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‘जीते जी इलाहाबाद’ में दलित-बहुजनों के सवालों को नहीं देख सकीं ममता कालिया

जहां एक तरफ़ इलाहाबाद के सामाजिक यथार्थ की बात करने से गुरेज़ किया गया है, वहीं लेखिका इस शहर के प्रति गहरे ‘नॉस्टेल्जिया’ में डूबी हुई नज़र आती हैं। इलाहाबाद का संस्मरण लिखने का शायद यह बेहतर तरीक़ा नहीं है कि हम शहर के प्रति इतने भावुक हो जाएं, मानो इलाहाबाद इस दुनिया से बिल्कुल अलग कोई जगह हो। पढ़ें, यह आलेख

ममता कालिया हिंदी साहित्य की जानी-मानी रचनाकार हैं। पिछले सात दशकों से वे निरंतर सक्रिय रही हैं और उनके द्वारा लिखित लगभग तीन दर्जन पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। कहानी, उपन्यास, कविता और निबंध जैसे साहित्य की लगभग सभी प्रमुख विधाओं में उन्होंने अपनी उपस्थिति दर्ज की है। लगभग पांच वर्ष पूर्व उनका संस्मरण ‘जीते जी इलाहाबाद’ प्रकाशित हुआ। हाल के सालों में साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किए जाने के बाद इस संस्मरण के बारे में अदबी दुनिया में चर्चा और भी तेज़ हो गई। स्वाभाविक रूप से, पाठकों – विशेषकर सामाजिक न्याय के प्रति प्रतिबद्ध और हिंदी साहित्य के लोकतंत्रीकरण के पक्षधर तबकों – में इस पुस्तक को लेकर विशेष अपेक्षाएं थीं कि यह किताब इलाहाबाद की अदबी और तालीमी दुनिया के भीतर सवर्ण वर्चस्व के वास्तविक चेहरे को बेनक़ाब करेगी। लेकिन यह कृति उन अपेक्षाओं पर खरी नहीं उतरती है और बहुजन पाठकों को मायूस करती है।

इलाहाबाद उत्तर प्रदेश का एक ऐसा शहर है जहां दलित और अन्य वंचित तबक़े बड़ी तादाद में रहते हैं, मगर संसाधनों और सांस्कृतिक संस्थानों पर क़ब्ज़ा सवर्णों का है। आश्चर्य यह है कि लगभग दो सौ पृष्ठों में फैले ममता कालिया के इस संस्मरण में ये बुनियादी सामाजिक सच्चाइयां जगह नहीं बना पातीं और “प्रगतिशील” लेखिका जाति के प्रश्न पर लगभग ख़ामोशी बरतती हैं। उनकी यह चुप्पी तब और अधिक अर्थपूर्ण हो जाती है, जब हम देखते हैं कि लेखिका मुस्लिम समुदाय के साथ अपने संबंधों का उल्लेख और ईद के मौक़े पर कबाब खाने का ज़िक्र तो करती हैं, मगर इलाहाबाद की साहित्यिक दुनिया में दलित लेखक और दलित साहित्य इस संस्मरण में जगह नहीं बना पाते।

यह बात शहर से बाहर रहने वाले लोग भी जानते हैं कि इलाहाबाद विश्वविद्यालय में बहुजन छात्र बड़ी संख्या में अध्ययनरत हैं, जो हिंदी साहित्य के एक महत्वपूर्ण पाठक-वर्ग का निर्माण करते हैं, लेकिन उनके संघर्षों पर कोई गंभीर चर्चा कालिया जी के संस्मरण में नहीं मिलती। यह सर्वविदित है कि विश्वविद्यालय के शैक्षणिक और प्रशासनिक ढांचे में सवर्ण जातियों का वर्चस्व बना हुआ है, और शहर के प्रमुख हिंदी साहित्यकारों की दुनिया भी प्रायः सवर्ण पुरुषों के इर्द-गिर्द केंद्रित दिखती है। ऐसे में, इस संस्मरण में साहित्यिक और शैक्षणिक संस्थानों में जाति के प्रश्न की उपेक्षा केवल एक साधारण चूक नहीं लगती।

