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कॉकरोच जनता पार्टी का उभार : एक आंबेडकरवादी विश्लेषण

कोई भी आंदोलन हो, कोई भी पार्टी हो, कोई भी लीडर हो यह देखा जाना चाहिए कि इस पार्टी के मज़बूत होने से क्या वंचितों को न्याय मिलेगा? क्या वंचितों के लिए आरक्षण का पूर्ण रूप से अनुपालन किया जाएगा और उसे सम्मानपूर्वक देखा जाएगा? क्या जातिवाद का ख़ात्मा होगा? पढ़ें, अभय कुमार का यह आलेख

कई बार हमारे दिल और दिमाग़ में जो बातें दबी होती हैं, वे ज़ुबान पर आ जाती हैं। जातिवादी समाज को ही देखिए कि जब किसी ‘चोर’ का ज़िक्र आता है, तो उसे एक दलित जाति से जोड़ दिया जाता है। जबकि चोरी करने वाले लोग तमाम जातियों से संबंध रखते हैं, फिर भी प्रभुत्वशाली जातियां दलितों को ही ‘टारगेट’ करती हैं।

जातिवादी मानसिकता में लोग सोशल जस्टिस की राजनीति से निकले एक नेता को जानवरों से जोड़ देते हैं। कुछ दिन पहले की बात है जब मैं अपने एक जानने वाले शिक्षक के साथ धनबाद जा रहा था। धनबाद के पास गोविंदपुरी में अक्सर ट्रैफिक जाम रहता है। हम लोग एक कार में सवार थे। गाड़ी शिक्षक महोदय की ही थी और वही उसे चला भी रहे थे। अचानक उन्होंने सड़क पर दो गायों को देखकर कहा, “लालू, हट, हट…”।

बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री और सामाजिक न्याय के एक क़द्दावर लीडर को किसी गाय से जोड़ देना सिर्फ़ ज़बान की फिसलन नहीं है, बल्कि यह हमारे जातिवादी समाज की सोशल जस्टिस की राजनीति के प्रति गहरे पूर्वाग्रह का परिचायक है।

इन उदाहरणों का यहां ज़िक्र करने का मक़सद यही है कि हम इस बात को समझें कि हमारी जीभ से अल्फ़ाज़ यूं ही फिसलकर बाहर नहीं आते, बल्कि वे हमारे दिल और दिमाग़ में मौजूद पूर्वाग्रहों के विष से ही तैयार होते हैं। प्रगतिशीलता, “धर्मनिरपेक्षता” और समरसता के ‘अलंबरदार’ उन्हें बाहर आने से रोकने की पूरी कोशिश करते हैं, ताकि उनकी असली सच्चाई सामने न आ जाए, फिर भी दबी हुई बातें कभी न कभी बाहर निकल ही जाती हैं।

इसलिए सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश द्वारा बेरोज़गार युवाओं के एक बड़े समूह के लिए ‘कॉक्रोच’, अर्थात् तेलचट्टे, शब्द के इस्तेमाल को न तो ज़बान की फिसलन माना जा रहा है और न ही नाराज़ नौजवानों को यह लगता है कि वे जानबूझकर इस पूरे मामले को तूल दे रहे हैं।

सत्ता वर्ग से यह भी दलील दी जा रही है कि न्यायपालिका पर सवाल खड़ा करना उचित नहीं है। मगर अहम सवाल यह है कि इस देश के कुलीन वर्ग को प्रश्नों और आलोचनाओं से इतनी घबराहट क्यों होती है? ‘डेमोक्रेसी’ में कुछ भी आलोचना से परे नहीं होता है। किसी भी संस्था को हम ‘होली काऊ’ नहीं मान सकते हैं।

पॉलिटिकल साइंस की पहली क्लास में पढ़ाया जाता है कि सरकार के तीन अंग होते हैं। एक है विधायिका, जो क़ानून बनाती है; दूसरा है कार्यपालिका, जो क़ानून को अमल में लाती है; और तीसरा है न्यायपालिका, जो संविधान और क़ानून की मुहाफ़िज़ होती है और यह देखती है कि देश संविधान के मुताबिक चल रहा है या नहीं।

जिस ‘संविधान’ की रक्षा की बड़ी ज़िम्मेदारी सुप्रीम कोर्ट को है, उसी संविधान के आर्टिकल 19 में इज़हार-ए-राय की आज़ादी दी गई है। आप सरकार की किसी भी ग़लत नीति की आलोचना कर सकते हैं। राज्य के दमन का विरोध कर सकते हैं। सुप्रीम कोर्ट के ख़ुद के फ़ैसले कि ‘डिसेंट’ के बग़ैर लोकतंत्र का कोई अर्थ नहीं है। बोलने का अधिकार संविधान द्वारा प्रदत्त बुनियादी अधिकारों का हिस्सा है।

