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‘वर्ष 2012 के रेगुलेशन से अधिक व्यापक व प्रभावकारी है नया रेगुलेशन’

ओबीसी बच्चों के साथ भी भेदभाव होता है। भारत की किसी यूनिवर्सिटी में ब्राह्मण और क्षत्रिय छात्रों के साथ जातीय भेदभाव का कोई आरोप लगाया गया हो, ऐसा मेरे संज्ञान में तो अभी तक नहीं आया है। पढ़ें, इलाहाबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय के प्रो. विक्रम हरिजन से यह साक्षात्कार

यूजीसी इक्विटी रेगुलेशन-2026 या भेदभाव विरोधी अधिनियम 2026 को लेकर इन दिनों ख़ूब शोर मचा हुआ है। यह विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) द्वारा अधिसूचित विनियम है जिसका उद्देश्य उच्च शिक्षण संस्थानों के भीतर हर तरह के भेदभाव को दूर करना है। 2026 का ये विनियम 2012 के मौजूदा विनियमों को अधिक कठोर उपायों से प्रतिस्थापित करते हैं, ताकि हाशिए के छात्रों के लिए कैंपस में एक समावेशी माहौल सुनिश्चित किया जा सके। सुप्रीम कोर्ट में इस विनियम के ख़िलाफ एक जनहित याचिका दायर की गई। इसे संविधान के अनुच्छेद 14, 15 और 21 का उल्लंघन बताते हुए इसकी संवैधानिक वैधता को चुनौती दी गई। इसके विभिन्न पहलुओं और पृष्ठभूमि के बारे में इलाहाबाद यूनिवर्सिटी के प्रोफ़ेसर डॉ विक्रम हरिजन से विस्तार से बात की है सुशील मानव ने। 

नए विनियम में क्या-क्या प्रावधान हैं, कुछ सार-सारांश बताइए।

यूजीसी समानता विनियम-2026 के नए नियमों के तहत हर विश्वविद्यालय और कॉलेजों को समान अवसर केंद्र (ईओसी) स्थापित करना होगा। यह ईओसी, 2026 के विनियमों के तहत एक प्रमुख संस्थागत तंत्र है, जो परिसर में समानता और समावेश स्थापित करने के लिए नोडल निकाय के रूप में कार्य करता है। इसका उद्देश्य सभी उच्च शिक्षण संस्थानों में समानता, सामाजिक समावेश, और समान पहुंच को बढ़ावा देना और परिसर में भेदभाव संबंधी शिक़ायतों को देखना है।

प्रत्येक संस्था को ईओसी के अन्तर्गत एक समता समिति का गठन करना होगा, जिसकी अध्यक्षता संस्थान के प्रमुख करेंगे। इसमें एससी, एसटी, ओबीसी, महिला, विकलांग व्यक्तियों का अनिवार्य प्रतिनिधित्व होगा। इस समिति में वरिष्ठ शिक्षक, छात्र और सिविल सोसायटी के लोग शामिल होंगे। यह समिति भेदभाव के शिक़ायतों की जांच करेगी। नए नियमों के तहत प्रत्येक संस्थान को एक चौबीसों घण्टे उपलब्ध समता हेल्पलाइन चलानी होगी। अगर किसी छात्र, शिक्षक या कर्मचारी को लगे कि उसके साथ भेदभाव हुआ है तो वह हेल्पलाइन, ऑनलाइन पोर्टल या समान अवसर केंद्र को ईमेल से शिक़ायत दर्ज़ कर सकता है। अनुरोध करने पर शिक़ायतकर्ता की पहचान गोपनीय रखी जाएगी। साथ ही अलग-अलग कैंपस में निगरानी रखने और भेदभाव रोकने के लिए सभी उच्च शिक्षा संस्थान समता समूह (इक्विटी स्क्वॉड) बनाएंगे। इसके अलावा हर विभाग, हॉस्टेल, लाइब्रेरी में एक समता दूत (इक्विटी एम्बेसडर) नियुक्त किया जाएगा, जो समता संबंधी गतिविधियों को लागू करने और किसी भी उल्लंघन की रिपोर्ट करने के लिए ज़िम्मेदार होगा।

2026 का रेगुलेशन, 2012 के रेगुलेशन से किस तरह अलग है?

