h n

हिंदुत्व के फांस में फंसता जा रहा पिछड़ा वर्ग, पटना में आयोजित संगोष्ठी में बोले प्रो. सतीश देशपांडे

सामाजिक न्याय आंदोलन (बिहार) के बैनर तले पटना के आईएमए सभगार में आयोजित इस संगोष्ठी का विषय ‘मंडल कमीशन की सिफारिशें : सामाजिक न्याय का संघर्ष और चुनौतियां’ था। यह संगोष्ठी बहुजन नायक नारायण गुरु, रामस्वरूप वर्मा, बी.पी. मंडल और अयंकाली को समर्पित थी। पढ़ें, यह रपट

“हमारे सामने हिंदुत्व की राजनीति और इसके फैलते जहर की एक नई चुनौती सामने आकर खड़ी हो गई है। यह केवल किसी एक राजनीतिक पार्टी तक सीमित नहीं रह गई है, बल्कि वह समाज में विभिन्न स्तरों तक प्रवेश कर गई। दुखद लेकिन तथ्य है कि सामाजिक न्याय की अगुवाई करने वाले पिछड़े वर्ग के बड़े हिस्से को भी हिंदुत्व की यह राजनीति अपने साथ करने में सफल हुई है। अलग-अलग प्रदेशों में भले ही थोड़ी अलग-अलग स्थितियां हों।” ये बातें देश के जाने-माने समाजशास्त्री प्रो. सतीश देशपांडे ने गत 30 अगस्त, 2026 को बिहार की राजधानी पटना में आयोजित एक संगोष्ठी में कही।

सामाजिक न्याय आंदोलन (बिहार) के बैनर तले पटना के इंडियन मेडिकल एसोसिएशन (आईएमए) सभगार में आयोजित इस संगोष्ठी का विषय ‘मंडल कमीशन की सिफारिशें : सामाजिक न्याय का संघर्ष और चुनौतियां’ था। यह संगोष्ठी बहुजन नायक नारायण गुरु, रामस्वरूप वर्मा, बी.पी. मंडल और अयंकाली को समर्पित थी। संगोष्ठी में पूर्व राज्यसभा सांसद और पसमांदा आंदोलन के अगुआ अली अनवर अंसारी, मंडल कमीशन की रिपोर्ट को हिंदी में प्रस्तुत करने वाले लेखक और सामाजिक-राजनीतिक कार्यकर्ता चंद्रभूषण सिंह यादव, फारवर्ड प्रेस, नई दिल्ली के मुख्य संपादक अनिल वर्गीज, दलित इंटलेक्चुअल फोरम, गोरखपुर के राष्ट्रीय संयोजक डॉ. अलख निरंजन, सामाजिक न्याय आंदोलन (बिहार) के संयोजनक रिंकू यादव, पूर्वांचल में भूमिहीन दलितों-पिछड़ों के लिए भूमि आंदोलन चलाने वाले व आंबेडकर जनमोर्चा के नेता श्रवण निराला तथा पत्रकार व लेखक डॉ. सिद्धार्थ रामू भी मौजूद थे।

संगोष्ठी में अपने अध्यक्षीय संबोधन में प्रो. सतीश देशपांडे ने सामाजिक न्याय आंदोलन के समक्ष उपस्थित गंभीर चुनौतियों को रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि फुले, आंबेडकर, पेरियार आदि ने जाति उन्मूलन का जो एजेंडा प्रस्तुत किया था, वह पूरी तरह गायब होता जा रहा है। जाति उन्मूलन की जगह जातियों के सशक्तीकरण की परिघटना आगे बढ़ रही है। जबकि भारत के इतिहास और वर्तमान की सबसे बड़ी सच्चाई जाति है। यहां सबकुछ जाति के दायरे में ही होता है। भारत में जाति की छननी से छान कर ही सबकुछ लागू होता है। यहां तक कि ब्रिटिश साम्राज्य भी जाति की छननी से छनकर ही भारत में स्थापित हुआ। पूंजीवाद और नव-उदारवाद भी भारत में इसी के मातहत ही हुआ। उन्होंने जोर देकर कहा कि जाति का उन्मूलन न सही, कम-से-कम जाति के क्षरण की प्रक्रिया तो शुरू होनी चाहिए।

