आजादी के बाद विकास के नेहरू माॅडल के तहत झारखंड (तत्कालीन बिहार) में सार्वजनिक क्षेत्र की स्थापना हुई और बड़े पैमाने पर सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियां, उद्योग-धंधे, कल-कारखाने और खनन कंपनियां अस्तित्व में आईं। जैसे स्टील सेक्टर के क्षेत्र में बोकारो स्टील प्लांट, कोयला खनन के क्षेत्र में सीसीएल और बीसीसीएल, देश का पहला खाद कारखाना – सिंदरी खाद कारखाना, भारी मशीन बनाने वाली कंपनी एचईसी, बिजली उत्पादन के लिए दामोदर वैली कारपोरेशन, स्टील कारखाना के निर्माण और रख-रखाव के लिए हिंदुस्तान स्टील कंस्ट्रकशन लिमिटेड आदि। इन कंपनियों में बड़े पैमाने पर रोजगार का सृजन हुआ। मसलन, कोयला क्षेत्र की कंपनियों में साढ़े छह लाख लोगों को रोजगार मिला। बोकारो स्टील कारखाना में 52 हजार नियमित कर्मचारी हुआ करते थे। इसी तरह सार्वजनिक क्षेत्र की तमाम कंपनियों में लाखों लोगों को रोजगार मिला। नेहरू इन औद्योगिक कारखानों को विकास का मंदिर कहा करते थे। लेकिन त्रासदी यह कि विकास के इन मंदिरों का प्रसाद आदिवासी जनता को नहीं मिला। उन्हें मिला सिर्फ विस्थापन का दंश।
वजह यह कि उन्हें इन कंपनियों में रोजगार के लिए पात्र नहीं समझा गया। कहा गया कि वे आधुनिक शिक्षा से महरूम हैं। वे इस तरह के कारखानों में काम करने के लिए योग्य नहीं हैं। उनमें हुनर और ज्ञान भले हो, लेकिन वह शिक्षा और तकनीकी डिग्री नहीं, जिससे उन्हें कारखानों व अन्य कंपनियों में काम के योग्य समझा जाए। हां, यह जरूर कहा गया कि कारखाना निर्माण के बाद उन्हें इसके योग्य बनाया जाएगा। उन्हें आधुनिक शिक्षा और तकनीकी ज्ञान दिया जाएगा, ताकि वे इन कारखानों में नौकरी प्राप्त करने के योग्य बन सकें। लेकिन यह काम ईमानदारी से किया नहीं गया। उन्हें इन कंपनियों मे काम मिला भी तो निहायत दोयम दर्जे का। वह काम जो सिर्फ अनस्किल्ड मनुष्य ही कर सकते हैं।
इसलिए आप गौर करेंगे कि इन कारखानों की बदौलत झारखंड में कई औद्योगिक शहर बने। धनबाद, सिंदरी, बोकारो स्टील सिटी, रांची, टाटा, हजारीबाग आदि। हजारीबाग वैसे तो पुराना शहर है, लेकिन उसमें चमक अबरख उद्योग से ही आई। अन्य तमाम शहर नए हैं, जिनकी बुनियाद औद्योगिक कारखाने ही थे। और वे सभी आदिवासी, मूलवासियों की जमीन पर ही, उनके श्रम से ही निर्मित हैं। उन्हें आप समृद्धि के द्वीप जैसे कह सकते हैं। लेकिन इन शहरों में अब आदिवासी नहीं दिखेंगे। या दिखेंगे भी तो बहुत कम दिखेंगे। वह भी शहर के हाशिए पर।
