झारखंड के इतिहास में कुछ तारीखें ऐसी हैं जिन्हें केवल कैलेंडर में दर्ज समझना उनसे जुड़े इतिहास के साथ अन्याय होगा। 8 सितंबर, 1980 भी ऐसी ही एक तारीख है। इस दिन अविभाजित बिहार (वर्तमान झारखंड) के पश्चिमी सिंहभूम के गुवा बाजार में राज्य की पुलिस द्वारा गोलियां चलाई गई थीं। ये गोलियां केवल कुछ आदिवासी प्रदर्शनकारियों के शरीर को छलनी करके नहीं रुकी थीं, बल्कि उन्होंने उस दौर के एक बड़े सवाल को भी सामने ला दिया था। सवाल यह कि जिस जंगल, जमीन और खनिज संपदा को सरकार और उद्योग जगत के लोग विकास का आधार मानते हैं, उस पर सबसे पहला और सबसे ज्यादा अधिकार किसका है?
यह गोलीकांड केवल कुछ लोगों की शहादत भर नहीं था, बल्कि यह उस दौर की क्रूर व्यवस्था और आदिवासियों के संघर्ष का प्रतीक बन गया। जिस तरह 1919 में जालियांवाला बाग की घटना ने पूरे देश के स्वतंत्रता आंदोलन को नई दिशा दी थी, उसी तरह गुवा गोलीकांड ने झारखंड राज्य गठन आंदोलन को एक निर्णायक मोड़ दिया और आने वाले वर्षों की राजनीति, समाज और संस्कृति पर गहरी छाप छोड़ी।
गुवा उस समय बिहार का हिस्सा हुआ करता था। यह क्षेत्र सारंडा के विशाल जंगलों तथा लौह-अयस्क क्षेत्र के कारण देश के महत्वपूर्ण खनन क्षेत्रों में गिना जाता है। लेकिन गुवा की पहचान केवल लौह-अयस्क की खदानों से नहीं होनी चाहिए। इस धरती की पहचान उन आदिवासियों के संघर्ष से भी है, जिन्होंने जंगल और जमीन को केवल आर्थिक संपत्ति नहीं, बल्कि अपने जीवन और अस्तित्व का आधार माना था।
गुवा से पहले का जंगल आंदोलन
गुवा गोलीकांड को समझने के लिए 8 सितंबर, 1980 की सुबह से कहानी शुरू करना पर्याप्त नहीं होगा। इसके पीछे कई वर्षों से जंगलों के कारण वहां के लोगों में असंतोष जमा हो रहा था।
1970 के दशक के अंतिम वर्षों में सारंडा और कोल्हान क्षेत्र के जंगलों में रहने वाले आदिवासियों के मन में एक अजीब बेचैनी छाई हुई थी। उस समय जंगल आंदोलन शुरू हुआ था, क्योंकि सरकार ने व्यावसायिक लाभ कमाने के उद्देश्य से निर्णय लिया कि सखुआ के पेड़ों को काटकर उनकी जगह सागवान का पेड़ लगाया जाएगा। चूंकि आदिवासी समाज के लिए सखुआ केवल एक पेड़ नहीं, बल्कि धार्मिक आस्था और सांस्कृतिक आधार रहा है। यह पेड़ उनका ‘धर्मेश’ का प्रतीक, सरना संस्कृति का आधार, और दातून से लेकर पत्तल और औषधि तक जीवन का अभिन्न अंग है।
इसे काटना आदिवासियों के आत्मसम्मान पर चोट था। उनका मानना था कि यदि सरकार उनके जंगलों को काटकर उनकी पारंपरिक व्यवस्था उजाड़ेगी, तो आदिवासी जंगलों पर अपना पारंपरिक अधिकार फिर से बहाल करेंगे। जंगल और जमीन पर अपने पारंपरिक अधिकार को वापस पाने की कोशिश में ग्रामीणों ने अपनी जमीनों पर फिर से खेती शुरू करने के लिए जंगल साफ करना शुरू किया। सरकार ने इसे अपने वन कानूनों के उल्लंघन के रूप में देखा और वन विभाग की कार्रवाई तेज हो गई। इसी कार्रवाई के दौरान अगस्त, 1980 में 108 लोगों को गिरफ्तार कर गुवा थाना ले जाया गया था। इन गिरफ्तारियों ने इलाके में पहले से मौजूद असंतोष को और गहरा कर दिया तथा आंदोलनकारियों की रिहाई एक प्रमुख मांग बन गई।
