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राजस्थान : सरपंच पतियों का इलाज

जो महिला अपनी ही चुनाव प्रचार सामग्री में एक कोने में सिमटी नज़र आती है, जो आमसभाओं में भाषण नहीं देती और न ही खुलकर मतदाताओं से मिलती है, उसके लिए अपनी स्वतंत्र राजनीतिक पहचान बनाना मुश्किल होता है। इसका नतीजा होता है सार्वजनिक जीवन में उसकी सीमित उपस्थिति। और फिर इसी तथ्य का इस्तेमाल उसके पति के वर्चस्व को उचित ठहराने के लिए किया जाता है। बता रहे हैं नीरज बुनकर

‘सरंपच पति’ – यह एक ऐसा शब्द-युग्म है, जिसका मतलब राजस्थान के ग्रामीण इलाकों में किसी को समझाना नहीं पड़ता। इस पद को कोई कानूनी मान्यता हासिल नहीं है, लेकिन फिर भी गांवों के सभी रहवासी जानते हैं कि वह क्या होता है। सरपंच पति, सरपंच के पद पर निर्वाचित महिला का पति होता है जो उसकी तरफ से प्रचार करता है, अधिकारियों से बातचीत करता है और सरपंच पद के सभी अधिकारों का इस्तेमाल करता है।

वर्तमान में राजस्थान में चार चरणों में पंचायत चुनाव हो रहे हैं। सरपंचों और वार्डों के पंचों के निर्वाचन कार्यक्रम के अनुसार 25 अक्टूबर, 31 अक्टूबर, 6 नवंबर और 16 नवंबर 2026 को वोट डाले जाने थे। हर चरण के परिणाम मतदान के दिन शाम को घोषित कर दिए जाते हैं। चुनाव के दो चरण पूरे हो चुके हैं। मेरे अपने गांव और राज्य में अन्य स्थानों पर मैंने जिस तरह से चुनाव प्रचार होते देखा है, उसमें कई समानताएं हैं। चुनाव प्रचार के लिए जो बैनर लगाए जाते हैं, उनमें सरपंच पद की महिला उम्मीदवारों के पति, लड़के, ससुर और कभी-कभी पिता के चित्र होते हैं। ये ही लोग दरवाजे-दरवाजे जाकर वोट मांगते हैं। महिला उम्मीदवार या तो चुनाव प्रचार में शामिल ही नहीं होती या अगर होती भी है तो घूंघट में चेहरा छिपाए पीछे खड़ी महिलाओं की भीड़ में कहीं छिपी होती है। उसके समर्थक जो टी-शर्टें पहनते हैं, उनमें भी उसके पुरुष परिजनों के चित्र छपे होते हैं।

प्रचार सामग्री का संदेश भी लगभग एक-सा होता है। पोस्टरों में गांव के विकास का वादा होता है और जिन पुरुष परिजनों के नाम और चित्र छपे होते हैं, उन्हें शिक्षित, मेहनती और अपने गांव के प्रति प्रतिबद्ध बताया जाता है। प्रचार के लिए तैयार की गई इंस्टाग्राम रीलों, बॉलीवुड और राजस्थानी संगीत पर आधारित गीतों और एआई से बने चित्र की धुरी भी यही पुरुष-केंद्रित राजनीति होती है। जो महिला चुनाव में उम्मीदवार होती है, अमूमन वह कहीं नजर ही नहीं आती। वह अपने ही चुनाव प्रचार अभियान से अदृश्य रहती है। 

पुरानी समस्या

इसमें से कुछ भी राज्य और उसके चुनाव आयोग के लिए नई खबर नहीं है। सन 2015 में प्रधानमंत्री ने स्वयं सार्वजनिक रूप से यह अपील की थी कि महिला सरपंचों के पतियों का बोलबाला खत्म होना चाहिए। फिर, जुलाई, 2023 में मुन्दोना रूरल डेवलपमेंट फाऊंडेशन नामक एक एनजीओ ने इस मसले को उच्चतम न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत किया। लेकिन अदालत ने इस मामले में अपनी तरफ से कोई सुझाव या उपाय सुझाने से इंकार करते हुए याचिकाकर्ता से कहा कि वह केंद्रीय पंचायती राज मंत्रालय से संपर्क करे। 