उन्होंने कहा कि पिछड़े वर्ग में आजादी के बाद एक सापेक्षिक तौर पर समृद्धशाली हिस्सा जरूर पैदा हुआ, लेकिन उसका बड़ा हिस्सा आज भी कंगाली-गरीबी में जी रहा है। इस स्थिति ने दोनों हिस्सों के बीच एक अंतर्विरोध को जन्म दिया है, इसको कैसे हल किया जाएगा, यह गंभीर मंथन का विषय है। यह समृद्धशाली हिस्सा खुद को पिछड़े वर्गों के गरीब लोगों से जोड़ता है या उच्च कही जाने वाली जातियों के साथ जोड़ रहा है, यह बहुत ही विचारणीय प्रश्न है।

संगोष्ठी में मौजूद गणमान्य अतिथि

सामाजिक न्याय आंदोलन (बिहार) के संयोजक रिंकू यादव ने संगोष्ठी के विषय के महत्व पर जोर देते हुए कहा कि भारत में न केवल सामाजिक न्याय का एजेंडा अधूरा है, बल्कि राष्ट्र निर्माण का एजेंडा भी अधूरा है। मंडल कमीशन की सिफारिशें लोकतांत्रिक राष्ट्र निर्माण और सामाजिक न्याय के एजेंडे को पूरा करने का बुनियादी प्रस्थान बिंदु हैं। इसे लोकतांत्रिक राष्ट्र निर्माण और सामाजिक न्याय के संपूर्ण पैकेज के रूप में देखना चाहिए। मंडल कमीशन की नजर में यदि क्रांतिकारी भूमि सुधार की जरूरत है, तो उसके साथ पिछड़े वर्गों (एससी, एसटी, ओबीसी) की सत्ता एवं समाज संरचना के हर स्तर में हिस्सेदारी भी जरूरी है। इसका एक जरूरी उपाय आरक्षण है। उन्होंने मंडल कमीशन की शिक्षा, औद्योगिक उत्पादन आदि में पिछड़ों की हिस्सेदारी की सिफारिशों की चर्चा की। रिंकू यादव ने कहा कि हिंदी पट्टी में पिछड़े वर्गों और सामाजिक न्याय की प्रतिनिधि कही जाने वाली पार्टियों ने मंडल कमीशन की सिफारिशों को अपना एजेंडा ही नहीं बनाया। जबकि मंडल कमीशन उनके घोषणा-पत्र का बुनियादी आधार होना चाहिए था। इसका कारण यह है कि इन पार्टियों की सामाजिक न्याय की दृष्टि सीमित और संकुचित रही है।

वहीं, पूर्व राज्यसभा सांसद अली अनवर अंसारी ने कहा कि मंडल कमीशन सामाजिक-शैक्षणिक पिछड़ों की पहचान करते हुए हिंदू, मुसलमान, ईसाई आदि के आधार पर कोई भेदभाव नहीं करता है, क्योंकि कमीशन भारतीय समाज की इस जमीनी सच्चाई से पूरी तरह वाकिफ था कि जाति केवल हिंदुओं तक सीमित नहीं है। मुसलमानों-ईसाइयों में जाति-व्यवस्था का एक पूरा श्रेणीक्रम है। मुसलमानों में हिंदुओं की करीब हर जाति मिल जाएगी। यहां तक कि मुसमलानों और ईसाइयों में बड़ी संख्या में दलित भी हैं। उनके हालात हिंदू दलितों से किसी भी मामले में बेहतर नहीं है। उन्होंने कहा कि पसमांदा आंदोलन मुसलमानों के बीच के इन दलितों की पहचान के सवाल पर मुख्य रूप से जोर देता रहा है।