यह प्रश्न भी स्वाभाविक रूप से उठता है कि जहां ‘सिविल लाइंस’ जैसे ‘पॉश’ इलाक़ों के खान-पान और बाज़ार का विस्तार से संस्मरण में वर्णन मिलता है, वहीं लेखिका के मन में यह सवाल क्यों नहीं उठता कि आखिर ‘सिविल लाइंस’ की अधिकांश बड़ी-बड़ी कोठियों की ‘नेम-प्लेटों’ पर प्रायः सवर्ण ‘सरनेम’ ही क्यों दिखाई देते हैं?

‘नॉस्टेल्जिया’ बनाम सामाजिक यथार्थ

ममता कालिया अपने संस्मरण की शुरुआत सिविल लाइंस से करती हैं। पहली ही पंक्ति में लोकभारती प्रकाशन का ज़िक्र आता है, जो “लेखकों, पाठकों और दोस्तों-दुश्मनों का सबसे बड़ा अड्डा था।”[1] धीरे-धीरे लेखिका शहर के प्रकाशकों, प्रिंटिंग प्रेसों, पत्रिकाओं, लेखकों, बाज़ारों, कॉफ़ी हाउसों तथा खाने-पीने के होटलों और ढाबों की दुनिया से पाठकों को परिचित कराती हैं। जगह-जगह लेखकों के आर्थिक संघर्षों का भी उल्लेख मिलता है– “इलाहाबाद में चार-पांच रचनाकारों को छोड़कर बाक़ी सब मुफ़लिसी के मारे थे।”[2] यहां तक कि लेखकों के बीच आपसी प्रतिद्वंद्विता और एक-दूसरे को कमतर साबित करने की प्रवृत्ति का भी वर्णन मिलता है– “इलाहाबाद में ऐसी [लेखकों के दरम्यान] अदावतें होती रहती हैं। अदावतों में प्रतिभा की टक्कर होती है।”[3] मगर जो बात जातिगत भेदभाव और सामाजिक वर्चस्व के संदर्भ में सामने आनी चाहिए थी, वह पूरी किताब से लगभग नदारद है।

इसकी एक बड़ी वजह यह है कि हिंदी साहित्य के प्रगतिशील लेखकों का एक बड़ा तबका, दक्षिणपंथी लेखकों की तरह ही, जाति के प्रश्न पर खुलकर बात नहीं करना चाहता। राष्ट्रवाद – चाहे वह सांप्रदायिक राष्ट्रवाद हो या तथाकथित प्रगतिशील राष्ट्रवाद – की पिच पर सवर्ण लेखकों को बैटिंग करना अधिक आसान लगता है। इसकी वजह यह भी है कि हिंदी साहित्य के अधिकांश नामचीन लेखक उत्तर भारत, ख़ासकर यूपी और बिहार के सवर्ण समाज से आने वाले पुरुष रहे हैं, जो जाति के प्रश्न को केंद्र में लाने से बचते रहे हैं।

इतना ही नहीं, प्रगतिशील और दक्षिणपंथी – दोनों तरह के सवर्ण लेखकों ने साहित्य में सामाजिक न्याय के प्रश्न को दबाने के लिए अलग-अलग विमर्शों को आगे बढ़ाया है। प्रगतिशील तबका आर्थिक शोषण की प्रधानता की दुहाई देता है, जबकि दक्षिणपंथी तबका ‘मेरिट’ के शोर में बहुजन लेखकों की आवाज़ को दबाने का प्रयास करता है। रही बात आर्थिक शोषण के महत्व की तो इससे इंकार नहीं किया जा सकता है, लेकिन ये तथाकथित प्रगतिशील लेखक भी आर्थिक पहलू का सहारा लेकर जाति-आधारित भेदभाव की ज़मीनी सच्चाई को नज़रअंदाज़ करने लगते हैं। इसके पीछे उनका वास्तविक उद्देश्य आर्थिक बराबरी हासिल करना नहीं, बल्कि अपने और अपनी जातियों के निजी वर्चस्व तथा स्वार्थों की रक्षा करना होता है।