मंत्रालय ने इस मसले पर सलाह देने के लिए एक समिति का गठन किया और एक सेवानिवृत्त आईएएस अधिकारी सुशील कुमार को समिति का अध्यक्ष बनाया। समिति से कहा गया कि वह निर्वाचित महिला पंचों व सरपंचों की मुख्तारी उनके परिवारजनों द्वारा किए जाने की समस्या पर विचार करे और महिला जनप्रतिनिधियों को सही अर्थों में जननेता बनाने के लिए उपाय सुझाए। समिति ने फरवरी, 2025 में अपनी रपट प्रस्तुत की। अखबारों में समिति की सिफारिशों के बारे में प्रकाशित खबरों के अनुसार समिति ने यह सुझाव दिया कि सरकार को एक नया कानून बनाना चाहिए, जिसके तहत अगर यह साबित हो जाए कि किसी महिला पंच या सरपंच के प्रतिनिधि के तौर पर कोई और काम कर रहा था तो उसे दंडित किया जाए और साथ ही संबंधित पंच या सरपंच को पद के लिए अपात्र घोषित किए जाएं। जिन मामलों में किसी प्रकार की धोखाधड़ी का अंदेशा हो उनमें आपराधिक प्रकरण कायम किए जाएं। यह सुझाव भी दिया गया कि महिला प्रतिनिधियों के लिए एक लोकपाल नियुक्त हो, हर जिले में शिकायत सेल हों, पंचों के शपथग्रहण समारोहों की वीडियोग्राफी हो, उनके कामकाज का हर साल सोशल ऑडिट हो और ऐसी प्रणाली विकसित की जाए, जिसके तहत अनुभवी महिला नेता, नई महिला जनप्रतिनिधियों का पथप्रदर्शन करें। रिपोर्ट बताती है कि महिला जनप्रतिनिधियों के पुरुष रिश्तेदार उन बैठकों में भाग लेते हैं, जिनमें घुसने तक का उन्हें अधिकार नहीं है। वे महिला जनप्रतिनिधियों की आधिकारिक सील का इस्तेमाल करते हैं, अधिकारियों को मुंहजबानी निर्देश देते हैं और पंचायतों के खजाने पर उनका पूर्ण नियंत्रण होता है। वास्तविक प्रतिनिधि – उनकी पत्नियां – चूल्हा-चौका करती हैं। 

राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने राज्यों से इस चलन पर रपट मांगी थी और मार्च, 2026 में केंद्रीय पंचायती राज मंत्रालय ने प्रतिनिधि सरपंच को ना कहें (से नो टू प्रॉक्सी सरपंच) नाम से एक जनजागृति अभियान शुरू किया था। इसका उद्घाटन अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर किया गया। लेकिन इसमें एक समस्या है। और यह समस्या राजस्थान के लिए महत्वपूर्ण है। केंद्र सरकार का साफ कहना है कि महिला प्रतिनिधियों के स्वतंत्रतापूर्वक अपने निर्णय न ले पाने की समस्या राज्यों की समस्या है। इसलिए इस सिलसिले में की गई सिफारिशों पर अमल राज्यों को कानून बनाकर और राज्य की चुनाव मशीनरी के ज़रिए करना है। विडंबना यह है कि मार्च में यह जनजागृति अभियान शुरू हुआ और अक्टूबर में महिला उम्मीदवार अपने ही चुनाव प्रचार से गायब हैं। यह इस जनजागृति अभियान की उपादेयता पर एक बड़ा प्रश्नचिह्न है। यह समस्या छोटी-मोटी नहीं है। भारत में करीब 2.63 लाख पंचायतें हैं, जिनमें 32.29 लाख निर्वाचित जनप्रतिनिधि हैं। इनमें से 46.6 प्रतिशत महिलाएं हैं। अतः यह साफ है कि ऐसी महिलाओं की संख्या बहुत बड़ी है जिनके अधिकारों का प्रयोग कोई अन्य व्यक्ति कर रहा हो।

‘क्या आप मजाक कर रहे हैं? वो कहां जाएगी?’

महिलाओं के लिए आरक्षण के नियमों ने यह तो तय कर दिया है कि आरक्षित पदों के लिए केवल महिलाएं ही उम्मीदवार हो सकती हैं। लेकिन इससे लोगों के मानस में सरपंच की छवि में कोई बदलाव नहीं आया है। उनके लिए सरपंच पुरुष ही हो सकता है। जब मैंने अपने गांव के कुछ लोगों से कहा कि महिला उम्मीदवारों को आगे आना चाहिए, मतदाताओं से बात करनी चाहिए और अपने चुनाव प्रचार का नेतृत्व खुद करना चाहिए तो मेरी खिल्ली उड़ाई गई। “क्या आप मजाक कर रहे हैं? वो कहां जाएगी?” इस प्रश्न को मैं भुला नहीं पा रहा।

किसका चुनाव? सरपंच का या सरपंच पति का?

