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‘साल बनाम सागवान’ आंदोलन का परिणाम था 8 सितंबर का गुआ गोली कांड

1980 में इस गोलीकांड में 11 आदिवासियों की जघन्य हत्या हुई थी, क्योंकि जहां तीन आदिवासी तो पुलिस और आदिवासी के आमने-सामने की लड़ाई में मारे गए। वहीं 8 आदिवासियों को कतार में खड़ा कर गोली मार दी गई थी और वह भी एक स्वास्थ्य केंद्र के सामने, जहां उन्हें घायलावस्था में इलाज के लिए ले जाया गया था। पढ़ें, विनोद कुमार का यह आलेख

गौतम बुद्ध का जन्म और परिनिर्वाण साल वृक्ष के नीचे ही हुआ था। मतलब साल के वृक्ष हिमालय की तराई में भी हैं और देश के अन्य हिस्सों में भी छिटपुट रूप से। लेकिन एशिया में साल वृक्षों का सबसे बड़ा जंगल झारखंड के कोल्हान क्षेत्र में है जो ‘सारंडा के जंगल’ के नाम से विख्यात है और यही क्षेत्र आदिवासियों के एक प्रमुख समुदाय ‘हो’ आदिवासियों का अधिवास क्षेत्र भी है। साल वृक्ष का आदिवासी जीवन में बहुत महत्व है और उसके सरना स्थल सामान्यतः साल वृक्षों के नीचे ही होते हैं। इसलिए अधिकतर आदिवासी गांवों के आसपास के जंगलों में साल के वृक्ष मिल ही जाते हैं और जहां नहीं हैं, वहां कोशिश होती है कि साल वृक्ष लगाए जाएं।

लेकिन साल वृक्षों का मनोरम जंगल तो आपको कोल्हान क्षेत्र में ही मिलगा। इसका बड़ा हिस्सा अवैध माइनिंग की वजह से खत्म हो चला है। माओवादियों को नियंत्रित करने के नाम पर भी सारंडा क्षेत्र में पेड़ों की कटाई हुई, बावजूद इसके आप अब भी यदि कोल्हान के इन साल वृक्षों के बीच से गुजरेंगे तो बेहद आह्लादकारी अनुभव होगा। आकाश छूते साल के वृक्ष, उनसे छन कर दिखता नीला आकाश और उसके बीच से गुजरती सड़कें, जो पहले लाल मोरम की हुआ करती थीं। आज मोरम की वे सड़कें लुप्त हो चुकी हैं। आपको अब कोलतार की सड़कें और उस पर चीटिंयों के मानिंद रेंगते लौह अयस्कों से लदी ट्रकों की कतार दिखेंगी।

साल वृक्ष सदियों से खड़े हैं और आज भी बचे हुए हैं तो उन आदिवासियों की बदौलत जो इन जंगलों के बीच रहते हैं और इसे बचाने के लिए अंग्रेजों के जमाने से संघर्ष करते रहे हैं। सारंडा के जंगलों में अंग्रेजों के प्रवेश के वक्त यदि ‘हो विद्रोह’ हुआ, तो आजाद भारत में साल वृक्षों को बचाने की लड़ाई 1980 में हुई, जिसकी पूर्णाहुति 8 सितंबर, 1980 को गुआ गोलीकांड के रूप में हुई।

हम कह सकते हैं कि सतत संघर्ष के बावजूद अंग्रेजों के जमाने में वनों पर से आदिवासियों का अधिकार जिस तरह से छिनता चला गया था, उसकी वापसी के लिए 2006 में बना वनाधिकार कानून की आधारशिला गुआ गोलीकांड जैसे संघर्षों ने ही रखी थी।

इस गोलीकांड में 11 आदिवासियों की जघन्य हत्या हुई थी, क्योंकि जहां तीन आदिवासी तो पुलिस और आदिवासी के आमने-सामने की लड़ाई में मारे गए। वहीं 8 आदिवासियों को कतार में खड़ा कर गोली मार दी गई थी और वह भी एक स्वास्थ्य केंद्र के सामने, जहां उन्हें घायलावस्था में इलाज के लिए ले जाया गया था।

यह उस समय की कहानी है जब झारखंड बिहार का हिस्सा हुआ करता था तथा खनन और टिंबर माफिया से जंगल को बचाने का आंदोलन चरम पर था। तत्कालीन बिहार सरकार सारंडा के साल वृक्षों को उजाड़ कर सागवान लगाना चाहती थी, जिसे टीक भी कहते हैं। चूंकि साल का आदिवासी समाज में एक आध्यात्मिक महत्व है, वहीं सागवान का व्यापारिक महत्व है। देखते ही देखते वह आंदोलन ‘साल बनाम सागवान’ का हो गया। देवेंद्र मांझी, सूला पूर्ति, शैलेंद्र महतो, बहादुर उरांव आदि उस आंदोलन के नेता थे। कह सकते हैं कि शैलेंद्र महतो का राजनीतिक अभ्युदय उसी आंदोलन से हुआ और बाद में वे झारखंड मुक्ति मोर्चा में शामिल हो गए।

