पश्चिम बंगाल की आदिवासी आरक्षित सीटों पर हालिया चुनावी परिदृश्य एक जटिल, बहुस्तरीय और विचारोत्तेजक तस्वीर प्रस्तुत करता है। एक ओर आदिवासी महिलाओं की बढ़ती हुई राजनीतिक भागीदारी, दूसरी ओर चुनावी परिणामों में एकतरफा सत्ता-संतुलन, और तीसरी ओर इन सीटों की भौगोलिक विविधता, जो इस पूरे परिदृश्य को और अधिक गहराई प्रदान करती है। यदि इन तीनों आयामों, भागीदारी, परिणाम और भूगोल, को एक साथ रखकर देखा जाए, तो यह स्पष्ट हो जाता है कि आदिवासी प्रतिनिधित्व का प्रश्न केवल संख्या या सीटों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सत्ता, विचारधारा और आदिवासी राजनीति के जटिल अंतर्संबंधों से जुड़ा हुआ है।
वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार पश्चिम बंगाल में आदिवासियों की कुल जनसंख्या 52,98,953 और विधानसभा के लिए आरक्षित सीटों की संख्या सिर्फ 16 है। निर्वाचन आयोग, भारत सरकार द्वारा जारी आंकड़ों के अनुसार, 16 आदिवासी आरक्षित सीटों में से 10 पर कुल 23 आदिवासी महिलाएं चुनाव मैदान में थीं। इनमें से 19 विभिन्न राजनीतिक दलों से थीं, जबकि 4 निर्दलीय के रूप में उतरीं। जिन सीटों पर आदिवासी महिलाओं ने भागीदारी की, वे हैं– मदारीहाट (जीएसपी), माल (निर्दलीय 2), फांसीदेवा (तृणमूल, सीपीआई [एम-एल], कांग्रेस, एसयूसीआई (वामपंथी), एजेयूपी, निर्दलीय), तपन (तृणमूल), संदेशखाली (तृणमूल), केशियारी (सीपीएम), बिनपुर (तृणमूल, कांग्रेस), मानबाजार (भाजपा, तृणमूल, सीपीएम, कांग्रेस), रानीबांध (तृणमूल, सीपीएम, कांग्रेस) और रायपुर (तृणमूल, कांग्रेस)।
राजनीतिक दलों के स्तर पर देखें तो तृणमूल कांग्रेस ने 7 आदिवासी महिला उम्मीदवारों को टिकट दिया, कांग्रेस ने 4 को, और वामपंथी दलों में सीपीएम ने 3, जबकि एसयूसीआई और सीपीआई (एम-एल) ने 1-1 आदिवासी महिला उम्मीदवार उतारी। इसके अतिरिक्त, भाजपा, एजेयूपी और जीएसपी ने भी 1-1 आदिवासी महिला उम्मीदवार को मैदान में उतारा। विशेष रूप से राष्ट्रीय दलों के संदर्भ में यह तथ्य उल्लेखनीय है कि सत्ताधारी भाजपा ने केवल 1 आदिवासी महिला को टिकट दिया, जबकि कांग्रेस ने 4 और वामपंथी धारा की पार्टियों – सीपीएम, एसयूसीआई और सीपीआई (एम-एल) – ने मिलकर कुल 5 महिलाओं को मैदान में उतारा। यह आंकड़ा स्वयं में इस बात का गवाह है कि महिला प्रतिनिधित्व को लेकर विभिन्न दलों की प्राथमिकताएं और रणनीतियां कितनी भिन्न हैं।
फांसीदेवा सीट पर सर्वाधिक – 6 आदिवासी महिला उम्मीदवारों – की उपस्थिति इस बात की ओर संकेत करती है कि जिन क्षेत्रों में आदिवासी राजनीतिक संघर्ष की परंपरा ऐतिहासिक रूप से सुदृढ़ रही है, वहां महिलाओं की भागीदारी भी अपेक्षाकृत अधिक सशक्त रूप में सामने आई है। फांसीदेवा का सामाजिक-राजनीतिक इतिहास इस संदर्भ में विशेष महत्व रखता है। यह वही क्षेत्र है जहां आदिवासी बटाईदारों के भू-अधिकार संघर्ष ने न केवल स्थानीय सत्ता-संतुलन को चुनौती दी, बल्कि भारतीय राजनीति की दिशा को भी निर्णायक रूप से प्रभावित किया। 1967 के उस विश्व-प्रसिद्ध नक्सलबाड़ी आंदोलन में, जिसे व्यापक रूप से एक बड़े किसान-आदिवासी उभार के रूप में देखा गया, आदिवासी महिलाएं न केवल सहभागी थीं, बल्कि वे अग्रिम मोर्चे पर खड़ी नेतृत्वकारी शक्ति के रूप में उभरी थीं। आज फांसीदेवा में बड़ी संख्या में आदिवासी महिला उम्मीदवारों की उपस्थिति उसी ऐतिहासिक विरासत और संघर्षशील चेतना की निरंतरता के रूप में देखी जा सकती है।