उधर इस्को की खदानों से निकलने वाला लाल पानी खेतों और नदियों को प्रदूषित कर रहा था। जिस मिट्टी से जीवन पनपता था, वही बंजर हो रही थी। इसके अलावा स्थानीय कंपनियों जैसे स्टील ऑथोरिटी ऑफ इंडिया लिमिटेड (सेल) में वहां के लोगों को रोजगार का सिर्फ आश्वासन दिया जाना और नौकरियां बाहर से आए लोगों को मिलना। ऐसी परिस्थिति में असंतोष धीरे-धीरे पूरे कोल्हान में फैलने लगा।
उस समय जेल भेजे गए 108 लोगों की रिहाई की मांग, लाल पानी को रोकने की मांग, गुवा जामदा के मजदूरों को स्थाई करने की मांग और स्थानीय युवाओं को रोजगार दिलाने की आवाज़ गूंज रही थी। इन्हीं परिस्थितियों में गुवा गोलीकांड की पृष्ठभूमि तैयार हुई। 8 सितंबर, 1980 का दिन इन्हीं वर्षों के आक्रोश और पीड़ा का विस्फोट था। इन दिनों आंदोलन की अगुवाई देवेंद्र मांझी, मछुआ गागराई, सुला पूर्ती, भुवनेश्वर महतो, बहादुर उरांव, शैलेन्द्र महतो, मोरा मुंडा जैसे नामी गिरामी नेताओं के हाथों में थी। यही लोग अलग राज्य की मांग, जंगल और खदानों के सवालों को लेकर गांव-गांव से लोगों को जोड़ रहे थे।
गुवा का वह खूनी सोमवार का दिन
8 सितंबर को गुवा के साप्ताहिक बाजार में एक विशाल जनसभा का आह्वान किया गया था। उस सुबह गुवा हवाई अड्डे से होकर हजारों की संख्या में आदिवासी पुरुष और महिलाएं तीर, धनुष, भाला जैसे पारंपरिक हथियार लेकर गुवा बाजार पहुंच रहे थे। उनका इरादा हिंसा का नहीं, बल्कि शांतिपूर्ण प्रदर्शन का था। वे ज्ञापन सौंपना चाहते थे, अपनी मांगें रखना चाहते थे और सभा कर अपनी पीड़ा जाहिर करना चाहते थे। उनकी मांगें साफ थीं। इन मांगों में एक मांग एक अलग झारखंड राज्य की स्थापना भी थी।
स्थानीय प्रशासन ने सभा को लेकर पहले से तैयारी कर रखी थी। धारा 144 लागू थी और पुलिस बल की तैनाती की गई थी। उस समय वहां भूमि सुधार उप समाहर्ता रहे फ्रांसिस दिन मजिस्ट्रेट के रूप में मौजूद थे। सभा शुरू हुई, भाषण दिए जाने लगे, भीड़ अपने उत्साह और उम्मीद से भरी थी। इसी बीच मुखिया नाम से परिचित एक स्थानीय नेता बैसाखू गोप के जोशीले भाषण के बाद पुलिस ने नेताओं को पकड़ना शुरू कर दिया। इससे भीड़ उत्तेजित होने लगी और देखते ही देखते झड़प शुरू हो गई। पुलिस ने मुख्य नेताओं को सरेंडर करने को कहा। बैसाखू और भुवनेश्वर महतो ने तो सरेंडर कर दिया, लेकिन बहादुर उरांव और सुला पूर्ती ने सरेंडर करने से इनकार कर दिया। इसी झड़प के दौरान पुलिस ने गोलियां चलाईं और जवाब में आंदोलकारी भीड़ की ओर से तीर चलाए गए। आधे घंटे तक हाट का मैदान रणभूमि बना रहा। इस सभा में तीन आदिवासी आंदोलनकारी मारे गए और जवाबी हमले में चार पुलिसकर्मी भी ढेर हो गए। यह टकराव उस आक्रोश का प्रतीक था जो लंबे समय से भीतर-भीतर सुलग रहा था। लेकिन इसके बाद जो हुआ, उसने गुवा को इतिहास के सबसे काले अध्यायों में दर्ज कर दिया।

