मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली यूपीए-2 के कार्यकाल के दौरान अन्ना हजारे के नेतृत्व में भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन हुआ। भ्रष्टाचार विरोधी एक माहौल सत्ता संस्थानों में काम कर रहे कई नौकरशाहों के जरिए बनाने में मदद मिली। जिन नौकरशाहों ने इस माहौल में उस दौरान अपनी भूमिका निभाई, उन्हें उसका ईनाम भी नरेंद्र मोदी की सरकार ने दिया।
सभी बड़ी और चुनावबाज राजनीतिक पार्टियों और उनके नेताओं की छवि इस हद तक गिर चुकी है कि वे किसी भी आंदोलन को खड़ा नहीं कर सकते हैं। उन्हें एक ऐसे आंदोलन की जरूरत होती है जो अपने सह-उत्पाद यानी अपने प्रभाव का लाभ उस पार्टी को दे सकें जो कि सत्ताधारी पार्टी के बगल में खड़ी हो।
अन्ना आंदोलन की पृष्ठभूमि में
अन्ना हजारे का चेहरा सामने रखकर भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन दो तरह की योजनाओं का हिस्सा था। एक तो अन्ना हजारे को सामने रखकर नौकरशाही से राजनीति में आए अरविंद केजरीवाल को अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षा का आधार बनाना था और वह भी उस जमीन के एक हिस्से पर खड़े होकर जिस जमीन पर भाजपा खड़ी थी। अरविंद केजरीवाल बार-बार यह दोहराते रहे कि वे कोई राजनीतिक पार्टी नहीं बनाएंगे। लेकिन उनकी राजनीतिक महत्वाकांक्षा दूसरी संसदीय पार्टियों के बहुतेरे नेताओं से अलग नहीं था। अकेले अपनी पार्टी का चेहरा बनने के लिए उन्होंने अन्ना हजारे के साथ खुद को बराबर तस्वीरों में बनाए रखा। राजनीतिक पार्टी बनने के बाद जो भी उनकी भक्ति के साथ खड़ा रहा, वह आम आदमी पार्टी में बना रहा। दूसरा भाजपा ने कांग्रेस के बरअक्स सबसे बड़ी पार्टी होने का यह फायदा उठाया कि वह नरेंद्र मोदी के चेहरे के साथ फिर से सत्ता में आ गई।
इस आंदोलन की पूरी मंशा साफ तौर पर जाहिर हो गई तो आंदोलनों को देखने के प्रति सावधानी और सतर्कता बढ़ी। आंदोलन अपने उपरी हिस्से में जो दिखता है, वह अंदर से भिन्न इरादों और नतीजों के साथ ही चलता है। सत्ता और उसकी राजनीतिक संस्कृति से उबे, डरे, सताए गए और उपेक्षित लोगों को उल्टी दिशा की तरफ ले जा सकता है जो कि किसी तरह से दीख नहीं रहा है। शोर इतना बढ़ा दिया जाता है कि भटकी हुई दिशा की कोई आवाज भी सुनाई नहीं पड़ती है।
मुख्य रूप से यह माना जा सकता है कि अब तक के आंदोलनों का लाभ भाजपा जैसे संसदीय दलों ने उठाया है। इसकी बड़ी वजह यह है कि उसके आधार में राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ है जो कि एक निश्चित राजनीतिक उद्देश्यों को हासिल करने के लिए बना हुआ है। उसका उद्देश्य संविधान के मकसद से बिल्कुल उलट रहा है। जाहिर-सी बात है कि वह सीधे तौर पर अपना मकसद हासिल नहीं कर सकता है। उसे इसके लिए रास्ते निकालने पड़े हैं। लेकिन आंदोलन कई बार स्वत:स्फूर्त भी हो सकते हैं और उसमें अपनी पैठ बढ़ाने की उसकी कोशिश हो सकती है। दूसरा वह आंदोलनों में सहयोगी बनकर उसके प्रभाव का इस्तेमाल कर सकता है।
स्वत:स्फूर्त आंदोलनों के भीतर घुसी राजनीति की पहचान