विडंबना यह है कि आज भी हालात वही हैं। आदिवासी जनता, उनके बच्चे आधुनिक शिक्षा से महरूम हैं। यह नहीं कहा जा सकता कि झारखंड में शिक्षा की स्थिति या स्तर बहुत खराब है। मिशनरियों के प्रभाव और उनकी कृपा से पुराने जमाने से ही यहां अच्छे कालेज और स्कूल हैं। सार्वजनिक प्रतिष्ठानों वाले शहरों में निजी विद्यालयों की भरमार जो आदिवासियों-मूलवासियों से प्राप्त सस्ती जमीन या कहिए कि मुफ्त की जमीन पर खड़े हैं, चाहे वह डीपीएस की शृंखला हो या डीएवी की। उनके भवन आदि भी पब्लिक मनी से ही, यानि स्टील सेक्टर में सेल प्रबंधन से और कोयलांचल में बीसीसीएल के पैसे से बने। लेकिन वे उनके अपने कर्मचारियों के हितार्थ थे। उनके बच्चों के लिए बने। उनमें आदिवासी-मूलवासियों के बच्चों के लिए जगह नहीं थी। हां, पेरिफेरल डेवेलपमेंट के तहत जहां-तहां कुछ दोयम दर्जे के स्कूल चलाए गए। वे भी समय के साथ खत्म हो गए।
तो, कुल मिला कर हम कह सकते हैं कि आदिवासी बच्चे, जो ईसाई नहीं हैं, वे मूल रूप से शिक्षा के लिए सरकारी स्कूलों पर ही निर्भर हैं। मिशनरियों ने अपने धर्म के प्रचार के लिए शुरुआती दौर में सेवा भावना से पिछड़े इलाकों में स्कूल जरूर शुरू किये थे और प्रतीकात्मक रूप में उनमें से कुछ अभी भी चलते होंगे, लेकिन अब वे शिक्षा का व्यापार ही करते हैं। हां, इतना कहा जा सकता है कि वे व्यापार थोड़ी ईमानदारी से करते हैं, लेकिन करते वे व्यापार ही हैं। और निजी विद्यालयों और अन्य शिक्षा केंद्रों की तुलना में उनके यहां फीस थोड़ी जरूर कम होती है, लेकिन इतनी भी कम नहीं कि आदिवासी बच्चे वहां पढ़ सकें। वहां ईसाई आदिवासी बच्चे पढ़ते हैं या झारखंड में बसे बहिरागतों के बच्चे?

यानि, आदिवासी और सदान (लंबे समय से आदिवासियों के साथ रहने वाले शिल्पकार) बच्चों के लिए, एसटी और ओबीसी समुदाय के बच्चों के लिए एकमात्र सहारा सरकारी स्कूल ही है। त्रासदी यह कि उच्च शिक्षा के कुछ सरकारी संस्थान, जैसे, मेडिकल कालेज, इंजीनियरिंग कालेज, बिरसा विश्वविद्यालय, रांची कालेज आदि झारखंड में हैं, लेकिन प्राइमरी शिक्षा का बेहद खस्ता हाल है। जाहिर है कि बुनियाद मजबूत नहीं होने की वजह से सरकारी उच्च शिक्षा के केंद्रों का फायदा भी वे ही उठा पाते हैं जो निजी विद्यालयों में पढ़ कर निकलते हैं। इसलिए अलग राज्य बनने के बाद भी राजनीति छोड़, हर जगह, चाहे वह ब्यूरोक्रेसी हो, शैक्षणिक प्रतिष्ठान हो, सर्वत्र बहिरागतों का बोलबाला है। झारखंड में आदिवासियों के लिए 26 फीसदी आरक्षण है, लेकिन सरकारी नौकरयों में तीन-चार फीसदी से ज्यादा आदिवासी नहीं हैं। निजी क्षेत्र की नौकरियों की बात तो जाने ही दीजिए।
और इस स्थिति के लिए मूलतः झारखंडी राजनीतिक नेतृत्व जिम्मेदार है। आप कहेंगे, गैर राजनीतिक नेतृत्व क्यों नहीं? इसलिए कि आदिवासी इलाके आज भी शेष भारत के लिए आंतरिक औपनिवेशिक क्षेत्र ही हैं जहां से उन्हें सस्ता श्रम और खनिज संपदा मिलती है। उनकी प्राथमिकता यह क्यों होगी कि आदिवासी जनता में शिक्षा का प्रचार-प्रसार हो। अलग राज्य बनने के पहले यह बिहार के राजनेताओं और अधिकारियों का चरागाह था, अलग राज्य बनने के बाद भी यह बिहार और उत्तर प्रदेश के लोगों का चरागाह ही है। ब्यूरोक्रेसी में उन्हीं का दबदबा है। झारखंडी राजनेताओं का कहना था कि अलग राज्य बनने के बाद भी भाजपा का शासन चलता रहा। लेकिन 2019 के बाद से यहां बहुमत से चुनी गयी इंडिया गठबंधन की सरकार है जिसके केंद्र में है झारखंड मुक्ति मोर्चा। बड़़े गर्व से कहा जाता है कि यहां ‘अबुआ राज’ और ‘अबुआ सरकार’ है। अबुआ माने अपना। लेकिन इस अबुआ सरकार यानि हेमंत सोरेन की सरकार ने भी शैक्षणिक क्षेत्र में, खासकर प्राथमिक शिक्षा के क्षेत्र में कोई ठोस काम नहीं किया है।