अस्पताल : जहां जिंदगी बचाई जानी थी, वहीं मौत दी गई
झड़प में सभी घायल आंदोलनकारियों को गुवा के इस्को अस्पताल ले जाया गया। अस्पताल वह जगह होती है जहां हर घायल को जीवनदान मिलता है, लेकिन उस दिन अस्पताल ही मौत का अड्डा बन गया। बिहार मिलिट्री पुलिस (बीएमपी) के जवान गुस्से से भरे हुए वहां पहुंचे। उन्होंने इलाजरत आंदोलनकारियों को अस्पताल से बाहर निकाल कर एक कतार में खड़ा किया और फिर गोलियों से भून डाला गया। आठ आदिवासी उसी जगह ढेर हो गए। इस तरह कुल 11 आदिवासी आंदोलनकारी शहीद हुए। तीन की मौत गुवा के हाट मैदान में सभा-स्थल पर जबकि आठ अस्पताल के बाहर। यह भारत की पहली घटना बन गई जब अंतरराष्ट्रीय रेडक्रॉस कानून को तोड़ा गया और अस्पताल परिसर में ही घायलों की हत्या की गई।
उस दिन की त्रासदी यहीं खत्म नहीं हुई थी। स्थानीय प्रशासन ने अतिरिक्त पुलिस बल के रूप में रांची से गोरखा रेजिमेंट मंगाया। आदिवासियों को तरह-तरह की यातनाएं दी जाने लगी। गुवा गोलीकांड के मुख्य नायक बहादुर उरांव के घर में पुलिस के द्वारा कुर्की हुई। बहादुर उरांव किसी तरह बच निकले, लेकिन उनकी पत्नी और नवजात जुड़वा बच्चों को पुलिस ने घर से निकाल दिया। ठंड की रात में खुले आसमान के नीचे रहने के कारण दोनों जुड़वा बच्चों की मौत हो गई।
इधर, भुवनेश्वर महतो को भी पुलिस ने पकड़ लिया था और रास्ते में ही उनका एनकाउंटर करने की तैयारी थी। इसी बीच सिंहभूम के तत्कालीन एसपी डॉ. रामेश्वर उरांव ने हस्तक्षेप किया। उन्होंने गुस्साए जवानों के चंगुल से भुवनेश्वर महतो की जान बचाने की रणनीति के तहत उन्हें दिखावे के लिए खुद भुवनेश्वर महतो को एक थप्पड़ मारा। पुलिस के गुस्से को शांत करने के इस अप्रत्याशित कदम ने भुवनेश्वर महतो की जान बचा ली थी।
उधर गुवा गोलीकांड के बाद पूरे झारखंड में उबाल आ गया था। पुलिसिया दमन के खिलाफ जगह-जगह विरोध, झारखंड बंद और जुलूस होने लगे थे। लोगों को तीर-धनुष रखने पर भी प्रतिबंध लगा दिया गया, लेकिन यह आदिवासियों के अस्मिता पर सीधा हमला था। जन-दबाव इतना गहरा था कि सरकार को यह प्रतिबंध वापस लेना पड़ा। झारखंड मुक्ति मोर्चा ने इसे राजकीय हत्या कहा। निर्मल महतो, शिबू सोरेन और अन्य नेताओं ने इस आंदोलन को नई धार दी। फिर राष्ट्रीय मीडिया में यह घटना सुर्खियों में आई और संसद तक मामला गूंज उठा, जिसके फलस्वरूप झारखंड आंदोलन अब केवल स्थानीय मुद्दा नहीं रहा, बल्कि राष्ट्रीय विमर्श का हिस्सा बन गया।
लेकिन सवाल यथावत है
गुवा गोलीकांड के बाद झारखंड आंदोलन में जो ऊर्जा और एकजुटता आई, उसने आने वाले दो दशकों की दिशा तय की। और ठीक 20 साल बाद, 15 नवंबर 2000 को जब झारखंड राज्य का निर्माण हुआ, इसकी नींव में गुवा की शहादत दर्ज थी। यह घटना झारखंड की अस्मिता और न्याय की लड़ाई का प्रतीक बन गई।
आज भी जब हम पीछे मुड़कर देखते हैं तो सवाल उठता है कि क्या विकास की कीमत पर स्थानीय समाज के अधिकार कुर्बान किए जा सकते हैं?