कुछ ऐसी ही प्रवृत्ति इस संस्मरण में भी दिखाई देती है, जहां लेखिका आर्थिक शोषण से लेकर लेखकों की आपसी अदावतों तक की चर्चा तो करती हैं, मगर पूरी किताब में दलित साहित्य, दलित लेखकों के शोषण और बहुजन लेखकों के संघर्ष का उल्लेख लगभग ग़ायब है। हां, यह ज़रूर है कि एक जगह लेखिका चलते-चलते यह पंक्ति लिखती हैं कि शहर के “विश्वविद्यालय की प्राध्यापकी जिसमें हरदम ठाकुर-ब्राह्मण घमासान मचा रहता व जिसका फ़ायदा कायस्थ अभ्यर्थी ले जाते।”[4] मगर इस अहम सामाजिक सच्चाई पर वे वैसा ठहरकर विश्लेषण नहीं करतीं, जिस चाव से और तफ़सील के साथ इलाहाबाद की दही-जलेबी, कुल्हड़ लस्सी और दम आलू का ज़िक्र करती हैं।

साहित्य अकादमी द्वारा पुरस्कृत ममता कालिया की किताब ‘जीते जी इलाहाबाद’ का मुख्य पृष्ठ

जहां एक तरफ़ इलाहाबाद के सामाजिक यथार्थ की बात करने से गुरेज़ किया गया है, वहीं लेखिका इस शहर के प्रति गहरे ‘नॉस्टेल्जिया’ में डूबी हुई नज़र आती हैं। इलाहाबाद का संस्मरण लिखने का शायद यह बेहतर तरीक़ा नहीं है कि हम शहर के प्रति इतने भावुक हो जाएं, मानो इलाहाबाद इस दुनिया से बिल्कुल अलग कोई जगह हो, जहां की हर बात ‘अनोखी’ हो और इतिहास का चक्र यहां आकर थम गया हो। दूसरे शब्दों में कहें तो लेखिका इलाहाबाद को कुछ इस तरह बयान करती हैं, गोया वह किसी दूसरे ग्रह पर बसा हुआ शहर हो– “शहर [इलाहाबाद] – पुड़िया में बांध कर हम नहीं ला सकते साथ, किंतु स्मृति बन कर वह हमारे स्नायुतंत्र में, हूक बन कर हमारे हृदयतंत्र में और दृश्य बन कर हमारी आंखों के छविगृह में चलता-फिरता नज़र आता है।”[5]

व्यक्तिगत संबंध बनाम साहित्यिक इतिहास

संस्मरण में लेखिका ने इलाहाबाद को हिंदी साहित्य के तमाम मशहूर लेखकों से जोड़ने में थोड़ी जल्दबाज़ी से काम लिया है।

इस बात से कोई इंकार नहीं कर सकता कि इलाहाबाद साहित्य प्रकाशन और उससे जुड़े सार्वजनिक गतिविधियों का एक बड़ा केंद्र रहा है। इसकी एक बड़ी वजह यह भी है कि आज़ादी के बाद सत्तावर्ग ने अन्य भारतीय भाषाओं के मुक़ाबले हिंदी को फ़रोग़ (बढ़ावा) देने में अग्रणी भूमिका निभाई, क्योंकि यूरोपीय संदर्भ की नक़ल करते हुए एक उभरते हुए राष्ट्र-राज्य के लिए एक भाषा की ज़रूरत महसूस की गई और हिंदी भाषा के चुनाव के पीछे राजनीतिक हस्तक्षेप, अन्य कई कारणों के साथ, एक अहम वजह था। हालांकि जिन इलाक़ों को हिंदी के नाम पर दिखलाया जाता है, उन्हें अगर उर्दू की सरज़मीन कहा जाए तो कुछ ग़लत नहीं होगा, क्योंकि हिंदी और उर्दू में लिपि के अलावा कोई बहुत बड़ा फ़र्क़ नहीं है।

