बीते 31 मई, 2026 को उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में अर्जक संघ के 59वें स्थापना दिवस के अवसर पर एक कार्यक्रम का आयोजन किया गया। इस मौके पर ‘अर्जक संघ : भारतीय संस्कृति का वाहक’ विषय पर संगोष्ठी हुई। इसका आयोजन लखनऊ से प्रकाशित मासिक पत्रिका ‘करेंट एजेंडा’ द्वारा किया गया, जिसमें राष्ट्रीय स्तर की प्रमुख हस्तियों ने अपना वक्तव्य रखा।
ध्यातव्य है कि उत्तर प्रदेश के पूर्व वित्त मंत्री सह कई बार के विधायक रहे महामना रामस्वरूप वर्मा ने सामाजिक और सांस्कृतिक विकल्प के रूप मे 1 जून, 1968 को अर्जक संघ की स्थापना की थी। इस संगठन का मुख्य नारा था– ‘जिसकी संस्कृति, उसकी सत्ता।’
कार्यक्रम के प्रारंभ में संचालन कर रहे ‘करेंट एजेंडा’ के सह-संपादक डॉ. अनूप पटेल ने महामना के जीवन और कृत्य पर विस्तार से जानकारी दी और कहा कि दलित, किसान और कामगार वर्ग अपनी बेहतरी के लिये अर्जक संस्कृति को अपनाए। कार्यक्रम की अध्यक्षता अर्जक संघ के राष्ट्रीय अध्यक्ष शिवकुमार भारती ने की।
मुख्य वक्ता के रूप में चेन्नई से आए ऑल इंडिया ओबीसी एंप्लॉयज फ़ेडरेशन के महासचिव जी. करुणानिधि रामासामी पेरियार नायकर के आत्मसम्मान आंदोलन के 100 साल और उत्तर भारत में महामना रामस्वरूप वर्मा के अर्जक संघ के योगदान को याद किया। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि दोनों आंदोलनों को साथ मिलकर काम करना चाहिए।

गाजियाबाद, उत्तर प्रदेश से आए प्रसिद्ध चित्रकार डॉ. लाल रत्नाकर ने अपने वक्तव्य में सांस्कृतिक वर्चस्व के खिलाफ़ क्रांतिकारी आंदोलन में अर्जक संघ के महत्व को रेखांकित किया और महामना रामस्वरूप वर्मा के योगदानों पर प्रकाश डाला। उन्होंने युवाओं और महिलाओं को बीच अर्जक संस्कृति को विस्तारित करने के तरीके भी बताए। उल्लेखनीय है कि डॉ. रत्नाकर अर्जक विधि से कई विवाह करवाते रहे है। उन्होंने अपने गृह क्षेत्र जौनपुर में अर्जक संघ का एक वैचारिक कार्यक्रम कराने की बात कही।
वहीं दिल्ली से आए लेखक विद्याभूषण रावत ने अपने वक्तव्य में अर्जक संघ को सांस्कृतिक वैचारिकी का अग्र-दल कहा। उन्होंने कहा कि नॉर्थ इंडिया मे बाबासाहब और पेरियार साहब को वैचारिक रूप से स्थापित करने में अर्जक संघ और महामना रामस्वरूप वर्मा का बहुत बड़ा योगदान है। बहुजन वर्ग के राजनीतिक-सामाजिक संगठनों ने इन योगदानों को भुला दिया लेकिन अर्जक संस्कृति बनी रही। अर्जक समाज को मेहनतकश कौम का संगठन बने रहना चाहिए।
लखनऊ यूनिवर्सिटी की प्रोफेसर रीता चौधरी ने अपने वक्तव्य में अर्जक संघ के आंदोलन में शामिल स्त्री-विमर्श को रेखांकित किया। उन्होंने अर्जक संघ की संस्कृति और महिलाओं के अधिकारों की व्याख्या की, जिसमें महिलाओं को समता और स्वतंत्रता के अधिकार पर बल दिया गया है। उन्होंने कहा कि अर्जक संघ में अधिक से अधिक महिलाएं सक्रिय रूप से शामिल हों, इसके लिए व्यापक स्तर पर प्रयास किए जाने की आवश्यकता है।
कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे शिवकुमार भारती ने अर्जक संघ की ऐतिहासिक यात्रा और भविष्य में आने वाली चुनौतियों पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि जब कार्यक्रम का विषय ‘अर्जक संघ : भारतीय संस्कृति का वाहक’ रखा गया तो संगठन के कई लोगों ने एतराज जताया, क्योंकि वर्तमान में व्याप्त संस्कृति, भारतीय संस्कृति नहीं है। कुछ लोगों की वर्चस्ववादी ब्राह्मणवादी संस्कृति ही संस्कृति मान ली गई है। इसका विकल्प समता, समानता और बंधुत्व पर आधारित अर्जक संस्कृति ही है। इसी संस्कृति को भारतीय संस्कृति कहा जाएगा। कार्यक्रम में महामना रामस्वरूप वर्मा को याद करते हुए झांसी से आए रंगकर्मी माता प्रसाद शाक्य ने एकल नाटक ‘क्रांतिकर्मा रामस्वरूप वर्मा’ का मंचन किया। इसके अलावा लखनऊ यूनिवर्सिटी के रिसर्च स्कॉलर आलोक यादव ने अपने शोध ‘रामस्वरूप वर्मा : जीवन और साहित्य’ के बारे में जानकारी दी, जिसने युवा शोधर्थियों को अर्जक संस्कृति पर शोध करने के लिए प्रेरित किया।
(संपादन : नवल/अनिल)
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