डॉ. आंबेडकर भगवत गीता को बौद्ध धर्म के विरुद्ध ‘ब्राह्मणवादी प्रतिक्रांति का दार्शनिक कवच’ मानते थे। उनकी रचनाओं में भगवत गीता पर जो निबंध संकलित है, वह इसी शीर्षक से संकलनकर्ताओं को मिला था– ‘फिलोसोफिक डिफेन्स ऑफ़ काउंटर-रेवोलूशन : कृष्ण एंड हिज़ गीता।’ वह इस निबंध के आरंभ में कुछ प्रश्न उठाते हैं, जैसे “प्राचीन भारत के साहित्य में भगवत गीता का क्या स्थान है? क्या यह उसी अर्थ में हिंदू धर्म का शास्त्र है, जिस अर्थ में बाइबिल ईसाई धर्म का शास्त्र है? यदि यह एक धर्मशास्त्र है, तो इसकी वास्तविक शिक्षा क्या है? यह किस सिद्धांत का प्रतिपादन करता है?”[1] आंबेडकर लिखते हैं, “इस विषय के योग्य विद्वानों ने इन प्रश्नों के अलग-अलग जवाब दिए हैं, और वे जवाब हैरान करने वाले हैं।”[2] उन्होंने कुछ विद्वानों के विचारों को उद्धृत किया है। जैसे, बोटलिंगक का यह विचार कि “गीता में कई ऊंचे और सुंदर विचार हैं, पर साथ में कई विरोधाभासी, बेतुकी और घिनौनी बातें भी हैं।”[3] हॉपकिंस का यह मत कि “भगवत गीता आदिम समय के दार्शनिक विचारों का एक बेमेल संग्रह है।”[4] होल्ट्ज़मैन का यह कथन कि “भगवत गीता में एक सर्वेश्वरवादी कविता का विष्णुवादी संशोधन है।”[5] गार्बे का यह निष्कर्ष कि गीता में “कृष्ण ने अपने को उस परम ईश्वर के रूप में दर्शाया है, जिसने संपूर्ण जगत और समस्त जीवों को बनाया है और वह उन सब पर राज करता है। दूसरी ओर, वह ब्रह्म और माया के वेदांतिक सिद्धांत को समझाते हैं, और मनुष्य के सबसे ऊंचे लक्ष्य के तौर पर बताते हैं कि जगत भ्रम से मुक्त होकर ब्रह्म बन जाए। लेकिन यह कहीं नहीं सिखाया गया है कि ईश्वरवाद सत्य के ज्ञान का आरंभिक कदम है या उसका प्रतीक है, और वेदांत का सर्वेश्वरवाद ही परम तत्व है।”[6] इसी तरह आंबेडकर ने मि. तेलंग का मत व्यक्त किया है, जिसमें वह लिखते हैं कि गीता में सब परस्पर-विरोधी बातें भरी हुई हैं।[7]
इन विभिन्न मतों के संबंध में आंबेडकर लिखते हैं, “ये उन लोगों के विचार हैं, जिन्हें आधुनिक विद्वान कहा जा सकता है। पुराने ख्यालों वाले पंडितों के विचारों की बात करें, तो हमें और भी कई तरह के विचार मिलते हैं। एक विचार यह है कि भगवत गीता कोई सांप्रदायिक ग्रंथ नहीं है, बल्कि यह वह ग्रंथ है, जो मुक्ति के तीन मार्गों – (1) कर्म मार्ग, (2) भक्ति मार्ग, और (3) ज्ञान मार्ग – का प्रचार करती है। वे पंडित बताते हैं कि भगवत गीता के 18 अध्याय में से, अध्याय 1 से 6 ज्ञान मार्ग, 7 से 12 कर्म मार्ग और 12 से 18 अध्याय भक्ति मार्ग का वर्णन करते हैं।” इन पंडितों के ठीक विपरीत मत रुढ़िवादी ब्राह्मण शंकराचार्य और तिलक का है। आंबेडकर लिखते हैं, “शंकराचार्य इस मत के हैं कि भगवत गीता ने जो ज्ञानमार्ग का उपदेश दिया है, वही मुक्ति का सच्चा मार्ग है। तिलक ऐसे किसी विद्वान के मत से सहमत नहीं हैं। वह इस बात का खंडन करते हैं कि गीता में कोई कमी है। वह उन पंडितों से भी सहमत नहीं हैं, जो यह कहते हैं कि भगवत गीता मुक्ति के तीनों मार्गों को मान्यता देती है। वह शंकराचार्य से भी असहमत होते हुए यह मानते हैं कि गीता कर्मयोग की शिक्षा देती है, ज्ञान योग की नहीं।”[8]
आंबेडकर, गीता पर अपने अध्ययन में इन सभी विद्वानों से असहमत हैं। वह लिखते हैं, “ये अलग-अलग विचार इस वजह से हैं, क्योंकि इन विद्वानों ने गीता को कुरान, बाइबिल या धम्मपद की तरह एक धर्मशास्त्र समझकर उसमें धर्म की शिक्षा की खोज की है। यह धारणा पूरी तरह से गलत है। भगवत गीता कोई धर्मशास्त्र नहीं है, जिसमे धर्म की शिक्षा की व्यर्थ खोज की जाए। अब यह सवाल पूछा जा सकता है कि अगर भगवत गीता धर्मशास्त्र नहीं है, तो क्या है? मेरा उत्तर यह है कि भगवत गीता न तो धर्म की किताब है और न ही दर्शनशास्त्र की। भगवत गीता असल में दार्शनिक आधार पर धर्म के कुछ सिद्धांतों का बचाव करती है। अगर इस वजह से कोई इसे धर्मशास्त्र या दर्शनशास्त्र का ग्रंथ कहना चाहे, तो वह अपनी इच्छा से कह सकता है। लेकिन हकीकत में यह इन दोनों में से कुछ भी नहीं है।”[9]
