राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) एक ऐसी विधायिका चाहता रहा है जो पूर्णतः हिंदू सदस्यों से बनी हो। इसके लिए उसने ‘अन्यों’ के बहिष्कृत किए जाने की अवधारणाएं विकसित की। जैसे संघी संस्कार के नेता और लोग संसद को ‘लोकतंत्र का मंदिर’ कहते है, जिससे वे दो तरह की धारणाएं फैलाते हैं। पहला, संसद एक पवित्र स्थान है। यानी अपवित्र लोगों को यहां नहीं आना चाहिए। पवित्र और अपवित्र, जाति और धर्म के आधार पर कौन होते हैं, यह कहने की ज़रूरत नहीं है। दूसरा, ऐसा कहकर वे लोकतंत्र जैसे आधुनिक व्यवस्था को हिंदू परंपरा से निकली शासन व्यवस्था होने की अफ़वाह फैलाते हैं। स्वयं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जब संविधान सभा के सदस्यों को ‘सनातनी’ कहते हैं तो वे दरअसल, यही साबित कर रहे होते हैं।
इस अवधारणा की वजह से सत्ता पर सवर्ण आधिपत्य को तार्किक मान लिया गया, जिसे चुनौती मंडलवादी और आंबेडकरवादी दलों के उभार के साथ ही मिला, जब उन्होंने संसद को मंदिर के बजाए जातीय, वर्गीय संख्या और भागीदारी के नज़रिए से संबोधित करना शुरू किया।
आरएसएस बहिष्कार की राजनीति को चरणबद्ध तरीके से करता रहा है, जिसमें सबसे ऊपर मुस्लिम रहे हैं। इसीलिए हम देखते हैं कि लोकतंत्र की पवित्रता को बचाए रखने के नाम पर बहुत से हिंदुत्ववादी नेता चुनावों के समय मुसलमानों से उन्हें वोट न देने की बात करते रहे हैं क्योंकि इससे ईवीएम अपवित्र हो जाएगी। इसी तरह चुनाव को त्योहार और मतदान को यज्ञ जैसे शब्द दिया जाना आम हिंदू के अवचेतन में संघ के इस नैरेटिव को स्थायी बना देता है। इसीलिए एसआईआर के नाम पर जब मुसलमानों को मतदान की प्रक्रिया से बहिष्कृत किया जाता है तो उसे कुछ लोग लोकतांत्रिक व्यवस्था के पवित्रीकरण के लिए ज़रूरी मानकर स्वीकार कर लेते हैं।
मुसलमानों के बाद आदिवासी
आरएसएस मानता है कि मुस्लिम विरोध के स्थायी और संस्थागत हो जाने के बाद जिन इलाक़ों में मुस्लिम आबादी अच्छी है, वहां तो हिंदू वोटबैंक संगठित हो गया है। लेकिन जहां मुसलमानों की आबादी कम है, ख़ासतौर से आदिवासी इलाक़ों में, वहां उन्हें सिर्फ़ मुस्लिमों का डर दिखाकर हिंदू परिधि में पूरी तरह नहीं लाया जा सकता। इसके लिए आदिवासियों के बीच ही ग़ैर-ईसाई और ईसाई के बीच तनावपूर्ण स्थिति बनानी होती है। इसके साथ ही बिरसा मुंडा जैसे नायकों का ‘भगवानीकरण’ भी करना होता है, ताकि उन्हें अन्य हिंदू भगवानों के बीच एक और भगवान की तरह फिट किया जा सके।
इसीलिए आरएसएस समर्थित संगठन ‘जनजाति सुरक्षा’ मंच द्वारा पिछले 24 मई को दिल्ली में पृष्ठभूमि में भारत माता की फोटो के साथ ‘भगवान’ बिरसा मुंडा की 150वीं जयंती पर जो ‘जनजाति सांस्कृतिक समागम’ किया गया और उसमें जो प्रस्ताव पास किए उन्हें आदिवासी पहचान पर हमले के बतौर लिया जाना चाहिए। यह सीधे आदिवासियों से संविधान द्वारा प्रदत्त अधिकारों को छीनकर उन्हें वर्णव्यवस्था वाली हिंदू पहचान में ढालने की साज़िश है।
