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छत्तीसगढ़ : इस कारण सतनामी समाज के लोगों का आक्रोश बढ़ा

डिग्री प्रसाद चौहान कहते हैं कि जैतखाम को बिहार के तीन गरीब मजदूरों द्वारा आरी से काटे जाने की बात पुलिस की मनगढ़ंत कहानी है, जिस पर सूबे के सतनामी समाज के लोग यकीन नहीं कर रहे हैं। पढ़ें, संजीव खुदशाह की यह रपट

गत 10 जून, 2024 को छत्तीसगढ़ के बलौदा बाजार जिले के मुख्यालय में हजारों की संख्या में सतनामी समाज के लोग एकजुट हुए। वे गुरु घासीदास की जन्मभूमि व कर्मभूमि गिरौदपुरी में सतनामी समाज की आस्था के प्रतीक ‘जैतखाम’ को असामाजिक तत्वों द्वारा नुकसान पहुंचाए जाने का विरोध कर रहे थे। विरोध प्रदर्शन में सूबे के अनेक जिलों से सतनामी पंथ के लोग जुटे थे। उनका प्रदर्शन शांतिपूर्वक चल रहा था। लेकिन शाम होते-होते इसने उग्र रूख अख्तियार कर लिया और देखते ही देखते डेढ़ सौ के करीब विभिन्न वाहन व जिलाधिकारी तथा पुलिस अधीक्षक के कार्यालय को आग लगा दिया गया। 

बिहार के तीन गरीब मजदूरों के माथे पर पुलिस ने मढ़ा आरोप

घटना की पृष्ठभूमि यह है कि गत 15 मई, 2024 को गिरौदपुरी में जैतखाम को आरी से दो हिस्से में काट दिया गया। चूंकि गिरौदपुरी का संबंध सतनामी पंथ के संस्थापक गुरु घासीदास से जुड़ा है, इसलिए यह खबर जंगल में लगी आग के जैसे तेजी से फैली और सूबे के विभिन्न जिलों के सतनामियों ने अपने-अपने क्षेत्र में स्थानीय प्रशासनिक अधिकारियों को इस बाबत ज्ञापन सौंपा कि दोषियों की पहचान कर उन्हें गिरफ्तार किया जाय।

पीयूसीएल, छत्तीसगढ़ के अध्यक्ष डिग्री प्रसाद चौहान कहते हैं कि सतनामी समाज के लोगों ने इस तरह का ज्ञापन लगभग हर जिला और प्रखंड के स्तर पर दिया। लेकिन इसके बावजूद छत्तीसगढ़ पुलिस हाथ पर हाथ धरे बैठी रही। लेकिन जब लोग सड़कों पर उतरने लगे तो उसने 19 मई, 2024 को तीन लोगों को गिरफ्तार किया। लेकिन ये तीनों बिहार के रहनेवाले गरीब मजदूर हैं। पुलिस ने बताया कि गिरफ्तार किए गए आरोपियों में सल्टू कुमार, पिंटू कुमार और रघुनंदन कुमार बिहार के सहरसा जिला के निवासी हैं।

डिग्री प्रसाद चौहान पुलिस द्वारा इस संबंध में दी गई सफाई पर यकीन नहीं रखते हैं। उनका कहना है कि पुलिस असली आरोपियों को बचा रही है और गरीब मजदूरों को गिरफ्तार कर इस मामले से अपना पल्ला झाड़ने की कोशिश कर रही है।

स्थानीय प्रशासन की अनदेखी से बढ़ा आक्रोश

बताते चलें कि बलौदा बाजार पुलिस ने अपने बयान में कहा कि इस मामले में खोजबीन के दौरान पता चला कि भोजराम अजगल्ले, जो ठेकेदारी का काम करता है, उसके द्वारा गांव महकोनी में नल जल मिशन के तहत पानी टंकी का निर्माण कराया जा रहा था। इसका ठेका उसने साढ़े चार लाख रुपए में उपरवर्णित तीनों आरोपियों को दिया था। पुलिस के मुताबिक, प्रारंभ में ठेकेदार भोजराम अजगल्ले द्वारा मजदूरों को एक लाख रुपए की अग्रिम राशि का भुगतान किया गया था। जबकि टंकी निर्माण का कार्य 90 फीसदी पूरा हो जाने पर भी बाक़ी रक़म का भुगतान नहीं किया जा रहा था। पुलिस का कहना है कि आरोपियों के द्वारा भुगतान मांगने पर ठेकेदार उन्हें गाली-गलौज तथा जान से मारने की धमकी देता था।

पुलिस के अनुसार तीनों आरोपियों ने जैतखाम को काटने एवं लोहे के गेट में तोड़-फोड़ करने के आरोप को स्वीकार कर लिया। उनके अनुसार वे ठेकेदार से नाराज चल रहे थे और क्षुब्ध होकर गिरौदपुरी के अमर गुफा में अवस्थित जैतखाम को तोड़फोड़ करने की योजना बना डाली। तीनों आरोपियों ने शराब का सेवन कर 15 मई की रात करीब साढ़े ग्यारह बजे अपनी बजाज मोटरसाइकिल में बैठकर आरी एवं अन्य सामान लेकर अमर गुफा गए। तीनों ने गुस्से में आकर सतनामी समाज के प्रतीक जैतखाम को आरी से काट दिया तथा लोहे के गेट को उखाड़ कर तोड़फोड़ किया। पुलिस का कहना है कि उसने आरोपियों से घटना में उपयोग किए गए आरी एवं मोटरसाइकिल को जब्त कर लिया है।