ऐसा नहीं है कि लोगों को लगता हो कि कोई महिला यह सब नहीं कर सकती। उनका तर्क तो यह है कि सार्वजनिक जीवन में महिलाओं के लिए कोई जगह ही नहीं है। उनकी दृष्टि में सरपंच एक ऐसा व्यक्ति होना चाहिए जो खुलकर कहीं भी जा सके, अधिकारियों से मिल सके, बैठकों को संबोधित कर सके और लोगों से संवाद कर सके। और उनकी निगाहों में ऐसा व्यक्ति कोई पुरुष ही हो सकता है। इसलिए पति को ऐसे व्यक्ति के रूप में नहीं देखा जाता है जिसने अपनी पत्नी के पद पर जबरिया कब्ज़ा कर लिया हो। माना यह जाता है कि वही इस पद का हक़दार है, वही सरपंच है। इसलिए मुख्तारी के खिलाफ नियम में व्याप्त खामियों को दूर करने से कुछ होना-जाना नहीं है। सरपंच पतियों को ऐसा नहीं लगता कि वे नियमों के साथ खिलवाड़ कर रहे हैं। वे पूर्णतः आश्वस्त होते हैं कि यह पद उनका ही है और वे उसी के लिए बने हैं।

शिक्षित मुख़्तार

जो चीज़ मुझे और परेशान करती है वह यह है कि यह सोच केवल अशिक्षित और अर्ध-शिक्षित पुरुषों तक सीमित नहीं है। अच्छे-खासे पढ़े-लिखे नौजवान भी यह मानते हैं कि वे ही अपने गांव के नेतृत्व की अगली पीढ़ी हैं। वे यह मानते हैं कि वे योग्य हैं, समर्पित हैं और बदलाव लाने में सक्षम हैं। किसी को भी लग सकता है कि स्थानीय राजनीति में उनका प्रवेश स्वागतयोग्य है और इस बात का संकेत है कि गांवों में पीढ़ीगत बदलाव आ रहा है। लेकिन शिक्षा से स्त्रियों के पुरुषों से निम्न होने की उनकी सोच में कोई अंतर नहीं आता। वे समानता और भाईचारे में अपनी आस्था और अपने गांव के विकास और उसे एक अलग पहचान दिलवाने के प्रति अपनी प्रतिबद्धता पर बार-बार जोर देते हैं। लेकिन वे अपनी पत्नियों, माताओं और लड़कियों को स्वतंत्र रूप से, उनके अपने बल पर राजनीति में हिस्सा लेने की इज़ाज़त देने को तैयार नहीं हैं। वे अपने आप को परिवर्तन का झंडाबरदार बताते हैं, मगर अपने परिवार के दकियानूसीपन में कोई परिवर्तन नहीं लाना चाहते। 

समस्या सामाजिक है

समस्या यह नहीं है कि पुरुषों ने महिला आरक्षण का तोड़ निकाल लिया है। समस्या यह है कि पुरुषों का वर्चस्व समाज को इतना अधिक स्वीकार्य है कि स्थानीय सरकार का प्रकृति बदलने की नीतिगत कवायद, परिवारों के अंदर विद्यमान पदानुक्रम के आगे धराशायी हो गई है। जो महिला अपनी ही चुनाव प्रचार सामग्री में एक कोने में सिमटी नज़र आती है, जो आमसभाओं में भाषण नहीं देती और न ही खुलकर मतदाताओं से मिलती है, उसके लिए अपनी स्वतंत्र राजनीतिक पहचान बनाना मुश्किल होता है। इसका नतीजा होता है सार्वजनिक जीवन में उसकी सीमित उपस्थिति। और फिर इसी तथ्य का इस्तेमाल उसके पति के वर्चस्व को उचित ठहराने के लिए किया जाता है। महिलाओं के लिए आरक्षित सीटों के एक निश्चित क्रम में बदलने (रोटेशन) से इस प्रवृति को बल मिलता है। किसी महिला के निर्वाचित होने को उसके स्वतंत्र राजनीतिक करियर की शुरुआत के रूप में नहीं देखा जाता। उसे उस महिला के परिवार के राजनीतिक प्रभाव को कायम रखने के मौके के रूप में देखा जाता है। राजनीतिक दल, स्थानीय अधिकारी और यहां तक कि मतदाता भी महिला जनप्रतिनिधियों की बजाय के उनके पुरुष मुख्तारों से मुखातिब होना पसंद करते हैं। किसी महिला के चुनाव में जीत हासिल करने से कोई फर्क नहीं पड़ता क्योंकि समाज यह मानता ही नहीं है वह उस पद पर काबिज है।

