देश में पेपर लीक होने की खबरें आम हो गई हैं। नीट के पेपर लीक हुए। बाइस लाख से ज्यादा छात्रों ने मेडिकल कॉलेजों में दाखिले के लिए दिन-रात मेहनत की। एक छात्र की परीक्षा की तैयारी में पूरा परिवार शामिल होता है। मेहनत करता है, पैसे खर्च करता है। लेकिन 2026 में नीट की परीक्षा के पेपर लीक हुए और परीक्षा रद्द कर दी गई। फिर परीक्षा की तारीख मुकर्रर की गई। छात्रों को दुबारा परीक्षा की तैयारी करनी पड़ी। नीट के बाद नेट की परीक्षा के पेपर लीक होने की खबरें आई। यह भी कॉलेजों में पढ़ाने की नौकरी के लिए परीक्षा होती है। प्रदेशों से ऐसे पेपर लीक होने की खबरें आती ही जा रही है। महाराष्ट्र, राजस्थान में भी पेपर लीक होने की खबरें आई। यहां तक कि एफटीआईआई यानी फिल्म एंड टेलीविजन इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया में दाखिले के लिए दिल्ली में होने वाली ऐसी परीक्षा भी थी, जिसे पेपर लीक होने की आशंका जाहिर करने पर रद्द करनी पड़ी। एफटीआईआई में दाखिले के लिए परीक्षाएं रद्द हुईं, लेकिन उसकी खबरें ज्यादा नहीं चलीं। न जाने ऐसी कितनी और ऐसी खबरें हो सकती हैं।
क्यों बढ़ रही हैं पेपर लीक होने की घटनाएं? क्या पेपर लीक होने का यह सिलसिला रुकेगा? हालात क्यों ऐसे हैं कि यह सिलसिला कहीं खत्म होता नहीं दिखाई दे रहा है? इसकी क्या वजहें हैं?
जिस पेपर लीक पर थोड़ा शोर मचता है, विरोध होता है और छात्र भूख हड़ताल पर बैठ जाते हैं। राजनीतिक सत्ता उसमें कुछ करने और सक्रियता दिखाने की कोशिश करती है। लेकिन सरकारी मशीनरी आखिर क्या कर सकती है।
नीट के पेपर जब लीक हुए तो 9 दिनों के बाद यह बात पक्की हो गई कि परीक्षा के लिए गेसपेपर के नाम पर असल परीक्षा के पेपर लीक कर दिए गए थे। जिस परिवार और छात्र के सपने अपनी मेहनत से दाखिले पर टिके हों, उनके लिए परीक्षा रद्द की खबर कितना भारी हो सकती है। छात्रों ने आत्महत्याएं की। परीक्षा का रद्द होना और परीक्षा के नतीजे हमारे समाज में आत्महत्या के फैसले तक के लिए छात्रों को मजबूर कर देती है।
नीट की परीक्षा के पेपर लीक को महज एक क्राइम की तरह सरकारी मशीनरी ने लिया। सीबीआई की जांच बैठा दी गई। सीबीआई ने महाराष्ट्र से एक ऐसे व्यक्ति को पकड़ा जो प्रोफेसर रहा है और प्रश्न पत्र तैयार करने की प्रक्रिया से जुड़ा रहा है। उसने गेसपेपर के नाम पर एक कोचिंग सेंटर को नीट के प्रश्न पत्र बेचे। कोचिंग का धंधा चमका। आखिर इस देश में कोचिंग का धंधा चमकने के कारण क्या हैं? कोचिंग के मालिक अपने यहां आने वाले कुछ सफल परीक्षार्थियों की कामयाबी के फोटो छापते-छपवाते हैं। विदेशों में अपने लिए ऐशोआराम की जगहें बनाते हैं। कोचिंग के पूरा धंधा गेस यानी संभावित प्रश्नों के उत्तर तैयार करवाने पर टिका है। आखिर यह कब से शुरू हुआ और क्यों शुरू हुआ? कोचिंग देश की सबसे बेहतरीन ऊर्जा और समझदारी का कैसे दोहन कर रहे हैं?

बहरहाल नीट के पेपर लीक मामले में गिरफ्तारी हुई। लेकिन नेशनल टेस्टिंग एजेंसी (एनटीए) तो बनी थी पूरे देश में लीक मुक्त परीक्षा कराने के लिए। आखिर यह सिस्टम इतनी जल्दी कैसे लाचार दिखने लगा? उसे कौन चलाता है?