दोनों रेगुलेशन में ज़मीन आसमान का अंतर है। जैसे 2012 के रेगुलेशन में जो भेदभाव की परिभाषा थी, वह बहुत ज़्यादा व्यापक नहीं थी, ठोस नहीं थी। जबकि 2026 के रेगुलेशन में भेदभाव की परिभाषा बहुत व्यापक और ठोस है। जैसे 2012 के रेगुलेशन में पीड़ित समूह का जो विभाजन था, वह स्पष्ट नहीं था। जबकि 2026 के रेगुलेशन में बहुत स्पष्ट है। इसमें ओबीसी, विकलांग और महिलाओं को जोड़ा गया है।

परिभाषा का जो तीसरा भाग है, उसका उपबंध 3(ई) कहता है– भेदभाव का अर्थ है कि धर्म, नस्ल, जाति, लिंग, स्थान, दिव्यांगता, इनमें से किसी एक के आधार पर किसी भी हितधारक के विरुद्ध कोई भी भेदभाव या पक्षपात पूर्ण व्यवहार या ऐसा कोई कार्य चाहे वह स्पष्ट हो या अंतर्निहित हो। इसमें से कोई भी प्रतिबंध या पक्षपात शामिल है, जिसका उद्देश्य या प्रभाव शिक्षा में, समान व्यवहार को निष्प्रभावी रक्षण करना है, विशेष रूप से किसी भी छात्र या हितधारकों के समूह पर ऐसी शर्ते लगाना जो मानवीय गरिमा के प्रतिकूल हो। यानी उत्पीड़क तो कोई भी हो सकता है। जैसे स्थान या क्षेत्र के आधार पर मान लीजिए कि नॉर्थ ईस्ट की कोई लड़की या लड़का है, उसका कोई उत्पीड़न करेगा क्षेत्र के आधार पर तो वह उत्पीड़क एससी, एसटी, ओबीसी भी हो सकता है। इसी तरह भाषा के अनुसार जेंडर वाले मामले में उत्पीड़क कोई भी लड़का हो सकता है किसी भी जाति धर्म नस्ल क्षेत्र का। इसी तरह जाति के मामले में अपर कास्ट है। सुप्रीम कोर्ट में 3(ई) पर बहस होनी चाहिए थी।

मैं आपको बताऊं कि 2012 में समता समिति नाम से एक कमेटी गठित की गई थी, जिसमें इक्वल ऑपर्च्युनिटी ऑफिस के गठन की बात की गई है, लेकिन समता समिति के साथ कोई ढांचे वाली बात नहीं की गई है। यह एक समस्या थी। इसी तरह 2012 के रेगुलेशन में समता हेल्पलाइन की चर्चा नहीं की गई है। 2026 के रेगुलेशन में इस पर चर्चा की गई है।

प्रो. विक्रम हरिजन, एसोसिएट प्रोफ़ेसर, इलाहाबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय

आपके हिसाब से नए रेगुलेशन में किस तरह की खामी है?

मुझे तो कोई ख़ामी नज़र नहीं आती है इसमें। परिसर में ओबीसी के साथ भी भेदभाव होता है। इसके भी कई आधार बनाये गए हैं। जैसे इसका सबसे बड़ा आधार रोहित वेमुला का मामला है। आप जानते होंगे कि मरने के बाद भी रोहित वेमुला की दलित पहचान को लेकर के तत्कालीन कैबिनेट मंत्री स्मृति ईरानी ने कहा था कि ये ओबीसी हैं, ओबीसी कहां आता है उत्पीड़न में। इस मामले में एससी/एसटी का केस नहीं हो सकता है, तो इस मैटर को वहां से उठाया गया है। सामान्यतः ओबीसी बच्चों के साथ भी भेदभाव होता है। भारत की किसी यूनिवर्सिटी में ब्राह्मण और क्षत्रिय छात्रों के साथ जातीय भेदभाव का कोई आरोप लगाया गया हो, ऐसा मेरे संज्ञान में तो अभी तक नहीं आया है।

ओबीसी वर्ग के साथ जातीय उत्पीड़न को कैसे परिभाषित किया जा सकता है? 