आंबेडकर भगवत गीता की अपनी व्याख्या में लिखते हैं, “गीता को पढ़ते समय सबसे पहले युद्ध को सही ठहराने का उदाहरण मिलता है। अर्जुन युद्ध के खिलाफ है, और संपत्ति के लिए लोगों को मारने का विरोध करता है। कृष्ण युद्ध का और युद्ध में लोगों की हत्याओं का एक दार्शनिक बचाव करते हैं। युद्ध का यह दार्शनिक बचाव दूसरे अध्याय के श्लोक 11 से 28 में मिलेगा। युद्ध का यह दार्शनिक बचाव दो तर्कों पर आधारित है। एक तर्क यह है कि दुनिया वैसे भी खत्म होने वाली है और मनुष्य मरणधर्मी है। समझदार व्यक्ति को इससे क्या फर्क पड़ता है कि मनुष्य स्वाभाविक मौत मरे या हिंसा से मरे? जीवन तो असत्य है, उसके खत्म होने पर आंसू क्यों बहाए जाएं? मौत तो होनी ही है। फिर मौत की चिंता क्यों की जाए? युद्ध को सही ठहराने के लिए दूसरा तर्क यह है कि यह सोचना गलत है कि शरीर और आत्मा एक हैं। वे दोनों न सिर्फ बिल्कुल अलग हैं, बल्कि उनमें इतना अंतर है कि शरीर नष्ट हो जाता है, जबकि आत्मा हमेशा अमर रहती है। जब मौत होती है, तो शरीर ही मरता है। आत्मा कभी नहीं मरती। यहां तक कि हवा उसे सुखा नहीं सकती, आग उसे जला नहीं सकती, और कोई हथियार उसे काट नहीं सकता। इसलिए यह कहना गलत है कि जब कोई आदमी मारा जाता है, तो उसकी आत्मा भी मर जाती है। सिर्फ उसका शरीर मर जाता है। उसकी आत्मा मरे हुए शरीर को वैसे ही छोड़ देती है, जैसे कोई मनुष्य अपने पुराने कपड़े छोड़कर नए कपड़े धारण करता है। इसलिए जब आत्मा मरती ही नहीं, तो युद्ध में हत्या के लिए न तो पछताने की ज़रूरत है, और न उस पर शर्म करने की। यह भगवत गीता का तर्क है।”[10]
गीता जिस दूसरे सिद्धांत की दार्शनिक रक्षा करती है, वह चतुर्वर्ण है। आंबेडकर लिखते हैं, “भगवत गीता बेशक यह कहती है कि चतुर्वर्ण का निर्माण ईश्वर ने किया है, इसलिए वह पवित्र है। लेकिन उसको वह मनुष्यों के जन्मजात गुणों से जोड़कर उसकी दार्शनिक रक्षा करती है। गीता कहती है कि मनुष्य के वर्ण का निर्धारण उसकी अपनी इच्छा से नहीं, बल्कि उसके जन्मजात गुणों से निश्चित होता है।”[11]
जिस तीसरे सिद्धांत को गीता दार्शनिक कवच पहनाती है, वह आंबेडकर के अनुसार, कर्म मार्ग है। “कर्ममार्ग से गीता का तात्पर्य मोक्ष के लिए किए जाने वाले यज्ञ जैसे कर्मकांड से है। कर्मयोग को बचाने का कारण यह था कि उसमें कुछ विद्रूप पैदा हो गए थे, जिसमें एक विद्रूप अंधविश्वास था। गीता इस कमी को दूर करने के लिए बुद्धियोग को प्रस्तुत करती है। वह कहती है, स्थितप्रज्ञ बनो, अर्थात बुद्धि से युक्त कर्मकांड में कुछ भी गलत नहीं है। कर्मकांड में जो दूसरी बुराई पैदा हुई, वह स्वार्थ, यानी फल की कामना है। गीता इसे दूर करने के लिए आसक्ति का सिद्धांत प्रस्तुत करती है। यानी, कर्म करो, पर फल की इच्छा मत करो।”[12] इस प्रकार, आंबेडकर कहते हैं, “भगवत गीता कर्मयोग में बुद्धियोग और अनासक्ति के भाव की स्थापना से कर्ममार्ग की दार्शनिक रक्षा करती है।”[13]
वे कौन-से सिद्धांत हैं, जिनके लिए भगवत गीता को दार्शनिक बचाव की ज़रूरत पड़ी, और भगवत गीता के लिए उन सिद्धांतों की रक्षा क्यों करनी पड़ी? आंबेडकर लिखते हैं, “भगवत गीता जिन सिद्धांतों का दार्शनिक बचाव करती है, वे प्रतिक्रांति के सिद्धांत हैं जैसा कि प्रतिक्रांति की बाइबिल, अर्थात जैमिनि कृत पूर्वमीमांसा में वर्णित हैं। … वास्तव में गीता का संबंध आम तौर से कर्म बनाम ज्ञान की किसी दार्शनिक चर्चा से नहीं है। कर्म योग से गीता का मतलब जैमिनी के कर्मकांड में दिए गए सिद्धांत हैं और ज्ञान योग से उसका मतलब है बादरायण के ब्रह्मसूत्रों में दिए गए सिद्धांत। गीता में कर्म की बात करते समय धार्मिक कार्यों और रीति-रिवाजों की बात की जा रही है। गीता को एक पार्टी के पैम्फलेट की तरह और इस तरह दिखाकर, जैसे वह उच्च दर्शन की किताब है, यह कोशिश की गई है कि कर्म और ज्ञान जैसे शब्दों का मतलब बढ़ा-चढ़ाकर बताया जाए और