़ी। इसका सबसे बड़ा उदाहरण उत्तर प्रदेश है। देश के सबसे बड़े सूबे की 80 लोकसभा सीटों में 17 सीटें अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित हैं। इस प्रदेश में दलित आबादी 21.5 फीसदी है। इसमें आधी आबादी करीब 11 फीसदी केवल जाटव समाज की है। जाटव समाज बहुजन समाज पार्टी (बसपा) का समर्थक रहा है। लेकिन इस चुनाव में मायावती की यह पार्टी एक भी सीट नहीं जीत सकी। उनका वोट प्रतिशत भी 1995 की स्थिति में पहुंच गया। इस बार बसपा को केवल 9.43 फीसदी वोट मिले। बसपा किसी भी सीट पर दूसरे स्थान पर भी नहीं आ सकी। इसका बड़ा कारण मायावती द्वारा भतीजे आकाश आनंद को बीच चुनाव में नेशनल कोऑर्डिनेटर और उत्तराधिकारी पदों से हटाया जाना भी रहा। जाटव समाज का पढ़ा-लिखा और जागरूक तबका संविधान बदलने की मुनादी करने वाली भाजपा को हराने के लिए बसपा को छोड़कर इंडिया गठबंधन की ओर चला गया।

हालांकि इनकी संख्या बहुत ज्यादा नहीं है। लेकिन इस बार बड़ा प्रभाव गैर-जाटव वोट में दिखाई दिया। यह समाज भाजपा से निकलकर बड़े पैमाने पर इंडिया गठबंधन के साथ गया। इसकी मूल वजह संविधान बदलने का भाजपा का नारा बना। गैर-जाटव जातियों में कोरी, पासी और धोबी; ये तीन जातियां विशेष रूप से इंडिया गठबंधन के साथ आईं। इसके अतिरिक्त वाल्मीकि, सोनकर, धानुक, मुसहर और खरवार आदि जातियों का एक हिस्सा भाजपा से निकलकर इंडिया गठबंधन के साथ गया। यही कारण है कि 2019 में सुरक्षित 17 सीटों में से 14 सीटें जीतने वाली भाजपा को इस बार बड़ा झटका लगा। इस चुनाव में विपक्ष को 9 सुरक्षित सीटों पर जीत मिली है। इनमें 7 पर सपा, एक पर कांग्रेस और एक नगीना सीट पर आजाद समाज पार्टी के चंद्रशेखर आजाद चुनाव जीते। जाहिर तौर पर सामान्य सीटों पर भी दलित वोटों के निकलने से भाजपा को बड़ा नुकसान हुआ।

संविधान बचाने के लिए हुए इस चुनाव को सबसे ज्यादा राहुल गांधी ने प्रभावित किया। यह उल्लेखनीय है कि 1989 से ही उनकी पार्टी कांग्रेस सूबे की सत्ता से बाहर है। हालांकि 2009 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को बड़ी सफलता मिली थी। इस चुनाव में कांग्रेस ने यूपी में 18.2 फ़ीसदी वोट हासिल करके 21 सीटों पर जीत हासिल की थी। जबकि 2014 में वह केवल अमेठी और रायबरेली सीट पर ही जीत सकी। और 2019 में राहुल गांधी भी अमेठी हार गए। केवल सोनिया गांधी ही रायबरेली से अपनी सीट बचा सकीं। लेकिन 2024 के चुनाव में राहुल गांधी ने अपने हाथ में संविधान लेकर जब कहा कि नरेंद्र मोदी और भाजपा बाबा साहब का संविधान बदलना चाहते हैं तो दलित समाज उनके साथ खड़ा हो गया। सामाजिक न्याय, आरक्षण बढ़ाने और जातिगत जनगणना के मुद्दों ने राहुल गांधी को विशेषकर अति पिछड़ों में लोकप्रिय बनाया। मुस्लिम समाज तो ‘भारत जोड़ो यात्रा’ से ही कांग्रेस की ओर मुड़ने लगा था। इन तमाम मुद्दों ने राहुल गांधी को उत्तर प्रदेश में लोकप्रिय बना दिया।

