बीते 21 सितंबर, 2026 को पटना स्थित बिहार विधान परिषद के सभागार में वैकल्पिक मीडिया की एक अनोखी तस्वीर नजर आई। कार्यक्रम में ग्रामीण समाज की महिलाएं मौजूद थीं, जिन्होंने अपने गांव-जवार की समस्याओं और महिलाओं की समस्याओं को अपनी पत्रकारिता का केंद्र बनाया। ‘अप्पन समाचार’ से जुड़ी इन महिलाओं की अपनी कहानी पर आधारित एक किताब का लोकार्पण किया गया तथा इस मौके पर ‘मुख्यधारा की मीडिया और वैकल्पिक पत्रकारिता’ विषयक संगोष्ठी का आयोजन किया गया। इसके पहले ‘अप्पन समाचार’ की रिपोर्टिंग टीम की महिला पत्रकारों – सिमरन सहनी, अनिता कुमारी, काजल कुमारी, नेहा कुमारी, प्रियंका कुमारी, गुड़िया कुमारी, ट्विंकल कुमारी, रिमझिम कुमारी, प्रियंका कुमारी, वंदना कुमारी और नैना सुहानी – को सम्मानित किया गया। लगभग दो दशक पूर्व कस्बाई और ग्रामीण इलाके में शुरू की गई उनकी पत्रकारिता की सभी वक्ताओं ने सराहना की।
मुख्य अतिथियों में दिल्ली से आए वरिष्ठ पत्रकार अनिल चमड़िया, पूर्व राज्यसभा सदस्य एवं वरिष्ठ पत्रकार अली अनवर, अनिल चमड़िया, वरिष्ठ पत्रकार हेमंत कुमार, पटना साइंस कॉलेज की प्राचार्य अलका यादव, राजकीय डिग्री कॉलेज चनपटिया पश्चिम चंपारण के प्राचार्य सह सीनेटर प्रो. संजय कुमार सुमन और संतोष सारंग आदि शामिल रहे।
कार्यक्रम के आरंभ में संगोष्ठी के संचालक डॉ. सुशांत कुमार ने कहा कि जिस समय सोशल मीडिया की धूम भी नहीं थी, उससे पहले संतोष सारंग ने गांव की किशोरियों को ‘अप्पन समाचार’ के माध्यम से प्रशिक्षित किया। मुजफ्फरपुर के सुदूर पिछड़े गांव से इस अभियान की शुरुआत हुई और कम समय में इसका असर दिखाई देने लगा। वर्ष 2007 में संतोष सारंग के मन में इस न्यूज नेटवर्क का विचार आया और इसके लिए उन्होंने मुजफ्फरपुर के अत्यंत पिछड़े गांव की महिलाओं का चयन किया। ग्रामीणों के मन में इस अभियान को लेकर कई तरह की आशंकाएं थीं, लेकिन काम आगे बढ़ने के साथ लोगों का कारवां भी बनता गया।
मीडिया कंपनियों की पत्रकारिता को ‘मुख्यधारा’ कहना बंद कीजिए
इस परिचयात्मक उद्बोधन के उपरांत संगोष्ठी के विषय पर बातें आरंभ हुईं। अपने संबोधन में मुख्य वक्ता अनिल चमड़िया ने कहा कि हिंदी मीडिया को मुख्यधारा की मीडिया कहना कहीं से भी संगत नहीं है। इसे मीडिया कंपनियां चलाती हैं और इनमें सीमेंट या जूट बनाने वाली कंपनियां भी शामिल रही हैं, जिनका लोकतंत्र से कोई सीधा रिश्ता नहीं रहा है। लोकतंत्र का चौथा स्तंभ मीडिया नहीं, बल्कि संविधान के अनुच्छेद 19 में प्रदत्त अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार है।

उन्होंने कहा कि हम अनावश्यक रूप से इसे महिमामंडित करते रहे हैं और इसके विकल्प की बात करते रहे हैं, जबकि सच यह है कि ‘मुख्यधारा की मीडिया’ की यह अवधारणा ही सवालों के घेरे में है। उन्होंने कहा कि पहले प्रेस आयोग की रिपोर्ट पर 1955 में संसद में हुई बहस के दौरान मीडिया को लेकर जो चिंताएं व्यक्त की गई थीं, उनमें से अनेक चिंताएं आज 2026 में भी बनी हुई हैं। टेलीविजन और प्रिंट मीडिया की बात करें तो इसके बड़े हिस्से पर लगभग 50 कारोबारी घरानों के नियंत्रण की चर्चा होती रही है। इसलिए मीडिया कंपनियों की पत्रकारिता को मुख्यधारा की पत्रकारिता कहना बंद करना चाहिए।