डिग्री प्रसाद चौहान कहते हैं कि यह पुलिस की मनगढ़ंत कहानी है, जिस पर सूबे के सतनामी समाज के लोग यकीन नहीं कर रहे हैं। वे बारंबार प्रशासन से असली अपराधियों को गिरफ्तार करने व सूबे में अवस्थित अन्य जैतखामों की सुरक्षा सुनिश्चित करने की मांग कर रहे थे।

सरईं की लकड़ी से बनता है जैतखाम

वहीं लोरमी विधानसभा क्षेत्र से बतौर निर्दलीय उम्मीदवार 25,126 मत प्राप्त करनेवाले सामाजिक कार्यकर्ता संजीत बर्मन यह बताते हैं कि जैतखाम सतनामी समाज के लोगों के लिए विशेष महत्व रखता है। यह सरईं के पेड़ का तना होता है, जिसे सफेद रंग से पेंट कर उसके शिखर पर सफेद झंडा लगाया जाता है। यह सफेद रंग गुरु घासीदास द्वारा दिए गए शांति के संदेश का परिचायक है। संजीत बताते हैं कि गिरौदपुरी में 15 मई को हुई घटना ने सूबे के सतनामी समाज के लोगों को आक्रोशित किया और इसके लिए स्थानीय प्रशासन पूरी तरह जिम्मेदार है, जिसने सतनामी समाज के लोगों की आस्था का ख्याल नहीं रखा।

डिग्री प्रसाद चौहान बताते हैं कि जैतखाम को नुकसान पहुंचाने की यह कोई पहली घटना नहीं है। उन्होंने उदाहरण देते हुए बताया कि इससे पहले 4 जनवरी, 2021 को कवर्धा जिले के धरमपुरा में जैतखाम को नुकसान पहुंचाया गया था। इसके अलावा बिलासपुर व अन्य जिलों में भी इस तरह की घटनाएं घटित हो चुकी हैं।

पहले भी दलित-बहुजन नायकों के प्रतीकों को पहुंचाया गया है नुकसान

सर्वविदित है कि सतनामी समाज छत्तीसगढ़ के दलितों में सबसे ज्यादा संख्या वाला समाज है। छत्तीसगढ़ में अनुसूचित जाति के जितने भी लोग हैं, उनमें से लगभग 90 फीसदी सतनामी समाज के लोग हैं। सतनामी समाज का जातिवादी समाज से संघर्ष गांव, शहरों, कस्बों में लगातार होता रहता है। आज भी यह समाज ऊंच-नीच का शिकार होता रहता है।

जाहिर तौर पर यह पहली घटना नहीं है जब दलित समाज के महापुरुषों, गुरुओं का इस तरह से अपमान हुआ है। भारत में दलित समाज के महापुरुषों को अपमान करने की एक लंबी फेहरिस्त है। संविधान निर्माता डॉ. आंबेडकर की मूर्ति को तोड़ देना, गुरु रविदास के मंदिर को क्षति पहुंचाना, कांशीराम की तस्वीर का अपमान करना, भारत में बेहद आम है।

हाल ही में छत्तीसगढ़ के ही दुर्ग रेलवे स्टेशन में डॉ. आंबेडकर की तस्वीर के साथ रेलवे के ही एक अधिकारी ने अपमानजनक व्यवहार किया था‌, जिसके कारण दलित समाज के विरोध ने उग्र आंदोलन का रूप ले लिया था। बाद में प्रशासन द्वारा आरोपी के खिलाफ कानूनी कार्यवाही करने पर मामला ठंडा हुआ। लेकिन यह मामला अभी पूरी तरह शांत भी नहीं हुआ था कि 15 मई, 2024 को गिरौदपुरी में जैतखाम को क्षतिग्रस्त कर दिया गया।

सवाल शेष हैं

बहरहाल, यह सवाल महत्वपूर्ण है कि आखिर वे कौन लोग हैं, जो दलितों, पिछड़ों व आदिवासियों की आस्थाओं को चोट पहुंचाने का काम कर रहे हैं? क्या ये वही लोग नहीं हैं, जो खुलेआम आरक्षण और संविधान के नाम पर जहर उगलते हैं, जिसके कारण सामाजिक ताना-बाना, सामाजिक सौहार्द बिगड़ जाता है। अभी हाल ही में राजधानी रायपुर में दो मुसलमानों की मॉब लिंचिंग कर दी गई। उनके ऊपर आरोप लगाया गया कि वे गाय लेकर जा रहे थे, जबकि वास्तव में उनके पास भैंस थी। निश्चित रूप से यह घटना कट्टरवादियों के द्वारा फैलाए गए जहर के कारण ही घटित हुई।

जाहिर तौर पर ऐसी घटनाएं राजनीतिक और सामाजिक परिदृश्य को लेकर चिंतनीय सवाल खड़ा करती हैं और आवश्यकता है कि प्रशासनिक तंत्र संवेदनशील बने ताकि लोगों को अपनी मांगें रखने के लिए आक्रोशित नहीं होना पड़े।

(संपादन : राजन/नवल/अनिल)


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लेखक के बारे में

संजीव खुदशाह

संजीव खुदशाह दलित लेखकों में शुमार किए जाते हैं। इनकी रचनाओं में "सफाई कामगार समुदाय", "आधुनिक भारत में पिछड़ा वर्ग" एवं "दलित चेतना और कुछ जरुरी सवाल" चर्चित हैं

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