सवाल यह है कि स्वत:स्फूर्त आंदोलनों की राजनीतिक स्तर पर कैसे पड़ताल की जा सकती है? झंडे, डंडे, नारे, और भाषण – ये सब उसकी पहचान कराने में सहायक सामग्री देते हैं। वे दरअसल एक राजनीतिक दिशा की तरफ ले जाने का स्पष्ट संकेत देते हैं। लेकिन इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है कि कई बार आंदोलन वास्तविक अर्थों में स्वत:स्फूर्तता से शुरू होते हैं और वे बिना किसी राजनीतिक मकसद के हो सकते हैं। बाद में उन आंदोलनों के राजनीतिक इस्तेमाल करने की प्रतिस्पर्धा शुरू होती है। बड़े आंदोलन जितने भी हुए हैं वे लोगों की स्वत:स्फूर्त की भावना से ही विस्तार पा सके हैं।
मैं स्वत:स्फूर्तता को अपने अनुभवों से स्पष्ट करने की कोशिश यहां कर रहा हूं। 1980 के दशक में एक दिन हम सुबह किसी चायखाने में बैठे थे। हम मतलब युवाओं का एक समूह जो कि रोजाना उस चायखाने में जमा हो जाता था और राजनीतिक घटनाक्रमों, समाज में घटित होने वाली कुछ प्रवृत्तियों पर बातचीत करके अपना समय गुजारा करते थे। उस दिन का एक अखबार हमारे सामने आया तो उसमें एक खबर छपी थी कि राज्य सरकार के मंत्री ने स्थानीय एसपी को बदलने का ऐलान किया है। जबकि वह एसपी जिले में अपराध नियंत्रण करने में बहुत हद तक सफल था। लेकिन भ्रष्ट अधिकारी और राजनेता उससे बहुत परेशान थे। हमने खबर पढ़ते ही एक रिक्शे पर बैठकर पूरे शहर में लाउडस्पीकर से यह ऐलान कर दिया कि एसपी के तबादले के खिलाफ शाम को आम सभा होगी। आम सभा में लोग जमा हुए। आम सभा की समाप्ति पर हमने दूसरे दिन शहर बंद करने का ऐलान कर दिया और पूरी आम सभा उसी वक्त अपने इस ऐलान की जानकारी शहरवासियों को देने निकल पड़ी।
दूसरे दिन न केवल शहर बंद हुआ बल्कि इस तरह की स्थिति बन गई कि कई दिनों तक मुख्य मार्ग पर जाम लगा रहा। जाहिर-सी बात है कि कांग्रेस की सत्ता थी तो जितने भी विरोधी दल के नेता थे, वे अपने तरह से इस आंदोलन में अपना चेहरा चमकाने की कोशिश करने लगे। राजनीतिक पार्टियों का मकसद एक लोकतांत्रिक राजनीतिक संस्कृति बनाना नहीं होता, वह संस्कृति जो लोकतंत्र को मजबूत करती है, लोगों में सवाल करने की चेतना बढ़ाती है। उस आंदोलन का यह असर हुआ कि एसपी का स्थानांतरण थोड़े समय के लिए टला। लेकिन जिस दिन वे शहर से जा रहे थे तब पूरा शहर उमड़ पड़ा था। राजनीतिक पार्टी के तौर पर कांग्रेस वहां कभी भी अपनी छवि नहीं सुधार सकी। चुनाव जीतने का गणित तो अलग होता ही है।

आंदोलनों का आखिरकार राजनीतिक फायदा यानी विरोधी दलों को सत्ता में पहुंचने के लिए रास्ता आसान हो जाता है। लेकिन आंदोलन से राजनीतिक पार्टियों पर एक दबाव बराबर बना रहता है। लोकतंत्र केवल सत्ता में एक पार्टी के खिलाफ दूसरी पार्टी को सत्ता में भेजने की प्रक्रिया नहीं है। लोकतंत्र का विचार और चेतना से लोगों को जोड़ना यह लोकतांत्रिक माहौल को बनाए रखने के लिए सबसे जरूरी माना जाता है।
कॉकरोच जनता पार्टी के आंदोलन की पूर्व पीठिका