उन्हें आम मतलब का बनाया जाए। ‘देशभक्त भारतीयों’ की इस चाल के लिए काफी हद तक श्री तिलक दोषी हैं। नतीजा यह हुआ है कि इन गलत मतलबों ने लोगों को यह यकीन दिला दिया है कि भगवत गीता एक अलग, अपने आप में पूरी किताब है और इसका उससे पहले के लिटरेचर से कोई लेना-देना नहीं है। लेकिन अगर कोई कर्म योग शब्द का वही मतलब माने जो भगवत गीता में मिलता है, तो उसे यकीन हो जाएगा कि कर्म योग की बात करते हुए भगवत गीता जैमिनी द्वारा बताए गए कर्मकांड के सिद्धांतों के अलावा और कुछ नहीं कह रही है, जिसे वह नया बनाने और मज़बूत करने की कोशिश करती है। कर्म योग की बात करते हुए भगवत गीता ने केवल जैमिनी के बताए कर्मकांड के सिद्धांतों को ही नया बनाने और मज़बूत करने की कोशिश की है।”[14]
भगवत गीता को प्रतिक्रांति के सिद्धांतों का बचाव करना क्यों ज़रूरी लगा? इस प्रश्न के उत्तर में आंबेडकर लिखते हैं, “उन सिद्धांतों को बौद्ध धर्म के हमलों से बचाने के लिए ही गीता की रचना की गई थी। बुद्ध ने अहिंसा की शिक्षा दी थी। इस शिक्षा को, ब्राह्मणों के सिवा, आम लोगों ने अपने जीवन में उतार लिया था। उन्हें हिंसा से नफ़रत हो गई थी। बुद्ध ने चातुर्वर्ण्य के खिलाफ़ आवाज़ उठाई। उन्होंने चातुर्वर्ण्य के सिद्धांत पर हमला करने के कारण चातुर्वर्ण्य का ढांचा टूट गया था। चातुर्वर्ण्य का क्रम उलट गया था। बुद्ध की व्यवस्था में शूद्र और महिलाएं संन्यासी बन सकते थे। बुद्ध ने कर्मकांड और यज्ञों की निंदा की थी। उन्होंने हिंसा के आधार पर उनकी बुराई की थी। उन्होंने इस आधार पर भी उनकी बुराई की थी कि उनके करने से कोई लाभ नहीं मिलता है। पुनरुत्थानवादी ब्राह्मण इस हमले का विरोध यह कहकर करते थे कि ये बातें वेदों में लिखी हुई हैं, इसलिए इन सिद्धांतों पर सवाल नहीं उठाया जा सकता।”[15]
आंबेडकर लिखते हैं, “बौद्ध युग में, जो भारत का सबसे बुद्धिवादी और तर्कवादी युग था, ऐसे बेवकूफी भरे, ऊलजलूल, मनमाने, बिना तर्क वाले और कमज़ोर आधार पर टिके सिद्धांत शायद ही टिक पाते। जिन लोगों ने अहिंसा को जीवन का सिद्धांत मानकर अपना नियम बना लिया था, उनसे इस सिद्धांत को स्वीकार करने की अपेक्षा कैसे की जा सकती थी कि क्षत्रिय जो हत्या करता है, वह पाप नहीं है, क्योंकि वेद कहते हैं कि हत्या करना उसका कर्तव्य है? जिन लोगों ने सामाजिक समानता के सिद्धांत को स्वीकार कर लिया था, और जो व्यक्तियों की योग्यता के आधार पर समाज का पुनर्निर्माण कर रहे थे, वे सिर्फ इसलिए ऊंच-नीच के चातुर्वर्ण्य के सिद्धांत को कैसे मान सकते थे कि वेद ऐसा कहते हैं? जिन लोगों ने बुद्ध की यह शिक्षा मान ली थी कि समाज में दुख का कारण तृष्णा है, वे लोग इस वजह से कि वेद कहते हैं, उस धर्म को कैसे मान सकते थे, जो लोगों को बलि देने की शिक्षा देता था? इसलिए इसमें संदेह नहीं कि बौद्ध धर्म के ज़बरदस्त हमले के कारण जैमिनी के प्रतिक्रांति के सिद्धांत डगमगा रहे थे और अगर उन्हें भगवत गीता से दार्शनिक समर्थन न मिला होता, तो वे खत्म हो गए होते।”[16]
लेकिन आंबेडकर गीता द्वारा हत्या के दार्शनिक बचाव को बहुत ही बचकाना तर्क मानते हैं। वह लिखते हैं, “गीता में कृष्ण का अर्जुन से यह कहना कि मनुष्यों को मारना कोई हत्या नहीं है, क्योंकि शरीर मरता है, आत्मा नहीं, हत्या का ऐसा बचाव है, इससे पहले नहीं सुना गया। अगर कृष्ण एक वकील के तौर पर किसी ऐसे आरोपी के लिए पेश होते, जिस पर हत्या का मुकदमा चल रहा हो और भगवत गीता में बताए गए बचाव की दलील देते, तो इसमें ज़रा भी शक नहीं कि उन्हें पागलखाने भेज दिया जाता। इसी तरह सांख्य के गुण-सिद्धांत के आधार पर चतुर्वर्ण का बचाव भी बचकाना है। क्योंकि कृष्ण को यह अहसास नहीं था कि चतुर्वर्ण में चार वर्ण होते हैं, जबकि सांख्य के अनुसार गुण सिर्फ तीन ही होते हैं। अत: चार वर्णों की व्यवस्था का बचाव उस दर्शन के आधार पर कैसे किया जा सकता है, जो तीन से ज़्यादा वर्णों को मान्यता नहीं देती? कृष्ण का बचाव इतना बचकाना है कि उसे बिल्कुल भी गंभीरता से नहीं लिया जा सकता। लेकिन इसमें संदेह नहीं कि भगवत गीता की इस दार्शनिक सहायता के बिना ब्राह्मणवाद के पुनरुत्थान की क्रांति अपनी बेवकूफी भरी बातों की वजह से खत्म हो गई होती। आज ब्राह्मणवाद गीता की वजह से ही जिंदा है। उसका यह दार्शनिक समर्थन जैमिनी की पूर्व मीमांसा से भी ज़्यादा मज़बूत है, जो ब्राह्मणवाद के केंद्रीय सिद्धांत चातुर्वर्ण्य का बचाव करता है।”[17]