चमड़िया ने कहा कि हमारे समय की विडंबना यह है कि हम बात समाजवाद की करते हैं, लेकिन जीना पूंजीवाद में चाहते हैं। हम ठहरे हुए लोग हैं और आज इसी ठहराव को तोड़ने की जरूरत है। यह कैसे हो सकता है, इस पर गंभीरता से विचार करना होगा। उन्होंने सवाल उठाया कि लोकतंत्र का चौथा स्तंभ क्या है? मीडिया को चौथा स्तंभ क्यों कहा जाता है और यह धारणा कहां से आई? लोकतंत्र की पूरी अवधारणा हमारे संविधान में लिपिबद्ध है। संविधान के अनुच्छेद 19 में नागरिकों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता दी गई है। इसका मतलब है कि लोकतंत्र का चौथा स्तंभ अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार है। लेकिन सारी शक्ति कंपनियों के हवाले कर दी गई है।
चमड़िया ने आजादी के आंदोलन में मीडिया की भूमिका का संदर्भ देते हुए सवाल उठाया कि उस दौर में किन कंपनियों के अखबारों की भूमिका थी? उन्होंने कहा कि एक दौर में छोटे-छोटे अखबारों की जो भूमिका थी, वह आज लगभग खत्म कर दी गई है। यह सही है कि ऐसे अखबार सीमित संख्या में निकलते थे, लेकिन उनका प्रभाव बहुत व्यापक था। बंगाल से कोई अखबार निकलता था तो पंजाब तक पहुंचता था। तब हर जिले में ऐसे छोटे-छोटे अखबार होते थे, जो जनता की आवाज मुखर करते और सत्ता को असहज करते थे। इन अखबारों और उनके प्रयासों को समाज के हाशिये पर डाल दिया गया।
आज की पत्रकारिता की चर्चा करते हुए अनिल चमड़िया ने कहा कि एल्गोरिदम ने हमें एक खास तरह के वातावरण में घेर लिया है और तकनीक ने हमें पूरी तरह अपने नियंत्रण में ले लिया है। यह एक बड़ी चुनौती है। हम दौड़ते हुए दिखाई देते हैं, लेकिन वास्तव में ठहरे हुए हैं। उन्होंने कहा कि हम खुद को आधुनिक सिद्ध करते हैं, लेकिन विचारों में उतने ही पीछे हैं। आधुनिकता का संबंध हमेशा विचारों से होता है।
‘अप्पन समाचार’ की चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि यह बहुत अच्छा काम किया गया है। इसे वे दस्तावेजीकरण की दिशा में एक महत्वपूर्ण प्रयास के रूप में देखते हैं। हाशिये के समाज से आने वाली लड़कियों ने समाज को जागरूक करने की दिशा में एक अलग तरह का काम किया है। उन्होंने कहा कि इन लड़कियों ने एक चुनौतीपूर्ण काम पूरा किया है। मीडिया कंपनियां पत्रकारों से अपने हित में काम करवाती हैं और वे कभी नहीं चाहतीं कि व्यापक दायरे में समाज को देखने और उसका विश्लेषण करने की क्षमता पत्रकारों में विकसित हो। कम्युनिटी रेडियो समाज की व्यापक चिंताओं का मंच बने, यह अच्छी बात है। उन्होंने कहा कि यदि तकनीक लोकतंत्र के सवालों पर गुस्सा करने के बजाय केवल आपका मनोरंजन करने लगे तो यह दुखद है। तकनीक की क्षमता को हमेशा व्यापक सामाजिक सवालों की परिधि में देखना चाहिए।
कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए राजकीय डिग्री कॉलेज चनपटिया, पश्चिम चंपारण के प्राचार्य प्रो. (डॉ.) संजय कुमार सुमन ने कहा कि ‘अप्पन समाचार’ समाज और सत्ता के घातक प्रश्नों के खिलाफ आवाज उठाने की एक सशक्त पहल का खूबसूरत दस्तावेजीकरण है। उन्होंने कहा कि जब अखबारों का नियंत्रण बड़ी-बड़ी कंपनियां करने लगें तो यह चिंता का विषय है कि हमारा लोकतंत्र और संविधान किस रूप में सुरक्षित है।

स्वतंत्रता आंदोलन के दौर की चर्चा करते हुए प्रो. सुमन ने कहा कि तब पत्रकार छोटे-छोटे कमरों में बैठकर बहुत श्रम से पत्र-पत्रिकाएं निकाला करते थे। विषम परिस्थितियों में पुलिस और खुफिया तंत्र उनके पीछे लग जाता था और उन्हें जान जोखिम में डालकर वहां से भागना पड़ता था। पत्रकारिता को लेकर जो जोखिम उस दौर में था, वह आज भी कम नहीं हुआ है। ‘अप्पन समाचार’ की इन बेटियों ने भी कम जोखिम नहीं उठाए। उन्होंने अपने पंचायत के अधिकारियों के पसीने छुड़ाए और अपने आसपास सकारात्मक वातावरण पैदा किया। उन्होंने कहा कि जातियों में बंटे भारतीय समाज में जब तक जातियों के भीतर का श्रेष्ठताबोध खत्म नहीं होगा, तब तक समाज का भला नहीं हो सकता।
अली अनवर ने दिया 1986 में हुए अरवल गोलीकांड का उदाहरण
पूर्व राज्यसभा सदस्य एवं वरिष्ठ पत्रकार अली अनवर ने कहा कि संतोष सारंग बधाई के पात्र हैं कि उन्होंने हमारी बहन-बेटियों की ऐसी टीम तैयार की, जो समाज के लिए नजीर बन सकती है। इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ मास कम्यूनिकेशंस (आईआईएमसी), दिल्ली, की डिग्री लेकर बहुत सारे लोग पत्रकारिता कर रहे हैं, यह नई बात नहीं है, लेकिन सुदूर गांवों से हाशिये के समाज की बच्चियों को तैयार करना और उन्हें पत्रकारिता से जोड़ना अनोखा काम है। यह ऐसी मिसाल है, जिस पर समाज का ध्यान जाना चाहिए।
उन्होंने कहा कि मेनस्ट्रीम मीडिया आज हास्यास्पद स्थिति में पहुंच गई है और ऐसे में उम्मीद सोशल मीडिया से बनती है। अपने पत्रकारिता जीवन की चर्चा करते हुए अली अनवर ने कहा कि वे ‘एक्सीडेंटल पत्रकार’ हैं। उन्होंने पत्रकारिता की औपचारिक पढ़ाई नहीं की, लेकिन हमेशा एक एक्टिविस्ट की तरह काम किया। राज्यसभा में भी इसी अंदाज में काम किया। व्यवस्था के खिलाफ लिखना ही उनकी असली जवाबदेही रही है।
अली अनवर ने बिहार विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष के पद से कर्पूरी ठाकुर को हटाए जाने की घटना का उल्लेख करते हुए कहा कि उस समय बिहार विधानसभा अध्यक्ष शिवचंद्र झा ने उन्हें नेता प्रतिपक्ष के पद से हटा दिया था। बाद में जब शिवनंदन पासवान विधानसभा के कार्यकारी अध्यक्ष बने तो उन्होंने नियमन देकर कर्पूरी ठाकुर को पुनः नेता प्रतिपक्ष घोषित किया। लेकिन व्यवस्था की निर्ममता यह थी कि इसके लिए विधानसभा अध्यक्ष के नाम की पट्टिका से उनका नाम हटा दिया गया। उन्होंने इसे ऐसा न्याय बताया, जिसे इतिहास दर्ज करेगा।
