h n

ब्राह्मण वर्गों की ‘पवित्रता’ के निशाने पर बहुजन

कोई किसी विशेष नदी में नहाकर ‘पवित्र’ हो सकता है, भले उसका पानी बहुत दूषित हो। इसके विपरीत साफ़-सफ़ाई या स्वच्छता एक मूर्त और दिखाई देने वाली चीज़ है। आरएसएस और भाजपा का नॅरेटिव ‘पवित्रता’ पर केंद्रित होता है, क्योंकि उसका सामाजिक लक्ष्य वर्ण के आधार पर पवित्रता को स्थापित करना है। बता रहे हैं शाहनवाज़ आलम

बनारस नगर निगम ने मीट और मछली की दुकानों को शहर से बाहर करने का आदेश जारी किया है। इसका कारण शहर को गंदगी और जाम से बचाना बताया जा रहा है। लेकिन बनारस के कुछ संगठन जैसे ‘ब्रह्म सेना’ और ‘अभियान पवित्र काशी’ का दावा है कि ऐसा देश की ‘सांस्कृतिक राजधानी’ काशी की ‘पवित्रता’ को पुनर्बहाल करने के लिए किया गया है और वे जल्द ही काशी को मांस और मदिरा से मुक्त कर देंगे।

ग़ौरतलब है कि पिछले महीने ही इलाहाबाद हाईकोर्ट ने रमज़ान के दौरान बनारस में गंगा नदी में नाव पर अफ़तार करते हुए बिरयानी खाने और उसकी हड्डियों को पानी में फेंकने के आरोपियों को 60 दिन बाद ज़मानत दी थी, जिसका आधार उन युवाओं और उनके परिजनों की तरफ़ से माफ़ी मांगना रहा। अपने फ़ैसले में कोर्ट ने इसे धार्मिक भावनाओं को आहत करने वाला कृत्य बताते हुए गंगा की धार्मिक ‘पवित्रता’ की महत्ता को रेखांकित किया था। हालांकि पिछले दिनों ही हिंदू युवाओं द्वारा गंगा में ही नाव पर नॉनवेज बनाने और बीयर पीने के मामले में 24 घंटे में ही जमानत दे दिया जाना ‘पवित्रता’ केंद्रित एक ही तरह की दो घटनाओं को दो तरह की न्यायिक दृष्टि से देखे जाने को रेखांकित करता है।

बहरहाल, ‘पवित्रता’ के इस सवाल को हमें चार संवैधानिक बिंदुओं के मद्देनज़र परखना चाहिए।

पहला, क्या देश में कोई ऐसा भूभाग हो सकता है जो मौलिक अधिकारों से रहित हो?

दूसरा, क्या हमारा संविधान शहरों या स्थानों का धार्मिक या पवित्रता के आधार पर वर्गीकरण करता है?

तीसरा, क्या प्राकृतिक संसाधनों जैसे नदियों और पहाड़ों को धार्मिक स्थल कहा जा सकता है?

चौथा, क्या मांसाहार या शाकाहार के आधार पर किसी भी धर्म की एकरूपी व्याख्या की जा सकती है?

संविधान क्या कहता है?

भारतीय संविधान 6 मौलिक अधिकार देता है। इसमें अपनी पसंद का भोजन करना और अपनी इच्छा से किसी भी जगह अपने जीविकोपार्जन के लिए व्यवसाय करना भी शामिल है। भारतीय संविधान ऐसी किसी भी जगह का वर्गीकरण नहीं करता जहां लोगों को संविधान प्रदत अधिकारों को निलंबित किया जा सकता हो। यानी देश में ऐसा कोई ज़मीन का टुकड़ा नहीं हो सकता जो मौलिक अधिकारविहीन हो। इसलिए अगर किसी भी जगह के लोगों से उनके भोजन और व्यवसाय के आधार पर भेदभाव किया जाता है या किसी त्योहार के कारण कहीं मांस की बिक्री पर रोक लगाई जाती है तो यह एक सविधान विरोधी कृत्य है। इस संदर्भ में जारी किया गया कोई भी सरकारी आदेश अवैध है। लेकिन आश्चर्य की बात है कि हमारी न्यायपालिका इन घटनाओं पर या तो संज्ञान नहीं लेती या बहुसंख्यकवादी धार्मिक संगठनों के दबाव में इसे वैध ठहराने की कोशिश करती है।