गीता ने जैमिनी की पूर्वमीमांसा का उल्लेख नहीं किया है। इस बारे में आंबेडकर लिखते हैं, “यह सच है कि भगवत गीता में जैमिनी का नाम नहीं लिया गया है, और न ही मीमांसा का नाम लिया गया है। लेकिन क्या इसमें कोई शक है कि तीसरे अध्याय के श्लोक 9-18 में भगवत गीता जैमिनी के पूर्व मीमांसा में बताए गए सिद्धांतों के बारे में बात कर रही है? यहां तक कि तिलक भी मानते हैं कि गीता में पूर्व मीमांसा के सिद्धांतों की जांच की गई है। इस तर्क को पेश करने का एक और तरीका है। जैमिनी शुद्ध और सरल कर्म योग का उपदेश देते हैं। दूसरी ओर, भगवत गीता अनासक्ति कर्म का उपदेश देती है। इस प्रकार भगवत गीता न सिर्फ़ कर्म योग को बदलती है, बल्कि शुद्ध और सरल कर्मयोग को मानने वालों पर कुछ कड़े शब्दों में हमला भी करती है। अगर गीता जैमिनी से पहले की है, तो उम्मीद की जा सकती है कि जैमिनी भगवत गीता के इस हमले पर ध्यान देते और उसका जवाब भी देते। लेकिन हमें जैमिनी में भगवत गीता के अनासक्ति कर्म योग का कोई उल्लेख नहीं मिलता। क्यों? इस क्यों का केवल एक ही उत्तर है कि यह बदलाव जैमिनी के बाद आया, पहले नहीं, जिसका सीधा अर्थ है कि भगवत गीता जैमिनी की पूर्वमीमांसा के बाद लिखी गई।”[18]
आंबेडकर आगे लिखते हैं, “माना कि भगवत गीता में पूर्व मीमांसा का उल्लेख नहीं है, लेकिन उसके अध्याय 13 के चौथे श्लोक में बादरायण के ब्रह्मसूत्रों के नाम का उल्लेख तो मिलता है। ब्रह्मसूत्रों का यह उल्लेख बहुत ज़रूरी है, क्योंकि इससे यह साफ़ स्पष्ट होता है कि गीता ब्रह्मसूत्रों से भी बाद की रचना है।”[19]
क्या भगवत गीता बौद्ध धर्म से प्राचीन है? यह प्रश्न तेलंग ने उठाया है। आंबेडकर ने तेलंग का एक लंबा उद्धरण हिंदुओं के विचारार्थ प्रस्तुत किया है। इसके बाद वह लिखते हैं, “कोई भी हिंदू विद्वान यह स्वीकार नहीं करता कि गीता पर बौद्ध धर्म का कोई प्रभाव है। वे यह बात इसलिए स्वीकार नहीं करते, क्योंकि इससे गीता को बौद्ध धर्म से प्राचीन नहीं ठहराया जा सकता। यही दृष्टिकोण तिलक और डॉ. राधाकृष्णन का है। उन्हें यहां भी गीता में बौद्ध धर्म के साथ समानता मिलती है, वहां वे उसे उपनिषदों से लिया गया बता देते हैं। पुनरुत्थानवादी हिंदुओं की नीच सोच की खासियत है कि वे बौद्ध धर्म को किसी तरह का श्रेय देना नहीं चाहते।”[20]
आंबेडकर गीता पर बौद्ध धर्म के प्रभाव को रेखांकित करते हुए लिखते हैं कि गीता और बौद्ध धर्म का तुलनात्मक अध्ययन करने पर पता चलता है कि गीता सांख्य दर्शन के साथ-साथ बौद्ध विचारों से भी भरी हुई है। “गीता में ब्रह्मनिर्वाण पर चर्चा है। ब्रह्मनिर्वाण तक पहुंचने के लिए पांच मार्ग बताए गए हैं– (1) श्रद्धा, (2) व्यवसाय, (3) स्मृति, (4) समाधि, और (5) प्रज्ञा। निर्वाण का यह सिद्धांत गीता ने कहां से लिया है? निश्चित रूप से यह उपनिषदों से नहीं लिया गया है, क्योंकि किसी भी उपनिषद में निर्वाण का उल्लेख नहीं है। निर्वाण का यह पूरा विचार बौद्ध धर्म का है, और गीता ने इसे बौद्ध धर्म से ही लिया है। जिस व्यक्ति को इस पर संदेह हो, वह गीता के ब्रह्मनिर्वाण की तुलना बौद्धों के महापरिनिब्बान सुत्त में वर्णित निर्वाण की बौद्ध विचार से कर सकता है। वह जान जाएगा कि गीता का ब्रह्मनिर्वाण वही है, जो बौद्धों का निर्वाण है। क्या यह कहना सत्य नहीं होगा कि गीता ने बौद्धों के निर्वाण की अवधारणा को चुराए जाने के तथ्य को छिपाने के मकसद से ही उसे ब्रह्मनिर्वाण का नाम दिया है?”[21]