लेकिन आदिवासी महिलाओं की इस उत्साहजनक भागीदारी के बावजूद चुनावी परिणाम एकदम विपरीत दिशा में खड़े दिखाई देते हैं। कुल 23 आदिवासी महिला उम्मीदवारों में से केवल एक, वह भी भाजपा से, मानबाजार सीट पर विजयी हो सकी। और व्यापक परिप्रेक्ष्य में देखा जाए तो सभी 16 आदिवासी आरक्षित सीटों पर भाजपा की जीत हुई। यह तथ्य केवल एक चुनावी परिणाम नहीं है, बल्कि यह सत्ता के केंद्रीकरण और हिंदू विचारधारा के विस्तार का संकेत भी है, जिसे आदिवासी दृष्टि से गंभीरता से समझने की आवश्यकता है।
यहां यह समझना भी आवश्यक है कि ये 16 सीटें भौगोलिक रूप से एकरूप नहीं हैं, बल्कि चार अलग-अलग भू-क्षेत्रों में फैली हुई हैं, जिनकी सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियां और जीवन-यापन के तरीके भी भिन्न हैं। उत्तर बंगाल के तराई और डुआर्स क्षेत्र – जैसे कुमारग्राम, कालचीनी, मदारीहाट, माल और नगराकाटा – मुख्यतः चाय बागानों के लिए जाने जाते हैं। यहां आदिवासी समुदायों की बड़ी आबादी पीढ़ियों से चाय बागानों में मजदूरी करती आई है। इन इलाकों में जीवन का केंद्र श्रम, मजदूरी, जमीन पर अधिकार, बागानों की स्थिति और विस्थापन जैसे प्रश्नों के इर्द-गिर्द घूमता है। फांसीदेवा जैसे क्षेत्र इस भूगोल का संक्रमण क्षेत्र हैं, जहां चाय बागान और कृषि, दोनों का मिश्रण दिखाई देता है।
इसके विपरीत, तपन और हबीबपुर जैसे क्षेत्र कृषि-प्रधान ग्रामीण इलाकों का प्रतिनिधित्व करते हैं, जहां आदिवासी समुदाय छोटे किसान या खेत मजदूर के रूप में अपनी आजीविका चलाते हैं। यहां के मुद्दे भूमि, सिंचाई, कृषि उत्पादकता और ग्रामीण रोजगार से जुड़े होते हैं। वहीं संदेशखाली, जो सुंदरबन के डेल्टा क्षेत्र में स्थित है, पूरी तरह भिन्न पारिस्थितिकी प्रस्तुत करता है – नदी, ज्वार-भाटा, मैंग्रोव जंगल और चक्रवातों से जूझता हुआ जीवन। यहां आदिवासी और स्थानीय समुदायों का अस्तित्व जल, जंगल और जलवायु पर निर्भर है।
पश्चिमी भाग में स्थित जंगलमहल – जिसमें नयाग्राम, केशियारी, बिनपुर, बंदवान, मानबाजार, रानीबांध और रायपुर जैसी सीटें आती हैं – एक अलग ही भूगोल रचता है। यह क्षेत्र झारखंड से सटा हुआ पठारी और वन क्षेत्र है, जहां आदिवासी समाज की ऐतिहासिक उपस्थिति और सांस्कृतिक गहराई सबसे अधिक दिखाई देती है। यहां के जीवन का केंद्र जल-जंगल-जमीन है, और यहां के राजनीतिक प्रश्न भी इन्हीं के इर्द-गिर्द घूमते हैं– वनाधिकार, खनन, विस्थापन और विकास की असमानता।
इस प्रकार, जब हम देखते हैं कि इन सभी विविध भूगोलों में फैली 16 सीटों पर एक ही राजनीतिक दल की जीत हुई है, तो यह प्रश्न और भी गहरा हो जाता है कि क्या यह वास्तव में स्थानीय आकांक्षाओं का प्रतिनिधित्व है, या फिर एक सुनियोजित और व्यापक हिंदुत्ववादी राजनीतिक परियोजना का परिणाम। यह चिंता का विषय है, क्योंकि विभिन्न भू-क्षेत्रों की समस्याएं और प्राथमिकताएं भले ही अलग-अलग दिखती हैं, पर मूल समस्या एक ही है जिससे आदिवासी समुदाय औपनिवेशिक समय से ही संघर्ष करते आ रहे हैं। चुनाव के जरिए एकरूप राजनीतिक प्रभुत्व जो मूल रूप से धार्मिक-सांस्कृतिक वर्चस्व की परियोजना के लिए है, न केवल इन विविधताओं को अनदेखा करता है, बल्कि मूल आदिवासी सवाल को गायब कर देता है।