देखिए रेगुलेशन में गरिमा (डिग्निटी) शब्द लिखा है, न कि अपमान की बात की गई है। गरिमा के विरुद्ध अगर आप किसी यादव को ‘अहीरा’ कहेंगे तो वो उसकी डिग्निटी के ख़िलाफ़ है। आप किसी यादव को यादव कहेंगे सम्मानजनक होगा। यह तो सम्मानसूचक है, लेकिन ‘अहीरा’ तो सम्मानसूचक नहीं है।

ठीक ऐसे पंडित जी सम्मानसूचक है लेकिन पंडितवा सम्मानसूचक नहीं है। ठाकुर जी सम्मानसूचक है, लेकिन ठकुरा अपमानसूचक है। लेकिन यह तो मैनर की बात हुई। इसमें जातीय भेदभाव कहां है?

हां, ऐसे तो किसी को भी बोलेंगे तो वो ग़लत होगा। किसी को भी अपमानजनक शब्द से बोलना ग़लत ही होगा। लेकिन ब्राह्मण के बच्चे ने आज तक कभी नहीं कहा कि इनका जाति के आधार पर अपमान हुआ, चाहे क्षत्रिय के बच्चा हो, चाहे कोई भी सवर्ण हो।

जब जाति श्रेष्ठता या गर्व की अनुभूति के साथ आ रही है, तब जाति का नाम लेना जातीय उत्पीड़न नहीं हो सकता है ना?

बिलकुल नहीं होगा। सम्मान से यदि आप मुझे हरिजन जी कहेंगे तो मुझे क्यों बुरा लगेगा। जैसे असम सेंट्रल यूनिवर्सिटी में लोग मुझे हरिजन जी कहते थे या विक्रम हरिजन जी कैसे हैं कहकर पूछते थे वहां पर। तो मुझे यह पता है कि सामने वाला जानबूझकर नहीं कह रहा है।

मैं तो यह कहता हूं कि एससी और एसटी से सवर्णों को समस्या नहीं है। उनको समस्या केवल ओबीसी से है। क्योंकि वे जानते हैं कि ये ओबीसी जातियां बहुत मज़बूत हैं, दबंग हैं। यही हमारे ख़िलाफ़ खड़ी हो सकती हैं, दलितों को तो वो जब चाहें तब दबा सकते हैं। जैसे यूजीसी प्रोटेस्ट के दौरान मोदी को तेली कहा गया, मुख्यमंत्री मोहन यादव को भैंस चराने के लिए कहा गया तो उनको ओबीसी से ज़्यादा तकलीफ़ है। चमार, पासी तो रोज़ की गाली है। उन्हें रोज़ गाली देते हैं। मज़ाक में अपमान करना, ये तो मैं रोज़ महसूस करता हूं। यह एक दिन की नहीं, रोज़ की कहानी है। यूनिवर्सिटी में चतुर्थ श्रेणी का कर्मचारी कहता है कि चमार के जन्मे हो क्या। वह मुझसे कह रहा है कि देख रहे हैं चोरी-चमारी चल रही है। कोई जुलूस आता था तो कहा जाता कि देखिए चमरपन चल रहा। कपड़ा अच्छा नहीं पहने तो कह देंगे क्या चमार की तरह चले आये हो। एक सवर्ण कर्मचारी हैं। मैं उनके साथ खड़ा था, तभी कोई व्यक्ति आया तो उसको कहने लगे बाबू साहेब आये हैं। बाबू साहेब मतलब ठाकुर साहेब। तो ये तो सामंतवादी भाषा हुई। पूरे यूनिवर्सिटी परिसर में यही चल रहा है।

क्या इसके लिए भी कुछ है 2026 के रेगुलेशन में?