आंबेडकर एक और उदाहरण गीता के अध्याय 7 के श्लोक 13-20 से देते हैं। “इन श्लोकों में यह चर्चा है कि कृष्ण को कौन प्रिय है? वह व्यक्ति, जो ज्ञान रखता है, या वह, जो कर्म करता है, या वह, जो भक्त है? कृष्ण कहते हैं, उन्हें भक्त प्रिय हैं, पर यह भी कहते हैं कि उसमें भक्ति के सच्चे गुण होने चाहिए। एक सच्चे भक्त के क्या गुण होने चाहिए? कृष्ण के अनुसार सच्चा भक्त वह है, जो मैत्री, करुणा, मुदिता, और उपेक्षा का पालन करता हो। भगवत गीता ने एक सच्चे भक्त के ये गुण कहां से लिए हैं? ये भी उसने (उपनिषदों से नहीं), बौद्ध धर्म से लिए हैं। जिन्हें प्रमाण चाहिए, वे महापदान सुत्त और तेविज्ज सुत्त से तुलना कर सकते हैं, जहां बुद्ध ने चित्त की मुक्ति के लिए चार भावनाओं का उपदेश दिया है। इस तुलना से पता चल जाएगा कि पूरी विचारधारा शब्दश: बौद्ध धर्म से ली गई है।”[22]
आंबेडकर तीसरा उदाहरण भगवत गीता के अध्याय 13 में वर्णित क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ का देते हैं। श्लोक 7-11 में कृष्ण इस भाषा में बताते हैं कि ज्ञान क्या है और अज्ञान क्या है– “श्रेष्ठता के अभिमान का अभाव, दंभाचारण का अभाव, प्राणिमात्र को किसी प्रकार भी न सताना, क्षमाभाव तथा मन, वाणी की सरलता, गुरु की सेवा, बाहर-भीतर की शुद्धि, अंत:करण की स्थिरता, मन और इन्द्रियों-सहित शरीर का निग्रह, भोगों में अनासक्ति, जन्म, जरा, मृत्यु, और रोगों के दुःख और बुराई पर विचार करना, पुत्र, स्त्री, घर और धन आदि में आसक्ति का अभाव, ममता का न होना, प्रिय-अप्रिय की प्राप्ति में चित्त का सम रहना, मेरे प्रति अटूट भक्ति, मेरा एकाग्र ध्यान, अध्यात्मज्ञान में नित्य स्थिति, और तत्वज्ञान के अर्थरूप की अनुभूति यह सब ज्ञान कहलाता है, और जो इसके विपरीत है, वह अज्ञान है।”[23]
आंबेडकर कहते हैं, “क्या कोई भी जो बुद्ध के धर्म के बारे में कुछ भी जानता है, इस बात से इनकार कर सकता है कि भगवत गीता ने इन श्लोकों में बौद्ध धर्म के मुख्य सिद्धांतों को शब्दशः नहीं दोहराया है?”[24]
इसी तरह आंबेडकर अध्याय 13 के श्लोक 5, 6, 18 और 19 के हवाले से लिखते हैं कि गीता इन श्लोकों में कर्मों का एक नया मेटाफोरिकल मतलब बताती है, जो अलग-अलग शीर्षक (1) यज्ञ, (2) दान, (3) तप, (4) आहार और (5) स्वाध्याय (वैदिक अध्ययन) के नाम से हैं। पुराने विचारों की इस नई व्याख्या का स्रोत क्या है? यदि इसकी तुलना बुद्ध के मज्झिम निकाय (I, 286 सुत्त 26) में कही गई बातों से करें, तो यह साफ़ हो जाता है कि कृष्ण जो कहते हैं, वह बुद्ध के शब्दों को ही हू-ब-हू दोहराया गया है।”[25]
निबंध के दूसरे भाग में आंबेडकर ने तिलक के मत की आलोचना की है। तिलक गीता को न पूर्वमीमांसा के बाद की कृति मानते हैं, और न बौद्ध धर्म के बाद की। तिलक एक नया ही तर्क गढ़ते हैं। वह हीनयान बौद्ध धर्म और महायान बौद्ध धर्म में अंतर करते हुए कहते हैं कि महायान बौद्ध धर्म भगवत गीता के बाद आया था। इसलिए उनके अनुसार, यदि बौद्ध धर्म और भगवत गीता के बीच कुछ समानताएं मिलती हैं, तो वह इसलिए है कि महायान ने गीता के विचारों को ग्रहण किया है। आंबेडकर इस मत के विरुद्ध दो प्रश्न उठाते हैं। पहला, महायान की उत्पत्ति कब हुई? और दूसरा, भगवत गीता किस काल में लिखी गई? आंबेडकर लिखते हैं, “तिलक होशियार और चालाक हैं। लेकिन उनके तर्क में कोई दम नहीं है। पहली बात तो यह कि उनका तर्क मौलिक नहीं है। इसे उन्होंने विंटरनिट्ज़ और केर्न द्वारा की गईं कुछ आकस्मिक टिप्पणियों से लिया है। इन टिप्पणियों के पीछे विंटरनिट्ज़, केर्न या तिलक की ओर से किसी विशेष शोध का कोई प्रमाण नहीं है। वे सभी इस सोच से चलते हुए लगते हैं कि भगवत गीता महायान बौद्ध धर्म से पहले की है। … तिलक का मानना है कि गीता महाभारत का हिस्सा है और दोनों को व्यास नाम के एक ही लेखक ने लिखा है, इसलिए महाभारत का समय भगवत गीता का समय ही होना चाहिए। तिलक का कहना है कि महाभारत शक युग से कम से कम 500 साल पहले लिखी गई होगी, इस आधार पर कि महाभारत की कहानियां मेगस्थनीज को पता थीं, जो लगभग 300 ईसापूर्व में चंद्रगुप्त मौर्य के दरबार में एक ग्रीक राजदूत के तौर पर भारत आया था। शक संवत 78 ईस्वी में शुरू हुआ था। इस आधार पर यह पता चलता है कि भगवत गीता 422 ईसापूर्व से पहले लिखी गई होगी। मौजूदा गीता की रचना के समय के बारे में तिलक का यही मानना है।”[26]