यह सिर्फ एक तकनीकी मसला नहीं है

इस पूरी समस्या को केवल चीज़ों को देखने का नजरिया बता कर खारिज नहीं किया जा सकता। भारत में महिलाओं के लिए राजनीतिक आरक्षण पर सबसे जाने-माने शोध में राघवेंद्र चट्टोपाध्याय और एस्टर डफ्लो ने पश्चिम बंगाल के बीरभूम और राजस्थान के उदयपुर जिलों में ग्राम पंचायतों का अध्ययन किया। चूंकि किन पंचायतों को महिलाओं के लिए आरक्षित किया जाना है, इसका चयन यादृच्छिक (लॉटरी के जरिए) होता है, अतः हम यह मान सकते हैं कि ऐसी पंचायतों की प्राथमिकताओं में जो भी अंतर हैं, उसकी वजह महिलाओं की उपस्थिति है। अध्ययन में पाया गया कि महिलाओं के नेतृत्व वाली पंचायतों के निर्णय उन आवश्यताओं को पूरा करने वाले थे जो महिलाओं के लिए सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण थीं। जैसे राजस्थान में महिलाओं की सबसे बड़ी शिकायत थी– पीने के पानी की कमी। और महिलाओं के नेतृत्व वाली पंचायतों ने सड़कों के निर्माण को कम प्राथमिकता देते हुए, सबसे ज्यादा धन पेयजल की उपलब्धता सुनिश्चित करने वाले योजनाओं पर खर्च किया।

लेकिन ये निर्णय और उन पर कार्यवाही उन महिला जनप्रतिनिधियों के चलते हो सकी जो उनके पदों द्वारा उन्हें प्रदत्त अधिकारों का स्वयं उपयोग करने की स्थिति में थीं। साफ़ है कि अगर निर्णयकर्ता इन महिलाओं के पति होंगे, तो उस उद्देश्य का कोई अता-पता ही नहीं रहेगा जिसके लिए महिला आरक्षण की व्यवस्था लागू की गई है। दरअसल, प्रतिनिधित्व और निर्णय लेने का अधिकार दो अलग-अलग चीज़ें हैं। निर्वाचित महिला जनप्रतिनिधियों की संख्या हमें केवल यह बताती है कि कितनी महिलाएं औपचारिक रूप से पदासीन हैं। मगर उससे हमें यह पता नहीं चलता कि फैसले कौन लेता है, अफसरों से बातचीत कौन करता है और वह कौन है जो गांव के प्रतिनिधि के रूप में अपनी बात रखता है। यह सब कहने का उद्देश्य राजनीतिक आरक्षण की खिलाफत करना नहीं है। उसके बिना तो कई महिलाओं को स्थानीय शासन व्यवस्था में कदम रखने का मौका भी नहीं मिलता। निस्संदेह महिलाओं के लिए राजनीतिक आरक्षण, उनके सशक्तिकरण के दिशा में पहला कदम है। 

किसे बदलना चाहिए

बदलाव लाने की ज़िम्मेदारी केवल महिलाओं के कंधों पर डालना ठीक नहीं होगा। अगर परिवार, महिलाओं को सार्वजनिक जीवन में हिस्सा लेने से रोकेंगे, अगर अधिकारी निर्वाचित महिला जनप्रतिनिधियों के स्थान पर उनके पतियों से बातचीत करेंगे और अगर मतदाता यह मानकर चलेंगे कि महिला उम्मीदवार नहीं, बल्कि उसके परिवार के पुरुष सदस्य को चुना जाना है तो महिलाओं के लिए सीटें आरक्षित करने का उद्देश्य पूरा नहीं हो सकेगा। राजनीतिक दलों और चुनाव करवाने वाली मशीनरी को यह समझना होगा कि किसी महिला उम्मीदवार के लिए वोट देने और उसके पुरुष रिश्तेदार या परिवारजन को वास्तविक प्रतिनिधि के रूप में देखने में फर्क है। राज्य का चुनाव आयोग कम-से-कम इतना तो कर ही सकता है कि उम्मीदवारों के खुद के चित्र उनकी चुनाव प्रचार सामग्री में छापना अनिवार्य बना दें और यह भी सुनिश्चित करे कि प्रमुख कार्यक्रमों में उम्मीदवार स्वयं उपस्थित रहें। चुनाव आयोग पार्टियों से यह भी कह सकता है कि वह महिला उम्मीदवारों को स्वतंत्र रूप से काम करने के लिए प्रोत्साहित करें। 