उन्होंने जातिगत जनगणना की आवश्यकता का उल्लेख करते हुए कहा कि इसकी अनुशंसा मंडल कमीशन और उसके पहले के काका कालेलकर के नेतृत्व में गठित पहले राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग ने भी की थी। आज की यह एक फौरी जरूरत है। उन्होंने कहा कि नरेंद्र मोदी सरकार ने जातिगत जनगणना की मांग स्वीकार तो कर लिया, लेकिन जिस तरह से इसकी गणना कराई जा रही है, शायद इसका कोई सार्थक परिणाम निकले। उन्होंने कहा कि कम-से-कम बिहार जैसी जातिगत जनगणना (जाति आधारित सर्वे) होना चाहिए।

फारवर्ड प्रेस के मुख्य संपादक अनिल वर्गीज ने मंडल कमीशन के हवाले से पिछड़े वर्गों के सांस्कृतिक संकट को चिह्नित करते हुए कहा कि पिछ़डा वर्ग, विशेषकर हिंदी पट्टी का पिछड़ा वर्ग गहरे सांस्कृतिक संकट में फंसा हुआ है। उन्होंने राजस्थान में स्थित बहुजनों के न्याय के प्रतीक राजा बलि के एक मंदिर के हवाले से यह बताया कि कैसे खुद बहुजन समाज के लोग ही ब्राह्मण वामन के वर्चस्व को अनजाने ही स्वीकार कर बैठे हैं। मंडल कमीशन ब्राह्मणवादी व्यवस्था की सांस्कृतिक गुलामी से पिछड़े वर्गों का मुक्ति का कार्यभार चिह्नित किया था।

अनील वर्गीज ने दक्षिण भारत और उत्तर भारत के बीच के अंतर को रेखांकित करते हुए कहा कि दक्षिण भारत ने कैसे पेरियार, नारायण गुरू, अयंकाली आदि के नेतृत्व में खुद इस उच्च जातीय सांस्कृतिक गुलामी से खुद को काफी हद तक मुक्त कर लिया, क्योंकि इन क्षेत्रों में पिछड़े वर्गों का आंदोलन बहुत ही व्यापक और गहरा असर पैदा करने वाला था। इसके विपरीत हिंदी पट्टी में ब्राह्मणवाद विरोधी आंदोलन बाद में पैदा हुआ। वह आंदोलन दक्षिण भारत, विशेषकर केरल की तरह उतना व्यापक और असरकारी नहीं बन पाया। हिंदी पट्टी में पिछड़ों के उच्च जातियों के सांस्कृतिक गुलामी से मुक्त करने वाले एक व्यापक एवं असरकारी आंदोलन की जरूरत है। उन्हाेंने यह भी कहा कि दक्षिण भारत में, जहां सामाजिक न्याय का आंदोलन असरदार रहा है, वहां एक मानवीय पहलू भी है। कोविड काल में इसका उदाहरण दिखा था जब उत्तर भारत के राज्यों से गरीब मजदूरों को पैदल अपने राज्यों में लौटना पड़ रहा था। जबकि दक्षिण के राज्यों में उन्हें घर वापस भेजने के लिए उनके नियोक्ताओं ने बस आदि की सुविधा उपलब्ध करायी थी।

आंबेडकर जनमोर्चा के नेता श्रवण निराला ने संगोष्ठी में यह सवाल उठाया कि आखिर क्या कारण है कि बिहार में मंडल कमीशन की सिफारिशों के अनुकूल जमीन पिछड़े वर्गों को नहीं मिली? जब तक जमीन का सवाल हल नहीं होगा, तब वंचित तबकों के बुनियादी हालात नहीं बदलेंगे। यदि रातों-रात बैंकों का राष्ट्रीयकरण हो सकता है, तो जमीन क्यों नहीं दी जा सकती है? बस राजनीतिक इच्छाशक्ति की जरूरत है। जमीन का सवाल एक व्यापक जनांदोलन की मांग करता है। हमें लाखों की संख्या में सड़कों पर इसके लिए उतरना होगा।