झारखंड में एक दशक पहले तक 27 हजार 744 प्राइमरी स्कूल थे। इसमें 27 हजार के करीब सरकारी प्राइमरी स्कूल। छात्र शिक्षक अनुपात 42, कक्षा छात्र अनुपात 56 और महज 29-30 फीसदी स्कूलों में कॉमन टायलेट, 19-20 फीसदी स्कूलों में लड़कियों के लिए अलग से टायलेट थे। इधर कुछ सुधार हुआ बताया जा रहा है, लेकिन यूडीआईएसई के आंकडों के मुताबिक प्रति शिक्षक 30 छात्र हैं, जबकि राष्ट्रीय औसत प्रति शिक्षक 26 छात्र का हैं। राज्य के प्राइमरी स्कूलों में 2 लाख 49 हजार 369 छात्र पढ़ते हैं जिनमें से 60 फीसदी इन्हीं खस्ताहाल सरकारी स्कूलों में पढ़ते हैं।
कुछ माह पूर्व विधानसभा में एक प्रश्न के जवाब में चौंकाने वाला जवाब तत्कालीन शिक्षा मंत्री रामदास मुंडा ने दिया था। वह यह कि 8 हजार सरकारी प्राइमरी स्कूल सिर्फ एक शिक्षक के भरोसे चल रहे हैं। 107 ऐसे स्कूल हैं जहां छात्र नदारद हैं, लेकिन 17 शिक्षक कार्यरत हैं। अनेक सरकारी स्कूल बगैर ठीक-ठाक भवन के चल रहे हैं। छत का टपकना, संसाधनों का अभाव सामान्य बात हैं। इस खस्ताहाली की वजह से सरकारी स्कूलों के प्रति जनता में घनघोर अविश्वास का भाव भर गया है। हर कोई निजी विद्यालयों में बच्चों को पढ़ाना चाहता है, भले ही उनकी हालत बहुत अच्छी नहीं, लेकिन ऐसे निजी स्कूल गांव से लेकर कस्बों-शहरों तक कुकुरमुत्ते की तरह उगे हुए हैं।
आदिवासी और ओबीसी समाज में बच्चों को पढ़ाने की ललक तो है, लेकिन उनके पास यह अवसर नहीं कि वे बच्चों को खुद गाइड कर सकें। उन्हें मेहनत मजूरी से ही फुर्सत नहीं मिलती और उनमें से अधिकतर खुद अनपढ़ हैं। वैसे, झारखंड में पुरुष साक्षरता दर 54 फीसदी बतायी जाती है जो राष्ट्रीय राष्ट्रीय औसत 59.2 फीसदी से कम है। स्त्री साक्षरता दर तो और भी कम है। महज 27.2 फीसदी, जबकि राष्ट्रीय स्त्री साक्षरता दर 34.8 फीसदी बतायी जाती है। लेकिन साक्षर होने मात्र से वे इस लायक नहीं बन जाते कि अपने बच्चों को पढ़ा सकें या उनकी पढ़ाई पर नजर रख सकें। वे स्कूलों में बच्चों को नामांकन करा कर और ट्यूशन पढ़ा कर मान लेते हैं कि बच्चे पढ़ लेंगे।

लेकिन अधिकतर बच्चे स्कूली शिक्षा के बीच ही पढ़ाई छोड़ देते हैं। हां, लड़कियां खुद मेहनत मशक्कत और चाकरी कर के भी आगे पढ़ती हैं। कुछ कालेज तक भी पहुंचती हैं। स्नातक और स्नातकोत्तर की डिग्री हासिल कर लेती हैं, लेकिन एक तो वे तकनीकी पढ़ाई पैसे के अभाव में प्राप्त नहीं कर पातीं, दूसरे प्रतियोगी परीक्षाओं में असफल हो जाती हैं। ऐसे में कभी-कभार कोई सफल होता है तो उसे खूब सुर्खियां मिलती हैं। जैसे– ‘मजदूर का बेटा डाक्टर बन गया’, ‘कलक्टर बन गया’ आदि आदि। लेकिन अपवादों से सामाजिक स्थितियां नहीं बदलतीं।
