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सुरक्षित संविधान के अलावा वी.पी. सिंह के प्रति आभारी होने के और भी कारण हैं हमारे पास

मंडल कमीशन को लागू कर देश की राजनीतिक दिशा में ऐतिहासिक बदलाव लाने वाले वी.पी. सिंह की 93वीं जयंती पर उन्हें याद करने के लिए एक बैठक कल 25 जून, 2024 को नई दिल्ली के कंस्टीट्यूशन क्लब में आयोजित है। इस संबंध में पढ़ें, प्रो. कांचा आइलैय्या शेपर्ड की यह टिप्पणी

इस बार फिर 25 जून, 2024 को हम विश्वनाथ प्रताप सिंह (25 जून, 1931 – 27 नवंबर, 2008) की 93वीं जयंती मनाएंगे। वे केवल 11 महीने प्रधानमंत्री रहे, मगर उन्होंने देश के इतिहास को एक नई दिशा दी। उनके बाद एक प्रधानमंत्री 6 साल तक सत्ता में रहे (अटल बिहारी वाजपेयी), दूसरे दस साल तक (मनमोहन सिंह) और तीसरे दस से अधिक (नरेंद्र मोदी) साल से सत्ता में बने हुए हैं। मगर उनके लंबे कार्यकालों से दमित शूद्रों, दलितों और आदिवासियों के जीवन में कोई खास परिवर्तन नहीं आया। उल्टे, नरेंद्र मोदी के 10 साल के शासनकाल में वे डरे-सहमे ही रहे। उन्हें डर था कि आरक्षण की व्यवस्था समाप्त ही नहीं कर दी जाएगी वरन वह पूरा संविधान, जिसे डॉ. आंबेडकर ने सामाजिक परिवर्तन के वाहक के रूप में तैयार किया था, को बदल दिया जाएगा । और यही कारण है कि इन वर्गों ने हाल में संपन्न लोकसभा चुनाव में आरएसएस-भाजपा के खिलाफ लामबंद होकर वोट दिया।

जनता दल (यूनाइटेड) के बिहार के बांका लोकसभा क्षेत्र से सांसद गिरिधारी यादव ने पिछले साल वी.पी. सिंह की जयंती पर उन्हें याद करने के लिए एक कार्यक्रम का आयोजन किया था। इस साल भी वे यह पहल कर रहे हैं। उनका साथ दे रही है सुनील सरदार की अध्यक्षता वाली ट्रुथ सीकर्स इंटरनेशनल एवं स्टूडेंट फेडरेशन ऑफ द्रविड़ियन्स। वी.पी. सिंह की 93वीं जयंती पर उन्हें याद करने के लिए एक बैठक आगामी मंगलवार यानी कल 25 जून, 2024 को नई दिल्ली के कंस्टीट्यूशन क्लब में आयोजित है।

वी.पी. सिंह को याद करने वाले और स्मारक बनाकर उनकी वैचारिकी को आगे बढ़ाने वाले राजनेता बहुत कम हैं। कारण यह है कि प्रधानमंत्री के बतौर उन्होंने ‘योग्यता’ के ब्राह्मणवादी मिथक को तोड़ा। एक छोटी-सी रियासत के इस क्षत्रिय शासक ने द्विजों के एकाधिकार को जो चुनौती दी थी, उसे ब्राह्मणवादी उच्च जातियां और आरएसएस जैसे उनके संगठन आज तक पचा नहीं पाए हैं। यह दिलचस्प है कि सिंह उसी उत्तर प्रदेश के थे, जहां से आरक्षण-विरोधी क्षत्रिय नेता योगी आदित्यनाथ उभरे। योगी आदित्यनाथ ने लखनऊ स्थित मुख्यमंत्री के आधिकारिक निवास में प्रवेश करने से पहले उसे गंगाजल से धुलवाया था, क्योंकि उनका मानना था कि शूद्र नेता अखिलेश यादव के रहने से वह मकान अपवित्र हो गया है। यह 2017 के विधानसभा चुनाव के तुरंत बाद की बात है।

भारतीय न्यायपालिका और योग्यता का मिथक

भारतीय न्यायपालिका अब भी योग्यता के मिथक का बचाव करने में लगी है। इसका एक प्रमाण है पटना हाईकोर्ट का हालिया निर्णय, जिसमें उसने एससी, एसटी और ओबीसी के लिए बिहार सरकार के आरक्षण की सीमा को 50 से बढ़ाकर 65 प्रतिशत करने के निर्णय को रद्द कर दिया है। यह निर्णय पिछले साल जारी किए गए जातिगत सर्वेक्षण के परिणामों पर आधारित था।