महिला दृष्टिकोण से यह स्थिति और भी जटिल हो जाती है। एक ओर आदिवासी महिलाएं बढ़-चढ़कर चुनावी प्रक्रिया में भाग ले रही हैं, जो उनकी सामाजिक और राजनीतिक पहलकदमी के विस्तार का प्रमाण है। दूसरी ओर, उनकी जीत की संभावना अत्यंत सीमित बनी हुई है। यह स्थिति ‘प्रतीकात्मक प्रतिनिधित्व’ और ‘वास्तविक सशक्तिकरण’ के बीच के अंतर को स्पष्ट करती है। महिलाओं को टिकट देकर दल अपनी समावेशी छवि प्रस्तुत करते हैं, लेकिन उन्हें जीतने योग्य परिस्थितियां – जैसे पर्याप्त संसाधन, संगठनात्मक समर्थन और राजनीतिक सुरक्षा – प्रायः उपलब्ध नहीं कराते।
विशेष रूप से यह तथ्य कि सत्ताधारी भाजपा ने केवल एक आदिवासी महिला उम्मीदवार को टिकट दिया और वही एकमात्र विजेता भी रही, इस बात की ओर संकेत करता है कि महिला प्रतिनिधित्व उस दल की रणनीति में सीमित स्थान रखता है। इसके विपरीत, कांग्रेस और वामपंथी दलों ने अधिक महिलाओं को मैदान में उतारा, लेकिन उनकी हार यह दर्शाती है कि केवल उम्मीदवारों की संख्या बढ़ाने से परिणाम नहीं बदलते, जब तक कि व्यापक राजनीतिक संतुलन और संगठनात्मक शक्ति उनके पक्ष में न हो।
आदिवासी दृष्टि से यह चुनावी परिदृश्य एक चेतावनी भी है और एक अवसर भी। चेतावनी इस अर्थ में कि यदि आदिवासी समाज अपनी राजनीतिक दिशा और नेतृत्व को मजबूत नहीं करता, तो बाहरी राजनीतिक शक्तियां और विचारधाराएं उसके प्रतिनिधित्व को नियंत्रित करती रहेंगी। और अवसर इस अर्थ में कि बढ़ती हुई महिला भागीदारी एक नई संभावित दिशा की ओर संकेत करती है – जहां आदिवासी महिलाएं केवल चुनावी प्रक्रिया का हिस्सा नहीं, बल्कि उसके केंद्र में आने की कोशिश कर रही हैं। लेकिन उनका आना अगर हिंदुत्ववादी राजनीति के रास्ते से होगा तो, उनके आने का कोई आदिवासी अर्थ नहीं रह जाएगा।
इसे इस संदर्भ में भी देखा जाना चाहिए कि जब चुनाव वास्तविक जनतांत्रिक मूल्यों की बजाय बहुमत की संख्यात्मक अवधारणा पर आधारित होते हैं, तो वे उन समुदायों की विशिष्ट आवाज़ों को मुख्य रंगमंच से बाहर धकेल देते हैं, जो संख्या में कम या राजनीतिक रूप से बिखरे हुए होते हैं। विशेषकर आदिवासी समाज को, जिसकी अपनी भाषा, संस्कृति, आस्था-प्रणालियां और जीवन-दृष्टि है, इस प्रक्रिया में धीरे-धीरे उस ढांचे में समाहित किया जाने लगता है, जो मूलतः उसके बाहर निर्मित हुआ है। इस समावेशन को ‘प्रतिनिधित्व’ का नाम दिया जाता है, परंतु यह प्रश्न बना रहता है कि क्या यह प्रतिनिधित्व वास्तव में आदिवासी समाज की स्वायत्तता और अस्तित्व को सशक्त करता है, या उसे एक व्यापक धार्मिक-राजनीतिक परियोजना के भीतर समाहित कर देता है।
2014 के बाद के राष्ट्रीय परिदृश्य को देखें, तो यह प्रवृत्ति और अधिक स्पष्ट रूप से सामने आती है, जहां बहुसंख्यक धर्म पर आधारित राजनीतिक शक्ति चुनावी बहुमत के सहारे सत्ता में आई हैं और उसने विभिन्न संस्थाओं को अपनी वैचारिक दिशा में मोड़ दिया है। इस स्थिति में धार्मिक और सांस्कृतिक अल्पसंख्यकों – जिनमें आदिवासी समुदाय भी शामिल है – के अधिकारों और अस्तित्व के प्रश्न और अधिक जटिल हो जाते हैं।