मसलन, सम्मेलन में मुख्य प्रस्ताव लाया गया कि जो आदिवासी ईसाई या इस्लाम धर्म अपना चुके हैं उन्हें संविधान के अनुच्छेद 342 और 366 में संशोधन करके अनुसूचित जनजाति की सूची से बाहर कर दिया जाए। इसके आधार पर ही यह मांग की गई कि ईसाई और मुस्लिम बन चुके आदिवासियों को मिलने वाले आरक्षण और अन्य संवैधानिक लाभों को छीन लिया जाए।

यह मांग संविधान द्वारा आदिवासियों की तय परिभाषा के ख़िलाफ़ है, क्योंकि संविधान आदिवासियों का वर्गीकरण धर्म, जाति या अनुसूचित वर्गों की तरह अस्पृश्यता के आधार पर नहीं करता। उसका आधार सामाजिक, भौगोलिक अलगाव, आदिम/पारंपरिक जीवन शैली, विशिष्ट संस्कृति और सामाजिक-आर्थिक पिछड़ापन है। यानी अगर कोई आदिवासी है तो वो चाहे जिस धर्म को माने, उसे आदिवासी ही माना जाएगा। इसलिए यह मांग ही संविधान विरोधी है और बिना संविधान को बदले यह मांग मानी ही नहीं जा सकती। लेकिन ध्यातव्य है कि इस मांग को सिर्फ़ राष्ट्रपति ही पूरा कर सकता है क्योंकि अनुसूचित जनजाति की सूची में संशोधन यानी उसमें जोड़ने और निकालने का अधिकार राष्ट्रपति को है और यह भी सनद रहे की आरएसएस ने एक आदिवासी महिला को ही राष्ट्रपति पद पर बैठाया है।
लेकिन सबसे अहम कि इसे देश के गृहमंत्री के समक्ष रखा गया, जो संविधान की रक्षा का शपथ लेने के बाद ही इस पद पर आसीन हुए हैं। दूसरे, इसमें “सनातन ही सरना है” और “तू-मैं एक रक्त” का उद्घोष भी किया गया।
पूरे देश में चल रही जनगणना के बीच इस तरह के प्रस्तावों और उद्घोषों का पहला लक्ष्य जनगणना के दौरान आदिवासियों को धार्मिक पहचान के कॉलम मे हिंदू लिखने के लिये प्रेरित करना है। इसके लिए दो उपाय इस्तेमाल किए जा रहे हैं। पहला, ईसाई और मुस्लिम विरोध के नाम पर आदिवासी ख़ुद को हिंदू लिखें। दूसरा, जो आदिवासी ईसाई और मुसलमान हो गए हैं, वे अनुसूचित जनजाति के आधार पर मिलने वाले सरकारी लाभ को खो देने के डर से हिंदू लिख दें। ताकि इन इलाक़ों में हिंदू आबादी की संख्या ज़्यादा साबित की जा सके। लेकिन, इसका सबसे बड़ा लक्ष्य आदिवासी समुदायों द्वारा जनगणना के कॉलम में आदिवासियों के लिए सरना धर्म कोड को शामिल करने की मांग को दबाना है। गौरतलब है कि लंबे समय से आदिवासी समुदायों में यह सहमति रही है कि वे जनगणना में अपनी धार्मिक पहचान सरना धर्म को दर्ज करवाएं।
पुराना पैंतरा
यानी लगभग, 90 साल बाद हम जनगणना में हिंदू आबादी को धोखे से ज़्यादा दिखाने के लिए उन्हीं पैंतरों को अपनाए जाते हुए अभी भी देख रहे हैं जो वर्चस्ववादी लोग दलितों के संदर्भ में 1940 के जनगणना के दौरान अपना चुके हैं। इसके बारे में डॉ. आंबेडकर अपनी किताब ‘गांधी और अछूतों का उद्धार’ में दर्ज करते हैं कि “1940 की जनगणना में पंजाब के कुछ विशेष भागों में सिखों ने अछूतों को योजनाबद्ध तरीके से डराया और उन्हें विवश किया कि वे सिख न होते हुए भी जनगणना में अपने को सिख लिखवाएं। इससे अछूतों की जनसंख्या सिकुड़ गई और सिखों की बढ़ गई। इसी तरह, हिंदुओं ने अलग से अभियान चलाया कि जनगणना में कोई अपनी जाति न लिखवाए। उन्हें बताया गया कि जाति का नाम ही यह प्रकट करता है कि वे अछूत हैं और यदि वे अपनी जाति का उल्लेख न करके केवल यही लिखवाएं कि वे हिंदू हैं, तो उनके साथ अन्य हिंदुओं की तरह बर्ताव किया जाएगा और किसी को यह पता भी नहीं चलेगा कि वे अछूत हैं। अछूत इस झांसे में आ गए और उन्होंने निश्चय किया कि वे जनगणना में अपने को अछूत नहीं, सिर्फ़ हिंदू बताएंगे। इसका नतीजा यह हुआ कि अछूतों की जनसंख्या घट गई और हिंदुओं की बढ़ गई।”