दूसरा, संवैधानिक तौर पर भारतीय गणराज्य का कोई राज्य धर्म नहीं है। इसीलिए संविधान किसी भी राज्य या शहर या किसी भी क्षेत्र का वर्गीकरण धार्मिक आधार पर नहीं करता। इसलिए अगर कोई भी सरकारी या प्रशासनिक आदेश जो किसी भी स्थान का वर्गीकरण धार्मिक आधार पर करता है, वह असंवैधानिक है।

गंगा किनारे स्नान के बाद पूजा करता एक परिवार

बावजूद इसके ऐसा किया जाना उस हिंदुत्ववादी दबाव को दिखाता है जिसके तहत राज्य के धर्मनिरपेक्ष चरित्र को बदलने की सचेत कोशिश की जाती रही है। इसके लिए एक रणनीति के तहत भारत के एक स्वभावतः हिंदू राष्ट्र होने का नॅरेटिव तैयार किया जाता है। मसलन, बाबरी मस्जिद की जगह राम मंदिर बनाने के पक्ष में एक तर्क यह भी विकसित किया गया कि अगर अयोध्या में राम मंदिर नहीं बनेगा तो क्या अरब में बनेगा। यानी धर्मनिरपेक्ष भारत को एक आधिकारिक धार्मिक मुल्क के समानांतर खड़ाकर यह मनोवैज्ञानिक दबाव बनाया गया कि भारत को भी एक धार्मिक राष्ट्र होना चाहिए।

देवभूमि के अलग-अलग मानदंड

इसे आप सवर्ण हिंदू बहुलता वाले राज्यों उत्तराखंड और हिमांचल प्रदेश के लोकप्रिय भाषा में ‘देवभूमि’ संबोधित करने की प्रवृत्ति में भी देख सकते हैं। ज़ाहिर है इन दोनों राज्यों के सिर्फ़ ख़ूबसूरत और ऊंचे हिमालयी क्षेत्र होने के आधार पर तो ‘देवभूमि’ नहीं ही कहा जाता है। अगर यही मानदंड होते तो कश्मीर तो इन दोनों राज्यों से ज़्यादा ख़ूबसूरत और ऊंचाई वाला है। लेकिन चूंकि वह मुस्लिम बहुल राज्य है इसलिए उसे वे लोग ‘देवभूमि’ नहीं स्वीकार कर सकते जो हिंदू बहुल उत्तराखंड और हिमांचल प्रदेश को देवभूमि बताते हैं। यह एक तरह से इन दोनों राज्यों को मुसलमानों के लिए ‘बहिष्कृत’ बनाने का प्रयास है। इन दोनों राज्यों में मुसलमानों के ख़िलाफ़ होने वाली हिंसा, उनकी इबादतगाहों पर हमले और उनको वहां से भगाए जाने की घटनाओं का मुख्य तर्क ही यही होता है कि चूंकि यह ‘पवित्र’ और ‘देवभूमि’ है, इसलिए मुसलमान यहां नहीं रहने चाहिए।