इसी संदर्भ में यह समझना आवश्यक है कि हिंदुत्ववादी शक्तियां आदिवासी समाज के प्रति जिस दीर्घकालिक परियोजना पर कार्य कर रही हैं, पश्चिम बंगाल का चुनाव उससे अलग नहीं है। यह सर्वविदित है कि 1940 के दशक से ही आदिवासियों को एक व्यापक ‘हिंदू’ पहचान के भीतर समाहित करने के प्रयास लगातार होते रहे हैं। यह प्रक्रिया केवल धार्मिक नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और राजनीतिक भी है, जिसमें आदिवासी जीवन-दृष्टि, उनके देवी-देवता, प्रकृति-आधारित आस्थाएं और सामुदायिक परंपराएं एक बड़े सांस्कृतिक ढांचे में पुनर्परिभाषित की जाती हैं।
इसके विपरीत, भारत का आदिवासी समाज – चाहे वह लाखों की आबादी वाले मुंडा, संताल, भील और गोंड जैसे समुदाय हों, या फिर अंडमान-निकोबार के अत्यंत छोटे समुदाय जैसे शोम्पेन – अपने पुरखा क्षेत्रों, जल-जंगल-जमीन और सांस्कृतिक अस्तित्व की रक्षा के लिए लगातार संघर्षरत रहा है। यह संघर्ष केवल संसाधनों की रक्षा का नहीं, बल्कि अस्तित्व और अधिकार का संघर्ष है। यही कारण है कि आदिवासी समाज लंबे समय से अपने लिए अलग धर्म-कोड की मांग भी करता रहा है, ताकि उसकी विशिष्ट धार्मिक-सांस्कृतिक उपस्थिति संवैधानिक तौर पर स्थापित हो सके।
पश्चिम बंगाल के चुनावी संदर्भ में यह पूरा विमर्श और अधिक प्रासंगिक हो जाता है। यहां एक ओर आदिवासी महिलाओं की बढ़ती हुई चुनावी भागीदारी है, जो उनकी राजनीतिक पहलकदमी और नेतृत्व की आकांक्षा को दर्शाती है; वहीं दूसरी ओर चुनावी परिणाम हैं, जो एक ऐसी हिंदूत्ववादी राजनीतिक शक्ति के प्रभुत्व को स्थापित करते हैं, जिसकी वैचारिक दिशा आदिवासी जीवन-दृष्टि से कई स्तरों पर टकराती है। इस विरोधाभास को समझे बिना आदिवासी प्रतिनिधित्व के प्रश्न को समग्र रूप में नहीं देखा जा सकता।
इसलिए यह आवश्यक है कि चुनाव को केवल लोकतांत्रिक उत्सव के रूप में न देखकर, उसे एक सामाजिक-राजनीतिक प्रक्रिया के रूप में समझा जाए, जिसमें सत्ता, संख्या और सांस्कृतिक अस्तित्व – सभी आपस में जुड़े हुए हैं। आदिवासी दृष्टि से यह समझना और भी जरूरी है, क्योंकि उनके लिए चुनाव केवल प्रतिनिधि चुनने का माध्यम नहीं, बल्कि अपना अस्तित्व, अधिकार और भविष्य की दिशा तय करने का एक निर्णायक क्षण भी है।
यह आवश्यक है कि इस भागीदारी को केवल संख्या तक सीमित न रखा जाए, बल्कि इसे वास्तविक जनतंत्र में बदला जाए। इसके लिए जमीनी स्तर पर राजनीतिक संगठन, नेतृत्व निर्माण, और सामुदायिक एकजुटता को बढ़ावा देना होगा। साथ ही, आदिवासी महिलाओं के अपने वास्तविक मुद्दों – जल, जंगल, जमीन के साथ-साथ आजीविका, स्वास्थ्य और शिक्षा – को चुनावी विमर्श के केंद्र में लाना होगा।
पश्चिम बंगाल की ये 16 आदिवासी सीटें, जिन पर भाजपा को जीत मिली है, हमें यह सिखाती हैं कि आदिवासियों के लिए प्रतिनिधित्व केवल चुनावी जीत या हार का प्रश्न नहीं है, बल्कि यह उस व्यापक प्रक्रिया का हिस्सा है जिसमें समाज अपनी आवाज़, अपनी पहचान और अपने भविष्य को गढ़ता है। जब तक इस प्रक्रिया में आदिवासी समाज – विशेषकर महिलाएं – सशक्त, संगठित और आत्मनिर्भर नहीं होंगी, तब तक राजनीतिक भागीदारी का यह विस्तार अधूरा ही रहेगा।
(संपादन : नवल/अनिल)
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