डॉ. आंबेडकर इसीलिए कहते थे कि ब्रिटिश भारत में अछूतों की संख्या उससे बहुत ज़्यादा है जितना आंकड़ों में बताया जाता है।
आदिवासियों के हिंदूकरण से आरएसएस चार लक्ष्य पूरा करना चाहता है
आदिवासियों के बीच सरना के सनातन होने की अफ़वाह फैलाकर आरएसएस फिर से धोखे से हिंदू आबादी को ज़्यादा दिखाना चाहता है। इससे वह चार मक़सद हासिल करना चाहता है।
पहला, कम या नगण्य मुस्लिम आबादी वाले आदिवासी इलाक़ों में ईसाइयों और ग़ैर-ईसाई आदिवासियों के बीच स्थायी तनाव और हिंसा का माहौल बनाना, जैसा कि मणिपुर में कुकी और मैतेई के बीच हुआ। यह संयोग नहीं है कि ईसाई आदिवासी समुदाय के विरुद्ध हुई हिंसा के तीन साल से जारी रहने के बावजूद पीएम वहां नहीं गए। दरअसल वे चले जाते तो इस परियोजना को दूसरे राज्यों में लागू करने में दिक़्क़त होती।
दूसरा, इससे राजनीतिक तौर पर आदिवासी अस्मिता वाली पार्टियों का वजूद ख़त्म हो जाएगा, क्योंकि तब आदिवासी हिंदू पहचान के साथ वोटिंग करेंगे। तीसरा, 2011 की जनगणना में हिंदू आबादी 79.8 प्रतिशत थी। अगर आदिवासी ईसाई और मुस्लिम दायरे से निकलकर हिंदू दायरे में आ जाएं तो बढ़ी हुई हिंदू आबादी के आधार पर भारत को हिंदू राष्ट्र घोषित करने के तर्क को और मजबूती मिलेगी। चौथा, आदिवासी की श्रेणी में मुसलमानों के आने से कश्मीर के गूजर और बकरवाल, महाराष्ट्र के तड़वी भील जैसी जातियां एसटी के लिए सुरक्षित सीटों पर चुनाव लड़ जाती हैं। वहीं इस वर्गीकरण में ईसाइयों के आने से पूर्वोत्तर के जनजाति बहुल राज्यों जैसे– 94.5 प्रतिशत आदिवासी आबादी वाले मिजोरम, 87 प्रतिशत आबादी वाले नगालैंड, 86 प्रतिशत आबादी वाले मेघालय और 69 प्रतिशत आबादी वाले अरुणाचल प्रदेश की एसटी सुरक्षित सीटों से ईसाई चुनाव जीतकर संसद को अपवित्र कर देते हैं।
राष्ट्रपति की भूमिका सबसे अहम
आरएसएस की रणनीति रही है कि जिस समाज का नुक़सान करना हो, वो उसी समाज से आने वाले व्यक्ति से करवाया जाए। इसीलिए उसने चुनावी लोकतंत्र को कमज़ोर करने के लिए जिस ‘एक देश – एक चुनाव’ की योजना लाई है उसे लागू करने के लिए गठित कमेटी का मुखिया दलित समाज से आने वाले पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद को बना दिया है। इसी तरह आदिवासियों के वर्गीकरण को धर्म आधारित बनाने यानी उसके दायरे से मुसलमानों और ईसाइयों को बाहर करने की योजना में निर्णायक भूमिका राष्ट्रपति की होनी है क्योंकि अनुच्छेद 342 और 366 राष्ट्रपति को ही अधिकार देता है कि वह अनुसूचित जनजाति के वर्गीकरण को तय करें। यानी बहुत संभव है कि राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू से भाजपा यह काम कराने का प्रयास करे।
ऐसे में यह देखना दिलचस्प होगा कि वो रामनाथ कोविंद बनने को तैयार होती हैं या इनकार करती हैं।
(संपादन : नवल/अनिल)
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