अपने पत्रकारिता जीवन का एक अनुभव साझा करते हुए अली अनवर ने बताया कि उस समय वे ‘जनशक्ति’ में काम करते थे। सन् 1986 में बिहार के अरवल जिले में तत्कालीन एसपी सी.आर. कस्वां के कार्यकाल में आठ लोगों की हत्या पुलिस द्वारा कर दी गई थी। उस समय बिहार के किसी बड़े अखबार में इसकी खबर नहीं छपी। वे स्वयं वहां गए तो पता चला कि जिन लोगों को एनकाउंटर में मारा बताया गया था, वे सभी गरीब मजदूर थे और सिंचाई विभाग की जमीन पर रह रहे थे। इलाके के एक प्रभावशाली व्यक्ति ने उन्हें वहां से विस्थापित कर दिया था। इसके बाद वे लाल झंडा लेकर प्रदर्शन करने के बाद वहीं सभा कर रहे थे। आरोप है कि एसपी ने उन्हें घेर लिया और जलियांवाला बाग की तर्ज पर उनकी हत्या कर दी गई। उनकी खबर एक छोटे अखबार में प्रकाशित हुई और बाद में उसके प्रभाव से दूसरे अखबारों ने भी इसे प्रकाशित किया।
अली अनवर ने ‘अप्पन समाचार’ की पहल की सराहना करते हुए कहा कि यह काम आगे चलकर प्रभाव पैदा करेगा और समाज के दूसरे लोग भी इसका अनुकरण करेंगे। उन्होंने बताया कि आपातकाल के दौर में भी उन्होंने ‘मुस्तकबिल’ के संवाददाता के रूप में अपने अनुमंडल से काम किया। छह महीने तक उसका खौफ रहा और फिर धीरे-धीरे परिस्थितियां सामान्य हुईं। उन्होंने वर्तमान दौर को अघोषित आपातकाल बताते हुए कहा कि पहले कुछ बड़े पत्रकार बिकते थे, अब पूरी मीडिया कंपनियों के बिक जाने की बात सामने आती है। उनके अनुसार इस दौर में सोशल मीडिया ही मेनस्ट्रीम मीडिया की भूमिका निभा रहा है और वह अधिक विश्वसनीय है। उन्होंने आंदोलनों में पत्रकारों के साथ होने वाली बदसलूकी पर भी चिंता जताई।
उन्होंने बिहार के नोनही नगमा की घटना का उल्लेख किया, जिसमें वीरेंद्र विद्रोही नामक राजनीतिक कार्यकर्ता ने तत्कालीन मुख्यमंत्री के चेहरे पर कालिख पोत दी थी। उस घटना की तस्वीर कृष्ण मुरारी किशन ने खींची थी। पुलिस ने उनका पीछा किया, लेकिन वे पकड़ में नहीं आए। अली अनवर ने सवाल उठाया कि क्या आज के दौर में ऐसी घटना और उसका स्वतंत्र दस्तावेजीकरण संभव है? उन्होंने गौरी लंकेश की हत्या का भी उल्लेख किया और कहा कि ऐसे समय में ‘अप्पन समाचार’ जैसी पहल आने वाले समय के लिए नजीर बन सकती है।
आम जनता से जुड़ी आवाजें ऊपर तक नहीं पहुंच रहीं
वरिष्ठ कथाकार संतोष दीक्षित ने कहा कि ‘अप्पन समाचार’ सामुदायिक स्तर पर मीडिया में किए गए अच्छे काम का दस्तावेज है। उन्होंने कहा कि विज्ञापनों से भरे आज के समाचार माध्यम सरकार के अधिक मुखापेक्षी हो गए हैं। पत्रकारिता का मुख्य काम सूचना देना और निगरानी रखना है, लेकिन यह दुखद है कि आम जनता से जुड़ी आवाजें ऊपर तक नहीं पहुंच रही हैं। इसकी मुख्य वजह यह है कि समाचार पत्र बड़े-बड़े कॉरपोरेट घरानों की इजारेदारी में आ गए हैं और जनता के मुद्दों की उपेक्षा की जा रही है।