मैं काकरोच जनता पार्टी का सोशल मीडिया पर गठन करने वाले अभिजीत दीपके को एक बेहद सीमित संख्या वाली ऑनलाइन मिटिंग में सुन रहा था। वे तब वहां थे जब 20 जुलाई को संसद मार्च के लिए लोगों को दिल्ली पहुंचने की अपील की जा रही थी। वे मीटिंग में कहते हैं कि उन्होंने कभी सोचा नहीं था कि इस तरह आंदोलन हो सकता है। “उन्होने तो मजाक-मजाक में यह सब शुरू किया था।” भारत के मुख्य न्यायधीश ने जब युवाओं को काकरोच जैसा कहा तब अभिजीत ने स्वत:स्फूर्त सोशल मीडिया पर एक बैनर बना दिया। चूंकि नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली सरकार ने लोगों को हल्के में लेने की संस्कृति विकसित कर ली है तो दूसरी तरफ समाज की लोकतांत्रिक चेतना और न जाने कितने सारे आंदोलनों से बने लोकतंत्र के विचारों पर हमला महसूस होता है। लोग मौके और मंच की तलाश में होते हैं कि वे कब और कहां मिले।
अभिजीत के विदेश से दिल्ली आने में एक राजनीति थी कि वह डॉ. आंबेडकर की तस्वीर के साथ हवाई अड्डे से निकला। शायद उसे यह समझ है कि डॉ. आंबेडकर भारतीय समाज में बराबरी और आजादी की चेतना का सबसे बड़ा चेहरा हैं। जाहिर है कि उसका एक राजनीतिक मुकाम भी होगा और वह स्पष्ट होगा। लेकिन उसके जंतर-मंतर पर पहुंचने से पहले उसके कार्यक्रम का विभिन्न स्तरों पर राजनीतिक इस्तेमाल करने की प्रतिस्पर्द्धा खड़ी होती है।
मोर्चे के मध्य राहुल गांधी
भारतीय समाज की यह विडंबना बन गई है कि वह अनजाने लोगों को सबसे विश्वसनीय मान लेने की विवशता में खड़ा है। यहां के राजनीतिक चेहरे, पार्टी, संगठन सभी उसके इर्द-गिर्द राजनीतिक स्तर पर अपनी वैधता या अपने विस्तार की गुंजाइश देखने लगते हैं। यह भी माना गया कि अभिजीत को जिस तरह देश में आने दिया गया और जंतर-मंतर मुहैया कराया गया, वह सत्ताधारी राजनीतिक दल की एक ऱणनीति का हिस्सा थी, क्योंकि राजनीतिक पार्टी के तौर पर राहुल गांधी सीबीएससी के बाद नीट की परीक्षा पेपर के लीक होने के मसले को सबसे ज्यादा उठा रहे थे। वे जगह-जगह छात्रों की गूंज पैदा करने की कोशिश कर रहे थे। लेकिन वहां स्वत:स्फूर्तता का मामला नहीं जुड़ रहा था। हो सकता है कि भाजपा अपने मुख्य प्रतिद्वंदी कांग्रेस के नेता राहुल गांधी को मिलने वाले राजनीतिक लाभ से बेचैनी महसूस कर रही हो। और उसे यह लगा कि अभिजीत दीपके के जरिए राहुल की मुहिम की हवा निकाली जा सकती है। अभिजीत को अपने कार्यक्रमों के लिए समर्थन चाहिए था, क्योंकि जमीनी स्तर पर वह शून्य की स्थिति में खड़ा था। वह लोगों में बेचैनी और गुस्से का मंच बनने की ललक लिए हुए था। यही उसका सांगठनिक आधार था।
अभिजीत के जंतर-मंतर पर डेरा डालने के बाद का राजनीतिक विश्लेषण किया जाना चाहिए कि वह किन-किन राजनीतिक प्रवृत्तियों के साथ दिखने लगा। सोनम वांगचुक के आने के बाद मंचों पर वैसी ही नारे जुड़ गए जैसे कि अन्ना हजारे के चेहरे के साथ आंदोलन हुआ था। डॉ. आंबेडकर का चेहरा जो प्रमुख रूप से बना था, वह धुंधला होकर पृष्ठभूमि की तरफ बढ़ने लगा। मुख्य मंच पर सीजेपी थी और वह सोनम के साथ खुद आंदोलन का एकमात्र चेहरा बनने की कोशिश में रहा। शुरुआती दौर में जो अभिजीत के साथ छात्र संगठनों के चेहरे दिख रहे थे वे मंच के नीचे दरियों पर टेंट में दिखने लगे। जो मांगें कांग्रेस कर रही थी, वही जंतर-मंतर में भी दिखने लगी।