यही वजह है कि इलाहाबाद आज़ादी के बाद से हिंदी पत्र-पत्रिकाओं और किताबों के प्रकाशन का एक बड़ा केंद्र रहा है। यहां तक तो बात ठीक है, मगर लेखिका इलाहाबाद की अदबी तारीख़ को और बड़ा करने के लिए उसके तार उन लेखकों से भी जोड़ देती हैं, जो इलाहाबाद में अतिथि के तौर पर साहित्यिक कार्यक्रमों में आते-जाते रहे हैं। ख़ुद लेखिका ने भी यह स्वीकार किया है कि ज्ञानरंजन, काशीनाथ सिंह और नामवर सिंह की कर्मभूमि क्रमशः जबलपुर, बनारस और दिल्ली रही है, मगर उनका “मन इलाहाबाद में ही रहता था” के बहाने लेखिका ने उन्हें भी इलाहाबादी बना दिया है। एक बात याद रहे कि हमारा यहां यह मक़सद नहीं है कि हम किसी को इलाहाबादी और ग़ैर-इलाहाबादी कहें। कार्ल मार्क्स को याद करते हुए हम कह सकते हैं कि जिस तरह मज़दूरों का कोई मुल्क नहीं होता, उसी तरह एक जनवादी लेखक को भी सही अर्थों में किसी शहर या किसी मुल्क की सरहद से बांधकर नहीं रखा जा सकता। इस वजह से किसी भी लेखक को किसी एक शहर के रंग में रंग देना बाज़ दफ़ा बहुत सारी पेचीदगियों को पैदा करता है।

इस संस्मरण का एक कमज़ोर पक्ष यह है कि लेखिका ने इलाहाबाद से जुड़े लेखकों के बारे में चर्चा करते हुए उनके साथ अपने व्यक्तिगत संबंधों पर ज़्यादा ‘फोकस’ किया है, जिसकी वजह से वह उन लेखकों की रचनाओं और साहित्य की राजनीति पर गहराई में जाकर कोई विश्लेषण नहीं कर पाई हैं। संस्मरण को पढ़कर ऐसा महसूस होता है मानो लेखिका इलाहाबाद आने वाले तमाम बड़े लेखकों को काफ़ी नज़दीक से जानती हों। इस किताब में लेखिका ने नामवर सिंह से लेकर शम्सुर्रहमान फ़ारूक़ी और भीष्म साहनी से लेकर फ़िराक़ गोरखपुरी तक की चर्चा की है, मगर संस्मरण में इन बड़ी हस्तियों के साथ उनके व्यक्तिगत संबंध के वाक़ये ज़्यादा सामने आते हैं। आसान शब्दों में कहें तो व्यक्ति-संबंधों की चर्चा ने साहित्य और राजनीति के संजीदा विमर्श को पीछे धकेल दिया है।

पूर्वाग्रह बनाम हकगोई

इस संस्मरण में जहां एक ओर लेखिका ने जाति के विमर्श को नज़रअंदाज़ किया है, वहीं संस्मरण पढ़ते वक़्त उनके पूर्वाग्रह भी सामने आते हैं। कई बार साहित्यकार राजनीतिक प्रश्नों पर चुप्पी साध लेते हैं, ताकि उनकी एक सर्वमान्य छवि बनकर उभरे, मगर वे यह भूल जाते हैं कि तथाकथित ‘निष्पक्षता’ नाम की रस्सी पर चलना किसी के लिए आसान नहीं होता। इसलिए वंचितों और कमज़ोरों के हक़ में खड़ा होना ही निष्पक्ष होने का सबसे बेहतर तरीक़ा हो सकता है। मगर कई बार बड़े-बड़े साहित्यकार ‘लिटरेचर फॉर लिटरेचर सेक’ के नाम पर स्वयं को तटस्थ रखने की कोशिश करते हैं, लेकिन वे यह भूल जाते हैं कि उनकी लेखनी कहीं-न-कहीं उनकी राजनीति को सामने ला ही देती है। यहां हम कालिया जी के संस्मरण से तीन मिसालें पेश करेंगे।

