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मध्य प्रदेश : कांग्रेस ने लगाई दलित-पिछडों के पुजारी बनने पर रोक

शिवराज सिंह चौहान ने सभी जातियों के लोगों को पुजारी बनाने का आदेश जारी करके ब्राह्मणों के वर्चस्व को तोडने की एक सकारात्मक पहल की थी। अब कांग्रेस से मुख्यमंत्री कमलनाथ ने इसे उलट दिया और पुजारी पद  ब्राह्मणों के लिए पूर्णतया सुरक्षित कर दिया

भोपाल : मध्यप्रदेश की कांग्रेस सरकार ने वंश-परंपरा के आधार पर मंदिरों में पुजारियों की नियुक्ति का फैसला किया है। जबकि पूर्ववर्ती भाजपा सरकार ने राज्य में सभी जातियों के लोगों को पुजारी बनाने का फैसला किया था। मुख्यमंत्री कमलनाथ से पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के फैसले को पलटते हुए पिछले दिनों पुजारियों की नियुक्ति के लिए नए नियम जारी किए हैं। साथ ही पुजारियों के मानदेय को एक हजार रुपए से बढ़ाकर तीन हजार रुपए कर दिया गया है।


5 फरवरी 2019 को सूचना एवं जनसंपर्क विभाग, मध्य प्रदेश द्वारा जारी सूचना के अनुसार, मध्य प्रदेश के ‘अध्यात्म विभाग’ ने पुजारियों की नियुक्ति, योग्यता, नियुक्ति की प्रक्रिया, उनके कर्तव्य, दायित्व, पद से हटाने और पद रिक्त होने पर व्यवस्था के संबंध में नियम बना लिए हैं। इसमें आवश्यक योग्यता के लिए 18 वर्ष की आयु, कम से कम आठवीं तक शिक्षित होना अनिवार्य किया गया है।

मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री कमलनाथ

अब पुजारी के पद पर ऐसे व्यक्ति की ही नियुक्ति की जा सकेगी, जो शुद्ध शाकाहारी हो और मद्यपान न करता हो। पिता पुजारी होने की दशा में पुत्र तथा उसी वंश के आवेदक को अन्य सभी योग्यता पूरी करने पर वरीयता दी जाएगी। मठ में संप्रदाय विशेष या अखाड़ा विशेष के पुजारी की परंपरा रहेगी।

नियुक्ति की प्रक्रिया

किसी देवस्थान में पुजारी का पद खाली होने की दशा में आवेदन निर्धारित प्रारूप में संबंधित अनुविभागीय अधिकारी को देना होगा। आवेदन-पत्र के साथ शपथ-पत्र पर अंडरटेकिंग भी देनी होगी। अनुविभागीय अधिकारी पंद्रह दिन में पुजारी के नाम की सार्वजनिक सूचना जारी करके आपत्तियां आमंत्रित करेंगे। आपत्ति न आने पर पटवारी, नायब तहसीलदार और तहसीलदार से प्रतिवेदन लेकर पुजारी की नियुक्ति की जाएगी।

पद से हटाने की भी प्रक्रिया

स्वस्थ चित्त न रहने पर, देवस्थान की चल-अचल संपत्ति में हित का दावा करने पर, चारित्रिक दोष पैदा होने पर, देवस्थान की सेवा, पूजा एवं संपत्ति की सुरक्षा में लापरवाही बरतने पर, शासन के आदेशों की अवहेलना करने पर पुजारी को पद से हटाया जा सकता है।

गौरतलब है कि कांग्रेस ने अपने चुनावी घोषणा पत्र में भी मठ-मंदिर का नामांतरण गुरु-शिष्य परंपरा अनुसार करने और पुजारियों की वंश परंपरा अनुसार नियुक्ति का वादा किया था। पार्टी ने चुनाव के दौरान विभिन्न कार्यक्रमों में भी ऐसी अनेक घोषणाएं की थीं, जिनसे ब्राह्मण व अन्य द्विज समुदाय के आर्थिक और सामाजिक हितों का येन-केन प्रकारेण पोषण किया जा सके। पार्टी सूत्रों के अनुसार उन सबों को पूरा करने की दिशा में लोकसभा चुनाव के बाद कदम उठाए जाएंगे।

संघ-भाजपा के विरोध के नाम पर कांग्रेस की प्रगतिशील और धर्मनिरपेक्ष छवि प्रस्तुत करने वाले लोगों के गाल पर कांग्रेस बार-बार तमाचा मार रही है। कभी राहुल गांधी जनेऊ दिखाते हैं और अपना ब्राह्मण गोत्र  बताते हैं। कभी उनके राष्ट्रीय प्रवक्ता कांग्रेस का डीएनए ब्राह्मण का डीएनए बताते हैं।

कौन इससे इंकार कर सकता है कि भाजपा के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने सभी जातियों के लोगों को पुजारी बनाने का आदेश जारी करके ब्राह्मणों के वर्चस्व को तोडने की एक सकारात्मक पहल की थी। डॉ. आंबेडकर ने अपनी किताब ‘जाति का विनाश’ में बताया है कि योग्यता के आधार पर पुजारियों की नियुक्ति की जानी चाहिए और सभी जातियों को लोगों को पुजारी बनने का मौका मिलना चाहिए। यही तो शिवराज सिंह चौहान ने किया था। अब कांग्रेस से मुख्यमंत्री कमलनाथ ने इसे उलट दिया और पुजारी पद  ब्राह्मणों के लिए पूर्णतया सुरक्षित कर दिया।

बहरहाल, स्पष्ट है कि कांग्रेस दलित- बहुजनों के बरक्स उच्च जातियों का हित साधने में संघ-भाजपा से एक कदम आगे है। गौ-हत्या के नाम पर तीन मुसलमानों पर राष्टीय सुरक्षा कानून लगाकर कांग्रेस अपने धर्मनिरपेक्ष चरित्र की असलियत को भी मध्यप्रदेश में उजागर कर चुकी है। सच्चाई यह है कि आजादी के बाद से ही कांग्रेस उच्च जातियों के हितों के सबसे बड़ी संरक्षक रही है। आज भी कांग्रेस के उस चरित्र में कोई बुनियादी बदलाव नहीं आया है।

(कॉपी संपादन : सिद्धार्थ/एफपी डेस्क)


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