गुआ बाजार में स्थापित शहीद स्मारक

आदिवासी उस इलाके में अंधाधुंध खनन का भी विरोध कर रहे थे। वह खनन लौह अयस्क के लिए हो रहा था। इस्को की गुआ खदान में हो रहे खनन की वजह से खनन के आसपास के खेतों में प्रदूषित पानी फैल रहा था। हवा तो प्रदूषित हो ही रही थी। एक तरफ उस क्षेत्र की जनता सरकार से लोहा लेने की तैयारी कर रही थी, दूसरी तरफ सरकार उस आंदोलन को या कहिए कि विद्रोह को ताकत के बल पर कुचलने पर आमादा थी और आदिवासियों को ऐसा सबक सिखाने की तैयार कर रही थी ताकि वे किसी सरकारी योजना का विरोध करने की हिम्मत न करें।

आंदोलनकारियों ने 8 सितंबर, 1980 को गुआ में एक विरोध प्रदर्शन की तैयारी की। नगाड़ा और पारंपरिक हथियारों के साथ सोनुआ, गोयलकेरा, मनोहरपुर आदि इलाकों से आदिवासी इकट्ठा हुए। प्रदर्शन को बिहार मिलिट्री पुलिस ने रोकने की काशिश की, लेकिन लोग साप्ताहिक हाट स्थल तक पहुंच गए, जहां सभा होनी थी। सभा के बीच ही पुलिस ने भुवनेश्वर महतो को गिरफ्तार कर लिया और वह बहादुर उरांव सहित अन्य नेताओं को गिरफ्तार करना चाहती थी, लेकिन तब तक आंदोलनकारियों में उत्तेजना फैल चुकी थी। आदिवासियों की तरफ से तीर चले, तो पुलिस की तरफ से ताबड़तोड़ गोलियां। सभा स्थल युद्ध स्थल में बदल गया था। दोनों पक्षों की तरफ से तीन-तीन लोग मारे गए।

इसी बीच जामदा से अतिरिक्त पुलिस बल घटना स्थल पर पहुंच गया। भीड़ तितर-बितर होने लगी थी। मारे गए लोगों के साथ बड़ी संख्या में घायल जहां-तहां पड़े थे। घायलों को गाड़ियों में लाद कर अस्पताल पहुंचाया गया और फिर एक प्रत्यक्षदर्शी बेहरा बालमुचू के बयान के अनुसार 8 आदिवासियों को अस्पताल के प्रांगण में खड़ा कर गोलियों से भून दिया गया।

यह मानवाधिकार के उल्लंघन का एक चर्चित मामला तो बना, लेकिन इस घटना की विस्तृत जांच कभी नहीं हुई और न इस घटना के लिए जिम्मेदार किसी अधिकारी को कोई सजा ही हुई। यह 1 जनवरी, 1948 को हुई खरसावां गोलीकांड के बाद की दूसरी बड़ी घटना थी।

बाद में सरकार के विरोध के बावजूद तत्कालीन सांसद कृष्णा मार्डी ने गुआ बाजार में एक शहीद स्थल का निर्माण करवाया, जहां एक पट्टे पर उस कांड के शहीदों के नाम दर्ज हैं। वे हैं– ईश्वरचंद्र सरदार, रामो लांगुरी, चांदो लांगुरी, रेगी सुरीन, बागी देवगम, जीतू सुरीन, चुड़ी हांसदा, चैतन चांपिया, गोंडा होनहागा और जुरा पूर्ति। शहीद तो ग्यारह हुए, लेकिन नाम दस के ही दर्ज हैं।

सरकार ने एक आंदोलन को ताकत के बल पर कुचल तो दिया था, लेकिन इस कांड के बाद न सिर्फ कोल्हान की स्वायत्तता का एक आंदोलन खड़ा हो गया, जिसका नेतृत्व कोल्हान रक्षा दल ने किया, साथ ही अलग झारखंड राज्य का आंदोलन भी नए सिरे से उठ खड़ा हुआ। वह आंदोलन, जो जयपाल सिंह की झारखंड पार्टी के 1962 में कांग्रेस में हुए विलय के बाद एक तरह से ठंडा पड़ गया था।

(संपादन : नवल/अनिल)


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लेखक के बारे में

विनोद कुमार

झारखंड के वरिष्ठ पत्रकार और सामाजिक कार्यकर्ता विनोद कुमार का जुड़ाव ‘प्रभात खबर’ से रहा। बाद में वे रांची से प्रकाशित मासिक पत्रिका ‘देशज स्वर’ के संपादक रहे। पत्रकारिता के साथ उन्होंने कहानियों व उपन्यासों की रचना भी की है। ‘समर शेष है’ और ‘मिशन झारखंड’ उनके प्रकाशित उपन्यास हैं।

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