h n

उच्च शिक्षा की राजनीति में पैठ बनाएगी आम आदमी पार्टी

कांग्रेस, वामदलों और भाजपा की तर्ज पर आम आदमी पार्टी ने भी कॉलेज शिक्षकों, रिसर्च स्कॉलर्स व कर्मचारियों के लिए अलग-अलग संगठन बनाने की घोषणा कर दी है

तीन संगठनों डीआरए, डीटीए व डीएनएसए के गठन की घोषणा

बीते 24 दिसंबर 2018 को दिल्ली में सत्तासीन आम आदमी पार्टी (आप) ने उच्च शिक्षा की राजनीति में पैठ बनाने के लिए तीन संगठनों के गठन की घोषणा कर दी। जाहिर तौर पर आप के इस पहल से विश्वविद्यालयों की राजनीति में पहले से जगह जमाए कांग्रेस, वाम दलों और भाजपा को एक और प्रतिद्वंद्वी का सामना करना पड़ेगा।

आप ने जिन तीन संगठनों के गठन की घोषणा की है उनमें दिल्ली टीचर्स एसोसिएशन (डीटीए), दिल्ली रिसर्चर्स एसोसिएशन (डीआरए) और दिल्ली नॉन-टीचिंग स्टाफ़ एसोसिएशन (डीएनएसए) शामिल हैं। अपने नाम के अनुरूप डीटीए उच्च शिक्षा में शिक्षकों के मसले पर काम करेगा। जबकि डीआरए दिल्ली के तमाम विश्वविद्यालयों के शोधार्थियों का एक साझा मंच होगा। वहीं डीएनएसए विश्वविद्यालयों के नॉन-टीचिंग स्टाफ़ का संगठन है।  

दिल्ली सरकार के श्रम मंत्री गोपाल राय

इन संगठनों के गठन की घोषणा दिल्ली सरकार के श्रम मंत्री और आम आदमी पार्टी के दिल्ली प्रदेश संयोजक गोपाल राय ने की। इस मौके पर मीडियाकर्मियों से बातचीत में उन्होंने बताया कि ये तीनों संगठन उच्च शिक्षा में बेहतरी के लिए संघर्ष करेंगे और आम आदमी पार्टी की नीतियों को लेकर ज़मीन पर काम करेंगे। उन्होंने कहा कि आम आदमी पार्टी दिल्ली राज्य की स्कूली शिक्षा में जो बदलाव लाई है, उसे उच्च शिक्षा तक ले जाना चाहती है। जिसमें इन तीनों संगठन अहम भूमिका होगी।

वहीं नवगठित डीटीए के अध्यक्ष व दिल्ली विश्वविद्यालय के शिक्षक डॉ. प्रदीप कुमार सिंह ने बताया कि आज उच्च शिक्षा के ऊपर निजीकरण से लेकर तमाम तरह के हमले हो रहे हैं, जिनसे अब व्यवस्थित संघर्ष के एजेंडे के साथ डीटी काम करेगा। प्रदीप सिंह ने यह भी बताया कि दिल्ली सरकार के सभी कॉलेजों के साथ दिल्ली के तमाम विश्वविद्यालयों में उच्च शिक्षा की चुनौतियों से लड़ने के लिए यह एक अहम संगठन होगा।

जबकि डीआरए के अध्यक्ष और दिल्ली विश्वविद्यालय के शोधार्थी मनोज कुमार गुप्ता ने कहा कि दिल्ली के शोधार्थियों का कोई मंच न होने से शोधार्थियों को तमाम मुश्किलों का सामना करना पड़ता है। उनका संगठन न केवल शोधार्थियों का एक साझा मंच बनाएगा, बल्कि उनकी मुश्किलों को प्रशासन के सामने पूरी शिद्दत से रखेगा। डीएनएसए के अध्यक्ष व दिल्ली विश्वविद्यालय कर्मचारी संगठन के पदाधिकारी श्री केदार नाथ ने मीडिया से बातचीत करते हुए कहा कि  हमारा संगठन दिल्ली के कर्मचारियों के मुद्दे पर काम करेगा।


(कॉपी संपादन : एफपी डेस्क)


फारवर्ड प्रेस वेब पोर्टल के अतिरिक्‍त बहुजन मुद्दों की पुस्‍तकों का प्रकाशक भी है। एफपी बुक्‍स के नाम से जारी होने वाली ये किताबें बहुजन (दलित, ओबीसी, आदिवासी, घुमंतु, पसमांदा समुदाय) तबकों के साहित्‍य, सस्‍क‍ृति व सामाजिक-राजनीति की व्‍यापक समस्‍याओं के साथ-साथ इसके सूक्ष्म पहलुओं को भी गहराई से उजागर करती हैं। एफपी बुक्‍स की सूची जानने अथवा किताबें मंगवाने के लिए संपर्क करें। मोबाइल : +917827427311, ईमेल : info@forwardmagazine.in

फारवर्ड प्रेस की किताबें किंडल पर प्रिंट की तुलना में सस्ते दामों पर उपलब्ध हैं। कृपया इन लिंकों पर देखें 

 

बहुजन साहित्य की प्रस्तावना 

दलित पैंथर्स : एन ऑथरेटिव हिस्ट्री : लेखक : जेवी पवार 

महिषासुर एक जननायक’

महिषासुर : मिथक व परंपराए

जाति के प्रश्न पर कबी

चिंतन के जन सरोकार

लेखक के बारे में

कुमार समीर

कुमार समीर वरिष्ठ पत्रकार हैं। उन्होंने राष्ट्रीय सहारा समेत विभिन्न समाचार पत्रों में काम किया है तथा हिंदी दैनिक 'नेशनल दुनिया' के दिल्ली संस्करण के स्थानीय संपादक रहे हैं

संबंधित आलेख

आदिवासियों के पुरखों की हत्या का जश्न मनाने वाले क्यों कर रहे हैं उनका सांस्कृतिक समागम?
यह कौतूहल जरूर होता है कि हिंदुओं के संपूर्ण पौराणिक वाङ्मय में जिन्हें अनार्य, राक्षस, असुर, दस्यु, दास, यहां तक कि मानवेतर वानर शब्द...
हार से खत्म नहीं हुई है स्टालिन की पेरियारवादी राजनीति
स्टालिन इसलिए भी महत्वपूर्ण बने रहेंगे कि उन्होंने राज्य को नीट से छूट और नेशनल एजुकेशन पॉलिसी में तीन भाषा वाली पॉलिसी का कड़ा...
मुख्य न्यायाधीश की टिप्पणी सुप्रीम कोर्ट के नजरिए का नया संस्करण
यह मानने में हिचक नहीं होनी चाहिए कि मौजूदा मुख्य न्यायाधीश की पृष्ठभूमि भी संस्थागत है। यह उनकी सीमा है। इसीलिए उनमें वह व्यापक...
गए थे जोतीराव को मारने, बन गए महान सत्यशोधक पंडित धोंडीराम नामदेव कुंभार
संस्कृत तथा धर्म-शास्त्रों में प्रवीण होने के बावजूद धोंडीराम अपने सत्यशोधक होने के लक्ष्य से भटके नहीं थे। सन् 1896 में उनकी एक पुस्तक...
जाति-आधारित जनगणना के लिए महाराष्ट्र में राज्यव्यापी अभियान प्रारंभ
पूरे देश में ओबीसी समुदाय की सही आबादी के आंकड़े, साथ ही उनकी शैक्षिक, सामाजिक और आर्थिक स्थिति का पता लगाने के लिए जाति-आधारित...