डॉ. सिद्धार्थ रामू ने अपने संबोधन में कहा कि जब हम कहते हैं कि मंडल कमीशन में भूमि सुधार की बात कही गई है तो वामपंथी साथी खुश हो जाते हैं कि यही बात तो हम भी कहते रहे हैं। लेकिन केवल रैडिकल भूमि सुधार से ही समाज शैक्षणिक, सामाजिक और आर्थिक रूप से आगे नहीं बढ़ सकता। इसका सबसे अच्छा उदाहरण पश्चिम बंगाल है, जहां 30 साल तक वामपंथी शासन रहा, रैडिकल लैंड रिफार्म हुआ, लेकिन गैर-ब्राह्मणवादी आंदोलन नहीं होने के चलते ब्राह्मण-कायस्थ का वर्चस्व नहीं टूटा। इसकी तुलना में दक्षिण के राज्यों को देखिए, जहां सत्ता और समाज में पिछड़े वर्गों की हिस्सेदारी के लिए आंदोलन चला, जिसके कारण हिस्सेदारी दी गई और भूमि सुधार भी हुआ और आज विकास के मामले में चीन के समकक्ष है। इसलिए मंडल कमीशन को केवल आरक्षण और भूमि सुधार तक सीमित करके भारतीय समाज में बदलाव नहीं होने वाला। इसकी अनुशंसाएं समग्र रूप में भारत के आधार और अधिरचना के बदलाव के लिए एक पैकेज हैं।

मंडल कमीशन की रिपोर्ट एवं सिफारिशों पर किताब के संपादक चंद्रभूषण सिंह यादव ने मंडल कमीशन की टुकड़े-टुकड़े में सिर्फ दो सिफारिशें आधी-अधूरी लागू हुईं। सरकारी नौकरियों में ओबीसी को 27 फीसदी आरक्षण और शिक्षा संस्थानों में प्रवेश के मामले में 27 प्रतिशत आरक्षण। आमूलचूल परिवर्तन लाने वाली अन्य सिफारिशें की तो अब चर्चा ही नहीं हो रही है। हमें मंडल कमीशन की सभी 40 सिफारिशों को लागू हो, इसको अपना एजेंडा बनाना चाहिए। उन्होंने कई उदाहरणों से यह बताया कि दलित या ओबीसी समुदाय के किसी व्यक्ति की सामाजिक-राजनीतिक और आर्थिक हैसियत कितनी भी बड़ी क्यों न हो जाए, उसे जातिगत अपमान का सामना करना पड़ता है। चाहे वे कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे हों या उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव हों या कोई और हो। आए दिन शीर्ष स्तर पर पहुंच चुके दलितों और ओबीसी को अपमानित किया जाता है। सामान्य दलित-ओबीसी की क्या स्थिति है, इससे यह सहज ही अंदाज लगया जा सकता है। जाति आज भी सबसे बड़ी सच्चाई है। मंडल कमीशन ने जाति आधारित सामाजिक-शैक्षणिक पिछड़ेपन को ही अपनी सिफारिशों का आधार बनाया था। सामाजिक-शैक्षणिक पिछड़ेपन में आर्थिक आधार को जोड़ना संविधान एवं आरक्षण की मूल भावना के खिलाफ छेड़छाड़ है।

दलित इंटेलेक्चुल फोरम के राष्ट्रीय संयोजक डॉ. अलख निरंजन ने कहा कि आधुनिक भारत का मुख्य संघर्ष ब्राह्मणों और गैर-ब्राह्मणों के बीच संसाधनों पर कब्जे का रहा है। अंग्रेजों के पहले भारत में आने वाले बाहरी शासक-विजेताओं को ब्राह्मणवाद ने अपनी भीतर समाहित कर लिया था। यहां तक कि उन्हें वर्ण-जाति के खांचे में बांट दिया। उन्होंने कहा कि जो आरक्षण का विरोधी है, वह संविधान एवं लोकतंत्र का विरोधी है।

भाकपा माले के पूर्व विधायक अजीत कुशवाहा ने कहा कि हमें मंडल कमीशन की सिफारिशों को लागू करने के लिए राजनतिक सत्ता की जरूरत है। भूमि सुधार मंडल कमीशन की एक महत्वपूर्ण सिफारिश है। बिहार की पूर्ववती नीतीश सरकार ने अपने जाति आधारित सर्वे में भूमि के मालिकाने का सर्वे नहीं किया। इसके बावजूद इस सर्वे ने बहुत सारे ऐसे सच उजागर किए हैं, जिनके ऊपर गहन विचार-विमर्श एवं विश्लेषण की जरूरत है। उन्होंने सवाल उठाया कि जब अनुसूचित जाति की आबादी 19 प्रतिशत है तो उन्हें 16 फीसदी ही आरक्षण क्यों दिया जा रहा है। जबकि संविधान में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति को उनकी जनसंख्या के अनुपात में आरक्षण का प्रावधान किया गया है।

