मेरे एक पत्रकार दोस्त ने 2017 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों में हफ्तों घूमने के बाद कहा था कि इस चुनाव के बाद कोई भी पार्टी और नेता सच्चर कमेटी का नाम नहीं लेंगे क्योंकि ऐसा करने पर उन्हें देशद्रोही घोषित कर दिए जाने का डर रहेगा।
2019 और 2024 में लोकसभा चुनाव से देश गुज़र चुका है और उसके अलावा इस दौरान कई राज्यों के चुनाव भी हो चुके हैं, जिनमें मेरे पत्रकार मित्र की इस भविष्यवाणी को सच साबित होते हुए देखा गया। सेक्युलर कही जाने वाली कोई भी पार्टी अब सच्चर कमेटी की सिफारिशों पर बात नहीं करती। यह एक आम सहमति से किया जा रहा व्यवहार दिखता है, जिसमें एक तरफ सेक्युलर राजनीतिक दल और दूसरी तरफ मुस्लिम तबक़ा ख़ुद है। पहले हिस्से को लगता है कि सच्चर कमेटी का नाम लेने से बहुसंख्यक हिंदू नाराज़ हो जाएंगे तो दूसरी ओर मुस्लिम समुदाय को लगता है कि इस पर बात करना फिलहाल समझदारी नहीं है।
इस तरह मुसलमानों के सर्वांगीण विकास के लिए की गई सिफ़ारिशें एक ख़राब रणनीतिक मुद्दा बन गईं, जिसपर चुप रहना समझदारी मान ली गई। दूसरे शब्दों में कहें तो मुसलमान स्वाभाविक नागरिक होने के बजाए एक रणनीतिक समुदाय में बदल गया, जिसके हितों के साथ समझौता ख़ुद उसकी सहमति से किया जा सकता है। ऐसा आपको कोई और जाति या वर्ग भारत में नहीं मिलेगा।
लोगों के समूह का एक रणनीतिक वर्ग में तब्दील होने के साथ ही राज्य का लोकतांत्रिक चरित्र भी ‘सिक्योरिटी स्टेट’ में बदल जाता है, जिसके तहत अंत में बहुसंख्यक वर्ग ख़ुद को देश और अल्पसंख्यक वर्ग को देश को मिलने वाली चुनौती मानने लगता है। इसीलिए हम देखते हैं मोदी या योगी के ख़िलाफ़ टिप्पणियों को उनके समर्थक देश और उनके धर्म के ख़िलाफ़ टिप्पणी बताते हैं।
मुसलमानों की इस आत्मघाती ‘समझदारी’ से हुए नुकसान को समझने से पहले यह याद रखना ज़रूरी है कि हमारे संविधान ने नए आज़ाद हुए देश, जिसमें सैकड़ों जातियां और वर्ग हैं, के लिए जो सबसे बुनियादी लक्ष्य निर्धारित किया वो था लोगों को नागरिक बनाना। डॉ. आंबेडकर ने संविधान सभा के भाषणों में इस बात को स्पष्ट किया था कि हम अभी देश नहीं बने हैं, बल्कि देश बनने की प्रक्रिया में हैं। यह प्रक्रिया लोगों को नागरिक में तब्दील करने की ही थी।

लोगों के नागरिक बनने की प्रक्रिया से ही भारतीय लोकतंत्र को विकसित होना था। इसलिए लोकतंत्र विरोधी शक्तियों ने शुरू से ही लोगों के नागरिक बनने की प्रक्रिया को रोकने और बाधित करने का प्रयास किया। इसके कुछ उदाहरण देखे जा सकते हैं। पहला, हिंदू कोड बिल का विरोध आरएसएस, जनसंघ और हिंदू महासभा ने इसलिए किया कि उसने हिंदू महिलाओं को नागरिक इकाई के बतौर स्वीकार किया। इसी नाराज़गी में आरएसएस द्वारा नेहरू और डॉ. आंबेडकर का पुतला फूंका गया। डॉ. आंबेडकर के दिल्ली स्थित सरकारी आवास पर हमला हुआ और 1952 के पहले लोकसभा चुनाव में कांग्रेस विरोधी दक्षिणपंथी मोर्चा बनाया गया। इसके दो और छुपे हुए एजेंडे भी थे– पहला, शूद्रों को मंदिर प्रवेश के अधिकार का विरोध और अस्पृश्यता निवारण क़ानून का विरोध।
दूसरा, मंडल कमीशन की सिफारिशों के लागू होने से पिछड़ों की राजनीतिक पहचान परंपरागत हिंदू दायरे से बाहर निकलने के ख़तरे को भांप कर ही आरएसएस और भाजपा ने ‘कमंडल’ का मुद्दा उठाया, जिसका मकसद बहुसंख्यक पिछड़े हिंदुओं को स्वतंत्र वर्गीय पहचान बनाने से रोकते हुए उन्हें धार्मिक हिंदू अवधारणा में बनाए रखना था। यह हुआ भी। समय के साथ मंडल का बड़ा हिस्सा कमंडल में विलीन हो गया।
यानी स्पष्ट तौर पर हम कह सकते हैं कि आरएसएस और भाजपा का मुख्य लक्ष्य बहुसंख्यक समाज को धार्मिक हिंदू पहचान के दायरे में रखना और उन्हें नागरिक की तरह सोचने से रोकना है। इसी तरह जब राजनीतिक दल और मुसलमान सच्चर कमेटी, या रंगनाथ समिति की सिफारिशों पर हुए अमल की समीक्षा के लिए बने अमिताभ कुंडू कमेटी की रिपोर्ट पर बात नहीं करते तो उसका सीधा परिणाम होता है कि मुसलमान नागरिक के बतौर सोचना बंद करने लगते हैं, जिससे वे संख्या में कम होने की कुंठा से ग्रस्त एक डरे हुए धार्मिक समुदाय में बदल जाते हैं।