आंबेडकर तिलक की धारणा का खंडन करते हुए कहते हैं, “महाभारत की रचना-काल के बारे में तिलक का मत सही नहीं है। तिलक यह मानकर चलते हैं कि पूरी भगवत गीता और पूरी महाभारत एक ही बार में, एक ही समय में और एक ही हाथ से लिखी गई हैं। यह मानने का कोई आधार न परंपरा में है और न इसका कोई प्रमाण इन दोनों पुस्तकों के भीतर मिलता है। इस तरह तिलक की यह सोच भारतीय परंपराओं के ही खिलाफ है। यह परंपरा महाभारत की रचना को तीन भागों में बांटती है; (1) जय (2) भारत और (3) महाभारत; और वह हर भाग का एक अलग लेखक बताती है। इस परंपरा के अनुसार, व्यास महाभारत के पहले भाग ‘जय’ के लेखक थे। ‘भारत’ नाम के दूसरे भाग के लेखक वैशम्पायन थे, और ‘महाभारत’ नाम के तीसरे भाग का लेखक ‘सौति’ को माना जाता है। यह परंपरा सही है, जिसकी पुष्टि प्रो. हॉपकिंस अनुसंधान से हुई है, और महाभारत में दिए गए आंतरिक प्रमाणों की जांच पर आधारित है।”[27]
प्रो. हॉपकिंस के हवाले से आंबेडकर लिखते हैं, “महाभारत की रचना के कई चरण रहे हैं। पहले चरण में सिर्फ़ एक पांडु महाकाव्य था, जिसमें महाभारत युद्ध में भाग लेने वाले नायकों की कहानियां थीं, जिनमें शिक्षाप्रद बातें नहीं थीं। यह भाग प्रो. हॉपकिंस के अनुसार 400-200 ईसापूर्व के बीच लिखा गया होगा। दूसरे चरण में उसमें शिक्षा देने वाली बातें और पौराणिक चीज़ें शामिल की गईं। इस भाग का लेखन 200 ईसापूर्व और 200 ईस्वी के बीच हुआ। तीसरे चरण में (1) आखिरी किताबें उसमें जोड़ी गईं, जैसा कि दूसरे चरण के अंत में पहली किताब के परिचय के साथ था और (2) बड़े अनुशासन पर्व को शांति पर्व से अलग करके एक अलग किताब के तौर पर पहचान दी गई। यह कार्य 200 से 400 ईस्वी के बीच किया गया। इन तीन चरणों में प्रोफ़ेसर हॉपकिंस ने कभी-कभी बढ़ा-चढ़ाकर बताने का एक चौथा या अंतिम चरण जोड़ा है, जो 400 ईस्वी से शुरू हुआ था। इस परिणाम पर पहुंचने के लिए प्रोफ़ेसर हॉपकिंस ने तिलक द्वारा दिए गए सभी तर्कों पर बात की है, जैसे पाणिनि और गृह्यसूत्र में महाभारत का उल्लेख। तिलक ने जो नए प्रमाण दिए हैं, जिन पर प्रोफ़ेसर हॉपकिंस ने विचार नहीं किया है, वे सिर्फ़ दो हैं। इनमें एक प्रमाण चंद्रगुप्त मौर्य के दरबार में ग्रीक राजदूत मेगस्थनीज की कही गई बातों का है, और दूसरा आदिपर्व का खगोलीय प्रमाण, जिसमें उत्तरायण की शुरुआत श्रवण नक्षत्र से होने का उल्लेख है। तिलक ने जो मेगस्थनीज की बातें बताई हैं, वे सही हैं और उनको नकारा नहीं जा सकता। इससे यह साबित हो सकता है कि मेगस्थनीज के समय यानी लगभग 300 ईसापूर्व में सौरसेनी समुदाय में कृष्ण पूजा का एक पंथ शुरू हो गया था। लेकिन इससे यह कैसे साबित हो सकता है कि महाभारत तब अस्तित्व में आ गया था? यह हो ही नहीं सकता था। न ही इससे यह साबित हो सकता है कि मेगस्थनीज ने जो किंवदंतियां और कहानियां बताईं, वे महाभारत से ली गई थीं। क्योंकि इस बात से कोई इनकार नहीं कर सकता कि ये किंवदंतियां और कहानियां गाथाओं का एक तैरता हुआ ढेर थीं और ये ढेर महाभारत के लेखक और ग्रीक राजदूत, दोनों के लिए एक भंडार के रूप में काम आया था।”[28]