देखिए इस रेगुलेशन की सबसे अच्छी बात यह है कि इसमें समानता को सुनिश्चित करने के लिए हर व्यक्ति को काम बांटा गया है। विनियम-2026 के 7(सी) में लिखा गया है कि प्रत्येक शैक्षणिक सत्र के प्रारंभ से पहले संस्थान का प्रमुख विभिन्न कार्यकर्ताओं जैसे छात्रावास वार्डन, छात्र विभाग, संरक्षण संकाय कर्मचारी जिला प्रशासन पुलिस की एक बैठक आयोजित करेंगे और उसमें संबोधित करेंगे जो अभिविन्यास कार्यक्रम का हिस्सा होगी ताकि हितधारकों के बीच समता बढ़ाने के उपायों पर चर्चा की जा सके और इन विनियमों के बारे में जागरूकता पैदा की जा सके। बैठक का एक वीडियो उच्च शिक्षा संस्थान की वेबसाइट पर अपलोड किया जाएगा। मतलब यह कि अब यह स्वीकार किया जा रहा है कि संस्थानों में जातिगत भेदभाव होता है। जबकि 2012 के रेगुलेशन में यह स्वीकार ही नहीं किया गया था। उसमें तो इसे एक संभावना के तौर पर देखा गया था और कहा गया था कि यदि इस तरह की घटनाएं होती हैं तो देखा जाएगा।

सवर्ण वर्ग के लोग क्यों विरोध कर रहे हैं इस रेगुलेशन का?

सवर्ण वर्ग के लोगों का इसलिए विरोध है, क्योंकि इसमें 24 घंटे में शिक़ायत रजिस्टर्ड करना है। पहले ऐसा कोई प्रावधान ही नहीं था। दूसरा, इसमें कहा गया है कि 15 दिन के अंदर रिपोर्ट करना है। पिछले रेगुलेशन में यह नहीं था। उसके बाद कहा गया है कि अगर कोई व्यक्ति इस कमेटी से सहमत नहीं है या इससे खुश नहीं होता है। तो वह लोकपाल को शिक़ायत करेगा। लोकपाल अलग से जांच बिठा सकता है। वह लोकपाल भी बाध्यकारी रूप से 30 दिनों के अंदर रिपोर्ट करेगा। ये बातें 2012 के रेगुलेशन में नहीं थीं।

नई कमेटी पुरानी कमेटी से किस तरह अलग है?

2012 के रेगुलेशन में यह सिर्फ़ क़ाग़ज पर था। शिक़ायतकर्ता केवल कॉलेज एडमिन के पास जा सकता था। एक सदस्यीय कमेटी ही सारे निर्णय लेती थी। ऐसे में कॉलेज एडमिन अपने संस्थान की साख बचाने के लिए शिक़ायतों को अनदेखा कर देता था। फिर शिक़ायतकर्ता के पास संस्थान छोड़ने या सुसाइड करना ही विकल्प होता था। नए नियमों में यह बदलाव हुआ है कि कॉलेज एडमिन के साथ-साथ हितधारक भी बैठेंगे, जिसमें छात्र, प्रोफ़ेसर, विशेषज्ञ, सभी वर्ग के प्रतिनिधि और भी लोग होंगे। यानी एक सदस्यीय कमेटी के बजाय सभी का प्रतिनिधित्व होगा। समुचित मॉनिटरिंग होगी, फैक्ट फाइंडिंग टीम होगी।

इस रेगुलेशन की पृष्ठभूमि क्या रही है? 

साल 2019 में रोहित वेमुला की मां राधिका वेमुला और पायल तड़वी की मां अबेदा तड़वी ने वकील दिशा वाडेकर की मदद से सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की। इस याचिका में शैक्षिक परिसरों में जाति आधारित भेदभाव और संस्थागत हत्याओं के ख़िलाफ़ सख़्त क़ानून और तंत्र की मांग की। साथ ही यूजीसी के 2012 के इक्विटी विनियमों को सख़्ती से लागू करने के लिए प्रत्येक संस्थान में विशेष सेल बनाने और भेदभाव के ख़िलाफ़ दंड के प्रावधान की मांग की गई थी।

2023 में केंद्र सरकार ने राज्यसभा में बताया था कि 2019-2021 के बीच यूनिवर्सिटी और कॉलेज में 98 एससी, एसटी, ओबीसी वर्ग के छात्रों ने सुसाइड किया है। इस तरह भेदभाव के मामलों में 118 प्रतिशत वृद्धि हुई है। 704 विश्वविद्यालय और 1553 कॉलेजों के आंकड़े इकट्ठे करने के बाद ये 118 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज़ की गई थी। वरिष्ठ अधिवक्ता इंदिरा जयसिंह के कहने पर सुप्रीम कोर्ट ने यूजीसी को निर्देश दिया था कि आप जाकर आंकड़े लेकर आइये तो यूजीसी ने आंकड़े एकत्र किये। ये आंकड़े पार्लियामेंटरी कमेटी और सुप्रीम कोर्ट को दिया। इन्हीं शिक़ायतों के आंकड़ों के आधार पर यह रेगुलेशन लाया गया है।