किसी नागरिक को बोलने से तभी रोका जा सकता है या फिर उसे जेल के अंदर किया जा सकता है, जब उसके बयान से ‘लॉ एंड ऑर्डर’ बिगड़ जाए। अगर ‘फ्रीडम ऑफ़ स्पीच’ को बुनियादी अधिकार का दर्जा मिला हुआ है, तो फिर पत्रकारिता या ‘एक्टिविज़्म’ के माध्यम से अपने विचार प्रकट करने वाले, या सरकार की नीतियों की आलोचना करने वाले नौजवानों को – जिनके विचारों से कोई सहमत न भी हों – कैसे कलंकित किया जा सकता है? ‘कॉक्रोच’ विवाद को इन तमाम मसलों के साथ देखकर समझा जाना चाहिए।

कॉकरोच जनता पार्टी के संस्थापक अभिजीत दीपके

न्यायपालिका सरकार का एक अंग है। अगर विधायिका और कार्यपालिका में आरक्षण है, तो फिर न्यायपालिका में क्यों नहीं है? क्या आप इस बात से सहमत नहीं हैं कि ‘ज्यूडिशियरी’ में आरक्षण आने से यह संस्था वंचितों के दुख-दर्द को समझने में और भी ज़्यादा संवेदनशील होगी?

मगर कुछ लोगों को लगता है कि न्यायपालिका पर सवाल उठाना, या फिर उसमें आरक्षण की बात करना, अदालत की न्याय-प्रक्रिया पर सवाल खड़ा करना है, जो कि देशहित में नहीं है। अगर ऐसी बात सही होती, तो डॉ. आंबेडकर जैसे देश के सबसे बड़े क़ानून-विशेषज्ञ यह नहीं कहते कि अच्छा क़ानून बन जाने के बावजूद, अगर वंचित समाज का व्यक्ति उस क़ानून को कार्यान्वित करने के लिए मौजूद नहीं है, तो दबे-कुचले और कमज़ोरों को न्याय नहीं मिलेगा। लेकिन अगर क़ानून बुरा भी हो और उसे लागू करने वाला इंसान कमज़ोर वर्ग से हो, तो वह बुरे क़ानून से भी कुछ अच्छा निकाल सकता है।

जब कॉलेज और यूनिवर्सिटी के अंदर आरक्षण मिलने से हमारी शिक्षा की ‘क्वालिटी’ घटती नहीं, बल्कि बढ़ती है; मेडिकल कॉलेज में जब डॉक्टरी की पढ़ाई करने वाले छात्रों को ‘रिजर्वेशन’ मिलता है, और जब समाज के हाशिए के लोग डॉक्टर बनते हैं, तो वे लोगों का अच्छे तरीक़े से इलाज करते हैं और अस्पतालों की सेवा-गुणवत्ता भी बाधित नहीं होती; तो फिर ‘ज्यूडिशियरी’ में रिजर्वेशन दे देने से न्याय-प्रक्रिया कैसे बाधित हो जाएगी?

इन बातों का ज़िक्र करने के पीछे उद्देश्य इस बात को रेखांकित करना है कि सत्ता में जो बैठे हुए लोग हैं, वे बेरोज़गार नौजवानों की जो पीड़ा है, जो उनका दर्द है, उसको महसूस नहीं कर पा रहे हैं। अपने अधिकार के लिए आवाज़ बुलंद करने वाले नौजवानों की, जिनमें बड़ी तादाद दलितों और बहुजनों की है, उन्हें प्रभुत्वशाली वर्ग या तो नज़रअंदाज़ कर रहा है या फिर एक समस्या के तौर पर देख रहा है। क्या बेरोज़गार नौजवानों के लिए ‘कॉक्रोच’ शब्द का इस्तेमाल इसी कुलीन सोच की पैदावार है?

कुछ दिन पहले अख़बार में एक छोटी-सी ख़बर कहीं छपी थी कि भारत की एक कंपनी की आमदनी पिछले साल 95 हज़ार करोड़ हुई है। क्या उस आमदनी में उन मज़दूरों को भी हिस्सा मिलेगा, जिनकी मेहनत से यह दौलत जमा की गई है? क्या इस आमदनी से हमारे हज़ारों और लाखों बेरोज़गार नौजवानों को नौकरी मिलेगी?