आंबेडकर आगे लिखते हैं, “तिलक के खगोलीय साक्ष्य काफी सही हो सकते हैं। उनका कहना सही है कि ‘अनुगीता’ में कहा गया है कि विश्वामित्र ने नक्षत्रों की गिनती श्रवण (मा.भा. अश्व.44.2, और आदि.71.34) से शुरू की थी। लेकिन टिप्पणी करने वालों ने इसका यह अर्थ निकाला कि तब उत्तरायण श्रवण नक्षत्र से शुरू होता था, और इसका कोई दूसरा अर्थ नहीं हो सकता। वेदाङ्ग-ज्योतिष के समय में, उत्तरायण सूर्य के धनिष्ठा नक्षत्र में होने से शुरू होता था। खगोलीय गणना के अनुसार, सूर्य के धनिष्ठा नक्षत्र में होने पर उत्तरायण शुरू होने की तारीख शक युग से लगभग 1,500 साल पहले थी; और खगोलीय गणना के अनुसार, उत्तरायण को एक नक्षत्र पहले शुरू होने में लगभग एक हज़ार साल लगते हैं। इस गणना के अनुसार, उत्तरायण की शुरुआत श्रवण नक्षत्र में सूर्य के साथ होने का समय शक युग से लगभग 500 साल पहले आता है। यह नतीजा सही होता, अगर यह सच होता कि संपूर्ण महाभारत की रचना एक ही समय में एक ही लेखक द्वारा की गई थी। इसे देखते हुए, तिलक के खगोलीय साक्ष्यों का उपयोग महाभारत का रचना-काल तय करने के लिए नहीं किया जा सकता।”[29]
आंबेडकर तर्क करते हैं, “महाभारत की रचना के लिए एक ही समय तय करने की कोई भी कोशिश बेकार मानी जाएगी, जो लंबे अंतराल पर अलग-अलग भागों में लिखी गई एक लंबी कहानी है। बस इतना ही कहा जा सकता है कि महाभारत 400 ईसापूर्व से 400 ईस्वी के बीच लिखी गई थी। कुछ जानकारों को यह समय भी बहुत कम लगता है। यह कहा जाता है कि वनपर्व के 190वें अध्याय में शिक्षाओं का ज़िक्र बौद्ध स्तूप के लिए गलत समझा गया है, जबकि असल में यह मुस्लिम हमलावरों द्वारा मुस्लिम धर्म बदलने वालों के लिए बनाई गई ईदगाहों के बारे में है। अगर यह मतलब सही है, तो इससे पता चलता है कि महाभारत के कुछ हिस्से मोहम्मद गोरी के हमलों के बारे में या उसके बाद लिखे गए थे।”[30]
‘तिलक की थ्योरी के पीछे’, आंबेडकर की दृष्टि में, “दो बातें हैं। पहली यह कि गीता महाभारत का हिस्सा है, और दोनों के लिखे जाने का एक ही समय है और दोनों का एक ही लेखक है। उनकी दूसरी बात यह है कि “भगवत गीता आज भी शुरू से वैसी ही है, जैसी इसे पहली बार लिखा गया था। गीता को महाभारत से जोड़ने के पीछे तिलक का मकसद बिल्कुल साफ़ है। उनका मानना है कि महाभारत का समय पता होना चाहिए, ताकि भगवत गीता का समय पता न चले। जिस आधार पर तिलक ने महाभारत और भगवत गीता के बीच एक पक्का संबंध बनाने की कोशिश की है, वह दुर्भाग्य से उनकी थ्योरी का सबसे कमज़ोर हिस्सा है। तिलक का यह मानना कि गीता महाभारत का हिस्सा है क्योंकि दोनों के लेखक व्यास हैं। यह असल में एक कल्पना को सच ठहराना है। तिलक जैसे लोग यह मानकर चलते हैं कि व्यास किसी खास व्यक्ति का नाम है, जिसे पहचाना जा सकता है। यह इस बात से साफ़ है कि महाभारत के लेखक व्यास हैं, पुराणों के लेखक व्यास हैं, भगवत गीता के लेखक व्यास हैं और ब्रह्मसूत्र के लेखक व्यास हैं। क्या यह सच हो सकता है कि एक ही व्यास इन सभी रचनाओं के लेखक हों, जो कई शताब्दियों तक फैले हुए लंबे समय से अस्तित्व में रहे हैं? यह सब जानते हैं कि कैसे पुराने ज़माने के लेखक अपनी पहचान छिपाने के लिए किसी सम्मानित नाम का इस्तेमाल करके अपनी रचनाओं के लिए बेहतर पहचान पाना चाहते थे। इसलिए व्यास एक सम्मानित नाम था, जिसका इस्तेमाल अपने उपनाम के तौर पर करने की आदत थी। इसलिए अगर गीता के लेखक व्यास हैं, तो वह अवश्य ही कोई और व्यास ही होंगे। एक और तर्क है जो श्री तिलक की भगवत गीता और महाभारत की रचना के बीच तालमेल की थ्योरी के खिलाफ लगता है।”[31]
अपनी अंतिम बहस में आंबेडकर ने महाभारत और भगवत गीता में कृष्ण की अलग-अलग स्थिति पर चर्चा की है। उन्होंने प्रश्न किया है कि ऐसा क्यों है कि महाभारत का जो कृष्ण है, वह भगवत गीता के कृष्ण से एकदम अलग है? दोनों के बीच कोई असमानता क्यों है? वह लिखते हैं, “महाभारत में कृष्ण को कहीं भी ऐसे भगवन के रूप में नहीं दिखाया गया है, जिसे सब मानते हों। महाभारत से ही पता चलता है कि लोग उसे पहला स्थान देने के लिए भी तैयार नहीं थे। जब राजसूय यज्ञ के समय धर्म ने अतिथि के रूप में सम्मान देने के लिए कृष्ण को प्राथमिकता देने का प्रस्ताव रखा, तो कृष्ण के करीबी रिश्तेदार शिशुपाल ने विरोध किया और कृष्ण को गाली दी। उसने कृष्ण पर न सिर्फ़ घटिया कुल का होने का आरोप लगाया, बल्कि उसे गंदी नैतिकता वाला, और एक साज़िश करने