शिक्षा संविधान की ऐसी विषय-वस्तु है जो मुख्य रूप से राज्य सरकारों के अधीन है। केंद्र की विषय सूची में भी है, लेकिन दाखिले की परीक्षाएं केंद्र सरकार आखिर अपने नियंत्रण में क्यों लेती जा रही है? कॉमन यूनिवर्सिटी इंट्रेंस टेस्ट (सीयूईटी) भी ऐसी ही परीक्षा है।
सीबीआई जब जांच करने लगी तो उसे 2025 में भी नीट के प्रश्नों को दाएं-बाएं करने का सबूत मिला है। लेकिन उसकी जांच केवल प्रश्न पत्र तैयार करने से जुड़े टीचर और कोचिंग सेंटर तक ही क्यों सीमित है। नीट की परीक्षा में ये दो चेहरे दिखाए जा रहे हैं, लेकिन पेपर लीक केवल नीट का ही नहीं हुआ है। पेपर लीक एक आम घटना की तरह दिखने लगी है। इसीलिए इसकी तह में गए बगैर इसे केवल आपराधिक मामला बताने से पेपर लीक के सिलसिले को रोका नहीं जा सकता है।
आखिर क्यों नहीं यह अनिवार्य किया जाना चाहिए कि प्रदेशों में परीक्षा के पेपर लीक हो तो मंत्री का इस्तीफा हो, सबसे बड़ा अधिकारी निलंबित हो। पेपर लीक की सजा परिवार और छात्र क्यों भुगतें। पेपर लीक के मसले को लेकर छात्रों को भूख हड़ताल करनी पड़ रही है। आखिर क्यों वे मंत्री के इस्तीफे की मांग कर रहे हैं। यदि पेपर लीक एक राजनीतिक जिम्मेदारी का प्रश्न नहीं बनेगा तो यह सिलसिला कैसे रूकेगा।
इस बात को ऐसे भी समझने की जरूरत है कि पेपर लीक आखिर किसके लिए होता है। उन छात्रों के लिए नहीं होता है जिनका परिवार किसी तरह जुगाड़ करके, पेट काटकर, कई तरह के खर्चों में कटौती करके अपने बच्चों को पढ़ाने के लिए मेहनत करते हैं। पेपर लीक उन परिवार के लिए होता है जिनके पास बहुत पैसे होते हैं और जिन्हें बच्चों की मेहनत पर भरोसा नहीं होता। अपने पैसे पर गुमान होता है। वे कौन होते हैं? हम कह सकते हैं कि ऐसे लोग अधिकारी होते हैं, व्यापारी होते हैं, ठेकेदार होते हैं, राजनेता होते हैं, बहुत पैसा कमाने वाले इंजीनियर और डॉक्टर और इस तरह के कई पेशे वाले होते हैं। ये वे हैं जो समाज पर अपना वर्चस्व रखते हैं।
एक सवाल पर विचार करना चाहिए कि गेस यानी संभावित प्रश्न का पूरा फंडा आया कैसे? फिर परीक्षा के लिए कोचिंग का धंधा उससे कैसे जुड़ा?
दरअसल जब समाज में वैसे लोग पढ़ने के लिए निकलते हैं जो अब तक वंचित रहे हैं तो वे अपनी पूरी ताकत और मेहनत से कुछ हासिल करने के लिए तैयारी करते हैं। जैसे लड़कियां आगे निकल रही हैं, क्योंकि उन्हें पढ़ने से वंचित रखा गया। वे जहां मौका मिल रहा है, वहां झंडे गाड़ रही हैं। इसी तरह समाज की कई जातियां हैं, जिन्हें पढ़ने से रोककर रखा गया। गरीबी में पलने वाले परिवारों के लोग भी हैं, जिन्हें गरीबी के कारण वंचित होना पड़ा। ऐसे लोग अपनी पूरी उर्जा कामयाबी के लिए लगा देते हैं। दूसरी तरफ संसाधनों की लूट करने वाले, भ्रष्ट तरीकों से अपना वर्चस्व रखने वाला एक वर्ग है, जो पॉवर के बिना नहीं रह सकते हैं। ऐसे लोग हर चीज को खरीदने में यकीन रखते हैं। वे वैसी ही नस्लें भी तैयार करना चाहते हैं।
एक तरफ यह वर्ग पहले से बहुत ज्यादा मजबूत हुआ है तो दूसरी तरफ स्त्रियों और वंचित जातियों में पढ़ने की भूख तेज हुई है।
ऐसे हालात में कोचिंग का व्यापार और पेपर लीक बढ़ रहे हैं तो उसकी वजहें बिल्कुल आईने की तरह साफ दिखती हैं। पेपर लीक उस वर्ग के लिए ‘पॉवरफुल’ बने रहने का आसान रास्ता है। स्त्रियां और वंचित जातियां केवल अवसर चाहती हैं और वर्चस्व रखने वाला वर्ग अवसरों से वंचित करने के रास्ते निकालता है। पेपर लीक अवसरों से वंचित करने का रास्ता है। जैसे इंटरव्यू को भी ऐसे ही एक माध्यम के रूप में इस्तेमाल किया गया है। पेपर लीक की एक राजनीतिक जिम्मेदारी निश्चित की जानी चाहिए, वर्ना यह सिलसिला थमने वाला नहीं।
(संपादन : नवल/अनिल)