संगोष्ठी की शुरुआत में सामाजिक न्याय आंदोलन (बिहार) के सचिव सुबोध यादव ने इस संगोष्ठी की प्रस्तावना रखते हुए कहा कि हम ऐसे दौर में सामाजिक न्याय की बात कर रहे हैं, जब वंचित तबकों के आरक्षण पर सवाल उठाया जा रहा है और उसकी समीक्षा करने की बात वर्चस्वशाली ताकतों के द्वारा हो रही है। ऐसे समय में मंडल कमीशन की सिफारिशों पर बात करना जरूरी हो गया है। मंडल कमीशन सिर्फ आरक्षण तक सीमित नहीं था। मंडल देश के उत्पादन संबंधों में निर्णायक परिवर्तन की सिफारिश की थी। कमीशन ने क्रांतिकारी भूमि सुधार का प्रस्ताव दिया था।

संगोष्ठी में इंजीनियर हरिशचंद्र मंडल, इंजीनियर नागेंद्र, दुर्गेश कुमार, सूरज यादव और विश्वा यादव ने भी वक्ता के रूप में अपनी बात रखी। अतिथियों का स्वागत अभिषेक आनंद ने किया। मंच का संचालन विकास यादव ने किया और आभार ज्ञापन रामानंद पासवान ने किया।

(संपादन : नवल)


फारवर्ड प्रेस वेब पोर्टल के अतिरिक्‍त बहुजन मुद्दों की पुस्‍तकों का प्रकाशक भी है। एफपी बुक्‍स के नाम से जारी होने वाली ये किताबें बहुजन (दलित, ओबीसी, आदिवासी, घुमंतु, पसमांदा समुदाय) तबकों के साहित्‍य, संस्‍क‍ृति व सामाजिक-राजनीति की व्‍यापक समस्‍याओं के साथ-साथ इसके सूक्ष्म पहलुओं को भी गहराई से उजागर करती हैं। एफपी बुक्‍स की सूची जानने अथवा किताबें मंगवाने के लिए संपर्क करें। मोबाइल : +917827427311, ईमेल : info@forwardmagazine.in

लेखक के बारे में

एफपी डेस्‍क

संबंधित आलेख

सांप्रदायिक हिंसा और सामाजिक चुनौतियाें से जुझ रहे भारतीय मुसलमान
साउथ एशिया जस्टिस कैंपेन की रिपोर्ट के अनुसार 2026 में पश्चिम बंगाल और असम में चुनावी अभियान के दौरान भी मुस्लिम समुदाय के खिलाफ...
मध्य प्रदेश : बालाघाट में 19 आदिवासी बच्चों की मौत
जिन गांवों में बच्चों की मौत हो रही है, वहां सड़क, स्वास्थ्य, पानी जैसी अन्य सुविधाओं का घोर अभाव है। बच्चे कुपोषित हैं। लोगों...
बिहार में सामंती उत्पीड़न और दलित-पिछड़े मजदूरों पर बढ़ते हमले
रोहतास में चंद्रेश्वर चौधरी की हत्या के बाद नवादा में एक गरीब महिला मजदूर द्वारा अपनी मजदूरी मांगना यदि उसके खिलाफ ऐसी बर्बर यौन...
‘जातिगत जनगणना जातियों के नाम की गणना नहीं’
“अगर यह सुनिश्चित किया जाना है कि ओबीसी से संबंधित आंकड़े वैज्ञानिक और विश्वसनीय हों तो हम गणना के बाद लाखों जातियों में से...
पिछड़े वर्ग की चेतना की कीमत पर जातिगत जनगणना करा रही सरकार
गत 14 अगस्त, 2026 को जारी अधिसूचना में जातियों के नाम पूछे जा सकते हैं, लेकिन वह जाति समूह के किस वर्ग में आते...