ऐसा लगता है कि यह देश दो दिशाओं में चल रहा है। इस देश में दो तरह के लोग रहते हैं। एक वे, जो हर तरह की सुविधाओं से संपन्न हैं, और दूसरे वे, जो दिन-रात मेहनत करके भी दो वक़्त की रोटी नहीं जुटा पा रहे हैं। मिसाल के तौर पर जो लोग सड़क बना रहे हैं, पुल बना रहे हैं, उनको क्या मज़दूरी मिल रही है और उनको क्या सुविधाएं मयस्सर हैं? साफ़ पानी तक पीने को कई बार नहीं मिलता है और जब काम करते-करते उनकी जान चली जाती है, तो दोषियों के ख़िलाफ़ अक्सर कार्रवाई नहीं होती और उनके घरवालों को कोई मुआवज़ा भी नहीं मिलता है। कोई भी मुआवजा मज़दूर की जान की कीमत अदा नहीं कर सकता, मगर हमारी व्यवस्था अपनी ज़िम्मेदारी से भाग रही है।

झारखंड के धनबाद ज़िले के निरसा में कुछ रोज़ पहले एक आदिवासी मज़दूर के ऊपर भारी केसिंग गिरने की वजह से उनकी मृत्यु हो गई। जब लोगों ने विरोध किया, तो सत्ता पक्ष के लोगों ने कहा कि विकास के काम में बाधा नहीं डाली जानी चाहिए। क्या दलित, आदिवासी, पिछड़ा, अल्पसंख्यक और मज़दूर का घर उजड़ जाए, तो उसे विरोध करने का भी अधिकार नहीं?

विकास का जो ‘मॉडल’ हमारे सत्ता वर्ग ने अपनाया है, वह कितना अवाम-मुख़ालिफ़ है, इसका अंदाज़ा आप एक अन्य उदाहरण से लगा सकते हैं। झारखंड के गिरिडीह में कुछ रोज़ पहले एक ख़बर आई थी कि एक आदिवासी महिला गर्भवती थी। उनको अस्पताल जाना था, लेकिन अस्पताल जाने के लिए उनके गांव से मुख्य सड़क तक पक्की सड़क नहीं थी। महिला जब दर्द से कराह रही थी, तो उनको एक खटिया पर लिटा दिया गया और फिर उस खटिया को उठाकर चार किलोमीटर दूर मुख्य सड़क तक ले जाया गया।

यह घटना बतलाती है कि सड़क बनाने का पहला उद्देश्य आदिवासियों की सुविधा नहीं है, बल्कि आदिवासियों के इलाक़े से लकड़ी, कोयला और दूसरे बेश-क़ीमती संसाधनों को लूटकर ले जाना है। जहां कोयले की खान होती है, वहां पक्की सड़क दिखती है, क्योंकि सड़क के माध्यम से ही कोयले को शहर पहुंचाया जाता है और उद्योगपतियों के कारख़ानों की भट्टी में झोंका जाता है। वहीं स्कूल, अस्पताल, कॉलेज और यूनिवर्सिटी आदि आदिवासियों के लिए अहम ‘इंफ़्रास्ट्रक्चर’ सरकार की प्राथमिकता में सबसे पीछे हैं।

सत्ता वर्ग में जो भी लोग बैठे हुए हैं, उनको गरीबों के दुख-दर्द से कोई मतलब नहीं है। राजनेता भी लोकतंत्र को, चुनाव को, एक व्यवसाय समझ रहे हैं। ‘पॉपुलैरिटी’ का पैमाना जनता से जुड़ाव और सामाजिक मुद्दों से सरोकार न होकर सोशल मीडिया पर ‘फ़ॉलोअर्स’ की भीड़ हो गई है, भले ही ‘फ़ॉलोअर्स’ की एक बड़ी संख्या किसी भी सही-ग़लत रास्ते को अपनाकर जुटाई गई हो।

यही वजह है कि आजकल के नेताओं की टीम में ज़मीन से जुड़े हुए ‘एक्टिविस्ट’ कम और सोशल मीडिया ‘इन्फ्लुएंसर्स’ ज़्यादा दिखते हैं।

यही वजह है कि देश के नौजवानों में व्यवस्था के प्रति नाराज़गी बढ़ती जा रही है। मगर बात सिर्फ़ नौजवानों तक ही सीमित नहीं है। परेशानियां महिलाएं भी झेल रही हैं। मार मज़दूरों और किसानों पर भी बहुत भयंकर है। दलितों और आदिवासियों के ऊपर भी हमले बढ़े हैं।

