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ओमप्रकाश कश्यप, डॉ. रमाकांत ठाकुर व नवल किशोर कुमार को मिला संतराम बी.ए. स्मृति-सम्मान

संतराम बी.ए. सम्मान-2024 से सम्मानित डॉ. रमाकांत ठाकुर ने बहुजन वैचारिकी के बारे में विस्तार से बताया और इस बात पर एक तरह से क्षोभ व्यक्त किया कि आज जब हम संतराम बी.ए. की स्मृतियों को याद कर रहे हैं तो सभी दलित व पिछड़ी जातियाें के लोग अपनी-अपनी जातियों की हद में जाकर सीमित हो गए हैं। इससे ब्राह्मणवाद दिन-ब-दिन मजबूत हो रहा है। पढ़ें, यह खबर

वे संतराम बी.ए. थे, जिन्होंने 1922 में अविभाजित भारत के लाहौर में ‘जात-पात तोड़क मंडल’ का गठन किया था। वे जातिगत भेदभाव को समाज की सबसे बड़ी व्याधि मानते थे। भारतीय समाज इस व्याधि से मुक्त हो, इसके लिए वे आजीवन लेखन के अलावा सामाजिक आंदोलनों को गति देते रहे। उनके योगदानों को गत 31 मई, 2026 को उत्तर प्रदेश के शाहजहांपुर में शिद्दत से याद किया गया। कार्यक्रम का आयोजन संतराम बी.ए. फाउण्डेशन द्वारा किया गया। इस मौके पर वरिष्ठ लेखक ओमप्रकाश कश्यप, प्रखर दलित-बहुजन वक्ता व विचारक डॉ. रमाकांत ठाकुर और फारवर्ड प्रेस, नई दिल्ली के हिंदी संपादक नवल किशोर कुमार को क्रमश: वर्ष 2023, 2024 और 2025 का ‘संतराम बी.ए. स्मृति सम्मान’ प्रदान किया गया। ज्ञातव्य है कि यह सम्मान वर्ष 2017 से दिया जा रहा है।

इससे पूर्व यह सम्मान वर्ष 2017 में कथाकार संजीव व गज़लकार रामकुमार ‘कृषक’ तथा कमल किशोर कठेरिया को, वर्ष 2018 में कथाकार तरसेम गुजराल को, 2019 में सामाजिक कार्यकर्ता स्वामी अग्निवेश को, 2020 में उपन्यासकार भगवानदास मोरवाल को, 2021 में बाल विवाह विरोधी सामाजिक कार्यकर्ता भंवरी देवी और 2022 में यह सम्मान दलित चिंतक व विचारक भंवर मेघवंशी को दिया जा चुका है।

कार्यक्रम का आयोजन शहर के गन्ना शोध संस्थान के प्रशिक्षण केंद्र के सभागार में किया गया था। तेज धूप और गर्मी के बावजूद लोग चार बजे आयोजन स्थल पर पहुंचने लगे थे। वहां लगाया गया किताबों का स्टॉल आकर्षण का केंद्र रहा। लोग पुस्तकों में दिलचस्पी ले रहे थे। कार्यक्रम का आगाज करीब 5 बजे हुआ। सभागार की अधिकांश कुर्सियां भर चुकी थीं और मंच पर संतराम बी.ए. सम्मान से सम्मानित तीनों लेखकों-विचारकों सहित अन्य गणमान्य उपस्थित थे।

संचालन की जिम्मेदारी वेदपाल ‘सुमन’ संभाल रहे थे। अपने प्रारंभिक संबोधन में उन्होंने कार्यक्रम की रूपरेखा का वर्णन करने के साथ ही संतराम बी.ए. के जीवन व उनके कार्यों का संक्षिप्त ब्यौरा प्रस्तुत किया। कार्यक्रम का आगाज़ संतराम बी.ए. फाउंडेशन के संस्थापक व अध्यक्ष डॉ. महेश प्रजापति के स्वागत वक्तव्य से हुआ। जिसमें उन्होंने मंचासीन व सभागार में उपस्थित सदस्यों का आभार व्यक्त किया। तत्पश्चात संतराम बी.ए. स्मृति सम्मान की दस वर्षों की यात्रा और आयोजन के औचित्य के बारे में बताया। यहां उन्होंने संतराम बी.ए. के कार्यों व उनके विचारों की प्रासंगिकता के बारे में भी बताया। साथ ही संतराम बी.ए. फाउंडेशन के द्वारा बीते वर्षों में प्रकाशित पुस्तकों व अन्य गतिविधियों के बारे में जानकारी दी।

