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अपनी जडें तलाशती एक चिट्ठी, परदेश से  

संस्कृति और परंपराएं सामाजिक मानदंडों का निर्धारण करती हैं। जिनकी अपनी संस्कृति नहीं होती, उनका न तो कोई अतीत होता है और न ही वर्तमान। भविष्य को लेकर भी कोई सकारात्मक तस्वीर नहीं बनायी जा सकती। यही वेदना है इस  चिट्ठी में जो सात समंदर पार से अमेरिका से आयी है

प्रणाम प्रमोद जी ,

दो दिन पहले आपकी किताब ‘महिषासुर : मिथक व परम्पराएं’ पढ़नी शुरु की | अब तक आपका यात्रा – वृतांत वाला खंड और संजय जोठे जी का गोंड – असुर परम्पराओं पर लेख पढ़ चुका हूँ |

मुझे अपनी भावनाएं व्यक्त करने के लिए शब्द कम पड़ रहे हैं | ऐसा लग रहा है कि  किसी सम्मोहन-पाश में फंस गया हूँ। किताब हाथ से छूट ही नहीं रही। इस किताब ने अब तक मुझे कई स्तरों पर झकझोर दिया है, और अभी तो ये आधी भी नहीं हुई है ।

पहली बात तो आपकी भूमिका में ही थी , जहाँ आप मध्यमवर्गीय एवं दरिद्र दलित – बहुजन तबकों की बात करते हैं।  आपकी बात सही है। समृद्ध दलित तबका आंदोलनकारी नहीं है। वह समझता है कि समृद्धि तो मिल गई , अब ब्राह्मणी आदर्शों  का अनुसरण करने से ,अथवा आर्थिक सफलता से कभी न कभी सम्मान और स्वीकृति भी मिल जाएगी। इस चक्कर में हम लोग अपने उन साथियों से अलग हो जाते हैं , जिनके साथ हमें खड़ा होना चाहिए। उनके साथ मिलकर हमें संपूर्ण अमृत-घट पाने का संघर्ष करना चाहिए।

उसके बाद आपका यात्रा – वृतांत पढ़ा। कई बातें ज़ेहन में कौंध गईं।  मैं मूलतः उज्जैन से हूँ, मंदिरों का शहर। महाकाल की भूमि। लेकिन हमारे कुलदेवता भैरो महाराज हैं , जिनकी पिंडियां उज्जैन के बाहर एक गाँव में एक खेत के अंदर चबूतरे पर रखी हैं। साल में एक बार उनकी पूजा करते हैं वहाँ जाकर। चबूतरे की मरम्मत करा दी है पिछले कुछ सालों में , लेकिन मंदिर बनाने का विचार भी किसी को नहीं आया। बस इतना पता है कि चबूतरा ही सही है।

बचपन में दादा जी कहानियाँ सुनाते थे कि  कैसे राजा विक्रमादित्य ने भैरो महाराज से कुश्ती लड़ी और उज्जैन जीता। आज वो कहानियां भी पूरी याद नहीं। संभाजी भगत का गाना याद आ गया, कि हमारे देवता हमारी तरह काले , मांस – मदिरा का सेवन करने वाले। याद आ गई हमारी कई प्रथाएं , जिनका मतलब अब हमारे माता- पिता भी भूलने लगे हैं।  शादी में गाने गाकर पूर्वजों को न्यौता देने की प्रथा, असुरों के वृतांत से याद आ गया। हमारी शादी ज़रूर वैदिक पद्धति से होती है, लेकिन उसके आगे-पीछे की रस्में वैदिक नहीं लगती।

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जोठे जी का गोंड संस्कृति के ऊपर लेख तो बहुत ही जोरदार था। इस लेख के कारण अगली बार भारत आकर मोतीरावण कंगाली जी की किताबें खोजूंगा। राहुल सांकृत्यायन जी की किताबों के बारे में ओमप्रकाश वाल्मीकिजी की ‘जूठन ‘ से पता चला था, वो भी मेरी रीडिंग लिस्ट पर हैं।

मैं आपका शुक्रिया अदा करना चाहता हूँ।  धन्यवाद , इस अनमोल किताब को सम्पादित करने के लिए, और मुझे इसकी भेंट देने के लिए।  जब ले कर आया था, तब पता नहीं था कि किस खजाने को अपने साथ ले आया हूँ।

मेरी व्यस्तता अब कुछ कम  हो गयी है। अब फिर से लेखन पर ध्यान देता हूँ।   

आप अनूप कुमार को जानते हैं? वे वर्धा में  दलित – बहुजन बच्चों को निःशुल्क कोचिंग देते हैं। इस बार भारत-यात्रा में आपके अलावा मैं उनसे भी मिला था।  

मैं समाज के लिए कुछ अच्छा काम करना चाहता हूँ प्रमोद जी।  लेकिन उसके लिए इस समाज को, इसके इतिहास को, और इसके वर्तमान को  समझना ज़रूरी है। ख़ासकर मैं समृद्ध बहुजन तबके को दरिद्र बहुजन तबके से जोड़ना चाहता हूँ।  कैसे होगा, पता नहीं। अभी जो समझ में आ रहा है , कर रहा हूँ।

फिर से , धन्यवाद।  नवल किशोर जी और डॉ. सिद्धार्थ को भी मेरा अभिवादन दीजियेगा।

(कॉपी एडिटर : नवल/सिद्धार्थ)


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जाति के प्रश्न पर कबी

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लेखक के बारे में

आनंद सिलोदिया

मध्यप्रदेश के उज्जैन में जन्मे आनंद सिलोदिया ने आईआईटी, दिल्ली से कंप्यूटर साइंस में उच्च शिक्षा प्राप्त की है। वर्तमान में ये अमेरिका के न्यूयार्क में सॉफ्टवेयर इंजीनियर हैं

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