उन्होंने कहा कि आम लोगों का इस मीडिया से भरोसा लगभग उठ गया है। आज वैकल्पिक मीडिया की जरूरत सबसे अधिक महसूस हो रही है। नागरिक पत्रकारिता कई मामलों में अच्छी है, लेकिन कुछ मामलों में खतरनाक भी हो सकती है। मुख्यधारा की मीडिया में एक अच्छी बात यह थी कि किसी घटना को संवाददाता संज्ञान में लेता था और वह संपादक के माध्यम से गुजरकर खबर बनती थी। वैकल्पिक मीडिया में संपादक की भूमिका कमजोर हुई है, इसलिए मनमानियां भी बढ़ी हैं और किसी तरह का नियंत्रण नहीं रह गया है। ‘अप्पन समाचार’ के संवाददाताओं की प्रशंसा करते हुए उन्होंने कहा कि वे उनकी आवाज का स्वागत करते हैं और यह आवाज दूर तक जाएगी, बशर्ते वे अपनी चुप्पियों को भी हथियार बनाएं।
ऐसे बना ‘अप्पन समाचार’ का कारवां
संतोष सारंग ने अकबर इलाहाबादी की प्रसिद्ध कविता – खींचो न तलवारों को, न कमान निकालो / जब तोप मुकाबिल हो तो अखबार निकालो – को उद्धृत करते हुए सवाल उठाया कि आखिर किसके लिए अखबार निकालें? उन्होंने कहा कि मुख्यधारा के मीडिया की हालत सामने है और वह गोदी मीडिया के रूप में देखी जा रही है। मुजफ्फरपुर के पारू प्रखंड के दियारा इलाके में जब ‘अप्पन समाचार’ की बुनियाद रखी गई थी, तब वह इलाका बेहद खतरनाक माना जाता था। वहां दिन-दहाड़े गोलियां चलती थीं। इसके बावजूद पंकज सिंह और अमृतांज इंदीवर जैसे मित्रों की मदद से 45 मिनट की पहली बुलेटिन तैयार की गई।
उन्होंने कहा कि यह पहल सत्ता या पूंजीपतियों के किसी गिरोह के खिलाफ खड़ी करने के लिए नहीं, बल्कि गांव, गरीबों, मजदूरों और किसानों की समस्याओं को अभिव्यक्ति देने के लिए शुरू की गई थी। 45 मिनट की इस बुलेटिन को प्रोजेक्टर के माध्यम से लोगों को दिखाया जाता था। इसका व्यापक सामाजिक प्रभाव देखने को मिला। इस काम को आगे बढ़ाने में दियारा इलाके की लड़कियां सामने आईं। हमने सोचा कि यदि इस काम का दस्तावेजीकरण नहीं किया गया और इन बहादुर लड़कियों की कहानियां सामने नहीं आईं तो एक प्रेरक कहानी खत्म हो जाएगी। आज इस पहल पर कई विश्वविद्यालयों में शोध हो रहे हैं। गांव के वंचित समुदाय की इन बेटियों की कहानी को सुशांत कुमार और अमृतांज इंदीवर ने पुस्तक का रूप दिया है।
पटना साइंस कॉलेज की प्राचार्य अलका यादव ने कहा कि आज का दिन अभिमान का दिन है। हमारी बेटियों ने अरसा पहले जो संघर्ष शुरू किया था, आज उन्होंने उस संघर्ष की एक महत्वपूर्ण यात्रा पूरी की है। उनका यह काम महिलाओं को हर स्तर पर आगे ले जाने में मदद करेगा।
वरिष्ठ पत्रकार हेमंत कुमार ने सवाल उठाया कि मुख्यधारा की मीडिया की भूमिका आखिर किधर है? उन्होंने कहा कि यह मीडिया आज जनता के साथ खड़ी नहीं दिखाई देती, इसलिए जनता के पास विकल्प के रूप में सोशल मीडिया है। इसने समानांतर मंच के रूप में जनता के बीच अपनी पहुंच बनाई है और लोगों को अपनी बात कहने का अवसर दिया है। बेरोजगारी, महंगाई, भ्रष्टाचार और सरकारी योजनाओं के क्रियान्वयन जैसे मुद्दों को सोशल मीडिया ने जगह दी है। इसने हाशिये के समाज को बोलने का मंच दिया और अपनी बात सबके सामने रखने का हुनर सिखाया।