जंतर-मंतर पर लगभग सभी विपक्षी पार्टियों के नेता पहुंचे। कांग्रेस के प्रतिनिधि भी पहुंचे। लेकिन कांग्रेस जंतर-मंतर के साथ एकजुट नहीं दिखना चाहती थी, वह मांग और आंदोलन के साथ एकजुटता का रणनीतिक संदेश देने की कोशिश में ही लगी रही। कांग्रेस के राहुल गांधी के सामने यह चुनौती थी कि वह कैसे जंतर-मंतर के नेतृत्व से ज्यादा मुखर दिखें और इस क्रम में प्रधानमंत्री के आवास पर बतौर विपक्ष के नेता पहुंचना एक बड़ी घटना थी। इससे आम आदमी पार्टी की जंतर-मंतर को अपने राजनीतिक मकसद को पूरा करने को लेकर बेचैनी दिखी। कांग्रेस और भाजपा के सांठगांठ का बचकाना आरोप आम आदमी पार्टी ने लगाया। भाजपा चूंकि सत्ताधारी पार्टी है वह विपक्षी पार्टी के हर कदम के राजनीतिक प्रभाव और मायने को सबसे बेहतरीन ढंग से विश्लेषित कर सकती है। उसके संसदीय राजनीति पर पड़ने वाले प्रभाव का आकलन कर सकती है। लिहाजा पहली कोशिश में उसने सोनम वांगचुक के जरिए अपनी सरकार के मंत्री को बचाने की कोशिश की।
भाजपा का टूटा भरोसा
दरअसल सत्ताधारी भाजपा को खुद का भरोसा टूट गया है कि आंदोलनों, लोकतांत्रिक विरोध को वह मैनेज कर सकती है। लोगों पर ज्यादती, जुल्म, दमन की कहानियों को अपने स्तर पर दुरुस्त कर लेगी। इसकी वजह यह कि वह लोगों को हल्के में लेने की संस्कृति में ढल चुकी है। वह तो कांग्रेस के बढ़ते प्रभाव के बीच मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को इस्तीफे से बचाने की कोशिश कर रही थी। लेकिन आंदोलन अभिजीत और सोनम के दायरे से बाहर हो गई थी। सोनम सीजेपी के चेहरे भर बन पाए। वे आंदोलन का नेतृत्व नहीं हासिल कर पाए। स्वत:स्फूर्तता ने आंदोलन का नेतृत्व संभाल लिया था। एक तरफ राहुल गांधी राजनीतिक पार्टी के रूप में इस मुद्दे को लेकर अपने स्तर पर कार्यक्रम कर रहे थे तो दूसरी तरफ उन्होने जंतर-मंतर पर मंच के नीचे दरी पर बैठने वाले आंदोलनकारियों से संपर्क में आए। इससे पूरी तस्वीर बदल गई। नरेंद्र मोदी की सरकार के मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा ले लिया गया। प्रेस कांफ्रेंस के जरिए सरकार के मंत्री और अभिजीत एवं उसके दोस्तों ने आंदोलनकारियों की मांगों को पूरा होने का ऐलान कर जंतर-मंतर से बिना किसी प्रस्ताव पर एक सहमति बनाने की कोशिश के बगैर अपने कार्यक्रम को खत्म करने का ऐलान कर दिया। हालांकि सत्ताधारी भाजपा भी अपनी रणनीतियों से वह नतीजे हासिल नहीं कर सकी जो कि वह चाहती थी।
जंतर-मंतर आंदोलन की यह विशेषता है कि वह स्वत:स्फूर्तता के नेतृत्व में चेतना के भीतर संगठित हो गया है। जंतर-मंतर ने लोकतंत्र के लिए जो उत्पाद किया है वह एक राजनीतिक संस्कृति के लिए जरूरी है। लाखों की तादाद में लोग ही नहीं, नई पीढ़ी के सदस्य और उनका परिवार इस आंदोलन से सीधे व अप्रत्यक्ष रूप से जुड़े और लोकतंत्र के साथ उनका विश्वास जुड़ा। पहली बार लाखों युवाओं, जिनमे लड़कियों की बड़ी तादाद शामिल है, का इस तरह खड़े होना लोकतंत्र के विचारों व चेतना की एक हरियाली फसल है। संसदीय राजनीति पर इसका प्रभाव दिखेगा।
(संपादन : नवल/अनिल)
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