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‘गुलामगिरी’ के नवें अध्याय में पढ़ें– कौन थे राम?

राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (शरद पवार गुट) के विधायक जितेंद्र आव्हाड ने हाल ही में शिर्डी में अपने दल के कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए कहा कि राम बहुजनों के भगवान थे और वे कभी शाकाहारी नहीं थे। इस प्रसंग में पढ़ें ‘गुलामगिरी’ का एक अंश

[राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (शरद पवार गुट) के विधायक जितेंद्र आव्हाड ने हाल ही में शिर्डी में अपने दल के कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए कहा कि राम बहुजनों के भगवान थे और वे कभी शाकाहारी नहीं थे। आव्हाड ने यह तर्क भी दिया कि बिना मांसाहार किए वह चौदह वर्षों तक जंगल में कैसे रह पाते। आव्हाड का यह बयान भाजपा के विधायक राम कदम द्वारा एक दिन पहले प्रदेश के मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे को पत्र भेजे जाने के बाद आया, जिसमें आगामी 22 जनवरी को राम मंदिर में प्राण-प्रतिष्ठा के दिन सूबे में शराबबंदी और शाकाहार दिवस के रूप में घोषणा करने की मांग की गई।

क्या जितेंद्र आव्हाड का बयान जोतीराव फुले की कालजयी कृति ‘गुलामगिरी’ से प्रेरित है, जिसमें वह राम का परिचय एक क्षेत्रपति (मूलनिवासी राजा) के रूप में देते हैं? प्रसंगवश हम यहां नवें अध्याय का एक अंश प्रकाशित कर रहे हैं।] 

धोंडिबा : तो फिर इस बात में कोई सच्चाई नहीं है कि ब्रह्मा के मुख से चारों वेद अपने आप निकले? कई ब्राह्मण ऐसी शेखी बघारते हैं। लेकिन आपकी बातें इससे मेल नहीं खातीं। 

जोतीराव फुले : यह सब झूठ है, क्योंकि अगर उनकी बातों को सच माना जाय तो फिर यह कैसे संभव है कि ब्रह्मा के मरने के बाद ब्राह्मणों के बीच के कुछ ब्रह्मर्षियों या देवर्षियों द्वारा रची गईं सूक्तियां उन वेदों में मिलती हैं, जो तथाकथित रूप से ब्रह्मा के मुख से निकले थे। उसी तरह से यह भी साबित नहीं होता कि चारों वेदों की रचना एक ही व्यक्ति ने एक ही समय में की होगी। कई यूरोपीय ग्रंथकारों ने यह साबित भी किया है।

धों. : आखिर भटों ने यह ब्रह्म धोखा कब किया?

जो. : ब्रह्मा के मरने के बाद बहुत सारे ब्रह्मर्षियों ने ब्रह्मा के लेख के तीन भेद यानि वेद बनाए। आगे अनेक ब्रह्मर्षियों ने उन तीनों वेदों में अनेक प्रकार के फेरबदल करके उनमें पहले की कुछ बकवास दंतकथाओं को डालकर, उनको काव्यात्मक रूप देकर एक चौथा नया वेद बनाया। इसी बीच परशुराम ने बाणासुर की पूरी प्रजा का कैसे सर्वनाश किया, यह देखकर अन्य सभी क्षेत्रपतियों के मन में ब्राह्मणों के वेद मंत्र और जादू-टोने का डर बैठ गया। इस मौके का फ़ायदा उठाकर मौगे नारद ने रामचंद्र और रावण, कृष्ण और कंस तथा कौरव और पांडवों जैसे भोले-भाले, श्रद्धालु क्षेत्रपतियों के घर उठना-बैठना शुरू किया। रात-दिन वह उनके घरों में स्त्रियों तथा बच्चों के सामने कभी अपना एकतारा बजाकर तो कभी तालियां बजाकर नाचते हुए उनका मनोरंजन करता था; सतही तौर पर उन्हें उपदेश देने का दिखावा करके वास्तव में उन्हें एक दूसरे के विरुद्ध भड़काने का काम करता था। ऐसा करके उसने सभी क्षेत्रपतियों को आपस में लड़ाकर उन्हें कमज़ोर कर दिया और ब्राह्मणों के वर्चस्व को और मज़बूत किया। ब्राह्मण ग्रंथकारों ने इस बात का लाभ उठाकर लोगों की नज़रों से छिपकर अपने वेद मंत्र और उनसे जुड़ी हुई दंतकथाओं से मिलती-जुलती स्मृतियां, संहिताएं, शास्त्रों और पुराणों आदि अनेक ग्रंथों की घर बैठे-बैठे भरमार रचनाएं की। इन सबका एक ही उद्देश्य था– शूद्रों पर ब्राह्मणों का वर्चस्व स्थापित करना। उन्होंने शूद्रों को विश्वास दिलाया कि उनके पूर्वजों की तरह उन्हें भी ब्राह्मणों की सेवा ही करनी है। उनके लिए भी सही धर्म का पालन करना होगा। आगे चलकर कभी यह ब्रह्म-कपट शूद्रों के सामने खुल न जाय, इस डर से और उन ग्रंथों में उन्हें मनचाहे फेरबदल करने में आसानी हो, इसलिए उन्होंने मनुस्मृति जैसे अपवित्र ग्रंथ में यह बड़ी कड़ाई के साथ लिख रखा है कि पाताल में भेजे हुए लोगों को यानि शूद्रों को कोई ज्ञान देने की कोशिश भी न करें।

जोतीराव फुले द्वारा लिखित व फारवर्ड प्रेस, नई दिल्ली द्वारा प्रकाशित ‘ब्राह्मणवाद की आड़ में गुलामगिरी’ का मुख पृष्ठ

धों. : क्या भागवत भी उसी समय लिखा गया होगा?

जो. : अगर भागवत उस समय लिखा गया होता तो सबसे बाद में पैदा हुए अर्जुन के परपोते की कहानी उसमें कभी नहीं होती। 

धों. : आपका कहना ठीक है, क्योंकि उसी भागवत में अनेक ऐसी पुरातन मनगढ़ंत झूठी दंतकथाएं मिलती हैं कि उससे तो इसपनीति हज़ार गुना अच्छी है। उसमें बच्चों के मन को भ्रष्ट करने वाली कोई बात नहीं मिलती। 

जो. : इसी प्रकार यह भी साबित किया जा सकता है कि मनुस्मृति भागवत के बाद लिखी गई थी।

धों. : क्या? मनुस्मृति भागवत के बाद लिखी गई थी! यह कैसे हो सकता है?

जो. : कुछ बातें इसे साबित करती हैं; जैसे– वशिष्ठ ने किसी का खून नहीं किया था, ऐसी शपथ सुदामन राजा के सामने खायी थी। यह कहानी भागवत में है और यही उदाहरण मनु ने अपने ग्रंथ में आठवें अध्याय के 110वें श्लोक में कैसे दिया? उसी तरह विश्वामित्र ने विपत्ति के समय में कुत्ते का मांस खाने के बारे में उसी ग्रंथ के दसवें अध्याय में 108वें श्लोक में उदाहरण कैसे दिया गया है? इसके अलावा भी उस किताब में कई विरोधाभासी बातें मिलती हैं।

(ब्राह्मणवाद की आड़ में गुलामगिरी, फारवर्ड प्रेस, नई दिल्ली, उज्ज्वला म्हात्रे द्वारा मूल मराठी से अनूदित का एक अंश)


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