मैं आपको यह भी बताना चाहता हूं कि सबसे पहले 2019 में दलित छात्रों को जाति के आधार पर नंबर देने का मुद्दा मैंने उठाया था। पूरे 26 महीने बाद मुझसे इस पर रिपोर्ट मांगा गया। मुझसे साक्ष्य मांगे गए। कहा गया कि 3 दिन में सबूत पेश कीजिए नहीं तो कार्रवाई होगी आपके ख़िलाफ़। चूंकि छात्र सामने आने में डर रहे थे। उन्हें लग रहा था कि नाम आने पर उनकी डिग्री रद्द हो सकती है या नंबर काट दिया जाएगा। तो साक्ष्य तो मैं दे नहीं पाया तो एससी कमीशन चला गया। कमीशन में अंजूबाला मैडम थीं। उनके सामने मैंने यह बात कही कि ये लोग तो आना नहीं चाह रहे हैं तो उन्होंने भी कहा कि कौन आएगा डर की वजह से। यही बात कमीशन के तत्कालीन चेयरमैन सापला जी ने कही। साक्ष्य के लिए मैंने कहा कि कमेटी गठित की जाए। जैसे सफदरजंग हॉस्पिटल के लिए बाल चंद्रमेकर कमेटी बनी थी और एम्स के लिए एस.के. थोराट कमेटी बनी थी उसी तरह। कमेटी बनाने के मसअले पर कई संगठनों से बातचीत हुई लेकिन यूनिवर्सिटी और एससी कमीशन में इस पर विस्तार से कार्य हो ही नहीं पाया। कमेटी की बात आई तो बाद में क्या हुआ कि मेरे खिलाफ़ इतना मामला तेज़ हो गया कि मुझे ऐसा लगने लगा कि मुझ पर हमला हो जाएगा, मुझे मार देंगे। यूनिवर्सिटी में माहौल गरमाने लगा। मेरे सस्पेंशन का माहौल बनने लगा। प्रोफ़ेसर मेरे साथ बात नहीं करते थे। मेरे साथ चाय-पानी तक नहीं पीते थे। तो मैं इस मैटर को लेकर के शांत हो गया।

फिर 4 जनवरी, 2021 से मैंने इसको लेकर पोस्टकार्ड अभियान चलवाया। ये पोस्टकार्ड प्रधानमंत्री, मानवाधिकार आयोग से लेकर शिक्षा मंत्रालय तक भेजे गए। 7 जनवरी को सारे अख़बारों में विस्तार से निकला। फिर लोग मेरे ख़िलाफ़ राजभवन चले गए। राज्यपाल को यूनिवर्सिटी और एबीवीपी के लोगों ने लेटर लिखा।

अच्छा, फिर उसी सुप्रीम कोर्ट ने नए रेगुलेशन पर स्टे लगा दिया।

इस बिल में सबके भले की बात है। ये चाहे जनरल कैटेगरी का हो, चाहे एससी एसटी, ओबीसी हों, इसमें सबके भले की बात है। लेकिन इस बात को न तो यूनिवर्सिटी कैंपसों में, न मीडिया में और न ही सुप्रीम कोर्ट में, ठीक से रखा गया। नतीज़ा यह हुआ कि तीन दिन इसका विरोध हुआ और सीजेआई सूर्यकांत ने तुरंत स्टे दे दिया। और मैं तो कहता हूं कि पूर्वाग्रह से ग्रस्त होकर दिया। अपने जजमेंट में वे कहते हैं कि 3(सी) का दुरुपयोग हो सकता है।

(संपादन : नवल/अनिल)

लेखक के बारे में

सुशील मानव

सुशील मानव स्वतंत्र पत्रकार और साहित्यकार हैं। वह दिल्ली-एनसीआर के मजदूरों के साथ मिलकर सामाजिक-राजनैतिक कार्य करते हैं

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