(बाएं से) जनता दल दल के राष्ट्रीय अध्यक्ष रहे एस. आर. बोम्मई, भूतपूर्व प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह,  शरद यादव, लालू प्रसाद और रामविलास पासवान

योग्यता के ब्राह्मणवादी मिथक की जड़ें वर्ण-व्यवस्था में है, जिसकी बुनियाद ऋग्वेद में हैं। इसके आधार पर ही बाद में वेदों को पढ़ने का अधिकार केवल ब्राह्मण को ही दिया गया। आरएसएस और उसके अनुषांगिक संगठन भाजपा की सरकार ने कथित ओबीसी प्रधानमंत्री के नेतृत्व में हिंदू आध्यात्मिक व्यवस्था को पुनर्जीवित करने का प्रयास किया है और आरक्षण के मामले में देश को पीछे ले जाने की कोशिश की है।

यह विडंबना ही है कि वी.पी. सिंह, जो कि एक क्षत्रिय थे, योग्यता के मिथक को तोड़ना चाहते थे। इसके विपरीत नरेंद्र मोदी, जो ओबीसी हैं, वे वी.पी. सिंह द्वारा उद्घाटित सामाजिक न्याय के युग की दिशा को पलटना चाहते हैं। अगर वी.पी. सिंह की जगह 1990 में नरेंद्र मोदी देश के प्रधानमंत्री होते तो मंडल आयोग की रपट लागू नहीं होती और ना ही शूद्रों/ओबीसी को आगे बढ़ने का मौका मिलता। मोदी ने तो वी.पी. सिंह सरकार द्वारा मंडल आयोग की रपट लागू करने के बाद राम मंदिर का मुद्दा उठाकर उनका विरोध ही किया था।

यह दिलचस्प है कि वर्तमान आरएसएस/भाजपा सरकार से संविधान की रक्षा करने में मंडल आरक्षण ही उपयोगी साबित हो रहा है।

पूरे देश में ओबीसी, दलितों और आदिवासियों को लगा कि अगर यह सरकार पूर्ण बहुमत के साथ तीसरी बार सत्ता में वापिस आई तो वह न केवल आरक्षण बल्कि संविधान का ही खात्मा कर देगी। सुखद यह कि भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे, जो कि दलित समुदाय से आते हैं, और कांग्रेस के राहुल गांधी, जो स्वयं को ब्राह्मण कहते हैं, के नेतृत्व में विपक्षी पार्टियों ने इस खतरे को भांपा और संविधान और आरक्षण की रक्षा के लिए मिलकर खड़े हुए। ‘इंडिया’ गठबंधन ने इस खतरे को दूर भगाने के लिए मज़बूत पहल की।

इसी खतरे और डर ने 18वीं लोकसभा के चुनाव में आरक्षण-समर्थक ताकतों को संविधान और आरक्षण के पक्ष में लामबंद किया और भाजपा को केवल 240 सीटें हासिल हो सकीं। आज संसद में एक मज़बूत विपक्ष है, जो आरक्षण और उसके पीछे की सोच का समर्थक है।

इस संदर्भ में उस व्यक्ति को याद करना महत्वपूर्ण है, जिसने अपनी जाति की संस्कृति के विरुद्ध जाकर आरक्षण की विचारधारा का समर्थन किया। वी.पी. सिंह को द्विजों के लिए एक रोल मॉडल होना चाहिए था, मगर सामाजिक परिवर्तन और संवैधानिकतावाद के प्रति उनकी प्रतिबद्धता को द्विज समझ नहीं पाए। हम केवल उम्मीद कर सकते हैं कि द्विज नेता भी वी.पी. सिंह के जीवन का उत्सव मनाएंगे और इस महान राष्ट्र और उसके संवैधानिक लोकतंत्र की रक्षा के लिए सामाजिक न्याय के महत्व को स्वीकार करेंगे।

(अंग्रेजी से अनुवाद : अमरीश हरदेनिया, संपादन : राजन/नवल/अनिल)


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लेखक के बारे में

कांचा आइलैय्या शेपर्ड

राजनैतिक सिद्धांतकार, लेखक और सामाजिक कार्यकर्ता कांचा आइलैया शेपर्ड, हैदराबाद के उस्मानिया विश्वविद्यालय में राजनीति विज्ञान के प्राध्यापक और मौलाना आजाद राष्ट्रीय उर्दू विश्वविद्यालय, हैदराबाद के सामाजिक बहिष्कार एवं स्वीकार्य नीतियां अध्ययन केंद्र के निदेशक रहे हैं। वे ‘व्हाई आई एम नॉट ए हिन्दू’, ‘बफैलो नेशनलिज्म’ और ‘पोस्ट-हिन्दू इंडिया’ शीर्षक पुस्तकों के लेखक हैं।

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