पहली, लेखिका 6 दिसंबर (1992) का ज़िक्र करती हैं। वह स्याह दिन जब हज़ारों की भीड़ के सामने सांप्रदायिक शक्तियों ने अल्पसंख्यक समाज के एक धार्मिक स्थल को मिस्मार कर दिया था। यह भारतीय लोकतंत्र को कलंकित करनेवाली घटना थी। उस दिन अयोध्या की बाबरी मस्जिद पर सिर्फ़ हथौड़े नहीं चले थे, बल्कि भारत के संविधान पर भी चोट पहुंचाई गई थी। राम मंदिर के नाम पर हिंदुत्व की ताक़तें पहले ही पूरे देश में नफ़रत का माहौल बना चुकी थीं और अल्पसंख्यक समाज को ख़ास तौर पर निशाना बनाया जा रहा था। हालांकि सांप्रदायिक उन्माद के लिए परोक्ष रूप से हिंदुत्ववादी ताक़तों को दोषी ठहराया जाता है, और यह सही भी है क्योंकि नफ़रत फैलाने में वही सबसे आगे थीं, मगर लेखिका ने जब यह लिखा कि “हमें फिर भी विश्वास था कि कांग्रेस के राज में अमन-चैन क़ायम रहेगा”[6], तो बड़ा आश्चर्य हुआ कि लेखिका इस पूरे मामले में तथाकथित सेक्युलर पार्टी की भूमिका को कैसे नज़रअंदाज़ कर सकती हैं! लेखिका इन प्रश्नों पर ख़ामोश रहीं कि बाबरी मस्जिद का ताला कांग्रेस के राज में ही खोला गया था और केंद्र में कांग्रेस सरकार रहते हुए ही बाबरी मस्जिद ढहाई गई थी।

राजनीतिक मामलों को छोड़ भी दिया जाए, तो लेखिका ने जिस अंदाज़ में 6 दिसंबर के रोज़ का संस्मरण लिखा है, वह भी काफ़ी विवादित है। वह लिखती हैं– “मैं खिड़की में खड़ी गली की तरफ़ देख रही थी कि बग़ल के मकान से एक जोड़ी हाथ निकले। हाथों में बड़ी-सी कैंची थी। पड़ोसी दर्जी भाई रईस अहमद ने टेलीफोन के खम्बे से हमारे घर के टेलीफोन तार काट दिए। मेरा कलेजा धक् हो गया।”[7] संस्मरण पढ़कर ऐसा लगता है मानो इलाहाबाद के अल्पसंख्यक इलाक़ों में रहने वाले बहुसंख्यक समाज के लोग ज़्यादा भयभीत थे, जबकि लेखिका ने इस बात पर कुछ भी नहीं लिखा कि शहर के बहुसंख्यक इलाक़ों में रहने वाले अकल्लियतों ने क्या महसूस किया होगा। किसी ने कहा है कि जहां रवि नहीं पहुंचता, वहां कवि पहुंच जाता है। इसलिए 6 दिसंबर के आसपास इलाहाबाद के अल्पसंख्यकों पर क्या बीती होगी, इसकी जानकारी लेखिका को न रही होगी, यह यक़ीन करना आसान नहीं है। और अगर उन्हें इस बात की जानकारी थी, तो फिर वह इस संस्मरण में उसके लिए जगह नहीं बना पाईं, यह और भी बड़े आश्चर्य की बात है।