यह याद रखना चाहिए कि हिंदुत्ववादी राजनीति को मुसलमानों के मुसलमानों की तरह सोचने से कोई दिक्कत नहीं है। उसे दिक़्क़त बस मुसलमानों के नागरिक की तरह सोचने से है। इस तथ्य की ऐसे भी तस्दीक की जा सकती है कि डॉ. आंबेडकर के अभियानों ने दलितों को नागरिक की तरह सोचने को प्रेरित किया। अगर वे उन्हें पारंपरिक हिंदू धार्मिक पहचान के अधीन सोचने को प्रेरित करते तो आरएसएस और भाजपा को उनसे कोई दिक्कत नहीं होती। किसी व्यक्ति या समुदाय को नागरिक बनाना आरएसएस और भाजपा की नज़र में कितना बड़ा अपराध है, इसे आसपास डॉ. आंबेडकर की मूर्तियों के तोड़े जाने की घटनाओं से समझा जा सकता है।
इसीलिए आज मुसलमानों की बदहाली की बड़ी वजह उनका नागरिक की तरह न सोच पाना है। इसमें डरे हुए नेताओं और नादान धर्मगुरुओं की बड़ी भूमिका है। मसलन, एक मुस्लिम धर्मगुरु ने पिछले दिनों यह बयान दिया कि जनगणना में मुसलमानों को अपनी जाति के बजाए सिर्फ़ मुसलमान लिखना चाहिए, जबकि ऐसा करना सीधे-सीधे अपने संवैधानिक वर्गीय पहचान को खोना होगा, क्योंकि जातिगत पहचान जिसे ओबीसी, एससी, एसटी और जनरल में विभाजित किया गया है, संविधान द्वारा निर्धारित पहचान है, जो अलग-अलग धर्मों के लोगों के कुछ हिस्सों को आर्थिक, सामाजिक और शैक्षणिक स्तर पर एक जैसे नागरिक हैसियत का मानकर एकजुट करता है। जैसे ही आप इस संवैधानिक स्थिति को नकारते हैं वैसे ही आप सिर्फ़ ‘मुसलमान’ की पहचान ओढ़ लेते हैं जिसका फ़ायदा उठाकर आरएसएस हिंदू पिछड़ों और दलितों को भी हिंदू धार्मिक पहचान में घेर लेता है। यानी अगर मुसलमान नागरिक के बजाए अपनी धार्मिक पहचान पर ज़ोर देंगे तो हिंदू भी नागरिक के बजाए अपनी धार्मिक पहचान के आधार पर प्रतिक्रिया करेंगे। इससे संविधान द्वारा निर्धारित आपसी वर्गीय चेतना कमज़ोर होगी। यानी डॉ. आंबेडकर के नज़रिए से कहें तो ऐसा करके हम देश बनने की प्रक्रिया को उलट रहे होंगे।
सच्चर कमेटी की एक अहम सिफारिश की रौशनी में हम मुसलमानों के नागरिक की तरह न सोच पाने के कारण हुए नुक़सान को उदाहरण के बतौर देख सकते हैं। 2006 यानी 20 साल पहले आई सच्चर कमेटी की सिफारिश थी कि “चुनाव क्षेत्र के परिसीमन प्रक्रिया में इस बात का ध्यान रखा जाए कि अल्पसंख्यक बहुल इलाक़ों को अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित न किया जाए।” यानी अगर सिर्फ़ इसी मुद्दे पर मुस्लिम समुदाय सेक्युलर पार्टियों से लड़ता तो उसे नगीना जैसी कई सीटों से अपने समाज के प्रत्याशियों को जिताने का अवसर मिल जाता, जहां उसकी आबादी 46 प्रतिशत है और दलित समाज की आबादी 22 प्रतिशत होने के बावजूद सीट सुरक्षित कर दी गई है। इससे संसद और विधान सभाओं में मुसलमानों की भागीदारी बढ़ती। सबसे अहम कि कोई भी सेक्युलर दल इसका विरोध नहीं कर पाता। यह नहीं भूलना चाहिए कि जिस तरह मंडल कमीशन की सिफारिशों ने पिछड़ों को केंद्र में लाकर राजनीति को बदला, सच्चर कमेटी और रंगनाथ आयोग की रपटें भी मुसलमानों को केंद्रीय भूमिका में लाकर देश की राजनीति को बदल सकने का माद्दा रखती हैं। लेकिन इसके लिए मुसलमानों को नागरिक की तरह सोचना शुरू करना होगा।
इसीलिए आरएसएस पर जब देश को तोड़ने का आरोप लगता है तो उसका मतलब यह नहीं होता कि वह राज्यों को तोड़ रहा है। वह दरअसल, हमें और आपको नागरिक की तरह व्यवहार करने के बजाए धार्मिक आधार पर व्यवहार करने का दबाव डालता है। याद रहे एक नागरिक के बतौर कोई भी दूसरे नागरिक से असहमत तो हो सकता है, उसके ख़िलाफ़ हिंसा नहीं कर सकता। हिंसक होने के लिए नागरिक से भीड़ बनना ज़रूरी होता है। भाजपा का अस्तित्व ही नागरिक चेतना के क्षरण पर टिका है। यह चाहे हिंदुओं में हो या मुसलमानों में। इसीलिए तमाम विपरीत स्थितियों और दबावों का सामना करते हुए भी नागरिक की तरह सोचना बंद नहीं किया जा सकता।
(संपादन : नवल/अनिल)
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