वाला भी कहा, जिसने जीत के लिए युद्ध के नियम तोड़े। कृष्ण के बुरे कर्मों का यह रिकॉर्ड इतना घिनौना, लेकिन सच्चा था कि जब दुर्योधन ने उन्हें कृष्ण के सामने रखा, तो महाभारत के गदा पर्व में खुद लिखा है कि स्वर्ग से देवता कृष्ण पर लगाए गए आरोपों को सुनने के लिए वहां आए और सुनने के बाद उन्होंने फूल बरसाए, यह दिखाने के लिए कि आरोप पूरी तरह सच हैं। दूसरी तरफ, भगवत गीता ने कृष्ण को सबसे ताकतवर, सब कुछ जानने वाला, सब जगह मौजूद, पवित्र, प्यार करने वाला, अच्छाई का सार बताया। एक ही व्यक्ति के बारे में दो बिल्कुल अलग-अलग विचारों वाली ऐसी दो रचनाएं एक ही समय में एक ही लेखक द्वारा नहीं लिखी जा सकती थीं। यह अफ़सोस की बात है कि तिलक भगवत गीता की रचना को बौद्ध काल से पहले का बताने की अपनी बेचैनी में इन ज़रूरी बातों पर भी ध्यान नहीं दे सके।”[32]
आंबेडकर ने निष्कर्ष दिया कि “यह सब इस बात को पक्का करता है कि भगवत गीता को बौद्ध धर्म से पहले का मानने की कोशिश कामयाब नहीं हो सकती। यह उन लोगों की मनगढ़ंत सोच का नतीजा है जिन्हें बुद्ध और उनके क्रांतिकारी धर्म से नफ़रत विरासत में मिली है। इतिहास इसका समर्थन नहीं करता। इतिहास साबित करता है कि भगवत गीता के बहुत से महत्वपूर्ण सिद्धांत बौद्ध धर्मग्रंथों और जैमिनी तथा बादरायण के सूत्रों से काफी बाद के हैं। काल के विश्लेषण से भी न सिर्फ़ यह साबित होता है कि भगवत गीता हीनयानी बौद्ध धर्म से बाद की है, बल्कि महायानी बौद्ध धर्म से भी बाद की रचना है। यह हिंदू विद्वानों की गलत धारणा बनी हुई है कि महायान बौद्ध धर्म ईस्वी 100 के बाद अस्तित्व में आया, जब कनिष्क ने बौद्ध-मतभेद सुलझाने के लिए तीसरी बौद्ध परिषद की थी। यह सच नहीं है कि बौद्ध परिषद के बाद बौद्ध धर्म का कोई नया संप्रदाय बना। महायानी बस बौद्धों के उस पंथ का दूसरा नाम है, जिसे महासंघिक कहा जाता था। महासंघिकों का संप्रदाय के बनने की कल्पना जिस समय की जाती है, वह उससे बहुत पहले बन गया था। यह संप्रदाय बुद्ध के परिनिर्वाण के 236 साल बाद, यानी 307 ईसापूर्व में पाटलिपुत्र में हुई पहली बौद्ध संगीति के समय बना था। यह संगीति या परिषद बौद्ध धर्म के सिद्धांतों को तय करने के लिए हुई थी और कहा जाता है कि इसने बौद्ध धर्म के थेरवाद पंथ का विरोध किया था, जिसे बाद में हीनयान (जिसका मतलब है नीच रास्ते पर चलने वाला) कहा जाने लगा। जब महासंघिक, यानी महायानी बना, तब भगवत गीता का नामोनिशान शायद ही कहीं था।”[33]
संदर्भ :
[1] डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर राइटिंग्स एंड स्पीचेस, वाल्यूम 3, पृष्ठ 357
[2] वही
[3] वही
[4] वही
[5] वही, 358
[6] वही, 358
[7] डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर राइटिंग्स एंड स्पीचेस, वाल्यूम 3, पृष्ठ 357-360
[8] वही, पृष्ठ 360
[9] वही, पृष्ठ 360-361
[10] वही, पृष्ठ 361
[11] वही, पृष्ठ 361-362
[12] वही, पृष्ठ 362
[13] वही
[14] वही, पृष्ठ 362-363
[15] वही, पृष्ठ 363-364
[16] वही
[17] वही, पृष्ठ 364
[18] वही, पृष्ठ 366-367
[19] वही, पृष्ठ 367
[20] वही, पृष्ठ 369
[21] वही, पृष्ठ 369
[22] वही, पृष्ठ 369-370
[23] वही, पृष्ठ 370
[24] वही
[25] वही
[26] वही, पृष्ठ 371-372
[27] वही, पृष्ठ 372
[28] वही, पृष्ठ 372-373
[29] वही, पृष्ठ 373-374
[30] वही, पृष्ठ 374
[31] वही, पृष्ठ 374-375
[32] वही, पृष्ठ 375-376
[33] वही, पृष्ठ 379
(संपादन : नवल/अनिल)
फारवर्ड प्रेस वेब पोर्टल के अतिरिक्त बहुजन मुद्दों की पुस्तकों का प्रकाशक भी है। एफपी बुक्स के नाम से जारी होने वाली ये किताबें बहुजन (दलित, ओबीसी, आदिवासी, घुमंतु, पसमांदा समुदाय) तबकों के साहित्य, संस्कृति व सामाजिक-राजनीति की व्यापक समस्याओं के साथ-साथ इसके सूक्ष्म पहलुओं को भी गहराई से उजागर करती हैं। एफपी बुक्स की सूची जानने अथवा किताबें मंगवाने के लिए संपर्क करें। मोबाइल : +917827427311, ईमेल : info@forwardmagazine.in
