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मान्यवर कांशीराम किसी से नहीं संभल रहे हैं

राहुल गांधी कांग्रेस की राजनीतिक प्रकृति से भिन्न दलितों के प्रतिनिधियों की उपस्थिति पर बेहद स्पष्ट रूप से बोलते हैं। लेकिन महज प्रतिनिधियों की तादाद को बढ़ाने की राजनीति दलित चेतना को संबोधित नहीं करती है। यह चेतना राजनीतिक नेतृत्व और उसकी स्वतंत्रता के आधार पर विकसित हुई है। पढ़ें, अनिल चमड़िया का यह आलेख

देश की सभी राजनीतिक धाराएं डॉ. भीमराव आंबेडकर को साधने की कोशिश में लगी हैं। डॉ. आंबेडकर की सामाजिक-राजनीतिक यात्रा पर एक नजर डालें तो यह दिखता है कि समाज में बराबरी की चेतना और भेदभाव के संस्थागत विरोध की चेतना का विस्तार हुआ है। वे सभी राजनीतिक विचारधाराएं भी डॉ. आंबेडकर को साधने की कोशिश करती रही हैं जो कि डॉ. आंबेडकर की विचारधारा को देश और समाज निर्माण के लिए गलत साबित करने का अभियान चलाती रही हैं। यहां तक कि डॉ. आंबेडकर के विचारों की उल्टी व्याख्या करके उन्हें अपने करीब होने का दावा प्रस्तुत करती हैं।

यदि एक नजर डालें तो दो दशक पहले तक महाराष्ट्र के बड़े भाग को छोड़कर पूरे देश में डॉ. आंबेडकर के विचारों को लेकर सतह पर कोई बड़ी हलचल नहीं दिखती थी। जब देश के सबसे बड़े प्रदेश और प्रमुख राजनीतिक केंद्र उत्तर प्रदेश में बहुजन समाज पार्टी (बसपा) के संस्थापक कांशीराम ने नए सिरे से डॉ. आंबेडकर के विचारों के प्रति जागरूक करने का अभियान चलाया तो उन्हें बड़े स्तर पर कामयाबी मिली। दरअसल कांशीराम ने उत्तर प्रदेश में डॉ. आंबेडकर के विचारों को राजनीतिक सतह पर जीवंत किया। इससे पहले भी उत्तर प्रदेश में डॉ. आंबेडकर के अलावा सामाजिक न्याय के जो भी नेतृत्व सामने आए उन्हें लेकर सामाजिक-राजनीतिक सक्रियता गहरे रूप में मौजूद रही। ललई सिंह पेरियार द्वारा प्रकाशित रामासामी पेरियार की पुस्तक ‘सच्ची रामायण’ और डॉ. आंबेडकर के साहित्य पर सरकार द्वारा पांबदी आदि की मिसालें यहां दी जा सकती हैं। यहां तक कि उत्तर प्रदेश में डॉ. आंबेडकर द्वारा स्थापित रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडिया के चार सांसद और दर्जन भर विधायक होते थे। संसदीय राजनीति में सामाजिक न्याय की धारा के साथ यह विडंबना जुड़ी दिखती है कि एक बार बड़े स्तर पर उभार दिखता है लेकिन उसे बार-बार पीछे की तरफ धकेल दिया जाता है। वर्चस्व की राजनीति उस उभार को अपने भीतर समाहित करने या साधने की कोशिश में खुद को सफल कर लेती है। लेकिन यह भी दिखता है कि फिर वही सामाजिक न्याय की धारा नए सिरे से खुद को संगठित करती है और राजनीति के नेतृत्व के रूप में खड़ी हो जाती है।

यह स्थिति स्पष्ट है कि 1990 के बाद का राजनीतिक नेतृत्व सामाजिक न्याय की धारा से खुद को अलग दिखाने की जुर्रत नहीं कर सकता है। राजनीतिक नेतृत्व जब यहां उल्लेखित किया जा रहा है तो इसका अर्थ यह है कि संसदीय राजनीति में हर धारा के सामने सामाजिक न्याय से जुड़े होने का दावा करने के अलावा दूसरा विकल्प नहीं है।

उत्तर प्रदेश में फिर से सामाजिक न्याय की धारा पीछे की तरफ चली गई है। उसे नए सिरे से संगठित करने की राजनीतिक प्रक्रिया अभी सतह पर नहीं दिख रही है। राजनीतिक सतह पर यह जरूर दिख रहा है कि कांशीराम जी को साधने की कोशिश कई स्तरों पर की जा रही है। पहली बात तो कांशीराम जी बसपा के संस्थापक जरूर थे, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि बसपा कांशीराम जी की क्षमताओं व दृष्टि को बचाए रखने में सक्षम है। किसी भी विचारधारा से जुड़ा संगठन उसके संस्थापक के बाद संगठन की वह क्षमता व दृष्टि बनाए रखने में सक्षम नहीं रह जाता है, क्योंकि उस संगठन की परिकल्पना और उसे निर्मित करने की प्रक्रिया से पदाधिकारी नहीं जुड़े होते हैं। संगठन का नेतृत्व करने वाले पदाधिकारी होते है और उनकी क्षमता प्रबंधन करने तक सीमित होती है। संस्थापक विचारों के रूप में परिवर्तित हो जाता है। डॉ. आंबेडकर, महात्मा गांधी और दूसरे लोगों को इस श्रेणी में देखा जा सकता है। अब सवाल यह है कि क्या कांशीराम को भी एक तरह के विचार के रूप में राजनीतिक स्तर पर देखा जाता है या फिर महज एक वोट बैंक के प्रेरक के रूप में देखकर उन्हें साधने की कोशिश की जा रही है।