इस प्रवृत्ति को आप अपने आसपास विकसित हो रही शहरी कॉलोनियों में भी देख सकते हैं जिनके नाम पहले धार्मिक पहचान पर रखे जाते हैं और फिर अगर कोई मुस्लिम परिवार वहां रहने आ जाता है तो उसे ‘पवित्रता’ पर ख़तरा बताकर कॉलोनी छोड़ने के लिए दबाव बनाया जाता है। जैसे पिछले दिनों मुज़फ़्फ़रनगर के ‘दक्षिणी कृष्णपुरी’ कॉलोनी में एक जैन परिवार ने एक मुस्लिम परिवार को फ़्लैट बेच दिया तो कॉलोनी के लोग डीएम कार्यालय पहुंचकर ‘कार्रवाई’ की मांग करने लगे और डीएम ने भी ‘कार्रवाई’ का आश्वासन दे दिया। यानी जहां प्रशासन को असंवैधानिक मांग रखने वाले लोगों के खिलाफ कार्रवाई करनी चाहिए थी, वहां वह ख़ुद ऐसी मांग करनेवालों के साथ खड़ा हो गया।

लेकिन सबसे अफ़सोस और आश्चर्य की बात है कि न्यायपालिका ऐसे संविधान विरोधी संबोधनों और कृत्यों पर स्वतः कोई हस्तक्षेप नहीं करती, जिससे इन मांगों को नॅरेटिव के स्तर पर स्वीकार्यता मिल जाती है।

नदी, पहाड़ और सूरज आदि धार्मिक कैसे?

तीसरा, नदी, पहाड़, सूरज, चांद आदि प्राकृतिक चीज़ें हैं। कोई भी धर्म प्रकृति से पुराना नहीं हो सकता। यानी पहाड़, नदी, सूरज या चांद किसी भी धर्म में महत्वपूर्ण तो हो सकता है, लेकिन वह मंदिर, मस्जिद या गिरजाघर की तरह धार्मिक स्थल नहीं हो सकता। इसी तरह नदियों के किनारे सभ्यताएं विकसित हुईं तो इसके अंतर्गत आनेवाले धर्म भी विकसित हुए। यानी नदियों पर कोई एक धर्म या संस्कृति के लोग दावा नहीं कर सकते। अगर कोई यह कहे कि किसी नदी पर सिर्फ़ उसकी धार्मिक मान्यताओं का प्रभुत्व होना चाहिए तो यह सभ्यतागत और प्राकृतिक दोनों आधारों से ग़लत है।

मसलन, हिंदू धर्म तीन हज़ार साल पुराना है तो गंगा नदी लाखों साल पुरानी होगी। आज अगर गंगा के तटीय इलाकों में हिंदू, मुसलमान, सिख और ईसाई सब हैं तो इसकी भी संभावना है कि हज़ार साल बाद सारे भारतीय किसी और धर्म को मानने वाले या नास्तिक हो जाएं। यानी धर्म आते-जाते हैं, प्रकृति रह जाती है।

ऐसे में इलाहाबाद हाईकोर्ट का अपने आदेश में गंगा नदी के धार्मिक महत्व पर अनायास ज़ोर देना और उसे धार्मिक स्थल के समान मानना अतार्किक है, क्योंकि धार्मिक स्थल मनुष्य बनाते हैं और नदियां प्रकृति की देन हैं। आप बहुत हद तक धार्मिक स्थल की परिधि में आने वाले नदी के हिस्से को धर्म स्थल का हिस्सा मान सकते हैं लेकिन पूरी नदी को आप धर्मस्थल नहीं कह सकते, क्योंकि इससे तो फिर अराजकता की ही स्थिति पैदा होगी। यदि ऐसा हुआ तो कोई भी सांप्रदायिक व्यक्ति पुलिस स्टेशन जाकर तहरीर दे आएगा कि मुसलमान उसकी धार्मिक नदी में कूड़ा फेंक रहे हैं। क्या ऐसा आदेश उत्तराखंड से लेकर बंगाल की खाड़ी तक गंगा के किनारे बसे करोड़ों मुसलमानों को अपराधी की श्रेणी में लाने का रास्ता नहीं खोल देगा?