अक्सर झारखंड के संदर्भ में एक बहुत सरल सवाल खड़ा किया जाता है कि या तो विकास होगा या जंगल बचेगा, या तो उद्योग आएगा या आदिवासी अधिकार बचेंगे, या तो खनन होगा या पर्यावरण बचेगा। लेकिन क्या वास्तव में विकल्प इतने ही सीमित हैं? शायद नहीं। सवाल विकास को रोकने का नहीं है। सवाल यह है कि विकास की परिभाषा कौन तय करेगा।
यहीं पर ग्रामसभा और सामुदायिक अधिकारों का प्रश्न सामने आता है। पश्चिमी सिंहभूम में पेसा और वन अधिकार कानून के क्रियान्वयन पर हुए हाल के अध्ययनों ने भी यह दिखाया है कि कानून मौजूद होने के बावजूद स्थानीय स्वशासन, भूमि अधिकार और सामुदायिक वन प्रबंधन के स्तर पर अभी कई व्यावहारिक बाधाएं हैं।
लगभग आधी सदी बीत जाने के बाद भी सारंडा और गुवा से जुड़े सवाल पूरी तरह खत्म नहीं हुए हैं। पश्चिमी सिंहभूम आज भी झारखंड का सबसे अधिक वन क्षेत्र वाला जिला माना जाता है। झारखंड के 2025-26 आर्थिक सर्वेक्षण के अनुसार, 2023 में जिले में लगभग 3,377 वर्ग किलोमीटर वन क्षेत्र दर्ज किया गया था। दूसरी ओर, इस क्षेत्र में खनन और वन संरक्षण के बीच संतुलन का सवाल आज भी बना हुआ है।
2025 में सारंडा-चाईबासा क्षेत्र में सतत खनन प्रबंधन योजना को लेकर झारखंड हाईकोर्ट के सामने भी यह सवाल आया कि खनन और संरक्षण के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए। इस योजना में क्षेत्र को खनन और संरक्षण के लिए अलग-अलग हिस्सों में बांटने तथा कुछ क्षेत्रों को नो-माइनिंग जोन के रूप में रखने की बात भी सामने आई।
यानी 1980 में गुवा में जो सवाल सड़कों और जंगलों के बीच उठ रहा था, वह आज अदालतों के सामने मौजूद है। फर्क इतना है कि आज उस सवाल को उठाने के लिए आंदोलन के साथ-साथ संविधान, ग्रामसभा, वन अधिकार कानून, और न्यायालय जैसे रास्ते भी मौजूद हैं।
गुवा की खदानों से निकलने वाले लाल पानी और उसके पर्यावरणीय प्रभाव को लेकर उठे सवाल भी पूरी तरह समाप्त नहीं हुए हैं। रोजगार का संकट और विस्थापन की पीड़ा कायम है। आज भी खदानों के मजदूर असुरक्षा और ठेका प्रथा से जूझ रहे हैं। गुवा गोलीकांड हमें चेताता है कि विकास तभी सार्थक है जब उसमें स्थानीय समाज की भागीदारी और संस्कृति का सम्मान हो।
गुवा के 11 शहीद
गुवा गोलीकांड के शहीदों के नाम आज भी गुवा स्मारक पर दर्ज हैं – ईश्वर सरदार, रामो लागुरी, चांदो लागुरी, रेंगो सुरीन, बागी देवगम, जीतू सुरीन, चैतन्य चांपिया, चूड़ी हांसदा, जूरा पूर्ति और गोंडा होनहागा। यह स्मारक आज भी उस बलिदान की गवाही देते हैं। विभिन्न प्रकाशित स्रोतों में 11वें शहीद के रूप में चांबे राधे का नाम मिलता है, लेकिन उनका नाम स्मारक की प्रचलित सूची में दर्ज नहीं है। इसी कारण गुवा गोलीकांड में शहीदों की संख्या और नामों को लेकर अलग-अलग विवरण मिलते हैं।