गत 15 मार्च, 2026 को कांशीराम की जयंती के मौके पर आयोजित एक कार्यक्रम में कांशीराम की तस्वीर पर पुष्प अर्पित करते राहुल गांधी

बसपा उत्तर प्रदेश में फिलहाल कांशीराम जी राजनीतिक विरासत को संभालने की कोशिश कर रही है। लेकिन वह यह संकेत देने में सफल नहीं हो पाई है कि वह इसका प्रबंधन कर सकती है। बसपा में कांशीराम से प्रभावित और प्रेरित कार्यकर्ता व समर्थक क्या करें? यह एक जटिल प्रश्न बना हुआ है। संसदीय राजनीति में पार्टियों को यह आकलन करना पड़ता है कि वे मतदाताओं के किस जातिगत व धार्मिक समूहों को अपनी ओर करने की कोशिश कर सकते हैं। उत्तर प्रदेश में कांग्रेस का लंबे समय तक शासन था, लेकिन एक-एक कर धार्मिक अल्पसंख्यक और दलित मतदाताओं का समूह उससे दूर हो गया। यहां तक कि कांग्रेस का नेतृत्व करने वाले सवर्णों के समूह ने भी पल्ला झाड़ लिया और पूरी तरह से भारतीय जनता पार्टी के पीछे लामबंद हो गए हैं। इसे आम बोलचाल की भाषा में जनाधार का खिसकना कहते हैं। कांग्रेस ने अपने जनाधार को वापस लाने के लिए कई तरह के प्रयोग करती रही है। लेकिन राहुल गांधी का नेतृत्व स्थापित होने के बाद उत्तर प्रदेश में पिछड़े वर्ग, अल्पसंख्यक और दलितों के बीच अपनी संभावनाएं तलाश रही है।

यहां हम केवल दलितों के बीच अपने जनाधार को वापस पाने के कांग्रेस के प्रयास पर ध्यान केंद्रित करते हैं। पहली तो यह कोशिश हुई कि बसपा के साथ उसका कोई गणित बैठ जाए। बसपा की नेता मायावती को साधने की कोशिश की गई, लेकिन इसमें सफलता नहीं मिली। नई कोशिश कांशीराम के जरिए बसपा के वोट आधार को साधने की एक नई मिसाल मिली है। लेकिन क्या यह संभव है? इसका जवाब इस रूप में देखा जा सकता है कि कांशीराम को किस रूप में देखा जा रहा है।

राहुल गांधी ने कांग्रेस की तरफ से उत्तर प्रदेश में आयोजित कांशीराम जयंती समारोह में कहा कि यदि नेहरू होते तो कांशीराम जी उत्तर प्रदेश में कांग्रेस के मुख्यमंत्री होते। देश के कुछेक राज्यों में कांग्रेस ने मुख्यमंत्री के रूप में दलित प्रतिनिधि की नियुक्ति की है, क्या उन राज्यों में कांग्रेस की तरफ दलितों का रुझान बना है? राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस ने जगजीवन राम के चेहरे के बूते दलितों के वोट आधार को लंबे समय तक साधा। जगजीवन राम की सक्रियता के दौरान ही उत्तर भारत के राज्यों में दलितों के बीच नए नेतृत्व की चेतना ने आकार ले लिया था। कांशीराम की राजनीतिक पृष्ठभूमि पर नजर डालें तो यह स्पष्ट है। कांशीराम से पहले भी बी.पी. मौर्या जैसा नेतृत्व एक नई चेतना के प्रतिनिधि के बतौर उभरा, लेकिन कांग्रेस में वह नेतृत्वकारी भूमिका में आने के बजाय हाशिए पर चले गए। कांशीराम ने दलितों की नहीं, बल्कि बहुजनों की चेतना को संबोधित किया और बहुजनों के बीच एक स्वतंत्र नेतृत्व की जरूरत का एहसास कराया। कांशीराम ने कभी भी खुद को मुख्यमंत्री के रूप में नहीं देखा, बल्कि मुख्यमंत्री बनवाने की राजनीतिक शक्ति बटोरी। राहुल गांधी कांग्रेस की राजनीतिक प्रकृति से भिन्न दलितों के प्रतिनिधियों की उपस्थिति पर बेहद स्पष्ट रूप से बोलते हैं। लेकिन महज प्रतिनिधियों की तादाद को बढ़ाने की राजनीति दलित चेतना को संबोधित नहीं करती है। यह चेतना राजनीतिक नेतृत्व और उसकी स्वतंत्रता के आधार पर विकसित हुई है। कांग्रेस के लिए दलितों के बीच आधार बढ़ाने की संभावना हो सकती है, लेकिन इसके लिए केवल कांशीराम जी की जयंती का रास्ता नहीं हो सकता है। कांग्रेस को बहुजन राजनीति की तासीर को साधना होगा।

(संपादन : नवल/अनिल)


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लेखक के बारे में

अनिल चमड़िया

वरिष्‍ठ हिंदी पत्रकार अनिल चमडिया मीडिया के क्षेत्र में शोधरत हैं। संप्रति वे 'मास मीडिया' और 'जन मीडिया' नामक अंग्रेजी और हिंदी पत्रिकाओं के संपादक हैं

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