क्या सरकार शिक्षा में सुधार के लिए कुछ नहीं कर रही? ऐसा नहीं है। सरकार तरह-तरह की घोषणाएं करती रहती है। उच्च शिक्षा केंद्रों में और प्रतियोगी परीक्षाओं में सफल होने के लिए कभी कोचिंग सेंटर चलाने की बात होती है, कभी मेडिकल कालेज आदि खोलने की बात होती है। सौ दो सौ ‘मुख्यमंत्री स्कूल ऑफ एक्सिलेंस’ खोलने की बातें भी चल रही हैं। लेकिन जहां लाखों लाख बच्चे पढ़ रहे हैं, वहां इस तरह के गिनती के स्कूलों से किसे फायदा होगा? उन स्कूलों में प्रवेश के लिए भी तो प्रतियोगिता ही होती है, जाहिर है, सुविधा संपन्न वर्ग के बच्चे ही वहां प्रवेश कर जाते हैं। व्यापक समाज और बहुसंख्यक आदिवासी-मूलवासी आबादी उन्हीं सरकारी स्कूलों के हवाले हैं, जिनकी चर्चा हम ऊपर कर चुके हैं।
मैं स्वयं पिछले दस वर्षों से महज शौक से समीप की आदिवासी बस्ती में डेढ़ घंटे की पाठशाला चलाता हूं। मेरा अनुभव है कि आदिवासी बच्चे कुशाग्र होते हैं। आत्मनिर्भरता उनमें कूट-कूट कर भरी होती हैं। उनके अक्षर सुडौल होते हैं। अपने परिवेश को वे अन्य बच्चों से बेहतर समझते हैं, लेकिन कभी-कभी यह तीव्र एहसास भी होता है कि आज की शिक्षा प्रणाली उनके लिए नहीं है। उनको अपनी मातृभाषा में पढ़ने का अवसर नहीं दिया जाता। आधुनिक पुस्तकों में दिये गये उद्धरण, बिंब-प्रतिबिंब उनके जीवन से मेल नहीं खाते। वे अब भी अपने परिवेश और जिंदगी की मौजूदा परिस्थितियों से ज्यादा सीखते हैं और इस दुनिया का मुकाबला करते हैं। कम-से-कम पढ़-लिख कर वे इस सिस्टम पर बोझ नहीं बनते।
लेकिन विकास के चालू माॅडल में अपनी जगह बनाने के लिए इसी शिक्षा प्रणाली में उनकी स्थिति सुदृढ़ करना आवश्यक होगा। यह कैसे होगा, इसको लेकर राजनीतिक नेतृत्व या कहिए कि सामाजिक रूप से सक्रिय जमातों में भी कोई स्पष्ट दृष्टि नहीं है। देश की शिक्षा नीति ही डांवाडोल है। तरह-तरह के प्रयोग होते रहते हैं। शिक्षा के बाजारीकरण के गिरफ्त में है पूरा समाज। हम कहेंगे कि जब तक स्कूली शिक्षा सभी संवर्गों के लिए एक तरह की नहीं होगी, तब तक शिक्षा में सुधार नहीं हो सकता। लेकिन अपने देश में तो दोहरी शिक्षा प्रणाली – यानि गरीबों के लिए अलग और अमीरों के लिए अलग शिक्षा व्यवस्था जानबूझ कर बनाई गई है ताकि रोजगार के क्षेत्र में सिमित अवसरों का उपयोग अभिजात वर्ग और मिडिल क्लास के लोग ही कर सकें। जब तक स्कूली क्षेत्र में दोहरी शिक्षा प्रणाली खत्म नहीं होगी, तब तक शिक्षा की स्थिति में सुधार नहीं होगा। लेकिन यह सब पुराने आदर्शों की बातें हैं। इन पर अमल करने की नीयत और इच्छा समाज के प्रभु वर्ग में दूर-दूर तक नहीं दिखाई देती। इसलिए निकट भविष्य में शिक्षा के क्षेत्र में किसी सुधार की उम्मीद करना बेमानी है।
(संपादन : नवल/अनिल)
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