इसलिए बात सिर्फ़ यह नहीं है कि नौजवानों को नौकरी नहीं मिल रही है; मसला यह भी है कि सरकार एक इम्तिहान को पारदर्शी तरीक़े से कराने में सक्षम नहीं है और पर्चे ‘लीक’ हो जा रहे हैं। अर्थव्यवस्था का तो हाल यह है कि किसान, मज़दूर, दलित और आदिवासी की कौन कहे, यहां तक कि छोटे व्यापारियों का भी कारोबार बंद हो रहा है।

पेट्रोल और डीज़ल की हर रोज़ बढ़ती क़ीमत ने महंगाई को बड़ी तेज़ी से बढ़ा दिया है। बस और ऑटो आदि के किराए भी बढ़ गए हैं, जिससे ग़रीब लोग काफ़ी परेशान हैं। रसोई गैस की क़िल्लत की वजह से गांव से लेकर शहर तक अफ़रातफ़री का माहौल है।

इन तमाम बातों की रोशनी में अगर देखें तो ‘कॉक्रोच जनता पार्टी’ के उभार और उसकी सोशल मीडिया पर भारी लोकप्रियता को समझा जा सकता है। हमारे समाज के वंचित तबके का जो गुस्सा है, सरकार की ग़लत नीतियों को लेकर जो आम लोगों में नाराज़गी है और सत्ता वर्ग की अवाम के दुख-दर्द के प्रति जो बेहिसी है, ‘कॉक्रोच जनता पार्टी’ उसी का परिणाम है।

मगर सवाल यह है कि वंचित तबके को ‘कॉक्रोच जनता पार्टी’ के प्रति क्या रुख़ अपनाना चाहिए? क्या उसका आंख मूंदकर समर्थन करना चाहिए, या फिर उसका विरोध होना चाहिए? मुझे लगता है कि इन दोनों अतिवादी क़दमों से गुरेज़ करना चाहिए। वक़्त की मांग है कि हमें हर क़दम किसी भी जज़्बात से ऊपर उठकर, किसी भी ‘प्रोपेगैंडा’ से प्रभावित हुए बग़ैर, अपना फ़ैसला लेना चाहिए।

अन्ना हज़ारे आंदोलन को मिसाल के तौर पर देखा जाना चाहिए। जब अन्ना हजारे रामलीला मैदान में अनशन पर बैठे हुए थे, तो मैं दिल्ली में ही था और जेएनयू में एम.ए. कर रहा था। उन दिनों जब हम ‘न्यूज़पेपर’ के पन्ने पलटते थे, तो हम देखते थे कि अन्ना आंदोलन को मीडिया बहुत ही ज़्यादा कवरेज देता था।

किसी भी अख़बार का पेज पलटने पर हमें बड़ा ताज्जुब होता था कि इस शहर में बस्तियां उजाड़ दी जा रही हैं, पेड़ काट दिए जा रहे हैं, कहीं आगजनी हो रही है, तो उसकी खबर अख़बारों में या तो आती नहीं थी, या आती भी थी तो बहुत छोटी-सी आती थी। मगर यह कौन-सा ऐसा ‘आंदोलन’ है, जिसके लिए कई-कई पेज की खबरें आती थीं?

उस जमाने के ‘प्रगतिशील’ समूह का एक बड़ा हिस्सा अन्ना आंदोलन को ‘सपोर्ट’ कर रहा था। कहीं-न-कहीं यह उनका सवर्ण-प्रेम था, जो उन्हें अन्ना हज़ारे आंदोलन के क़रीब ले गया। ऐसे प्रगतिशील लोगों को मायावती, लालू प्रसाद या स्टालिन जातिवादी दिखते हैं, मगर सवर्ण लीडरशिप को देखकर उन्हें कभी यह ख़्याल नहीं आता कि इसमें दलित, आदिवासी, पिछड़े और मुसलमान क्यों नहीं हैं।

हालांकि उस वक़्त भी मेरे मन में अन्ना आंदोलन को लेकर बहुत सारी आशंकाएं थीं। उस वक़्त भी मैं अन्ना आंदोलन से यही सवाल पूछता था कि इसमें दलितों, आदिवासियों, पिछड़ों, अल्पसंख्यकों, मज़दूरों और किसानों के लिए क्या है? क्या दंगा रोकने के लिए और ‘सामाजिक सौहार्द्र’ बनाने के लिए अन्ना आंदोलन प्रतिबद्ध है?