राज्य सरकार को केवल जनजागृति अभियानों तक सीमित न रहकर, उसके द्वारा नियुक्त सलाहकार समिति की सिफारिशों पर काम करना चाहिए। महिला जनप्रतिनिधियों के लिए शिकायतें दर्ज कराने कि व्यवस्था, सोशल ऑडिट और कड़ी सजाओं का प्रावधान कर इस प्रवृति को रोका जा सकता है। राज्य सरकार यह निर्देश भी दे सकती है कि सरकारी अधिकारी केवल चुनी हुई महिला जनप्रतिनिधियों से संपर्क रखें और उनके पुरुष परिजनों को कोई मान्यता न दें। महिला जनप्रतिनिधियों के प्रशिक्षण का काम मतदान से पहले ही शुरू हो जाना चाहिए। एक रिपोर्ट के अनुसार, केंद्रीय पंचायती राज मंत्रालय ने दिसंबर, 2025 तक 64,863 महिला पंचायत जनप्रतिनिधियों को प्रशिक्षण प्रदान किया था। यह पंचायतों की 14 लाख महिला जनप्रतिनिधियों का बहुत छोटा-सा हिस्सा है। 

चेहरा और आवाज

मगर केवल चुनाव संबंधी नियमों को बदलने से कुछ नहीं होने वाला। समस्या कहीं अधिक गहरी है। आप कानून बनाकर किसी पद को महिलाओं के लिए आरक्षित कर सकते हैं, परंतु इससे न तो उसके परिवार की सोच बदलती है और न ही उसके गांव की। परिवार के लोग महिलाओं के लिए क्या करना और क्या नहीं करना उचित समझते हैं, उसमें कोई बदलाव नहीं आता और न ही इसमें कि गांव के लोग किसे सामान्य और उचित मानते हैं। ये सारे परिवर्तन एक चुनाव में नहीं आ सकते। जब तक महिला का चेहरा पोस्टर पर नहीं दिखता, जब तक आमसभा में उसकी आवाज सुनाई नहीं देती, जब तक अधिकारी उसे संबोधित नहीं करते तब तक महिलाओं को प्रतिनिधित्व देने का वायदा अधूरा रहेगा। कोई राजनीतिक पद हासिल करने मात्र से महिला को उसकी आवाज हासिल नहीं हो जाती। महिला को चुनना एक बात है। उसे नेतृत्व सौंपना दूसरी बात है।

(अंग्रेजी मूल से अनुवाद : अमरीश हरदेनिया, संपादन : नवल/अनिल)


फारवर्ड प्रेस वेब पोर्टल के अतिरिक्‍त बहुजन मुद्दों की पुस्‍तकों का प्रकाशक भी है। एफपी बुक्‍स के नाम से जारी होने वाली ये किताबें बहुजन (दलित, ओबीसी, आदिवासी, घुमंतु, पसमांदा समुदाय) तबकों के साहित्‍य, संस्‍क‍ृति व सामाजिक-राजनीति की व्‍यापक समस्‍याओं के साथ-साथ इसके सूक्ष्म पहलुओं को भी गहराई से उजागर करती हैं। एफपी बुक्‍स की सूची जानने अथवा किताबें मंगवाने के लिए संपर्क करें। मोबाइल : +917827427311, ईमेल : info@forwardmagazine.in

लेखक के बारे में

नीरज बुनकर

लेखक नाटिंघम ट्रेंट यूनिवर्सिटी, नॉटिंघम, यूनाईटेड किंगडम के अंग्रेजी, भाषा और दर्शनशास्त्र विभाग के डॉक्टोरल शोधार्थी हैं। इनकी पसंदीदा विषयों में औपनिवेशिक दौर के बाद के साहित्य, दलित साहित्य, जाति उन्मूलन, मौखिक इतिहास व सिनेमा आदि शामिल हैं

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