उन्होंने कहा कि संतोष सारंग ने एक ऐसी टीम खड़ी की है, जो समाज के लिए मिसाल है। हाशिये के समाज से आने वाली इन लड़कियों को उन्होंने एक सलीका और एक लहजा दिया है। संभव है कि कुछ लोगों को यह भदेस पत्रकारिता पसंद न आए, लेकिन यह जनमुद्दों की पत्रकारिता का एक महत्वपूर्ण मंच बनकर उभरा है। उन्होंने सवाल किया कि जेन-जी के आंदोलनों में मेनस्ट्रीम मीडिया कहां था? उनके अनुसार उस समय वैकल्पिक मीडिया ने इन आंदोलनों को जगह दी। यह रास्ता आगे और खुल सकता है।
धन्यवाद ज्ञापन करते हुए अमृतांज इंदीवर ने ‘अप्पन समाचार’ शुरू करने की पृष्ठभूमि बताई। उन्होंने कहा कि उस समय जिला स्तर का कोई अधिकारी भी अपने लाव-लश्कर के साथ वहां मुश्किल से पहुंच पाता था। नदी किनारे का वह दियारा इलाका ऐसा ही था। इसी वातावरण और परिवेश में संतोष सारंग ने गांव में ‘अप्पन समाचार’ को खड़ा किया। पहले वे स्वयं जुड़े, फिर उनके प्रयास से अनीता कुमारी, खुश्बू, रूबी कुमारी, पिंकी कुमारी, अनिता राम, सविता कुमारी, अश्विनी पासवान, जुबेहा खातून जैसी लड़कियां तैयार हुईं और उसके बाद गांव में लड़कियों की एक और टीम बनी। लोगों ने कहा कि यह लड़कियों को बर्बाद कर रहा है, लेकिन जब यह टीम तैयार हुई तो दुनिया भर से मीडिया के छात्र-छात्राएं वहां पहुंचने लगे।
उन्होंने बताया कि लगभग दस वर्ष बाद यह पहल बंद हो गई। इतने वर्षों में सामूहिक प्रयास से जो सकारात्मक वातावरण बना था, वह फिर से छिन्न-भिन्न होने लगा। गांव एक बार फिर अराजकता की ओर बढ़ने लगा। ऐसे समय में तीनों ने मिलकर इस पहल को पुस्तक का रूप देने का निर्णय लिया। उन्होंने कहा कि आज गांव में तेजी से शहरीकरण फैल रहा है और प्रदूषण बढ़ रहा है। युवा नकारात्मक खबरों में लगे हैं, विकासात्मक लेखन लगभग नहीं हो रहा। नीम और बरगद काटे जा रहे हैं, कुएं और तालाब भरे जा रहे हैं। आज फिर गांव को एक मजबूत इकाई के रूप में खड़ा करने की जरूरत है और इस काम में युवाओं तथा लड़कियों की बड़ी भूमिका होनी चाहिए।
इस अवसर पर शैलेंद्र कुमार, संजीव चंदन, अरविंद पासवान, भीष्म कुमार, डॉ. हेम नारायण विश्वकर्मा, भूपाल भारती, डॉ. अविनाश कुमार, सिद्धांत सारंग, शत्रुघ्न साहू, फुलदेव पटेल, अजय शर्मा, राकेश कुमार सहित अनेक लोग उपस्थित थे।
(संपादन : नवल/अनिल)
फारवर्ड प्रेस वेब पोर्टल के अतिरिक्त बहुजन मुद्दों की पुस्तकों का प्रकाशक भी है। एफपी बुक्स के नाम से जारी होने वाली ये किताबें बहुजन (दलित, ओबीसी, आदिवासी, घुमंतु, पसमांदा समुदाय) तबकों के साहित्य, संस्कृति व सामाजिक-राजनीति की व्यापक समस्याओं के साथ-साथ इसके सूक्ष्म पहलुओं को भी गहराई से उजागर करती हैं। एफपी बुक्स की सूची जानने अथवा किताबें मंगवाने के लिए संपर्क करें। मोबाइल : +917827427311, ईमेल : info@forwardmagazine.in