शाकाहार बनाम मांसाहार का खेल

चौथा, हिंदू धर्म में भोजन को लेकर काफ़ी विविधता है। केरल, कश्मीर, बंगाल और गोवा में ब्राह्मण वर्गों तथा बिहार के मैथिल ब्राह्मणों में मांसाहार सामान्य है। वहीं पिछड़ों, अति पिछड़ों और हिंदू दलितों में भी मांसाहार सामान्य है। हिंदू मंदिरों में बलि प्रथा भी सामान्य है। यानी अगर आप हिंदुओं को सिर्फ़ शाकाहारी में वर्गीकृत करते हैं तो आपको हिंदू धर्म की विविधता की समझ नहीं है और आप ऐसा करके सिर्फ़ उत्तरी राज्यों के ब्राह्मणों के भोजन की आदत को सभी हिंदुओं पर थोप रहे हैं। दरअसल, इस मुद्दे पर महात्मा गांधी की समझ से सीखनी चाहिए।

एक बार सरदार पटेल ने गांधीजी से कहा कि हिंदू मांस नहीं खाते और मुसलमान मांसाहारी होते हैं। दोनों एक साथ कैसे रह सकते हैं? इस पर गांधीजी ने उन्हें सुधारते हुए बताया कि गुजरात को छोड़कर भारत के अन्य हिस्सों (जैसे यूपी, पंजाब और सिंध) में अधिकांश हिंदू मांस खाते हैं।

यानी मांसाहार और शाकाहार के प्रश्न को हमारे स्वतंत्रता आंदोलन ने बहुत पहले हल कर दिया था।

मांस के साथ मदिरा का ज़िक्र

दक्षिणपंथी संगठनों के इस ‘पवित्रता’ के आग्रह में मांस के साथ ही मदिरा को भी जोड़ा जाता रहा है। इसकी वजह मांसाहार को शराब सेवन के समान बताकर इसे सामाजिक अपराध की श्रेणी में लाना होता है, जिससे मांसाहारी लोग अपराधी की तरह देखे जाएं। दिल्ली के ऑटो रिक्शा के पीछे ‘पशु पर दया करें’ लिखने वाले किस राजनीतिक विचारधारा के लोग होंगे, समझा जा सकता है। यह दरअसल संभावित शिकारियों और शिकारों को गढ़ने की प्रक्रिया है।

इसीलिए मांस की दुकानों के साथ ही शराब की दुकानों को भी हटाने की मांग एक साथ होती है। अमूमन, आम बोलचाल में भी इसे स्वीकार्यता मिल गई है और लोग किसी नशे के आदि व्यक्ति को ‘शराबी’ के साथ ही ‘कबाबी’ भी बोलते हैं।

जबकि शराब एक नशीला पदार्थ है और कबाब मांस से बना सामान्य भोजन है। इसीलिए शराब की दुकानों पर यह चेतावनी लिखी होती है कि 18 वर्ष से कम आयु के व्यक्ति को शराब बेचना और उसका सेवन अपराध है। जबकि मांस की किसी दुकान पर यह नहीं लिखा होता कि नाबालिग को मांस बेचना अपराध है। आपने शायद ही कोई ऐसी ख़बर पढ़ी या सुनी हो कि किसी ने मांस खा लेने के कारण कहीं मारपीट या अराजकता की हो। जबकि शराब पीने के बाद ऐसी घटनाएं होनी आम हैं।