हर साल आठ सितंबर को हजारों लोग वहां पहुंचकर शहीदों को नमन करते हैं। यह केवल रस्म नहीं, बल्कि उस इतिहास को जीवित रखने का प्रयास है, जो आने वाली पीढ़ियों को बताता है कि अधिकार और अस्मिता की लड़ाई आसान नहीं थी। ये शहीद केवल गुवा या कोल्हान के नहीं, बल्कि पूरे झारखंड की आत्मा के प्रतीक हैं। उनकी कुर्बानी ने साबित कर दिया कि झारखंड की मिट्टी अन्याय सहन नहीं करती।
संदर्भ :
- ग्लैडसन डुंगडुंग, फेलिक्स पडेल एंड विनीता दामोदरन, ‘एंड रेड फ्लोज दी कोइना रिवर : आदिवासी रेजिस्टेंस टू दी ‘लूट’ ऑफ देयर लैंड एंड रिसोर्सेज इन इस्टर्न इंडिया, 1980-2020’
- ग्लैडसन डुंगडुंग, मिशन सारंडा : ए वॉर फॉर नैचुरल रिसोर्सेज इन इंडिया, देशराज प्रकाशन, 2015
- संजय ओझा, ‘झारखंड कॉरपोरेट हाउसेज सल्किंग ओवर कॉन्ट्राडिक्ट्री सरांडा आर्डर्स, दी टाइम्स ऑफ इंडिया, 22 जुलाई 2012
- “अक्षय वट: गुवा गोलीकांड के नायक श्री बहादुर उरांव की संघर्ष गाथा,” डीडी झारखंड
- गुरु स्वरूप मिश्रा, ‘झारखंड गुवा गोलीकांड : तिल-तिल कर मर रहा शहीद परिवार, बहादुर उरांव को 2 बेटों को खोकर चुकानी पड़ी कीमत’, प्रभात खबर, 8 सितंबर, 2022
- प्रभात खबर, डिजिटल डेस्क, ‘गुवा गोली कांड के कारण आंदोलनकारी बहादुर उरांव ने जुड़वां बेटों को खोया’, प्रभात खबर, 7 सितंबर, 2020
- समीर रंजन, ‘झारखंड : जुड़वां बेटों को खोने से ज्यादा गर्व है गुवा आंदोलन का हिस्सा बनना, बोले पूर्व विधायक बहादुर उरांव’, प्रभात खबर, 8 सितंबर, 2023
- जेवियर डायज, 13 मई, 2014, ‘गुवा फायरिंग : आईविटनेस एकाउंट ऑफ नर्स लिली मिंज’, पब्लिश्ड बाय बी.आई.आर.एस.ए. (बिंदराई इन्स्टीट्यूट फॉर रिसर्च स्टडी एंड एक्शन) व देवेंद्र कुमार नयन, गुआ गोलीकांड : 8 सितंबर 1980 को गुवा में क्या हुआ था? लिली मिंज इंटरव्यू,
- झारखंड इकोनामिक सर्वे 2025–26, झारखंड सरकार
- मेसर्स निशांत रोडलाइंस वर्सेज दी यूनियन ऑफ इंडिया, झारखंड हाई कोर्ट, जजमेंट डेटेड 2 सितंबर, 2025
- शशांक शेखर दयाल एंड देविका शर्मा, ‘सेल्फ गवर्नेंस एमॉन्ग ट्राइब्स इन वेस्ट सिंहभूम डिस्ट्रिक्ट ऑफ झारखंड : ए स्टडी ऑफ दी पेसा एक्ट, 1996 एंड दी एफआरए एक्ट, 2006’, जर्नल ऑफ मार्केटिंग एंड सोशल रिसर्च, वॉल्यूम 2, इश्यू 3, 2025, पेजेज 421-426
(संपादन : नवल/अनिल)
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