दूसरी, लेखिका ने अपने संस्मरण में तेरह-चौदह साल के एक ‘पहाड़ी’ बच्चे जगदीश का ज़िक्र किया है। वह पहले किसी मिठाई की दुकान में काम करता था। बाद में लेखिका उस बच्चे को अपने घर नौकर के तौर पर रख लेती हैं। हालांकि लेखिका यह दावा करती हैं कि जगदीश हमारे यहां घर का ‘सदस्य’ बन गया था, मगर घर का वही सदस्य बच्चा जब दो साल से अपने घर नहीं गया है और वहां जाने के लिए अपने मालिक और मालकिन से अनुरोध करता है, तो मालकिन लेखिका, जिनसे यह उम्मीद थी कि उनके भीतर एक संवेदनशील दिल होगा, कठोरता के साथ और अपने वर्ग हित को साधते हुए कहती हैं कि “साल भर बाद जाना। तब तुम्हारे हाथ में कुछ रुपए हो जाएंगे।”[8] बाद में संस्मरण पढ़कर यह भी समझ में आता है कि लेखिका और उनके मित्र ने मिलकर उस बच्चे को चोरी के इल्ज़ाम में पुलिस के हवाले भी कर दिया। अगर बच्चे ने चोरी की थी और उसकी सज़ा में उसे जेल जाना पड़ा, तो तेरह-चौदह साल के बच्चे को घर में नौकर रखकर उससे काम करवाने और उसे अपने घर न जाने देने की ज़बरदस्ती के लिए क्या एक लेखिका की भी कुछ ज़िम्मेदारी नहीं बनती?

तीसरी, जहां लेखिका ने अपने संस्मरण में जाति के प्रश्न को दबा दिया है, वहीं उनके सवर्ण और पिछड़े समाज के किरदारों के बारे में बात करते वक़्त उनका जातिगत पूर्वाग्रह साफ़ दिख जाता है। मिसाल के तौर पर, संस्मरण में एक जगह वह पूर्व पुलिस-ऑफिसर और लेखक विभूति नारायण राय की चर्चा करती हैं और उनके बारे में यह लिखती हैं कि “राय के दिमाग़ में कोई जातिगत पूर्वाग्रह नहीं था बल्कि वे अल्पसंख्यकों के प्रति हमदर्दी रखते थे।”[9] वहीं जब उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव का ज़िक्र आया, जिनके दौर में उन्हें राममनोहर लोहिया सम्मान मिला, तो उन्होंने अपना शुक्रिया कुछ इन शब्दों में अदा किया, “उन दिनों अखिलेश यादव मुख्यमंत्री थे लेकिन राज मुलायम सिंह यादव का चलता था।”[10]

यह बात सच है कि अखिलेश की राजनीतिक कामयाबी में उनके पिता का योगदान है, नहीं तो समाजवादी पार्टी के किसी सामान्य कार्यकर्ता की तरह उन्हें मुख्यमंत्री तो दूर की बात, विधायक और मंत्री बनने के लिए भी बहुत ज़्यादा मशक़्क़त करनी पड़ती। मगर जिस बेबाक़ी से लेखिका ने अखिलेश की क़ाबलियत पर सवाल उठाया, क्या ऐसी ही बेबाक़ी उन्हें सवर्ण साहित्यकारों के जातिगत वर्चस्व पर बात करते हुए नहीं दिखानी चाहिए थी? क्या उन्हें सवर्णों के ‘कास्ट नेटवर्क’ का लाभ लेने वाले लेखकों के बारे में भी खुलकर नहीं बोलना चाहिए था?

[1] ममता कालिया, जीते जी इलाहाबाद, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, पृष्ठ 11
[2] वही, पृष्ठ 33
[3] वही, पृष्ठ 21
[4] वही, पृष्ठ 13
[5] वही, पृष्ठ 7
[6] वही, पृष्ठ 63
[7] वही, पृष्ठ 64
[8] वही, पृष्ठ 51
[9] वही, पृष्ठ 71
[10] वही, पृष्ठ 165

(संपादन : नवल/अनिल)


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लेखक के बारे में

अभय कुमार

जेएनयू, नई दिल्ली से पीएचडी अभय कुमार संप्रति सम-सामयिक विषयों पर विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं के लिए स्वतंत्र लेखन करते हैं।

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