पवित्रता के निशाने पर बहुजन

‘पवित्रता’ एक अमूर्त धारणा है। कोई किसी विशेष नदी में नहाकर ‘पवित्र’ हो सकता है, भले उसका पानी बहुत दूषित हो। इसके विपरीत साफ़-सफ़ाई या स्वच्छता एक मूर्त और दिखाई देने वाली चीज़ है। आरएसएस और भाजपा का नॅरेटिव ‘पवित्रता’ पर केंद्रित होता है, क्योंकि उसका सामाजिक लक्ष्य वर्ण के आधार पर पवित्रता को स्थापित करना है। वर्ण-व्यवस्था के हिसाब से ब्राह्मण पवित्र है और बाक़ी अपवित्र। यानी यह पूरी अवधारणा ही बहुजन विरोधी है। इसीलिए, हमने देखा था कि दशहरा के दिन 15 अक्टूबर, 2002 को हरियाणा के झज्जर ज़िले के दुलीना गांव में हज़ार से ज़्यादा ग़ैर-दलित हिंदुओं की भीड़ ने मरी हुई गाय की चमड़ी उतारने वाले पांच दलितों को पुलिस चौकी से घसीट कर पीट-पीट कर मार डालने के दूसरे दिन विश्व हिंदू परिषद और बजरंग दल ने विजय जुलूस निकाला था। यह ‘पवित्रता’ को भंग करने वालों को चेतावनी थी। विश्व हिंदू परिषद के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष आचार्य गिरिराज किशोर ने प्रेस कांफ्रेंस करके हिंदू धर्म शास्त्रों को उद्धृत करते हुए इन हत्याओं को जायज़ ठहराते हुए कहा था कि “गाय का जीवन किसी भी मनुष्य के जीवन से ज़्यादा पवित्र होता है।”

(संपादन : नवल/अनिल)


फारवर्ड प्रेस वेब पोर्टल के अतिरिक्‍त बहुजन मुद्दों की पुस्‍तकों का प्रकाशक भी है। एफपी बुक्‍स के नाम से जारी होने वाली ये किताबें बहुजन (दलित, ओबीसी, आदिवासी, घुमंतु, पसमांदा समुदाय) तबकों के साहित्‍य, संस्‍क‍ृति व सामाजिक-राजनीति की व्‍यापक समस्‍याओं के साथ-साथ इसके सूक्ष्म पहलुओं को भी गहराई से उजागर करती हैं। एफपी बुक्‍स की सूची जानने अथवा किताबें मंगवाने के लिए संपर्क करें। मोबाइल : +917827427311, ईमेल : info@forwardmagazine.in

लेखक के बारे में

शाहनवाज आलम

लेखक भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के सचिव हैं

संबंधित आलेख

अगर जीतू मुंडा की जगह एक आदिवासी महिला होती …
आदिवासी समाज के कई हिस्सों में आज भी महिलाओं के प्रति अंधविश्वास, पितृसत्ता और सामाजिक भेदभाव गहराई से मौजूद हैं। ऐसी स्थिति में यदि...
एक दलित छात्रा का कैंपस के भीतर और बाहर का जीवंत अनुभव
अगर डांगावास (14 मई, 2015, राजस्थान), खैरलांजी (27 सितंबर, 2006, महाराष्ट्र) और लक्ष्मणपुर बाथे (1 दिसंबर, 1997) जैसे नरसंहार और प्रताड़नाएं दलित साहित्य का...
‘युगांतर’ के दायरे में अछूत
सन् 1930 के आरंभिक वर्षों तक संतराम बी.ए. एक ऐसे समाज सुधारक के तौर पर हमारे सामने प्रस्तुत होते हैं, जो हिंदू धर्म के...
जाति और सांवली त्वचा : विशेषाधिकारों पर मामूली खरोंच भर से बिलबिलाहट
यह संभव है कि क्रिकेटर लक्ष्मण शिवरामकृष्णन जैसे ऊंची जाति के सांवले व्यक्तियों के साथ कुछ मौकों पर ऐसा व्यवहार किया जाता हो जो...
जाति-विरोधी आंदोलनों के समक्ष ‘बहुवादीकरण’ की चुनौती
समकालीन जाति-विरोधी आंदोलन, बहुवाद (अलग-अलग पहचानों के चिह्नीकरण और आरक्षण की व्यवस्था) को बढ़ावा देने की मांग करने में तो आगे हैं, लेकिन वे...