डॉ. महेश प्रजापति ने कहा कि आजादी के बाद भी हमारे देश का जो इतिहास लिखा गया, उसमें ऐसे अनेक बहुजन नायकों-महापुरुषों के योगदान को छोड़ दिया गया जिन्होंने इस देश के तमाम दलित-बहुजनों, जिनमें दलित, पिछड़े, आदिवासी, घुमंतू व खानाबदोश जातियाें के अलावा पसमांदा व स्त्रियां शामिल हैं, को आत्मसम्मानपूर्वक जीना सिखाया। इस देश की सबसे बड़ी बुराई यानी जाति और वर्ण-व्यवस्था के विरुद्ध उनमें चेतना पैदा की। ऐसे महापुरुषों में जोतीराव फुले और बाबा साहब डॉ. भीमराव आंबेडकर के बारे में लोग अब जान चुके हैं। लेकिन पेरियार रामासामी, स्वामी अछूतानंद हरिहर, संतराम बी.ए., रामस्वरूप वर्मा व ललई सिंह यादव आदि के बारे में लोगों में व्यापक जानकारी का अभाव है। संतराम बी.ए. ने जाति के विनाश के लिए बहुत बड़ा काम किया, लेकिन दुखद है कि आज लोग उन्हें भूलते जा रहे हैं।

हालांकि उन्होंने जोर देते हुए यह भी कहा कि इक्कीसवीं सदी के भारत में यह नहीं चलने वाला है कि वर्णवादी लोगों ने जो लिख दिया उसे ही मान लिया जाएगा। आज तमाम दलित-बहुजन अपने महापुरुषों पर खुद लिखने में सक्षम हैं। बहुत कुछ लिखा भी जा रहा है इस देश के बहुजनों की पीड़ा पर, उनके साथ हो रहे भेदभाव और अन्याय पर।

संतराम बीए स्मृति सम्मान-2023 का सम्मान प्रसिद्ध साहित्यकार ओमप्रकाश कश्यप को देते डॉ. महेश प्रजापति

संतराम बी.ए. के योगदानों की चर्चा करते हुए डॉ. महेश प्रजापति ने कहा कि उनके द्वारा स्थापित जात-पात तोड़क मंडल ने बीसवीं शताब्दी के चौथे और पांचवे दशक में देश में धूम मचा रखी थी। न जाने कितने युवक-युवतियों ने उनके मंडल से प्रभावित होकर जाति विनाश हेतु अंतर्जातीय विवाह किये। इतना ही नहीं, हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने के लिए उन्होंने बहुत प्रयास किया। आज जिस स्त्री-विमर्श की बात होती है, उस विमर्श पर सौ साल पहले संतराम बी.ए. ने दसियों पुस्तकें लिख दी थीं।

मंचासीन वक्ता कमल किशोर कठेरिया ने अपने संबोधन में संतराम बी.ए. और महात्मा गांधी के बीच के संबंधों के बारे में बताया। उन्होंने कहा कि गांधी वर्ण-व्यवस्था व जातिगत पेशे के पक्षधर थे। लेकिन संतराम बी.ए. उनके इन विचारों से सहमत नहीं थे। यहां तक कि जिस आर्य समाज से वे जुड़े थे, उन्होंने उसकी भी खूब आलोचना की। श्री कठेरिया ने देश के मौजूदा हालात की भी चर्चा की और कहा कि आज जब एक तरफ देश में सांप्रदायिक उन्माद फैलाया जा रहा है, ऐसे में संतराम बी.ए. के विचार अत्यंत ही महत्वपूर्ण हो गए हैं। वे हर तरह के भेदभाव, अत्याचार और शोषण का विरोध करते थे।