परिणाम यह हुआ कि चुनाव बाद हुए सर्वेक्षण में यूपी के 36 फ़ीसदी लोगों ने राहुल गांधी को प्रधानमंत्री बनाने की बात कही, जबकि केवल 32 फ़ीसदी लोग ही नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री के रूप में देखना चाहते थे। रोजगार के सवाल से लेकर सामाजिक सुरक्षा और संविधान बचाने की इस लड़ाई में राहुल गांधी सबसे विश्वसनीय चेहरा बनकर उभरे।

इसके अलावा राहुल गांधी और अखिलेश यादव की जोड़ी को यूपी की जनता ने बहुत पसंद किया। यही कारण है कि जहां कांग्रेस ने 6 सीटें जीतीं और सपा ने 37 सीटों पर जीत हासिल की। स्मरण रहे कि 2004 में मुलायम सिंह यादव के नेतृत्व में सपा ने 36 सीटों पर जीत हासिल की थी। अखिलेश यादव ने इस बार अपने पिता का रिकॉर्ड तोड़ा। सपा के प्रति दलितों की नाराजगी इस बार नहीं दिखी। इसके दो कारण हैं। अखिलेश यादव ने पहली बार चुनाव में बाबा साहब आंबेडकर का नाम लिया और संविधान बचाने के मुद्दे को उठाया। इसके अतिरिक्त उन्होंने जाटव और पासी समाज को अपेक्षा से अधिक प्रतिनिधित्व दिया। मेरठ और फैजाबाद (अयोध्या) जैसे सामान्य सीटों पर भी उन्होंने दलित प्रत्याशी मैदान में उतारे। अयोध्या से अवधेश प्रसाद (पासी जाति के) ने जीत हासिल की। इस बार अयोध्या में नया नारा दिया गया– “ना मथुरा ना काशी, अयोध्या में अवधेश पासी!”

संविधान बचाने का मुद्दा इतना असरदार था कि दलित समाज की दो बड़ी जातियां – कोरी और धोबी – को इंडिया गठबंधन द्वारा एक भी टिकट नहीं दिए जाने के बावजूद बड़े पैमाने पर इन जातियों ने सपा और कांग्रेस को वोट दिया। यही कारण है कि यूपी में 75 सीटें जीतने का सपना देखने वाली भाजपा केवल 33 सीटों पर सिमट गई। अनुमानित तौर पर 70 फ़ीसदी से अधिक दलित वोट भाजपा के विरोध में गया। यह भी गौरतलब है कि दलित उत्पीड़न के मुद्दों पर बहुत मुखर रहे चंद्रशेखर आजाद को नगीना सीट पर जीत मिली। एक तरफ मायावती की राजनीति का अवसान दिख रहा है तो चंद्रशेखर आजाद की जीत को दलित राजनीति के नए विकल्प के तौर पर देखा जा रहा है। अब लगने लगा है कि मायावती का जाटव वोट आने वाले समय में जाटव समाज से आने वाले चंद्रशेखर आजाद के साथ शिफ्ट हो सकता है। जबकि गैर-जाटव दलित वोट अपने लिए बेहतर विकल्प की तलाश में है। इससे इंकार नहीं किया जा सकता है कि पिछले कुछ सालों में गैर-जाटव दलित वोट बसपा को छोड़कर भाजपा की ओर चला गया था। लेकिन इस चुनाव में ऐसा नहीं हुआ।

बहरहाल 1989 के बाद यह पहला चुनाव है जब गैर-जाटव दलित वोट कांग्रेस से प्रभावित नजर आ रहा है। अगर कांग्रेस ने गैर-जाटव दलित जातियों को उत्तर प्रदेश में सम्मान और उचित प्रतिनिधित्व दिया तो कांग्रेस का यह आधार वोट बन सकता है।

(संपादन : राजन/नवल/अनिल)


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लेखक के बारे में

रविकांत

उत्तर प्रदेश के जालौन जिले के दलित परिवार में जन्मे रविकांत ने जेएनयू से एम.ए., एम.फिल और लखनऊ विश्वविद्यालय से पीएच.डी. की डिग्री हासिल की है। इनकी प्रकाशित पुस्तकों में 'समाज और आलोचना', 'आजादी और राष्ट्रवाद' , 'आज के आईने में राष्ट्रवाद' और 'आधागाँव में मुस्लिम अस्मिता' शामिल हैं। साथ ही ये 'अदहन' पत्रिका का संपादक भी रहे हैं। संप्रति लखनऊ विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग में असिस्टेंट प्रोफेसर हैं।

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