रामलीला मैदान से अन्ना के समर्थकों ने बहुत कुछ बोला, मगर इन सवालों के बारे में वे चुप्पी साधे रहे। यही वजह है कि मैंने कल भी और आज भी अन्ना आंदोलन को एक प्रतिक्रियावादी आंदोलन के तौर पर देखा। यह दूसरी बात है कि उस दौर में कांग्रेस की सरकार अपनी ग़लत नीतियों के कारण अलोकप्रिय हो रही थी। अन्ना आंदोलन ने सिर्फ़ उस ग़ुस्से को भुनाया और दक्षिणपंथी ताक़तों को मज़बूत किया।

इतिहास के ये सबक़ आज हमें भूलना नहीं चाहिए। हमें किसी भी आंदोलन को ‘ब्लैंक चेक’ नहीं देना चाहिए। साथ ही, सोशल मीडिया की ‘पॉपुलैरिटी’ को हमें ‘रियल पॉपुलैरिटी’ नहीं समझना चाहिए।

कोई भी आंदोलन हो, कोई भी पार्टी हो, कोई भी लीडर हो यह देखा जाना चाहिए कि इस पार्टी के मज़बूत होने से क्या वंचितों को न्याय मिलेगा? क्या वंचितों के लिए आरक्षण का पूर्ण रूप से अनुपालन किया जाएगा और उसे सम्मानपूर्वक देखा जाएगा? क्या जातिवाद का ख़ात्मा होगा? क्या समता पर आधारित समाज बनेगा? क्या अंधविश्वास का ख़ात्मा होगा? क्या देश से धार्मिक उन्माद की राजनीति खत्म होगी? क्या कामगारों को उनका हक़ मिलेगा?

अगर इन सवालों का जवाब सकारात्मक मिलता है, तभी आपको किसी आंदोलन के समर्थन में आगे आना चाहिए। मगर एक बात और है कि हमें किसी भी लोकतांत्रिक आंदोलन, जो सही अर्थों में सत्ता वर्ग की किसी भी ग़लत नीति से नाराज़ है, उसे ख़ारिज नहीं करना चाहिए। ऐसे आंदोलनों के साथ सहयोग भी हो सकता है, मगर एकता के लिए यह ज़रूरी है कि वह वंचितों के हितों को ध्यान में रखे और एकता का मक़सद समानता, सोशल जस्टिस और सेक्युलरिज़्म जैसे संवैधानिक मूल्यों को मज़बूत करने वाला हो। वक़्ती फ़ायदे या फिर किसी भी तरह की अवसरवादिता के आधार पर बना कोई भी गठजोड़ नुक़सान के सिवाय कुछ और नहीं दे सकता है।

यह भी ज़रूरी है कि हम सकारात्मक राजनीति के लिए अपनी खिड़कियां खोलकर रखें, लेकिन हमें इस बात को भी देखना है कि हम किसी प्रोपेगैंडा की आंधी में बह न जाएं। कुछ लोग यह भी कह रहे हैं कि जब बारिश होगी तो हम घरों में नहीं रहेंगे और खेतों में निकलेंगे। ऐसे लोग दरअसल अपनी अवसरवादी राजनीति को ‘जस्टिफाई’ कर रहे हैं। उनको कौन समझाए कि बारिश होने पर आप अपने खेतों में काम करने जाएं तो बेहतर होगा, मगर आप किसी दूसरे के खेत में बेगारी करने जाएंगे, तो फ़सल आपके घर नहीं आएगी।

(संपादन : नवल/अनिल)


फारवर्ड प्रेस वेब पोर्टल के अतिरिक्‍त बहुजन मुद्दों की पुस्‍तकों का प्रकाशक भी है। एफपी बुक्‍स के नाम से जारी होने वाली ये किताबें बहुजन (दलित, ओबीसी, आदिवासी, घुमंतु, पसमांदा समुदाय) तबकों के साहित्‍य, संस्‍क‍ृति व सामाजिक-राजनीति की व्‍यापक समस्‍याओं के साथ-साथ इसके सूक्ष्म पहलुओं को भी गहराई से उजागर करती हैं। एफपी बुक्‍स की सूची जानने अथवा किताबें मंगवाने के लिए संपर्क करें। मोबाइल : +917827427311, ईमेल : info@forwardmagazine.in

लेखक के बारे में

अभय कुमार

जेएनयू, नई दिल्ली से पीएचडी अभय कुमार संप्रति सम-सामयिक विषयों पर विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं के लिए स्वतंत्र लेखन करते हैं।

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