अपने संबोधन में शाहजहांपुर के निवासी रहे शहीद अशफाकउल्ला खां के पोते अशफाकउल्ला खां ने संतराम बी.ए. के उन विचारों का उल्लेख किया जिनमें वे धर्म आधारित भेदभाव का विरोध करते हैं। उन्होंने कहा कि उनके दादा ने जिस भारत के लिए अपने जानों की कुर्बानी दी थी, उस भारत में किसी भी तरह के भेदभाव की परिकल्पना नहीं थी। हिंदू और मुसलमान आपस में मिलकर रहें, कोई किसी का शोषण नहीं करे। लेकिन आज देश के हालात बदल गए हैं। सियासी लाभ के लिए हिंदू और मुसलमानों के बीच नफरत फैलाया जा रहा है।

संतराम बी.ए. सम्मान-2023 से सम्मानित व गाजियाबाद से आए वरिष्ठ साहित्यकार ओमप्रकाश कश्यप ने अपने संक्षिप्त संबोधन में सम्मान देने के लिए संतराम बी.ए. फाउंडेशन के प्रति आभार प्रकट किया और कहा कि संतराम बी.ए. ने साहित्य से समाज को जगाने का काम किया। उन्होंने आंबेडकरवाद को तथ्यों के आलोक में समझने व विश्लेषित करने की बात कही।

वहीं संतराम बी.ए. सम्मान-2024 से सम्मानित डॉ. रमाकांत ठाकुर ने बहुजन वैचारिकी के बारे में विस्तार से बताया और इस बात पर एक तरह से क्षोभ व्यक्त किया कि आज जब हम संतराम बी.ए. की स्मृतियों को याद कर रहे हैं तो सभी दलित व पिछड़ी जातियाें के लोग अपनी-अपनी जातियों की हद में जाकर सीमित हो गए हैं। इससे ब्राह्मणवाद दिन-ब-दिन मजबूत हो रहा है।

अपने संबोधन में संतराम बी.ए. सम्मान-2025 से सम्मानित फारवर्ड प्रेस, नई दिल्ली के हिंदी संपादक नवल किशोर कुमार ने कहा कि दलित और पिछड़े सहित तमाम वंचितों के बीच सांस्कृतिक एकता के बगैर न तो सामाजिक एकता संभव है और न ही राजनीतिक एकता। इसके लिए सांस्कृतिक साम्यता के सूत्र तलाशे जाने चाहिए। एक उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि शाहजहांपुर व आसपास के इलाके में एक स्थानीय मिठाई ‘खजरा’ मिलती है। इसी तरह की एक मिठाई बिहार के मगध में भी मिलती है, जिसे ‘खाजा’ कहा जाता है। यह महज संयोग नहीं है, बल्कि यह बताता है कि तमाम दलित-बहुजन चाहे वे बिहार के हों या फिर पश्चिमी उत्तर प्रदेश के, उनके बीच सांस्कृतिक एकता कायम की जा सकती है। नवल किशोर कुमार ने जातिगत जनगणना का सवाल भी उठाया कि आज सरकार अपने वादे का पालन नहीं कर रही है। उसने जातिगत जनगणना कराने का वादा किया था।

कार्यक्रम को सुरेंद्र प्रजापति के अलावा शमीम आजाद, कप्तान कर्णधार, भगवंतराम, डॉ. पी.के. कपिल, सियाराम दिनकर, अनूप कुमार, अजय प्रजापति, रवींद्र प्रजापति, जोगराज आदि ने भी संबोधित किया।

(संपादन : अनिल)


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लेखक के बारे में

सुरेंद्र प्रजापति

लेखक सामाजिक कार्यकर्ता व बरेली, उत्तर प्रदेश से प्रकाशित मासिक पत्रिका ‘प्रजापति सम्मान’ के मुख्य संपादक हैं

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